लाली देखन मैं चली, मैं भी हो गयी लाल!

♦ याज्ञवल्‍क्‍य वशिष्‍ठ

हॉल से निकल कर जब बाहर आया, तो मुझे जाने क्‍यों, मगर लाली बहुत याद आयी। या शायद केवल लाली ही नहीं, कई और भी चेहरे, जिनके जीवन स्‍तर को लेकर कोई बहुत लिखी जाने वाली बात नहीं है, मगर अगर कुछ इन सबमें सारी असमानताओं के भी समान था, तो वह यह कि, फिल्‍मों को लेकर इन सबमें एक्‍साइटमेंट था।

मैं इन कई जाने-पहचाने चेहरों को न चाहते हुए भी याद करते जा रहा था। यह सारे चेहरे एकीकृत मध्‍यप्रदेश के एक इलाके में कभी दिखा करते थे। वह इलाका जो न तो पूरा कस्‍बा था न पूरा गांव न पूरा शहर … पर ये चेहरे जो मेरे जेहन में घूम रहे थे …

फिल्‍में इन लड़कियों के लिए ही बनती हैं। मैं सिल्‍क स्मिता पर बनी पिक्‍चर देखने गया था, लेकिन जब वहां से निकला और देर तक सोचता रहा तो लगा मैं तो कई सिल्‍क को जानता हूं, क्‍योंकि मुझे याद आया कि जिन्‍हें मैं याद कर रहा हूं, उन्‍होने जिंदगी का एक हिस्‍सा सिल्‍क की तरह ही जीया … और यह जिंदगी जो उन्‍होने जी, उसने इन कई लालियों को गैरेज वाला सरदार प्रेमी दिया, चटकीली साड़ी और क्रीम पाउडर दिया। बेहद बोझिल और जंग लगी सी जिंदगी को एक अजीब मगर शायद उनके लिए बेहद जरूरी लूब्रिकेंट दिया।

यह सब न होता, अगर ये लाली और उन जैसी लड़कियां फिल्‍में न देखतीं। काम करना और कमाई को अम्‍मा को देना ही जिंदगी नहीं है, यह बात लाली ने फिल्‍मों से ही सीखी।

दरअसल मैंने द डर्टी पिक्‍चर देखते वक्‍त यह महसूस किया, यह फिल्‍म पूरी शिद्दत से बताती है कि सिल्‍क फिल्‍मों में काम करने की दीवानी थी लेकिन उसके पहले वह फिल्‍मों की दीवानी थी और सिल्‍क की जिंदगी वहीं से बदली, जिस दिन उसने पहली बार सिनेमा देखा होगा … और अगर सिनेमा जिंदगी बदलने का मसला है, तो मैं दावे से कह सकता हूं मैं कई सिल्‍क को जानता हूं …

लाली घरों में काम करने वाली लड़की थी … कमली, गेंदा और चंपा यह भी उसकी सहेलियां थीं … सहेली यूं कि जिंदगी के जीने का अदांज एक सा था … इन्‍हें उस कस्‍बेनुमा गांव में अगर कुछ अच्‍छा लगता था, तो वह छोटा वीडियो हॉल ही था।

फिल्‍मों में हीरो जैसा तो इन्‍हें नहीं मिला, पर फिर भी इन सबने अपने अपने हीरो चुन लिये। किसी के लिए वो गैरेज वाला सरदार तो किसी के लिए पान ठेला चलाने वाला बबलू। इन फिल्‍मों ने इन्‍हें रेखा तो नहीं बनाया, लेकिन फिर भी इन्‍होंने यह जान लिया कि कुछ ऐसा है जो उस फिल्‍म वाली और इनमें समान है … बिल्‍कुल उसी तरह जैसे डर्टी पिक्‍चर में सिल्‍क ने जान लिया।

मैं नहीं जानता कि लाली और उसकी सहेलियां अब कहां हैं? कभी जाऊंगा उस कस्‍बेनुमा गांव में, जो अब भी शहर बनने को मचल रहा है तो पता करूंगा कि लाली और उसकी सहेलियां कहां हैं। यह भी हो सकता है कि वो लाली और उसकी सहेलिया न मिलें, पर शायद एक नये चेहरे के साथ एक नयी लाली दिख जाए। लेकिन फिर भी चाहूंगा कि मैं जान सकूं कि आखिर लाली और उसकी सहेलियों का आखिर हुआ क्‍या…

(याज्ञवल्‍क्‍य वशिष्‍ठ। छत्तीसगढ़ के वरिष्‍ठ पत्रकार। खबरनवीसी नाम की मीडिया कंपनी से जुड़े हैं। ब्‍लॉग अपनी बात अपनों से। yagnyawalky@gmail.com पर संपर्क करें।)

You may also like...

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *