कहते हैं भिखारी, ‘बरजत रहलन बाप मतारी’

♦ अश्विनी कुमार पंकज

भारत की हिंदी पट्टी में सांस्कृतिक रूप से कलाओं को सम्मान नहीं है। सांस्कृतिक रूप से ‘विपन्न’ दृष्टि वाले इस समाज में विभिन्न कलाएं और कलाकार विद्रोही होकर ही अपने लिए स्पेस बनाते रहे हैं। इनमें 18 दिसंबर 1887 को जन्मे भिखारी ठाकुर एक ऐसे सार्वकालिक विद्रोही कलाकार हैं, जिन्होंने एक नयी रंगशैली को लोकप्रिय बनाते हुए कला और कलाकार दोनों की गरिमा स्थापित की। अपने समय में अनेक नाटकों से समाज की वर्जनाओं को तोड़ते हुए उन्होंने समूची हिंदी पट्टी में व्याप्त सामंती संस्कारों पर प्रहार किया और कला के सामाजिक सरोकारों को सोद्देश्य रंगकर्म से रेखांकित किया। 10 जुलाई 1971 को उनका देहांत हुआ। यदि मान लिया जाए कि वे 1960 तक सक्रिय रहे होंगे, तो आज 50 साल बाद भी हिंदी पट्टी में कलाओं के प्रति समाज के रवैये में कोई विशेष बदलाव नहीं आया है। कलाकर्म अब भी जीविका के लिहाज से एक ‘अनुत्पादक’ काम माना जाता है। टीवी चैनलों पर होने वाले रीयलिटी कार्यक्रमों की वजह से नाच-गानों में भागीदारी जरूर बढ़ी है, फिर भी दिखावे के ग्लैमरस शोज के बाहर गीत-संगीत और नाट्य अध्ययन संस्थानों व समूहों में सन्नाटा ही पसरा हुआ है।

कलाएं अपने आंतरिक चरित्र में मूलतः बाजार की अपेक्षा समाजोन्मुखी होती हैं। कमर्शियल कंसर्ट, थिएटर, टीवी और सिनेमा उन्हीं कला उत्पादों को प्रोत्साहित करते हैं, जो बिकने लायक होती हैं। बिकने लायक कौन है, इसे बाजार तय करता है। वह बाजार को नियंत्रित करनेवाली शक्तियों के हितों के अनुरूप मनोरंजन का फार्मूला गढ़ता है और उन कलाकारों को प्रमोट करता है, जो उसके फार्मूले के तहत कलाकर्म करने लगते हैं। इस संदर्भ में भिखारी ठाकुर एक ऐसी मिसाल हैं, जिन्होंने न सिर्फ बाजार के फार्मूले का प्रतिकार किया बल्कि इस अवधारणा को फिर से प्रतिष्ठित भी किया कि कला और कलाकार की स्वायत्तता सर्वोपरि है, जो जन मूल्य आधारित होती है। पर हम बाजार के आक्रमण से घिरे होने के बावजूद भिखारी को सिर्फ एक महान गंवई लोक कलाकार के रूप में याद करते हैं। जन संस्कृति आधारित कलात्मक मूल्यों और विचारों के लिए नहीं, जिसके कारण वे जीते जी एक रंगशैली बन जाते हैं। हिंदी क्षेत्र में अक्सर यह सुनने को मिलता है कि लेखक-कलाकार के मरने के बाद ही उसका मूल्यांकन होता है। उसे लोकप्रियता मिलती है और उसके न होने की कमी अखरती है। दरअसल इस मिथ को बहुत चालाकी से उन अकर्मण्य कलाकारों, लेखकों और आलोचकों ने गढ़ डाला है, जो सृजनात्मक रूप से जन सक्रिय नहीं होते हैं। वे लोकप्रियता को नकारते हैं क्योंकि लोक को साथ लिये बिना, उसके साथ हुए बिना उन्हें सारी सुविधाएं व लाभ चाहिए। भिखारी जैसे अनेक लोग हैं, जो जीते जी ही बगैर सत्ता सहयोग के पॉपुलर हुए। आज भी ऐसे कई नाम हैं, जो मीडिया में प्रमुखता से नहीं छपते, पर पॉपुलर है।

