Home » Forward Press, नज़रिया

अब गीता ही ब्राह्मणवादियों की नयी मनुस्‍मृति है!

8 February 2012 11 Comments

राम के बाद अब गाय और गीता पर दांव खेलेंगे भगवाई

♦ प्रमोद रंजन

यह फारवर्ड प्रेस के फरवरी अंक की कवर स्‍टोरी है। हिंदी पट्टी में पत्रिका अपने तेवर के कारण तेजी से बुद्धिजीवियों के बीच जगह बना रही है। समाजशास्‍त्री-पत्रकार अभयकुमार दुबे भी इस पत्रिका के सलाहकार संपादक मंडल में शामिल हो गये हैं। पिछले दिनों कई तरह की विचारोत्‍तेजक बहसों के कारण पत्रिका विवादों में भी घिरी रही। इनमें से एक विवाद ‘ओबीसी साहित्‍य’ जैसी नयी स्‍थापना के कारण था। पत्रिका के ताजा अंक में भी यह बहस जारी है। अश्विनी कुमार पंकज ने आदिवासी अस्मिता को उपेक्षित करने के कारण ओबीसी साहित्‍य के पैरोकारों को आड़े हाथों लिया है। एक सूचना यह भी है कि फारवर्ड प्रेस ने अपनी तीसरी वर्षगांठ अप्रैल, 2012 पर ‘बहुजन साहित्‍य वार्षिकी : 2012′ के प्रकाशन की भी घोषणा की है : मॉडरेटर

भारत के गैर द्विजों के लिए यह एक सूचना भी है और चेतावनी भी। हिंदुत्व की बिसात पर एक बार फिर मोहरों की अदला-बदली हो रही है। इस बार राम की जगह कृष्‍ण और गाय है। मथुरा को ‘अयोध्या’ बनाया जाएगा। कृष्‍ण जन्मभूमि के सिर पर चढ़ कर बनाया गया ईदगाह – युद्ध की मुनादी का कारण बनेगा। बाबर की जगह औरंगजेब होगा, जिसने विश्‍व हिंदू परिषद और राष्‍ट्रीय स्वयंसेवक संघ के दावों के अनुसार 1669 में मथुरा का भव्य केशव मंदिर तोड़कर ईदगाह बनवा दी थी।

यह संजय की सूचना है। लेकिन किसी दिव्य दृष्टि पर नहीं, ठोस तथ्यों पर आधारित। वर्ण व्यवस्था के सैनिक वर्ष 2006 में ही कूच कर चुके हैं। 30 अगस्त, 2007 को उन्होंने इलाहाबाद हाईकोर्ट में पहली तथा 19 दिसंबर 2012 को भारतीय संसद में अपनी दूसरी बड़ी जीत दर्ज की। एक ओर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) शासित राज्यों में मध्यप्रदेश, हिमाचल प्रदेश, कर्नाटक, उत्तराखंड, गुजरात, बिहार, झारखंड और छत्तीसगढ़ में अश्‍वमेघ का यह घोड़ा कुलांचे भर रहा है, तो दूसरी ओर, कांग्रेस ओबीसी, दलित, आदिवासी और धार्मिक अल्पसंख्यकों को कह रही है कि उस ओर न देखें। जस्ट इग्नोर इट।

इस घटनाक्रम की तारीखों को ध्यान से देखें। हो सकता है आपको याद न हो, 11 सितंबर, 2007 को उत्तर भारत के सभी प्रमुख हिंदी अखबारों में पहले पन्ने की खबर थी, ‘राष्‍ट्रीय धर्मग्रंथ बने गीता : इलाहाबाद हाईकोर्ट’। अंग्रेजी अखबारों ने भी इसे प्रमुखता से रिपोर्ट किया था। यह फैसला इलाहाबाद हाईकोर्ट के न्यायमूर्ति एसएन श्रीवास्तव ने 30 अगस्त, 2007 को दिया था। लेकिन मीडिया में यह खबर 11 सितंबर, 2007 को आयी। इस बीच 4 सितंबर, 2007 को न्यायमूर्ति श्रीवास्तव रिटायर हो गये। पर्याप्त सनसनी वाली यह खबर वर्ष 2007 में क्यों और कैसे 11 दिनों तक दबी रही? जबकि यह एक सामान्य सार्वजनिक फैसला था, जिसके लिए किसी स्टिंग ऑपरेशन की आवश्‍यकता नहीं थी। 12 सितंबर, 2007 को विश्‍व हिंदू परिषद द्वारा सेतु समुद्रम परियोजना के विरोध में भारत बंद का आह्वान किया गया था। इस खबर के मीडिया में आने और ‘भारत बंद’ की तारीख में गहरा संबंध है। भारत बंद से ठीक एक दिन पहले इस खबर को मीडिया में प्रचारित करके एक साथ कई नशिाने साध लिये गये। पहला यह कि न्यायमूर्ति श्रीवास्तव के सेवानिवृत्त हो जाने के कारण उन पर कार्रवाई का खतरा कम हो गया। दूसरा यह कि भारत बंद के हंगामे के कारण मीडिया में इस खबर को उछाले जाने की संभावना समाप्त हो गयी। 12 और 13 सितंबर, 2007 को सभी समाचार माध्यमों में सिर्फ ‘भारत बंद’ की खबर थी, गीता की नहीं। यदि इस खबर को चर्चित होने का गैप मिला होता, तो निहित राजनीतिक कारणों से इसका विरोध होने की आशंका, कम से कम उस समय, विश्‍व हिंदू परिषद को थी। सांप भी मर गया, पर लाठी न टूटी।

यह हिंदुत्ववादी ताकतों के लिए भारतीय उच्च न्यायालय के एक नियोजित फैसले को अपनी ‘थाती’ बना लेने की सुनियोजित प्रक्रिया थी और बहुजनों की सांस्कृतिक और राजनीतिक चेतना के विकास का लिटमस टेस्ट भी।

विश्‍व हिंदू परिषद परीक्षण सफल रहा। कहीं से भी इसका प्रत्युत्तर ऊंची आवाज में नहीं आया। हिंदू ओबीसी, दलितों, आदिवासियों और धार्मिक अल्पसंख्यकों की राजनीति करने वाले चुप रहे। 11 सितंबर, 2007 को समाचार मध्यमों में कांग्रेस की ओर से तत्कालीन कानून मंत्री एचआर भारद्वाज का बयान आया कि ‘यह सिर्फ एक राय है, जिस पर ध्यान दिये जाने की कोई जरूरत नहीं है।’

8 मार्च, 2007 को विश्‍व हिंदू परिषद के प्रिय सेवानिवृत्त मेजर जनरल भूवन चंद्र खंडूरी उत्तराखंड में भाजपा सरकार के मुख्यमंत्री बने। मौजूदा परिस्थितियों में उत्तराखंड एकलौता राज्य है, जहां हिंदुत्वादी ताकतें ब्राह्मण मुख्यमंत्री देने में सफल हो सकती है। (1) ब्राह्मण होने के कारण मेजर जनरल हिंदुत्ववादी ताकतों के सबसे विश्‍वसनीय सेनापति हैं। भाजपा के अन्य मुख्यमंत्रियों पर ये ताकतें इतना भरोसा नहीं कर सकतीं।

उत्तराखंड में खंडूरी के मुख्यमंत्री बनने के एक महीने बाद 7 अप्रैल, 2007 को उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव के पहले दौर का मतदान था और भाजपा सांप्रदायिक सीडी कांड में बुरी तरह घिर चुकी थी। चुनाव आयोग के निर्देश पर पार्टी के बड़े नेताओं पर एफआईआर दर्ज की जा चुकी थी। (2) ठीक इसी समय, चुनाव के दो दिन पहले 5 अप्रैल, 2007 को इलाहाबाद हाईकोर्ट के इन्हीं न्यायमूर्ति एसएन श्रीवास्तव ने फैसला दिया ‘उत्तर प्रदेश में मुलमान अल्पसंख्यक नहीं हैं। उन्हें अल्पसंख्यक कोटे की सुविधाएं नहीं मिलनी चाहिए।’ (3) एक समाचार चैनल ने उस समय सर्वे के हवाले से खबर दी थी कि यह फैसला उत्तर प्रदेश के चुनाव नीतजों को प्रभावित कर सकता है। न्यायमूर्ति श्रीवास्तव ने इस फैसले की शुरुआत ही बताया भी कि ‘Since I have been scheduled to sit at Lucknow Bench of this Court from 9^th April, 2007, I consider it appropriate to pronounce operative part of the judgment of the writ petition.’

समझना शायद बहुत मुश्किल न हो कि इलाहाबाद से लखनऊ बेंच जाने के 4 दिन पहले मुसलमानों से अल्पसंख्यक दर्जा छीनने की कोशिश करने वाला फैसला देने और अपनी सेवानिवृत्ति के 5 दिन पहले गीता को राष्‍ट्रीय धर्मग्रंथ घोषित करने की जरूरत उन्हें क्यों नजर आयी? जबकि भुवन चंद्र खंडूरी के उत्तराखंड के मुख्यमंत्री बनने के पहले इस तरह के किसी अन्य फैसले का उनका रिकार्ड नहीं था।

सेवानिवृत्ति के तुरंत बाद एसएन श्रीवास्तव उत्तराखंड स्टेट पुलिस कंप्लेंट्स ऑथरिटी के चेयरमैन बना दिये गये। यह उनकी हिंदुत्ववादी ताकतों की सेवों का पुरस्कार था, जिस पर उनका नाम पहले ही लिखा जा चुका था।

इस भारी-भरकम पद का कार्यकाल खत्म होते-होते खंडूरी 11 सितंबर, 2011 को उत्तराखंड के मुख्यमंत्री दुबारा बने। खंडूरी ने 9 नवंबर, 2011 को न्यायमूर्ति श्रीवास्तव उत्तराखंड में कांग्रेस कार्यकाल में हुए घपले-घोटाले की जांच के लिए गठित न्यायिक आयोग का नया चेयरमैन बना दिया। अभी वे इसी पद पर हैं।

मुसलमान से अल्पसंख्यक का दर्जा छीनने की वकालत करने वाला फैसला 45 पृष्‍ठों का है, जबकि गीता को राष्‍ट्रीय धर्मशास्त्र बनाने की घोषणा करने वाला फैसला 95 पृष्‍ठों का। दोनों फैसलों में दर्जनों अकादमिक किताबों, धर्मशास्त्रों, आंकड़ों व विभिन्न सर्वेक्षणों का विस्तृत हवाला दिया गया है। ये दोनों फैसले काफी सतर्कता और विद्वतापूर्ण ढंग से लिखे गये हैं। इस तरह की लेखन शैली अकादमिक अभ्यास की मांग करती है जबकि न्यायमूर्ति श्रीवास्तव की शिक्षा और समझ उस स्तर की नहीं रही है। गीता वाले फैसले के बाद श्रीवास्तव को नजदीक से जानने वाले कानूनविद व पूर्व कानूनमंत्री शांति भूषण ने भी कहा था कि यह फैसला ‘सिर्फ यह बताता है कि वे लोग भी जज बनने में सफल हो जाते हैं, जो भारतीय संविधान के बारे में भी कुछ नहीं जानते।’*(4)

ऐसे में, यह सवाल भी अनुत्तरित नहीं ही रहता कि उपरोक्त दोनों ‘विद्वतापूर्ण’ फैसलों का ड्राफ्ट किन ताकतों के इशारे पर तैयार किया गया गया था। दरअसल, मूल पटकथा कहीं और लिखी जा रही थी, शूद्र परिवार में जन्मे (वर्ण व्यवस्था के अंतर्गत श्रीवास्तव की जाति ‘कायस्थ’ शूद्र श्रेणी के अंतर्गत आती है) न्यायमूर्ति एसएन श्रीवास्तव तो ‘निमित्त’ मात्र थे। कुछ-कुछ कृष्‍ण की भांति।

गीता के चौथे अध्याय में कृष्‍ण कहते हैं कि :

चातुर्वण्यं मयां सृष्‍टं गुणकर्मविभागश:
तस्य कर्तारमपि मां विद्ध्यकर्तारमव्ययम्।

मतलब, ‘मैं कृष्‍ण ही वर्णव्यवस्था का रचयिता हूं। मैंने ही गुण और कर्म देखकर चार वर्णों की रचना की। मैं उस सब का कर्ता हूं, पर तुम मुझे अकर्ता ही जानो’। यह श्‍लोक बताता है कि वर्णव्यवस्था किसी ब्राह्मण की रचना नहीं है, यदुकुल के कृष्‍ण ने इसे रचा है। साथ ही गीता का रचयिता यह भी साफ कर देता है कि यह महान कार्य कोई गैर-ब्राह्मण नहीं कर सकता। कुरुक्षेत्र के मैदान में गीता का उपदेश विष्‍णु देते हैं, यदुवंशी कृष्‍ण तो निमित्त मात्र हैं। इसलिए वह कहते हैं ‘तुम मुझे अकर्ता ही जानो!’। क्षत्रीय अर्जुन और यदुवंशी कृष्‍ण दोनों वहां ‘साधन’ मात्र हैं, जिनकी लगाम कहीं और से संचालित हो रही है!

