बगावत के शायर अदम गोंडवी आखिर चले ही गये!

आज सुबह पांच बज कर दस मिनट पर जनकवि अदम गोंडवी ने लखनऊ के पीजीआई हॉस्‍पीटल में आखिरी सांसें ले ही लीं। तब, जबकि उनकी सेहत में सुधार की खबरें लगातार आ रही थीं, इस मनहूस खबर ने सबको चौंका दिया है। इस बीच उनकी मदद के लिए आगे आये लोगों का शुक्रिया। कविता कोश पर उनके बारे में चंद वाक्‍य छपे हुए हैं, जो उनके जीवन और उनकी शायरी के बारे में एक संक्षिप्‍त परिचय देते हैं। पढ़िए जरा… मॉडरेटर


♦ अदम गोंडवी की कुछ कविताएं यहां पढ़ें: जनता के पास एक ही चारा है बगावत

♦ उनके इलाज से जुड़ी दो अलग अलग अपील यहां हैं, जिसका अब शायद कोई मतलब नहीं: अदम जनता के कवि हैं, उन्‍हें बचाने के लिए आगे आएं और अदम गोंडवी को बचाना बगावत की कविता को बचाना है!

♦ अदम की बाकी कविताएं यहां पढ़ें: कविताकोश

22 अक्तूबर 1947 को गोस्वामी तुलसीदास के गुरु स्थान सूकर क्षेत्र के करीब परसपुर (गोंडा) के आटा ग्राम में स्व श्रीमती मांडवी सिंह एवं श्री देवी कलि सिंह के पुत्र के रूप में बालक रामनाथ सिंह का जन्म हुआ जो बाद में “अदम गोंडवी” के नाम से सुविख्यात हुए।

अदम गोंडवी कबीर की परंपरा के कवि थे। अंतर यही कि अदम ने कागज-कलम छुआ, पर उतना ही जितना किसान ठाकुर के लिए जरूरी था।

देखना सुनना व सच कहना जिन्हें भाता नहीं
कुर्सियों पर फिर वही बापू के बंदर आ गये

कल तलक जो हाशिये पर भी न आते थे नजर
आजकल बाजार में उनके कलेंडर आ गये

दुष्यंत ने अपनी गजलों से शायरी की जिस नयी राजनीति की शुरुआत की थी, अदम ने उसे उस मुकाम तक पहुंचाने की कोशिश की है, जहां से एक-एक चीज बगैर किसी धुंधलके के पहचानी जा सके।

जो उलझ कर रह गयी है फाइलों के जाल में
गांव तक वह रौशनी आएगी कितने साल में

बूढ़ा बरगद साक्षी है किस तरह से खो गयी
राम सुधि की झौपड़ी सरपंच की चौपाल में

खेत जो सीलिंग के थे सब चक में शामिल हो गये
हम को पट्टे की सनद मिलती भी है तो ताल में

मुशायरों में घुटनों तक मटमैली धोती, सिकुड़ा मटमैला कुरता और गले में सफेद गमछा डाले एक ठेठ देहाती इंसान, जिसकी ओर आपका शायद ध्यान ही न गया हो, यदि अचानक माइक पे आ जाए और फिर ऐसी रचनाएं पढ़े कि आपका ध्यान और कहीं जाए ही न, तो समझिए वो इंसान और कोई नहीं अदम गोंडवी हैं। उनकी निपट गंवई अंदाज में महानगरीय चकाचौंध और चमकीली कविताई को हैरान कर देने वाली अदा सबसे जुदा और विलक्षण है।

किसको उम्मीद थी जब रौशनी जवां होगी
कल के बदनाम अंधेरों पे मेहरबां होगी

खिले हैं फूल कटी छातियों की धरती पर
फिर मेरे गीत में मासूमियत कहां होगी

आप आएं तो कभी गांव की चौपालों में
मैं रहूं या न रहूं भूख मेजबां होगी

अदम शहरी शायर के शालीन और सुसंस्कृत लहजे में बोलने के बजाय ठेठ गंवई दो टूकपन और बेतकल्लुफी से काम लेते थे। उनके कथन में प्रत्यक्षा और आक्रामकता और तड़प से भरी हुई व्यंग्मयता है।

वस्तुतः ये गजलें अपने जमाने के लोगों से ‘ठोस धरती की सतह पर लौट’ आने का आग्रह कर रही हैं।

गजल को ले चलो अब गांव के दिलकश नजारों में
मुसलसल फन का दम घुटता है इन अदबी इदारों में

अदीबों ठोस धरती की सतह पर लौट भी आओ
मुलम्मे के सिवा क्या है फलक के चांद तारों में

अदम की शायरी में आज जनता की गुर्राहट और आक्रामक मुद्रा का सौंदर्य मिसरे-मिसरे में मौजूद है, ऐसा धार लगा व्यंग है कि पाठक का कलेजा चीर कर रख देता है। आप इस किताब का कोई सफा पलटिए और कहीं से भी पढ़ना शुरू कर दीजिए, आपको मेरी बात पर यकीन आ जाएगा।

काजू भुने पलेट में व्हिस्की गिलास में
उतरा है रामराज्‍य विधायक निवास में

पक्के समाजवादी हैं तस्कर हों या डकैत
इतना असर है खादी के उजले लिबास में

जनता के पास एक ही चारा है बगावत
यह बात कह रहा हूं मैं होशो हवास में

अदम साहब की शायरी में अवाम बसता है, उसके सुख-दुःख बसते हैं, शोषित और शोषण करने वाले बसते हैं। उनकी शायरी न तो हमें वाह करने के अवसर देती है और न आह भरने की मजबूरी परोसती है। सीधे सच्चे दिल से कही उनकी शायरी सीधे सादे लोगों के दिलों में बस जाती है।

बेचता यूं ही नहीं है आदमी ईमान को
भूख ले जाती है ऐसे मोड़ पर इंसान को

सब्र की इक हद भी होती है तवज्जो दीजिए
गर्म रक्खें कब तलक नारों से दस्तरखान को

शबनमी होंठों की गर्मी दे न पाएगी सुकून
पेट के भूगोल में उलझे हुए इंसान को

You may also like...

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *