आजादी बोलेगा तो बिच्छू काटेगा! खामोश रहो!!
♦ गार्गी मिश्र
गार्गी पहली बार मोहल्ला लाइव से जुड़ रही हैं। उनका स्वागत है। अभिव्यक्ति के औजारों पर सरकार की टेढ़ी होती नजरों पर तंज कसते हुए उन्होंने यह गद्य लिखा है। इसमें व्यंग्य भी है और बेलौसपन भी, संवाद भी है और कविता भी, चिंता भी है और जंग की जिद भी। उनका स्वागत कीजिए : मॉडरेटर
सेंसर का बिच्छू
राज : नहीं श्री, मैंने तो ऐसा नहीं किया। जरूर कोई टेक्नीकल प्रॉब्लम होगी। वैसे तूने लास्ट स्टेटस क्या अपडेट किया था?
श्री : लास्ट स्टेटस। अ हां, कपिल सिब्बल की किसी घिनौनी राजनीति पे कोई कटाक्ष लिखा था।
राज : हा हा हा। दोस्त फिर तो तुझे सेंसर के बिच्छू ने डंसा है!
…
[और फिर फोन पे सन्नाटा]
हंसेगा तो फंसेगा
हंसी आ रही है? जी हां, ये कहानी सुन के जितना अफसोस हुआ होगा, उतनी ही हंसी भी आयी होगी, श्री के बेचारेपन पे। ऐसी कहानियां सुन के हमें न चाहते हुए भी हंसी आ जाती है। पर जनाब जो आबो हवा चली है, उससे चौकन्ना हो जाइए, कहीं आप भी हंसी के पात्र न बन जाएं।
अब आप सोच रहे होंगे कि भला आप क्यूं हंसी के पात्र बनेंगे। आखिर आपने ऐसा किया ही क्या है, जो आपकी चीजों पे कोई उंगली उठाये, आपकी बनायी हुई वेबसाइट्स को आप से बिना पूछे बैन कर दे। आपकी सोच पे और उसे प्रकट करने पे पाबंदी लगा दे।
इसका जवाब बड़ा सीधा सा है। ज्यादा कुछ नहीं। ऐसा इसलिए हो रहा है क्यूंकि आपने आजादी चाही है। आपने चाहा है कि आजादी के 68 साल बाद कम से कम आप अपनी आवाज को दुनिया के सामने रख सकें। आपने चाहा है कि आप तलवार की जगह कलम उठा सकें। आपने चाहा है कि अपने बनाये हुए चित्रों में रंग भर सकें। आपने दरसल खुली हवा में सांस लेना चाहा है। पर हर चाह के लिए, हर अनाज के लिए हम लगान देते आये हैं। और हमारी सरकार अब वो लगान तो नहीं मांगती, पर अब वो लगाम लगा रही है हमारी हर आवाज पर। हर सोच पर। हर आजाद ख्याल पर। चलता है!
लगान तो फिर भी चल गया। ढो लिया किसी तरह। पर क्या लगाम को बर्दाश्त कर पाओगे? आज अगर आपके पास दो जोड़ी ‘ली’ की जींस न हो, तो चलेगा। अगर फास्ट ट्रैक की घड़ी न हो, तो चलेगा। अगर साथ में टहलने वाली सुंदर सी गर्लफ्रेंड न हो, तो भी चलेगा जनाब, पर क्या अगर कोई आपकी आवाज पे ताला लगा दे, तो चलेगा? कोई आपको अपने विचारों की अभिव्यक्ति से रोके तो चलेगा? अगर कोई आपकी आर्ट (लेखनी, कविताओं, रचनाओं, कार्टून्स, डीबेट्स, कहानी, ब्लॉग्स) पर पाबंदी लगा दे और आपसे बिना पूछे उनका अस्तित्व ही समाप्त कर दे, तो क्या तब भी चलेगा? नहीं। शायद बौखला जाएंगे और घुटन सी महसूस होगी, आजाद देश का नागरिक होते हुए भी।
पर हमारी इसी “चलाने” वाली आदत की वजह से आज ऐसा हो रहा है। पहले हम खुद अनपढ़ चलते रहे। फिर अनपढ़ और भ्रष्ट नेताओं को चलाते रहे, और अब निराधार और बेबुनियाद पाबंदियों को चलाने की शह सरकार को दे रहे हैं। जी हां, हम खुद न्योता दे रहे हैं अपनी आजादी को खतम करने का।