विश्‍व हिंदू परिषद की आदि *(नवीन!) मनुस्मृति

यह अनायास नहीं था कि भले ही दलित-पिछड़े तबके के राजनीतिक नेतृत्व की ओर से गीता को राष्‍ट्रीय धर्मशास्‍त्र घोषित करने पर कोई प्रतिक्रिया नहीं आयी लेकिन भाजपा के पूर्व सांसद भारतेंदु प्रकाश सिंघल (बी पी सिंघल) ने कहा कि ‘न्यायमूर्ति श्रीवास्तव ने यह टिप्पणी एक न्यायधीश के रूप में की है, न कि एक हिंदू के रूप में’। *(5) हिंदुत्ववादी ताकतों के ‘विचारक’ के रूप पहचाने जाने वाले रिटायर्ड आइपीएस अधिकारी बीपी सिंघल विश्‍व हिंदू परिषद के अध्यक्ष अशोक सिंघल के भाई हैं। इनके तार कई रूपों में उत्तराखंड से जुड़े रहे हैं।

दरअसल, हिंदुत्ववादी ताकतों के ‘श्रीराम’ को 1990 के दशक में भले ही हिंदू अन्य पिछड़ा वर्ग का समर्थन हासिल हो गया था लेकिन बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद इस समर्थन का ग्राफ गिरता गया। यह वाम विचारधारा वाले इतिहासकारों व अन्य बुद्धिजीवियों द्वारा चलाये गये अभियान का प्रतिफल था, लेकिन उससे कहीं ज्यादा व्यापक पैमाने पर यह काम मंडल की राजनीति ने किया। अन्य पिछड़े वर्गों ने राम को राजनीतिक रूप से अस्वीकार कर दिया लेकिन किसी भी प्रकार के सांस्कृतिक आंदोलन के अभाव में वे देवी-देवताओं, पूजा-पाठ, कर्मकांडों से पहले की ही तरह चिपके रहे।

दूसरी ओर दलित बहुत पहले ही मनुस्मृति को पूरी तरह खारिज कर चुके थे और मनुस्मृति के अमानवीय कानूनों को ब्राह्मणवादी ताकतें अपनी तमाम व्‍याख्याओं, तमाम कुतर्कों के बावजूद सही ठहराने में असफल हो रहीं थीं। बल्कि मनुस्मृति शूद्रों, अति शूद्रों का ऐसा हथियार बन गयी थी, जिसकी कोई काट उनके पास नहीं थी। अब मनुस्मृति से पल्ला झाड़ लेने में ही उनकी भलाई थी।

अब गीता उनकी ‘नयी’ मनुस्मृति है, जिसमें उन्हें मनुस्मृति के वे सभी तत्व नजर आ रहे थे, जिनकी उन्हें कामना थी। सबसे पहले इसका डेक्यूमेंटेशन हमें राष्‍ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े ब्‍लॉग Sangh Parivar Insider Perspective पर 20 अप्रैल, 2006 के पोस्ट में दिखता है। इस पोस्ट में विश्‍व हिंदू परिषद के अंतराष्‍ट्रीय अध्यक्ष अशोक सिंघल के हवाले से कहा गया है कि ‘‘The “Manu Smriti” or the “Yagyavalkya Smriti” has no connection with Adi Manu or the Sage Yagyavalkya…The Vishva Hindu Parishad totally rejects the “Manu Smriti” as it has no place in a civilized society. The Adi Manu Smriti is the Gita as revealed in Chapter IV of the Gita.” *(6)

संघ परिवार के मुख पत्र आर्गनाइजर ने भी विश्‍व हिंदू परिषद के इस नये स्टैंड को अपने 21 मई, 2006 के अंक में प्रमुखता से छापा।

अब ये ताकतें गीता और गाय पर अपना दांव खेलेंगी। गीता के पक्ष में उनका सबसे बड़ा तर्क है कि राष्‍ट्रीय स्वतंत्रता आंदोलन के नेताओं ने इसका उपयोग बड़े पैमाने पर किया है।

कृष्‍ण यदुकुल के थे। उनकी स्वीकार्यता राम की तुलना ज्यादा व्यापक है। 1990 के राम को यदुवंशी राजनेतओं ने तगड़ी चुनौती दी थी लेकिन कृष्‍ण तो उनकी अपनी जात के थे, जिन्होंने गीता के चौथे अध्याय के अनुसार वर्ण व्यवस्था का निर्माण किया था! गीता पहले ही अध्याय में अर्जुन ने ‘वर्णसंकर’ की भी परिभाषा दी है : ‘‘पाप के अधिक बढ़ जाने से कुल की स्त्रियां अत्यंत दूषित हो जाती हैं और स्त्रियों के दूषित होने पर वर्णसंकर उत्पन्न होता है। यह वर्ण संकर पूरे कुल को और कुलघातियों को रौरव नरक में ले जाता है’’। यह जानना रोचक होगा कि वर्ण संकर जातियां कौन सी हैं *(सूची देखें)। मनुस्मृति व अन्य हिंदू धर्मशास्‍त्रों के अनुसार लगभग सभी ओबीसी जातियां वर्णसंकर हैं। गीता पर दांव बहुत सोच-समझ कर खेला जा रहा है।

