अन्‍ना को पुराने आंदोलनकारियों के मूल्‍यों से सीखना चाहिए

♦ अनीश

नाम मो इलियास। उमर लगभग सत्तर साल। काम टैक्‍सी चलाना। मूलत: प्रतापगढ़, उत्तरप्रदेश से हें। लगभग चालीस साल से मुंबई में रहते हैं। पांच बेटियां हैं और दो बेटे। एक बेटी और एक बेटे को छोड़ सबकी शादी हो चुकी है। कोई खोली नहीं है। कहते हैं बहुतों ने नश्‍तर चलाये हैं। फुटपाथ पर रहता हूं और होटल में खाता हूं। टैक्‍सी मालिक को रोज तीन सौ देना भारी पड़ता है।

पुराने दिनों की याद करते हैं और कहते हैं कि वो दिन बड़े अच्‍छे थे। नाराज हैं सरकार से, अपनी बेवकूफियों से, अपनी मां और बुआ से।

सरकार से नाराजगी इसलिए है कि महंगाई बढ़ गयी, कूल कैब और रेडियो टैक्‍सी आ गये हैं उनके पेट पर लात मारने। अपने आप से इसलिए कि जब मुफ्त में परमिट मिल रहा था तो क्‍यों नहीं लिया, ले लिया होता तो आज अपनी गाड़ी होती। 15 हजार कहीं नहीं गये थे महीने के।

एक बार एक मुल्‍ला ने उनसे कहा था कि तुम्‍हारी तकदीर मां और बुआ ने काट डाली, मेहनत तो बहुत करोगे, पर हासिल कुछ नहीं होगा। बड़े लोगों से मिलोगे जुलोगे पर काम नहीं बनेगा। दरअसल जन्‍म से उनके चेहरे पर एक मस्‍सा था, जो उनकी मां और बुआ ने मिल कर बचपन में ही घोड़े की पूंछ की बाल से काट डाला। मुल्‍ला जी कहते हैं कि वही उनकी तकदीर की चाभी थी। कहते हैं कि मां अब नहीं रही, कोसने से क्‍या फायदा।

फलसफाना अंदाज में बात आगे बढ़ाते हुए कहते हैं कि जब तकदीर में उजाला हो तो गाड़ी बढ़ती जाती है, लेकिन वहां अगर अंधेरा हो जाए तो कुछ भी कर लीजिए सर, गाड़ी आगे नहीं बढ़ती।

मियां इलियास नाराज हैं, निराश हैं, पर मायूस नहीं हैं। गरीब हूं पर गलीज नहीं हूं। पांच बेटियों का बाप हूं, पर इज्‍जत बनी हुई है। कोई भाग नहीं गयी किसी के साथ। मीटर से टैक्‍सी नहीं चलाते, भाड़ा तय करके चलाते हैं कि मीटर से दुगना होता है लेकिन दावा करते हैं कि उनका ईमान मुसल्‍लम है।

अन्‍ना हजारे के समर्थक हैं। उन्‍हें लगता है कि अन्‍ना के आंदोलन की सफलता से उनका जीवन बदल जाएगा। ये पूछने पर कि अगर कोई पुलिस कंप्‍लेन कर दे कि आप मीटर से नहीं चल रहे तो क्‍या करेंगे? जवाब था कि कुछ खिला दूंगा। मैंने कहा, भाई आपके अन्‍ना जी तो उन्‍हें भी लोकपाल के दायरे में ला रहे हैं। हंसने लगे और एक कहानी सुनायी…

एक बड़ा आदमी था। उनका नौकर जब उनके लिए चाय बनाता था तो थोड़ा ज्‍यादा पानी डाल कर अपने लिए भी चाय बना लेता था। कुछ दिनों के बाद उन्‍हें लगा कि चाय फीकी लगने लगी। उन्‍होंने दूसरे आदमी को निगरानी पर लगाया। चाय में दूध की मात्रा और कम हो गयी क्‍योंकि निगरानी करने वाला भी चाय पीने लगा।

उनकी ये कहानी सुन कर मैं सोच में पड़ गया कि बेचारे अन्‍ना क्‍या लोकपाल से सत्तर फीसदी भ्रष्‍टाचार दूर कर देंगे। वो ये भी कहते हैं कि भ्रष्‍टाचार महंगाई की जड़ में है तो क्‍या महंगाई भी उसी अनुपात में कम हो जाएगी? मियां इलियास बिना भ्रष्‍टाचार किये परिवार पाल लेंगे या उन्‍हें हम ग्राहकों से लोकपाल पुलिस के लिए भी वसूली करनी पड़ेगी? भारत जैसे देश के लिए लोकपाल से बहुत सारी आशाएं समस्‍या का अति सरलीकरण नहीं है क्‍या?