आजादी बोलेगा, तो बिच्छू काटेगा
सही पढ़ा आपने। आजादी का नाम लिया, तो बिच्छू काटेगा। ये सेंसर का है बिच्छू। जी हां, आप इशारा सही समझ रहे हैं। सेंसर, ये नाम आपने पहले कई बार सुना होगा। शायद हाल में ही सुना हो। विद्या बालन की “डर्टी मूवी” के संदर्भ में सुना होगा। लेकिन ये शब्द अब सुनने और सुनाने से कही ज्यादा बढ़ चुका है। ये अब अपना डंक आपकी जुबां पे मारना चाहता है। हमारी भारत सरकार बड़ी ही चालाकी से आईटी एक्ट के तहत कुछ बेबुनियादी नियमों का झांसा देते हुए इंटरनेट और फ्री स्पीच पे पाबंदियां लगा रही है। सरकार का कहना है कि कुछ वेबसाइट्स मनमाना अश्लील, आपत्तिजनक, देश के खिलाफ भड़काऊ कंटेंट को बढ़ावा दे रही हैं। सरकार ये भी साबित करने में लगी हुई है कि सोशल नेटवर्किंग साइट्स जैसे गूगल, फेसबुक, ऑरकुट, ट्विटर आदि निरंकुश आपत्तिजनक कंटेंट को बढ़ावा दे रही है, जो कि सरकार के संविधान और एक सभ्य समाज के खिलाफ है।
ये सेंसर का बिच्छू कैसे हमला कर रहा है, जानिए इस छोटी सी कविता के माध्यम से।
आजादी बोलेगा तो बिच्छू काटेगा
ये सेंसर का है बिच्छू
सरकार का है ये बिच्छू
आजादी बोलेगा तो बिच्छू काटेगा
ये मुंह पे काटेगा
ये कलम को काटेगा
हल्लाबोल को रोके ये बिच्छू
हर मकड़ी को काटेगा
आजादी बोलेगा तो बिच्छू काटेगा
ये गूंगा कर देगा
ये लूला कर देगा
हलक पे मार डंक
ये बिच्छू मुर्दा कर देगा
आजादी बोलेगा तो बिच्छू काटेगा
ये ब्लॉग को डंसता है
ये आर्ट को पीता है
फेसबुक का दुश्मन बिच्छू
आवाम को डंसता है
आजादी बोलेगा तो बिच्छू कटेगा
ये टूजी का है बिच्छू
ये राजा का है बिच्छू
ये नेता का है बिच्छू
ये बिच्छू बड़ा है इक्छु
आजादी बोलेगा तो बिच्छू कटेगा
डर मत, मुंह खोल, हल्ला बोल
लगान देने का जमाना नहीं रहा और लगाम तुझसे बर्दाश्त न होगी। तो करेगा क्या बंधु?
अरे डर मत, मुंह खोल और हल्ला बोल। भ्रष्ट सरकार और उसकी कार्यप्रणाली से तो हम और आप वैसे भी ग्रसित हैं। अब क्या आवाज भी दावं पे लगा देंगे? क्या अब भी अपनी आराम वाली कुर्सी पे बैठ के टीवी के रिमोट से खेलते रहेंगे? क्या इंतजार कर रहे हैं कि आपके सोने, उठने, बैठने, लिखने से लेकर आपकी निजी जिंदगी को भी सरकार सेंसर के नियमों तहत कंट्रोल करे?
क्या इंतजार कर रहे हैं कि राह चलते सरकार का नियम आ जाए कि इस रोड पे सर नीचे और पैर ऊपर कर के चलना है?
अगर नहीं, तो अपनी आवाज को बुलंद कीजिए। आगे आइए, सवाल पूछिए सरकार से, अपने हक के लिए लड़िए और अपाहिज होने से खुद को बचाइए।
अगर चुप रहे तो ऐसा भी होगा कि…
श्री : राज मैं तो खुद ही फंसा हुआ हूं। मैं क्यूं भला ऐसा करूंगा। वैसे कल तूने कोई कार्टून बना के लगाया था क्या अपने ब्लॉग पे?
