मेरी बात सुनी जाए चाहे मानी न जाए…!

♦ रोहित जोशी

ये जमावड़ा गिर्दा के बहाने ही संभव था। साहित्य, संगीत, रंगमंच और अन्य विविध कलाकर्मों में दखल के साथ ही जनपक्षीय राजनीति में भी सक्रिय रहे गिर्दा ही इनसे जुडे़ उत्तराखंड के महत्वपूर्ण लोगों को साथ जुटा सकते थे। सो पहाड़ के बैनर तले ये लोग गिर्दा को याद करने 23 और 24 तारीख को नैनीताल में जुटे। ‘गिर्दा के बाद गिर्दा की याद’ नाम से यह दो दिवसीय आयोजन इसलिए था कि गिर्दा को उनके मूल व्यक्तित्व और उनके होने के सही मायनों के साथ लगातार कैसे याद किया जा सके, इस बारे में कुछ बात हो।

आयोजन के पहले दिन की सुबह में उत्तराखंड की विविध लोक कलाओं का मंचन ‘माटी से मंच तक’ नाम से महिला समाख्या की महिलाओं ने किया। इसके बाद बच्चे, युवाओं और बुजुर्ग महिला-पुरुषों का एक बड़ा जुलूस गिर्दा के गीतों को गाता हुआ तल्लीताल में मॉलरोड से आगे बढ़ता मल्लीताल में ‘नैनीताल क्लब’ पहुंचा, जहां पर गिर्दा के गीतों, गिर्दा पर नाटक और प्रदीप पांडे के निर्देशन में बनी डाक्यूमेंट्री ‘सलाम गिर्दा’ का मंचन किया गया। यहां गिर्दा के रचनाकर्म पर 250-250 पन्नों की दो जिल्दों में पहाड़ द्वारा प्रकाशित पुस्तकों का लोकार्पण भी किया गया।

पहले दिन सांस्कृतिक आयोजनों के बाद कार्यक्रम का दूसरा दिन चर्चा के नाम रहा। इस योजना पर चर्चा हुई कि आगे के दिनों में गिर्दा को किन अर्थों में याद करना सबसे सार्थक होगा? सभागार में मौजूद लोक संगीत, साहित्य, कला, रंगमंच आदि विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े तकरीबन 50-60 लोगों ने गिर्दा के ही तकिया कलाम ‘मेरी बात सुनी जाए चाहे मानी न जाए’ की तर्ज पर अपनी बातें रखी।

गिर्दा के करीबी मित्र रहे चित्रकार विशंभर नाथ साह ‘सखा’ ने गिर्दा के बहाव को महसूस करने की अपील की। उन्होंने कहा कि गिर्दा को पूजने की कोई जरूरत नहीं है बल्कि जरूरी है कि उन्हें आत्मसात किया जाए। उन्होंने कहा कि गिर्दा को नींबू के कांटे की तरह याद करते रहने की जरूरत है, जो बार-बार चुभकर आपकी दिशा को सचेत करता रहे।

उलोवा के अध्यक्ष शमशेर सिंह बिष्ट ने कहा कि गिर्दा हमारे दौर की सबसे सजग राजनीतिक शख्सियत थे। उन्हें एक कवि और गीतकार के रूप में स्वीकारने के साथ यह जानना भी जरूरी है कि वह वामपंथी क्रांतिकारी आंदोलन के समर्थक थे। 1978 की एक मीटिंग का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि गिर्दा समेत उस वक्त उत्तराखंड के कई महत्वपूर्ण युवाओं ने इस मीटिंग में प्रस्ताव पारित किया था कि भारत की अर्धसामंती, अर्धऔपनिवेशिक सत्ता को उखाड़ फैंकने के लिए सशस्त्र क्रांतिकारी आंदोलन की जरूरत है।

माओवादी होने के आरोप में लंबे समय तक जेल में रहे पत्रकार और राजनीतिक कार्यकर्ता प्रशांत राही ने कहा कि वे जब जेल में थे, तो नैनीताल समाचार के जरिये गिर्दा से उत्तराखंड के क्रांतिकारी राजनीतिक आंदोलन और उसकी दशा-दिशा के बारे में चर्चा होती रही। उन्होंने कहा कि गिर्दा एक धारा थे। जिसे समझने की जरूरत है कि वह धारा है क्या? उन्होंने कहा कि जेल से निकलने के बाद कुछ साथियों ने उन्हें बताया कि गिर्दा क्रांतिकारी कवि व रंगकर्मी ‘गदर’ के साथ गैरसैण में एक आयोजन करना चाहते थे। इसमें इस बात के संकेत हैं कि गिर्दा अपनी सीमाओं को तोड़कर देशभर में चल रहे उन क्रांतिकारी आंदोलनों से जुड़ना चाह रहे थे, जिन आंदोलनों में पिछले समय में पूरे देश ने गुणात्मक परिवर्तनों को देखा है।