अतिवाद, हमारा देश अतिरेक में जीने का आदी है। इंदिरा गांधी की मौत राजीव गांधी को प्रधानमंत्री बनवा देती है। जीतने पर धोनी को जनता भगवान बना देती है और हारने पर मीडिया और लोग ऐसी भाषा का इस्‍तेमाल करने लगते हैं कि सुन कर शर्म से आंखें झुक जाए। इस अतिरेक को जो कोई भी गंभीरता से लेकर इसकी सवारी करने की कोशिश करेगा, उसका वही हश्र होगा, जो अन्‍ना और उनकी टीम का हुआ है।

जो भीड़ से आह्लादित होते हैं, वही भीड़ नहीं होने पर निराश भी होते हैं। अन्‍ना और उनकी टीम को इससे बचना चाहिए। यदि वो भ्रष्‍टाचार के खिलाफ अपनी मुहिम के प्रति संजीदा हैं। लोकपाल पर अपनी सारी ऊर्जा केंद्रित कर उन्‍होंने व्‍यवस्‍था को अपने खिलाफ एक अस्‍त्र दे दिया। राजनीतिक अपरिपक्‍वता ने उन्‍हें पीछे धकेल दिया, व्‍यक्ति पूजा ने उनकी साख कमजोर की। लोगों की टोपी पर ‘मैं अन्‍ना हूं’ के बजाय भ्रष्‍टाचार विरोधी हूं लिखा होना चाहिए था। किरण बेदी को अपनी नौकरी वाली चापलूसी की भाषा से परहेज करना चाहिए था। अन्‍ना को अपने भाषण में आत्‍म प्रशंसा से बचना चाहिए था।

जब वो कहते हैं कि मैंने महाराष्‍ट्र में छह मंत्रियों और तीन सौ अधिकारियों के विकेट गिराये, तब वो आत्‍ममोही और बड़बोले नजर आते हैं। सारे देश को मालूम है कि महाराष्‍ट्र देश के भ्रष्‍टतम राज्‍यों में से एक है। बाल ठाकरे और नीतीश कुमार जब एक बार टीम अन्‍ना को डांटते हैं और टीम अन्‍ना चुप हो जाती है, तब उनके कांग्रेस विरोध की हवा निकल जाती है।

बाल ठाकरे और पूरी शिवसेना लोकपाल के कॉन्‍सेप्‍ट के खिलाफ संसद और संसद के बाहर खुल कर बोलती है, लेकिन अन्‍ना घोषणा करते हैं कि वो सोनिया गांधी के घर के बाहर धरना देंगे, बाला साहिब के घर के बाहर नहीं। क्‍या उन्‍हें शिव सैनिकों से डर लगता है?

अन्‍ना को जेपी से बड़ा बताने वालों को याद रखना चाहिए कि इंदिरा गांधी ने जेपी को पिटवाया था, जेल भेजा था, चंडीगढ़ के अस्‍पताल की खिड़की के सामने दीवार चुनवा दी थी। जेपी की किडनी इंदिरा जी की यातनाओं के कारण खराब हुई और उनकी मौत का कारण बनी। जेपी लड़ते रहे दूसरी आजादी की लड़ाई और जीते। लेकिन उस पूरी लड़ाई के दौरान वो इंदिरा जी को बेटी ही मानते रहे। जनता पार्टी की सरकार बन रही थी और वो बैठे थे इंदिरा जी के घर। ये कहते हुए कि अभी इंदु को मेरी जरूरत है, मुझे उसके पास होना चाहिए। ये होता है चरित्र और ऐसे थे जेपी।

और तो और, शांति भूषण भी अतिरेक में बह कर अन्‍ना को दूसरा गांधी और जेपी मानने लगे। अन्‍ना को पुराने आंदोलनों और उनके संचालकों के मूल्‍यों से सीखना चाहिए। जमाना बदला है लेकिन जनांदोलन अभी भी फास्‍ट फूड नहीं हुआ है। अन्‍ना और उनकी टीम को नये सिरे से सोचना चाहिए। भ्रष्‍टाचार के खिलाफ एक गंभीर लड़ाई की तैयारी करनी चाहिए। व्‍यक्ति को ब्रांड बना कर नहीं, मुद्दा आधारित रणनीति बनानी चाहिए।

भले ही मो इलियास कनफ्यूज्‍ड है, लेकिन उसके जैसे लोगों के मन में उन्‍होंने आशा जगायी है, तो ये उनका धर्म है कि उनके जीवन में उजाला लाने की ईमानदार कोशिश करें।

(अनीश। पत्रकारिता और आंदोलन की पृष्‍ठभूमि। गंगा मुक्ति आंदोलन में पदयात्रा से लेकर दिल्‍ली-गोहाटी में अखबारनवीसी। नब्‍बे के दशक में मुंबई आये। टॉकिंग पिक्‍चर्स और सेवेन इंटरटेनमेंट नाम की फिल्‍म कंपनी बनायी। दिल पे मत ले यार, दंश, संकट सिटी, कैश सहित आधे दर्जन से अधिक फिल्‍मों के निर्माता। अनीश से seven.anish@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

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