दरअसल भारतीय रंगदृष्टि सामंती और बाहरी मूल्यों से ग्रसित है। इस दृष्टि में स्त्री, दलित, पिछड़े, आदिवासी आदि वंचित समूहों का स्थान नेपथ्य और सिर्फ परफारमेंस के लिए है। किसी भी परफारमेंस के निर्देशकीय क्षेत्र में जहां कि कथ्य, विचार और सौंदर्यदृष्टि पर विचार होता है, वहां ‘जन’ प्रवेश वर्जित है। भिखारी ठाकुर अपने रंगकर्म और निर्देशकीय भूमिका से खुद भी उस प्रतिबंधित क्षेत्र में प्रवेश करते हैं और लोगों के लिए भी उसे सुगम बनाते हैं। अपढ़ भिखारी द्विज सामंती विचारों को कलात्मक चुनौती देते हैं, नयी सौंदर्य दृष्टि गढ़ते हैं और इस मिथ को ध्वस्त करते हैं कि कलाकर्म के लिए ‘विद्वान’ होना जरूरी है। उनका जीवन और रंगकर्म बताता है कि विद्वान होने से कहीं ज्यादा जरूरी है जन संस्कृति का शिक्षार्थी होना, उनके सुख-दुख, संत्रास और आनंद में सहभागी बनना। इसलिए भिखारी जब कहते हैं, ‘बरजत रहलन बाप मतारी …’ तो इसका अर्थ महज अभिभावकीय चिंता नहीं है। ‘बाप मतारी’ से ही समाज बनता है और समाज के शासकों की संस्कृति ही, यदि वे सचेत नहीं हैं, तो उनकी संस्कृति होती है। आज भी ‘बाप मतारी’ ही सबसे ज्यादा कलाकर्म की अवमानना करते हैं और बचपन से ही घर-परिवार में कला विरुद्ध माहौल बनाये रखते हैं। भिखारी इस सामंती विचार के खिलाफ चल रहे जन सांस्कृतिक युद्ध में सबसे बड़े योद्धा हैं। वे सिर्फ युद्ध के सिद्धांतकार भर नहीं हैं बल्कि उसके कमांडर भी हैं।

सामाजिक चेतना के अग्रदूत भिखारी ठाकुर ने तत्कालीन समाज की शोषित-पीड़ित, दीन-हीन जनता की दबी चीखों को अपनी नाट्य मंडली के द्वारा नया स्वर दिया। अपने गीतों तथा नाटकों से मनोरंजन के साथ-साथ जन सरोकारों को मुखर अभिव्यक्ति दी। समाज की कुरीतियों, रूढ़ियों, विसंगतियों एवं शोषणकारी तत्वों का लोकमंच से पर्दाफाश किया। सामाजिक बुराइयों पर निर्मम सांघातिक प्रहार किये। लोकरंजक जनहित उनका एकमात्र उद्देश्य था। दहेजप्रथा, बालविवाह एवं बेटी बेचने जैसी सामाजिक कुरीतियों व सामंती मूल्यों के खिलाफ एक जबरदस्त मुहिम छेड़ा। कलयुग प्रेम, भाई विरोध, बेटी बेचवा, विधवा विलाप, गंगा स्नान, पुत्र वध तथा बिदेसिया आदि बहुचर्चित नाटकों के माध्यम से संकुचित रूढ़िग्रस्त और अंधविश्वासी मूल्यों की कलात्मक आलोचना करते हुए ‘बिदेसिया’ लोक महाकाव्य रचा। उन्हें शेक्सपीयर, भारतेंदु और जयशंकर प्रसाद जैसा मानते हुए उपाधियों से विभूषित किया गया। परंतु वे शेक्सपीयर और जयशंकर प्रसाद से बहुत आगे जाते हैं। वे भारतेंदु जैसे भी हैं लेकिन उनसे भी बीस ही पड़ते हैं। बेशक इन तीनों की तरह उनके नाटक किसी क्लासिक भाषा में रचित नहीं हैं, पर वे उसी जबान में लिखते हैं और रंगकर्म करते हैं, जिसे जनता बोलती है। इसलिए ही वे इन तीनों से ज्यादा लोकप्रियता हासिल करते हैं। शेक्सपीयर, प्रसाद और भारतेंदु को हम उनकी रचनाओं से ज्यादा उनके आलोचकों की वजह से जानते हैं जिन्होंने उन सबको स्थापित करने के लिए सैंकड़ों पुस्तकें और हजारों लेख लिखा। भिखारी किसी आलोचक की वजह से प्रकाश में नहीं आये। आलोचकों ने तो आज भी उनकी ओर से मुंह फेर रखा है। कवि के रूप में भी भिखारी तुलसी, मीरा और कबीर त्रयी की भोजपुरी त्रिवेणी हैं। जनभाषा और जनजीवन के संगम।