जहां तक स्वतंत्रता आंदोलन में गीता के उपयोग की बात है, तो सवाल यह बनता है कि वह किन तबकों की आजादी का आंदोलन था? गांधी, तिलक, विनोवा किस संस्कृति के देन थे? स्वतंत्रता संग्राम की फूले-अंबेडकरी परंपरा में गीता का क्या स्थान है? जाहिर है, आग या कूड़ेदान।

जैसा कि पेरियार ने भी लिखा है, क्या हमें यह नहीं पूछना चाहिए कि कौन हमें शूद्र का मतलब वेश्‍याओं की संतानें, कहकर पुकारता है। क्या वह तुम्हारा भगवान कृष्‍ण है? यदि हां, तो कहां उसने ऐसा कहा है? अगर यह गीता में है, तो क्यों नहीं हमें अपनी चप्पलें उतार कर कृष्‍ण और गीता की पिटाई करनी चाहिए?

पेरियार ने तमिलनाडु की सड़कों पर राम के साथ कृष्‍ण की मूर्तियों की भी चप्पलों से पिटाई की थी।

संदर्भ व पाद टिप्पणियां

1. गुजरात में नरेद्र मोदी और मध्यप्रदेश में शिवराज सिंह चौहान अन्य पिछड़ा वर्ग के (ओबीसी) हैं, छत्तीसगढ़ में रमण सिंह और हिमाचल प्रदेश में प्रेमकुमार धूमल राजपूत हैं, झारखंड में अर्जुन मुंडा अनुसूचित जनजाति के हैं तथा कर्नाटक के मुख्यमंत्री ब्राह्मणवाद के विरोधी रहे वोकालिंगा समुदाय से आते हैं। बिहार (एनडीए सरकार) में भी मुख्यमंत्री नीतीश कुमार (जदयू) और उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी (भाजपा) अन्य पिछड़ा वर्ग से आते हैं।
2. देखें, द हिंदू, 7 अप्रैल, 2007 : ‘What the BJP’s election campaign CD `Bharat ki Pukar’ presents — excerpts from the transcript’
3. देखें, ‘Committee Of Management, Anjuman … vs State Of U.P. Through Secretary, … on 5 April, 2007’ मामले में न्यायमूर्ति एस एन श्रीवास्तव का फैसला।
4. द टेलीग्राफ, 12 सितंबर, 2007
5. वही।
6. ब्‍लॉग, ‘संघ परिवार इनर प्रोस्पेक्टिव’। http://sangh.wordpress.com/

Pramod-Ranjan(प्रमोद रंजन। प्रखर युवा पत्रकार एवं समीक्षक। अपनी त्‍वरा और सजगता के लिए विशेष रूप से जाने जाते हैं। फॉरवर्ड प्रेस के संपादक। जनविकल्‍प नाम की पत्रिका भी निकाली। कई अखबारों में नौकरी की। बाद में स्‍वतंत्र रूप से तीन पुस्तिकाएं लिखकर नीतीश कुमार के शासन के इर्द-गिर्द रचे जा रहे छद्म और पाखंड को उजागर करने वाले वह संभवत: सबसे पहले प‍त्रकार बने। उनसे pramodrnjn@gmail.com पर संपर्क करें।)

11 Comments »

  • Prashant PD said:

    19 दिसंबर 2012??