कवि और संस्कृतिकर्मी कपिलेश भोज ने कहा कि गिर्दा का सपना एक समतामूलक समाज की स्थापना करने का था। गिर्दा ने अपने इस सपने के लिए कई स्तरों पर जोखिम भी उठाये। उन्होंने कहा कि जनपक्षीय कवि जोखिमों से नहीं घबराता और गिर्दा भी उन्हीं में थे। भोज ने कहा कि गिर्दा को सार्थक ढंग से याद करने के लिए ऐसे सांस्कृतिक संगठन बनाये जाने की जरूरत है, जो गिर्दा को सही अर्थों में जनता तक पहुंचाये।

गिर्दा के करीबी रहे वरिष्ठ पत्रकार नवीन जोशी ने कहा कि गिर्दा की किन्हीं भी रचनाओं पर कॉपीराइट जैसा कुछ भी नहीं होना चाहिए। उन्होंने कहा कि गिर्दा की रचनाओं को छोटे-छोटे अनेक जिल्दों में सस्ती कीमतों पर प्रकाशित करना चाहिए ताकि वे ज्यादा से ज्यादा प्रसारित हो सकें।

कवि महेश चंद्र पुनेठा ने कहा कि उत्तराखंड बन जाने का एक दशक गुजर गया है लेकिन आज तक साहित्यकारों-संस्कृतिकर्मियों आदि का ऐसा कोई संगठन नहीं है, जो इन्हें एकजुट कर सके। गिर्दा को इस रूप में भी याद करना सार्थक होगा कि ऐसा कोई संगठन बनाया जाए, जो गिर्दा के मूल्यों से प्रेरित हो।

पालीथीन बाबा प्रभात उप्रेती ने जब अपनी बात रखी, तो कहा कि गिर्दा को सच्चे ढंग से याद करना तब ही संभव है, जब आप अपनी-अपनी क्षमताओं के हिसाब से छोटे-छोटे जनांदोलनों को पैदा करें, उनमें शामिल हों। उन्होंने कहा कि गिर्दा को गोष्ठियों-सेमिनारों में समेट देना काफी नहीं है।

रंगकर्मी श्रीश डोभाल और डीएन भट्ट ने गोष्ठी में कंट्रास्ट पैदा किया। उन्होंने कहा कि गिर्दा को लंबे समय तक याद करते रहने के लिए व्यावहारिक यही होगा कि उनके नाम से संस्थानों, पुरस्कारों आदि की शुरुआत की जाए। विश्वविद्यालयों आदि में गिर्दा के नाम से कुछ कार्यक्रम आदि हों।

इसी क्रम में कुछ वक्ताओं ने यह भी कहा कि गिर्दा की कविताओं को बच्चों के पाठ्यक्रम में शामिल किया जाए, गिर्दा के नाम पर एक ट्रस्ट का निर्माण हो जो हर साल सांस्कृतिक आयोजन करवाये। एक सुझाव यह भी था कि गिर्दा के नाम पर भोपाल स्थित भारत भवन सरीखा कोई कला-संस्कृति का केंद्र बनाया जाए। अंत में इन सुझावों का स्वागत करते हुए पहाड़ पत्रिका के संपादक डॉ शेखर पाठक ने सभी लोगों का धन्यवाद ज्ञापित करते हुए कहा कि इन सुझावों से ठोस निष्कर्ष पर पहुंच कर उन्हें कार्यरूप देने के लिए भी सभी लोगों को इसी तरह जुटना होगा। इस सभा में नैनीताल समाचार के संपादक राजीव लोचन साह, छायाकार थ्रीश कपूर, गोपाल दत्त भट्ट, कैलाश लोहनी, मथुरा दत्त मठपाल, डॉ उमा भट्ट, महिला समाख्या की गीता गैरोला, चित्रकार बी मोहन नेगी, भास्कर उप्रेती, अभिषेक श्रीवास्तव, आदित्य, हेम मिश्रा, शीला रजवार, बसंती पाठक, प्रीती थपलियाल, भानुप्रकाश, कुलदीप, राजेश आदि लोग मौजूद थे।

‘पहाड़’ के इस आयोजन में नैनीताल समाचार, उत्तरा पत्रिका, उत्तराखंड भाषा संस्थान और बीडी उनियाल पर्वतीय चैरिटेबल ट्रस्ट का भी सहयोग रहा।

मोहल्‍ला लाइव पर गिर्दा का जिक्र

(रो‍हित जोशी। युवा पत्रकार, फोटोग्राफर। आईआईएमसी से पत्रकारिता की पढ़ाई। सिनेमा, आवारगी और यात्रा में दिलचस्‍पी। उनसे rohit.versatile@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

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