राज : हां वो, लोकपाल को जोकपाल बताया था… गलत क्या किया। यही तो हो रहा है।
राज : हा हा हा… अरे दोस्त तुझे भी सेंसर के बिच्छू ने डंस लिया है…
…
[और फिर फोन पे सन्नाटा]
(गार्गी मिश्र। पेशे से पत्रकार। मिजाज से कवयित्री। फिलहाल बेंगलुरु से निकलने वाली पत्रिका Bangalured की उपसंपादक और कंटेंट को-ऑर्डिनेटर। गार्गी से gargigautam07@gmail.com पर संपर्क करें।)










गार्गी मिश्र जी, फसबूक जो की पूंजीवादी सोच के साम्राज्यवादी देश (अमेरिका का नागरिक और दुनिया के सबसे बड़े धनाड्यों में से एक जुकरबर्ग की कंपनी है) की उपज है, के प्रति भविष्य में लागू होने वाले सेंसर को (जो कि अभी भी सेंसर हुआ नहीं है) लेकर इतनी हाय तौबा मचा रही हैं, और इसे अभिव्यक्ति पर खतरे के तौर पर देख रही हैं, मैं आपसे सिर्फ ये पूछना चाहूँगा कि आपने सलमान रश्दी और तसलीमा नसरीन की किताबों पर लगे सेंसर (जो कि सच में मानवीय और प्रजातान्त्रिक समाज पर खतरा है) पर कोई प्रतिक्रिया क्यों नहीं व्यक्त की? क्या फसबूक पर प्रतिबन्ध अभिव्यक्ति पर खतरा है और सलमान रश्दी को अपने ही देश में जाने पर रोक लगा दिया प्रजातंत्र पर खतरा नहीं है…आपके सरोकार सच हैं या नहीं इस बात का पता तब चलेगा जब आप “शैतान की आयतें” पर लगे प्रतिबन्ध पर भी अपने विचार व्यक्त करेंगी….
Bhai saheb Salman R. ko lekar itna halla kyon macha rahe hain aap. Salman saheb to Hindi ko doyam darje ki bhasha maante hain.Aap Hindi mein tippani likhkar unka samarthan kar rahe hain. Aur aap in mohatarma ki bajay Arundhati Roy se kyon nahi kahte ki ab abhivyakti ke adhikar par lekh likhein.
@anom, सलमान ने कभी भी हिंदी को दोयम दर्जे की भाषा नहीं कहा, ये आपके अपने हिंदी को लेकर आत्मकुंठा से उत्पन्न हुई मनगढ़ंत सोच है. वैसे ये विषयांतर है अभी, यहाँ भाषा को लेकर बात नहीं हो रही है, बात हो रही है अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की. तो क्यों गार्गी मिश्र जी फसबूक जैसी साम्राज्यवादी और विस्तार वादी (करोड़ों कॉर्पोरेट के विज्ञापनों के सहारे चलने वाली) मायावी एवं आभासी दुनिया के हित में इतनी व्यग्र हो रही हैं जबकि सच मुच के एक लेखक जो फासीवादी और धार्मिक ताकतों के खिलाफ लेखन के लिए प्रतिबद्ध है, की स्वतंत्रता और उसके किसी देश में (जो उसकी मातृभूमि है) आने जाने पर प्रतिबन्ध के प्रति बिलकुल भी संवेदनशील नहीं हैं!!! वाह वाह क्या ये double standard नहीं है? और तसलीमा नसरीन के लेखन के प्रति क्या कहना है इनका? गार्गी जी तो स्वयं एक नारी हैं, क्या एक दूसरी नारी जो धार्मिक कठमुल्लों के चलते अपने ही देश से निकाल दी गयी उसकी अभिव्यक्ति इनके लिए महवपूर्ण नहीं है…..आभासी दुनिया की अभिव्यक्ति की वकालत करने वालों का ये और कुछ नहीं दोगलापन है और वास्तविकता के प्रति मुह चुराना है….
और एक क्षण के लिए मान भी लिया जाय की रश्दी ने हिंदी की दोयम कहा है तो क्या इसीलिए आप उनको भारत में आने से रोक देंगे और उन पर फतवा जारी कर देंगे ?? ठहरिये क्या आप मौलाना बुखारी के चमचे तो नहीं हैं या फिर शिवसेना या संघी हैं जो किसी की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के खिलाफ हैं !! जिस तरह आप सोनिया गाँधी पर कार्टून बनाने के स्वतंत्र हैं वैसे भी रश्दी भी किसी भाषा को अच्छा या बुरा मानने के लिए स्वतंत्र हैं. अब अगर आपका शरीया के कानून में यकीन है तो बता दें, लेकिन सभ्य समाज में तो आपको रश्दी पर फतवा जारी करने के बजाय उनके बातों को अपने तर्कों से काटना चाहिए…है हिम्मत तो सिद्ध करिए की हिंदी दोयम दर्जे की भाषा नहीं है….