  • डॉ. पुरुषोत्तम मीणा 'निरंकुश' said:

    उत्तर देने के लिए धन्यवाद! ये कार्य अग्रिम होना चाहिए था! जहाँ तक मेरा सवाल है, मुझे इस प्रकार की सोच को आगे बढ़ाने की कोई जरूरत नहीं नज़र आती!
    आपका लेख तो बहुत ही विचरोत्तेजक है ही! जिसके लिए साधुवाद!
    आपने लिख है कि-

    “………….यह जानना रोचक होगा कि वर्ण संकर जातियां कौन सी हैं *(सूची देखें)। मनुस्मृति व अन्य हिंदू धर्मशास्‍त्रों के अनुसार लगभग सभी ओबीसी जातियां वर्णसंकर हैं। गीता पर दांव बहुत सोच-समझ कर खेला जा रहा है।”

    यहाँ आपका आशय ओबीसी की सूची से है या फिर आपके लेख के साथ कोई सूची संलग्न की गयी है? यदि हाँ तो कृपया उपलब्ध करवाएं!
    धन्यवाद!
    डॉ. पुरुषोत्तम मीणा ‘निरंकुश’

  • Mahendra Singh said:

    अन्य कोई जाति वर्णसंकर हों न हों, प्रमोद रंजन जी जरुर ही वर्णसंकर हैं….बड़ी अजीब बात है कि जब बाकी सारी दुनिया चाँद तारों पर बस्ती बनाने की बात कर रही है तो प्रमोद जैसे पिछड़ी मानसिकता के लोग जाति और वर्णव्यवस्था की गणित बैठा रहे हैं….

  • baba brahmchari said:

    यह लेओ भाई-बहन लोगन कृष्ण महिमा!!!!!

    पुराणों में ब्रज चौरासी कोस की परिक्रमा का विशेष महत्व बताया गया है। कहा गया है, ब्रज चौरासी कोस की परिक्रमा को लगाने से एक-एक कदम पर जन्म-जन्मान्तर के पाप नष्ट हो जाते हैं। यह भी कहा गया है, ब्रज चौरासी कोस की परिक्रमा चौरासी लाख योनियों के संकट हर लेती है।

    शास्त्रों में यह भी कहा गया है कि इस परिक्रमा के करने वालों को एक-एक कदम पर अश्वमेध यज्ञ का फल मिलता है। साथ ही जो व्यक्ति इस परिक्रमा को लगाता है, उस व्यक्ति को निश्चित ही मोक्ष की प्राप्ति होती है। गर्ग संहिता में कहा गया है कि एक बार नन्द बाबा व यशोदा मैया ने भगवान् श्रीकृष्ण से चारों धामों की यात्रा करने हेतु अपनी इच्छा व्यक्त की थी। इस पर भगवान् श्रीकृष्ण ने उनसे कहा कि आप वृद्धावस्था में कहां जाएंगे! मैं चारों धामों को ब्रज में ही बुलाए देता हूं। भगवान् श्रीकृष्ण के इतना कहते ही चारों धाम ब्रज में यत्र-तत्र आकर विराजमान हो गए।

  • समदर्शी said:

    प्रिय प्रमोद रंजन जी,
    लेख के लिए हार्दिक बधाई। और सीबीआई में अपनी पदस्थापना पक्की करने के लिए अग्रिम बधाई भी स्वीकार करें। आपने जिस तरह से जोड़-तोड़ करके, रिश्ते-नाते खोज-खोज के, अंदाजा लगा-लगा के मनमाफिक निष्कर्ष निकाले हैं, उसे देखते हुए मेरा निष्कर्ष है कि आपकी परम योग्यता के हिसाब से आपके लिए सर्वश्रेष्ठ जगह कांग्रेस राज में काम करने वाली सीबीआई ही है। कृपया अपने लेख की एक प्रति श्रीमती सोनिया गांधी को भेजने का कष्ट करें, ताकि वे इस एक लेख के आधार पर ही आपकी महान प्रतिभा के बारे में जान जाएं और तत्काल आपकी नियुक्ति सीबीआई के निदेशक पद पर करके पद को धन्य करें।

    पुनश्च : आपके भारी-भरकम, विस्तृत लेख के मुकाबले मेरा एक छोटा-सा सवाल है- क्या आप बाबा साहब या अन्य किसी भी महापुरुष/महामानव की बातों, लेखों, उद्धरणों, विचारों से पूरी तरह और शब्दश: सहमत हैं?
    तो फिर आपको गीता के जिन श्लोकों पर आपत्ति है, उन्हें किनारे कीजिए और कर्मवाद का संदेश देने वाले, विश्व के इस सर्वश्रेष्ठ ग्रंथ के संदेश को आत्मसात कीजिए- कृष्ण, अर्जुन, दुर्योधन, कंस, विदुर, संजय आदि की जातियों पर अपना और दूसरों का भेजा खराब किए बगैर। धन्यवाद।

    अशेष शुभकामनाएं
    समदर्शी, भोपाल

  • Chilam Champion said:

    चिलमवा बोलता है तो कहते हो कि बोल रहा है. लेकिन बोलने को मजबूर कर देते हो. आप लोगों का हाल किसी भी तरह से बाल ठाकरे और योगी आदित्यनाथ जैसे लोगो से अलग नहीं है, और खराब भले हो. तथाकथित अगड़ों ने तथाकति दलितों या अन्य पिछडों पर अत्याचार किया. ठीक है भाई पाप किया. तो अब क्या? आप उनके औलादों को काटेंगे? आप (और आप जैसे लोग) चाहते क्या हैं? बदला????
    फिर तर्कशास्त्र के इसी परिभाषा के हिसाब में योगी आदित्यनाथ, बाल ठाकरे और प्रवीन तोगडिया भी तो ठीक ही करते हैं. फर्क है आप पिछडों के लिए लड़ते हैं और वो हिंदुओं के नाम पर. आखिर कौन इनकार करेगा की इस्लाम के 700-800 साल के शासन में हिंदुओं पर अकथ्य अत्याचार नहीं हुआ. माना कि आप पर पहले से होता था, तो जिनपर पहली बार हुआ उन्हें प्रतिकार करने का हक तो है न. फिर और 2-4 गुजरात बनाना चाहिए क्या?
    मनुस्मृति को कोई नहीं पूछता आज. कोई भी किसी भी सार्वजनिक मंच से उसकी प्रशंसा नहीं करता लेकिन आप हैं कि उसको मिटने नहीं देना चाहते. मनु के सबसे बड़े प्रशंशक तो आप जैसे लोग ही हैं. जैसे कि जिन्ना के अडवाणी. कोई भी मनुस्मृति की बात नहीं करता, वहाँ भी जहाँ दलितों पर अमानवीय अत्याचार हुए हैं, उसके लिए किसी मनुस्मृति की आवश्यकता नहीं है. बाबूजी बिना किसी रेफरेंस ले सिखा के मरे थे कि कैसे औकात बतानी चमटोली वालो को.
    सभ्यताओं के बनने के दौर कई जायज-नाजायज चीजे हुई हैं. सभी धर्मग्रंथों में इसका प्रमाण मिलता है. कुर-आन में भी कई और गीता इत्यादि से कई गुना अधिक आपत्तिजनक चीजे हैं. तो कुर-आन को गाली देकर किसी को चोट पहुँचाना जरूरी है क्या? हाँ जरूर है, उस समाज में जहाँ कुर-आन को जबरदस्ती थोपा जाए. आप को गीता अच्छी नहीं लगती तो मत पढ़ो. कोई गीता का ज्ञान आप पर थोप रहा है क्या? हमें तो गांधी भी नहीं ठीक नहीं लगती, लेकिन चौराहे पर गाली नहीं देता. जानता हूँ गांधी से लोगों की भावनाये जुडी हुई हैं. भारत बाबा साहब के संविधान से चल रहा है कि मनु के स्मृति से? मरने दो मनुस्मृति को उसकी मौत.
    जहाँ तक मेरे बात है तो मैंने गीता का संक्षिप्त पढ़ा है. सहमति-असहमति अपनी जगह, लेकिन गीता महान ग्रन्थ है इससे कौन इनकार कर सकता है, अगर कोई धर्मग्रन्थ महान हो सकता है तो. कुछ श्लोक जातिवादी लगे लेकिन उसको पढ़े बिना कोई प्राचीन भारत को समझ सकता है क्या?
    तो चिलमवा यही कहेगा कि कुछ कंस्ट्रक्टिव बात करिये, ये जो है बाल, उसकी खाल निकल के क्या मिलेगा. दलितों और पिछडों के लिया अभी बहुत कुछ किया जाना है. और हाँ चिलमवा से नाम न पूछियेगा, क्योंकि नाम में उपनाम होता है. और उपनाम से लोग कूई-न-कोई ‘वादी’ हो ही जाते हैं. इतना तो जान ही लीजिए ब्राह्मण नहीं हूँ.

  • Mohalla Live » Blog Archive » वर्णसंकर (शूद्र- अतिशूद्र) जातियों का उद्भव said:

    [...] प्रेस के संपादक प्रमोद रंजन के पिछले लेख की पूरक है। दरअसल, वह लेख फारवर्ड [...]

  • ब्राह्मणवादियों की माँ बहन का यार said:

    …आइस-पाइस…बच्चों का लुकाछिपी का एक खेल है. जबतक धर्म रहेगा, उनको मानने वाले डरपोक और स्वार्थी रहेंगे, धर्म के नाम पर मानवता को ठेंगा दिखने वाले लोग रहेंगे, जबतक मानववादी वैज्ञानिक और तार्किक सोच का वर्चस्व समाज में नहीं कायम होगा तबतक धर्म और इसको इस रूप में मानने वाले चूतियों, पाजियों, हरामियों, मानवधर्मरोधियों के प्रतिकार में खड़ा होने की जरूरत बनी रहेगी.