यह हिंदी प्रदेश का दुर्भाग्य है कि आज वह साहस भरी बिदेसिया लोकमंचीय परंपरा लगभग दम तोड़ चुकी है। कुछ रंगकर्मियों ने जरूर उनकी शैली को अपने एकाध नाटकों में शामिल कर ख्याति पायी, पर उन्होंने भी बिदेसिया रंगशैली को एक ‘तत्व’ से ज्यादा महत्व नहीं दिया। प्रशिक्षित रंगकर्मियों की नजर भी इस लोकधर्मी परंपरा पर नहीं जाती क्योंकि नाट्य अध्ययन-प्रशिक्षण संस्थानों में भिखारी ठाकुर पाठ्यक्रम से बाहर हैं। सुदृढ़ बुनियाद के बावजूद मौजूदा हालात में रंगमंच जहां आधुनिक, आर्थिक एवं तकनीकी दृष्टि से विकसित हो चुका है, वहीं हमारे रंगकर्मियों का ध्यान इस मरती हुई लोकमंचीय परंपरा की तरफ से उदासीन है।

नाट्य संस्थानों से निकले रंगकर्मी मैकबेथ जरूर करते हैं, पर भिखारी उनके लिए त्याज्य हैं। भिखारी अब भी सचेत कर रहे हैं कि हम अपनी लोकभाषा तथा लोकशैलियों से कट कर रंगमंच के स्वतंत्र आत्मनिर्भर अस्तित्व का विकास नहीं कर सकते हैं। यदि हिंदी रंगकर्म को बाजार की शर्तो को नकारते हुए आजीविका व पेशेवर आर्थिक आत्मर्भिरता की ओर बढ़ना है, तो भिखारी बनने का साहस करना होगा। हिंदी समाज को भी अपने नजरिये में बदलाव लाने के लिए, अपनी सांस्कृतिक अभिरुचियों के परिष्कार के लिए बिदेसिया के समाजी की टेर सुननी होगी। ‘बाप मतारी’ के बरजने का प्रतिकार ही रंगकर्म व समाज की सौंदर्यदृष्टि को जन संस्कृतिमूलक बना सकता है।

(अश्विनी कुमार पंकज। वरिष्‍ठ पत्रकार। झारखंड के विभिन्‍न जनांदोलनों से जुड़ाव। रांची से निकलने वाली संताली पत्रिका जोहार सहिया के संपादक। इंटरनेट पत्रिका अखड़ा की टीम के सदस्‍य। इन दिनों आलोचना की एक पुस्‍तक आदिवासी सौंदर्यशास्‍त्र लिख रहे हैं।
उनसे akpankaj@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

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