Bhai saheb , pahli baat to ye hai ki Rushdie ke aane par kisi ne pratiband nahi lagaya. Aur jaise aap apni baat kahne ke liye swatantra hai mulla aur pandit bhi hain. Doosri baat kya aap meri jaati,dharm,rajnitik vichardhara,desh,varn jaankar meri baaton par tippani karenge? Teesri baat mujhe siddh karne ki jaroorat nahi hai ki Hindi ka sthan kya hai.
Aur aap jo baatein FB ke baare mein likh rahe hain corporate gharano se sahayata waigerah waigerah, wo Sulman Rushdie ke baare mein sahi nahi hain? Rushdie saheb jis lifestyle ko jeete hain wo kya unki kitabon ki royalti se aati hai? Ye jo Jaipur Festival hai ya Bukar prize hai,iska paisa kya hamare desh ki janta chanda jamakar ikattha karti hai?
रश्दी तो क्या लगभग सारे ही भारतीय अंग्रेजी लेखक बेकार ही होते हे सब ऊपर से ही आते हे मस्त जीवन जिया होता हे और ऊपर चड़ते चले जाते हे सब अहंकारी जमीन से कटे हुए बदमिजाज होते हे और तो और यहाँ तक की इनको पढने वालो में भी कामयाबी के बववाजूद कोई हल्का फुल्का भी महानता का लक्षण जिम्मेदारी की भावना खुशमिजाजी त्याग या बाटने की भावना विनम्रता संस्कार सरोकार नहीं होते हे अपने आस पास आसानी से महसूस किया जा सकता हे ये कठमुल्ला कठार्पंथी तो खेर बुरे हे ही लेकिन इन अंग्रेजी कठ्मुल्लाओ को भी इनसे कोई खास कम नहीं समझना चाहिए समाज को ये भी कोई कम नुकसान और ज़हालत नहीं दे रहे हे
“Bhai saheb , pahli baat to ye hai ki Rushdie ke aane par kisi ne pratiband nahi lagaya.”
भाई anom जी, प्रतिबन्ध तो फसबूक पर भी नहीं लगाया गया है अभी, केवल चर्चा हो रही है फिर क्यों गार्गी जी फसबूक पर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए इतना चिल्लपों कर रही हैं?? आप के अनुसार रश्दी साहब के आने पर प्रतिबन्ध नहीं लगाया गया…सही है तकनीकी तौर पर, पर अगर सरकार उनकी सुरक्षा की जिम्मेदारी नहीं लेगी तो यह भी एक प्रकार का सांकेतिक प्रतिबन्ध ही हुआ!! क्यों, क्या ये सरकार इतनी कमज़ोर है किसी लेखक की सुरक्षा नहीं कर सकती है?? रश्दी साहब की JLF में अंतिम दिन होने वाली विडियो कोंफेरेंसिंग पर तो रोक लगाई गयी…ये सब तो प्रतिबन्ध ही है न. सबसे बड़ी बात उनकी पुस्तक पर प्रतिबन्ध है वो तो भारत की सरकार ने लगा रखा है वो भी इतने सालो से. एक आभासी वेबसाइट फसबूक पर सिर्फ नियंत्रण के प्रस्ताव पर (न की प्रतिबन्ध) के लिए गार्गी मिश्र और आप दोनों ही इतनी हाय तौबा मचा रहे हैं फिर रश्दी के उपन्यास “शैतान की आयतें” पर लगे हुए प्रतिबन्ध के खिलाफ कुछ क्यों नहीं कहते??? भाई अगर सलमान रश्दी की पुस्तक पर प्रतिबन्ध लग सकता है तो फसबूक के कंटेंट पर नियंत्रण होने में क्या बुराई है??