    धर्माधारित अंधविश्वासी आचरण ही ब्राह्मणवाद की जड़ है जो भारतीय समाज के हर तबके को व्यापे हुए है.और इसके खात्मे के लिए हर धर्म के ऐसे अविवेक के पोषक अर्थात ब्राह्मणवादियों को औकात में लाने के लिए ज्यादा से ज्यादा ‘ब्राह्मणवादियों की माँ बहन का यार’ के पैदा लेने और कर्मरत होने की जरूरत है. एक ब्राह्मणवादी बामन ही तो कह गया है-शठे शाठ्यम समाचरेत्…

  • "ब्राह्मणवादियों की माँ बहन का यार" की बीवी और उसकी १८ साल की बेटी का आशिक said:

    “ब्राह्मणवादियों की माँ बहन का यार”

    “जबतक मानववादी वैज्ञानिक और तार्किक सोच का वर्चस्व समाज में नहीं कायम होगा”

    are teri bahan ke launde saale katue…saale pahle apne dharm ki buraiyon ko door kar…kis desh me dalit nahee hain…africa me jakar dekh…america me jakar dekh…somaliya me ek katua hi doosare katue ko maar raha hai..wahan kahan brahamana baitha hai? wahan to tere jaise katue hi hai…jakar somaliya me bakwaas kar…teri man aur bahan ka balatkar turant kar diya jayega…saale aukat hai to jakar saudi arab me bol madhachod…

    jakar Nigeria me bata kisi ko manavwaad aur vigyaan ke faayade…saale dogale….katue…

  • "ब्राह्मणवादियों की माँ बहन का यार" की बीवी और उसकी १८ साल की बेटी का आशिक said:

    @baba brahmchari and ब्राह्मणवादियों की माँ बहन का यार

    “जबतक मानववादी वैज्ञानिक और तार्किक सोच का वर्चस्व समाज में नहीं कायम होगा”

    भोसड़ी वाले माधरचोद दलित और हरिजान की चूत, कहाँ गया बे साले बिल में घुस गया. अरे साले बड़ा वैज्ञानिक बना फिरता है और साले ये ही नहीं जानता की विज्ञान और तकनीकी में विश्व के सिरमौर पश्चिमी देशों में चाहे वो जर्मनी हो या फिर इंग्लैंड, या चाहे अमेरिका ही क्यों न हो, धर्म का बोलबाला है…..भले ही कुछ वैज्ञानिक अनीश्वर वादी हों पर अभी भी ६० से ७० प्रतिशत सफल वैज्ञानिक चाहे वो फिजिसिस्ट हों या केमिस्ट या फिर बड़े डॉक्टर ही क्यों न हों आज भी किसी न किसी इश्वर या परमसत्ता में विश्वाश करते हैं और फिर भी बड़े बड़े मानवता वादी कार्य कर रहे हैं….

    तू साले दो कौड़ी का किसी सस्ती उनिवेरसिटी से रिज़ेर्वेसन श्रेणी में सस्ती डिग्री लेकर फसबूक और मोहल्ला पर इतना हल्ला कर रहा है साले तुझे कितना विज्ञान पता है माधरचोद, जाकर अपनी चमयीन माँ से पूछ, भोसड़ी वाले खुद तो कुछ कर नहीं पाया अब अगर अपने बच्चों को ही पढ़ा लिखा कर कुछ बना ले जा तो आकर अपनी विज्ञानं की बकवास करना, नहीं तो वो भी तेरे ही तरह लाल झंडा लेकर झंडू बाम बन कर रह जायेंगे और जिंदगी भर तेरी ही तरह फ्रास्तियाये रहेंगे और वाम पंथ के चक्कर में गरीबी में भी मरेंगे….भाग जा साले माधरचोद दलित वो भी कतुओं में दलित….

Leave your response!

Add your comment below, or trackback from your own site. You can also subscribe to these comments via RSS.

Be nice. Keep it clean. Stay on topic. No spam.

You can use these tags:
<a href="" title=""> <abbr title=""> <acronym title=""> <b> <blockquote cite=""> <cite> <code> <del datetime=""> <em> <i> <q cite=""> <strike> <strong>

This is a Gravatar-enabled weblog. To get your own globally-recognized-avatar, please register at Gravatar.