“Rushdie saheb jis lifestyle ko jeete hain wo kya unki kitabon ki royalti se aati hai? Ye jo Jaipur Festival hai ya Bukar prize”
भाई कौन लेखक अपनी पुस्तक की रोयल्टी नहीं लेता? चाहे सलमान रश्दी हों या स्वयं मार्क्स सबने ही अपनी किताबों से रोयल्टी ली है. रोयल्टी तो आपकी अपनी प्रिय लेखिका अरुंधती ने भी ली है, तो अगर सलमान रश्दी ने भी अपनी किताबों की रोयल्टी ले ली कौन सा अपराध कर दिया? रही बात लाइफ स्टाइल की, इसमें आपको आपत्ति नहीं होनी चाहिए, जिसकी जितनी औकात है उस ढंग से ही वो अपनी लाइफ स्टाइल बना रहा है..बड़े-बड़े वामपथी लेखकों (चाहे विदेशी हों या आपके अपने हिन्दुस्तानी लेखक) तकरीबन सभी के पास महिला मित्रों की लम्बी सूची होगी, मदिरा पान तो लगभग सभी वामपंथी या सामाजिक चेतना के प्रति प्रतिबद्ध लेखक करते ही रहे हैं, अभी शीघ्र ही अदम गोंडवी जी (हालाँकि मैं उनके लेखन का मुरीद हूँ) का इन्तेकाल हुआ है जो अल्कोहोलिक लीवर सिर्रोसिस से पीड़ित थे, इस बात का जीता जागता उदाहरण है. मैंने इसी मोहल्लालाइव पर एक और हिंदी के “स्वयंभू महान लेखक” उदय प्रकाश की एक बड़ी ही बेशर्म मुद्रा में तस्वीर देखी है जिसमे वो विदेशी शराब की बोतल लेकर एक गोरी लेखिका के साथ फोटो खिंचवा रहे हैं. कहाँ मोहनदास (जिसको अक्सर उदय प्रकाश अपनी कहानी बताते फिरते हैं ) और कहाँ गोरी लेखिका और विदेशी शराब की बोतल!!! मेरे कहने का मतलब ये है की सलमान रश्दी इसलिए पापी नहीं हो जाते क्योंकि वो विदेश में रह रहे हैं और अच्छी तरह से जी रहे हैं. आप हम सब अच्छी तरह से रहनa चाहते हैं और इससे आपके हमारे सामाजिक सरोकार कम नहीं नहीं हो जाते….
रही बात बुकर पुरस्कार की, ये अगर इतना ही पापी पुरस्कार है तो अरुंधती रॉय इसे वापस क्यों नहीं कर देती?? उनको समझना चाहिए कि आदिवासियों और गरीबों के प्रति लेखन और बुकर पुरस्कार जो पूंजीवादियों द्वारा प्रायोजित है, दोनों एक दूसरे का विरोधाभास है…या तो अपनी प्रतिबद्धता अपने लेखन के प्रति रखें या पूंजीवादियों के प्रति…
Gusse gusse mein aap samajhe nahi ki Arundhati Roy meri priy lekhika nahin hain. Mera pahla comment phir se padhiye.
Jis abhasi dunia ko lekar aap itna halla macha rahe hain, ye samvad bhi usi madhyam se ho raha hai. Aur dekha jaye to FB jyada loktantrik madhyam hai abhivyakti ka, JLF jaisa nahi jahanm jo amir lekhakon ki salana party hai.
शायद आपको गलतफहमी हुई है भाई साहब, मैं आभासी दुनिया को लेकर कोई हल्ला नहीं मचा रहा. आभासी दुनिया को लेकर हल्ला तो गार्गी मिश्र और आप मचा रहे हैं. जो सिर्फ आभासी है उसके नियंत्रण की चर्चा मात्र पर आप लोग इतना खौरिया रहे हैं पर एक जिन्दा आदमी (रश्दी और तसलीमा नसरीन) और उसकी किताबों पर प्रतिबन्ध से कोई असर नहीं पड़ता आप लोगों को!!!!
रही बात लोकतान्त्रिक होने kee, बात तो वही हुई….फसबूक और जयपुर फेस्टिवल दोनों उसी साम्राज्यवाद के दो अलग अलग रूप हैं. एक बड़े गुंडे और उसके चमचे में कैसे अंतर हो सकता है? दोनों ही अपराधी हैं, बल्कि आप फसबूक जैसे बड़े गुंडे को तो लोकतान्त्रिक बता रहे हैं क्योंकि उसके पास अपने पापों को ढकने कि क्षमता है परन्तु उसी के छुटभैय्ये चमचे को अलोकतांत्रिक बता रहे हैं….!! वाह मेरे भाई बड़ी अच्छी समझ है लोकतंत्र की.
रही बात जयपुर फेस्टिवल में अमीर लेखकों के आने की, फिर से वही बात दुहराऊंगा कि ये आप नहीं बल्कि हिंदी लेखकों की अंग्रेज़ी लेखकों के प्रति हीनभावना से उपजी हुई आत्मकुंठा है. गरीब लेखकों को आने से किसने मना किया था? बल्कि कुछ तो गए भी थे. कई सारे नाम हैं….ललित कुमार, यतीन्द्र मिश्र और भी ढेर सारे….अब ये सब कोई अमीर लेखक नहीं हैं..बड़े लेखकों में अशोक बाजपेयी थे….सिर्फ वो नहीं गए थे जिनको अंग्रेज़ी और अंग्रेज़ी लेखकों से कुंठा होती है और आत्मश्लाघा से फुर्सत नहीं है और जिनका अपना साहित्य मौलिक न होकर अक्सर अंग्रेज़ी साहित्य की नक़ल होता है, ऐसे लोग इस डर से नहीं जाते की कहीं चोरी पकड़ी न जाए…रही बात अमीर लेखकों की, किसने हिंदी लेखकों को अमीर बनने से रोका है? ये सारे अंग्रेज़ी और हिंदी लेखक (चाहे वो गुलज़ार हों या अशोक वाजपेयी) ये सब पैदा होते ही अमीर नहीं थे….अपने उत्कृष्ट साहित्य कि वजह से उन्हें पहचान मिली और पैसा भी मिला और उन्हें कोई हीनभावना भी नहीं अंग्रेज़ी साहित्यकारों के सामने जाने में….
“रही बात लोकतान्त्रिक होने kee, बात तो वही हुई….फसबूक और जयपुर फेस्टिवल दोनों उसी साम्राज्यवाद के दो अलग अलग रूप हैं. एक बड़े गुंडे और उसके चमचे में कैसे अंतर हो सकता है? दोनों ही अपराधी हैं, बल्कि आप फसबूक जैसे बड़े गुंडे को तो लोकतान्त्रिक बता रहे हैं क्योंकि उसके पास अपने पापों को ढकने कि क्षमता है परन्तु उसी के छुटभैय्ये चमचे को अलोकतांत्रिक बता रहे हैं….!! वाह मेरे भाई बड़ी अच्छी समझ है लोकतंत्र की”
Baat sirf abhivyakti ki hai. FB par koi bhi apna a/c khol sakta hai, kya JLF mein ko bhi jaakar apne vichar rakh sakta tha?
रही बात जयपुर फेस्टिवल में अमीर लेखकों के आने की, फिर से वही बात दुहराऊंगा कि ये आप नहीं बल्कि हिंदी लेखकों की अंग्रेज़ी लेखकों के प्रति हीनभावना से उपजी हुई आत्मकुंठा है. गरीब लेखकों को आने से किसने मना किया था?
“jahanm jo amir lekhakon ki salana party hai.” Maine na angrezi likha hai na hindi, maine sirf amir likha hai.
जो सिर्फ आभासी है उसके नियंत्रण की चर्चा मात्र पर आप लोग इतना खौरिया रहे हैं पर एक जिन्दा आदमी (रश्दी और तसलीमा नसरीन) और उसकी किताबों पर प्रतिबन्ध से कोई असर नहीं पड़ता आप लोगों को!!!!
Abhasi duniya ka istemal aapke aur mere jaise log hi karte hain. Agar is par pratibandh lagta hai to ye hum par pratibandh hai. Aap khud soch lijiye ki jab aapko 2 vyaktiyon par pratiband lagne se itni baiccheni ho rahi hai to itne sare log jo FB aur is tarah ke doosre madhyamon par apne ko abhivyakt karte hain, usse aapko taqlif nahi hai?
Aur aapko kya lagta hai ye sirf FB par khatm ho jayeega?
First they came for the communists,
and I didn’t speak out because I wasn’t a communist.
Then they came for the trade unionists,
and I didn’t speak out because I wasn’t a trade unionist.
Then they came for the Jews,
and I didn’t speak out because I wasn’t a Jew.
Then they came for the Catholics,
and I didn’t speak out because I was Protestant.
Then they came for me
and there was no one left to speak out for me.
[...] पर एक राइटअप मोहल्ला लाइव पर पढ़ा था, आजादी बोलेगा तो… उसी शृंखला में पेश है, उनका यह दूसरा [...]
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