ब्राह्मणों की हत्या के लिए यदुवंशी ने क्षत्रिय को उकसाया था!
♦ पंकज झा
फारवर्ड प्रेस के संपादक प्रमोद रंजन के लेख की प्रतिक्रिया में हमने पंकज झा से अनुरोध किया था कि वे कुछ लिखें। चूंकि पंकज बीजेपी से जुड़े विचारक हैं, उनकी प्रतिक्रिया हमारे लिए महत्वपूर्ण थी। उन्होंने हमारा अनुरोध स्वीकार किया। हम उनके आभारी हैं, लेकिन समर्थक नहीं : मॉडरेटर
गीता पर उठाये गये हालिया विवाद पर उच्च न्यायालय में कार्यवाही के दौरान की बातों पर गौर करें। याची के वकील को न्यायाधीश ने तीन सप्ताह का समय केवल इस बात के लिए दिया कि वो पहले गीता को पढ़ें और उसमें उल्लिखित किन-किन बातों पर आपत्ति है, उसका विवरण प्रस्तुत करें। पहले ही सुनवाई के दौरान अधिवक्ता ने ईमानदारी से स्वीकार किया कि उसने ‘गीता’ पढ़ा नहीं है।
और तीन सप्ताह के बाद अगली तारीख पर उसी विद्वान अधिवक्ता ने उसी तरह की ईमानदारी का परिचय देते हुए साफ तौर पर यह स्वीकार किया कि उन्होंने न्यायालय के आदेश पर गीता पढ़ तो जरूर लिया लेकिन समझा बिलकुल नहीं। और अंततः उनकी याचिका खारिज कर दी गयी। बात केवल गीता का ही नहीं है। अगर आप गौर करेंगे तो पाएंगे कि भारतीय संस्कृति से संबंधित हर फैसले में न्यायालय ने अपने नीर-क्षीर विवेक का परिचय देते हुए ऐसा ही फैसला दिया है। चाहे मामला राम जन्मभूमि का हो, धारा 370 का, सामान नागरिक आचार संहिता, आईएमडीटी एक्ट का विरोध कर बंगलादेशी घुसपैठियों को निकाल बाहर करने का, अमरनाथ श्राइन बोर्ड, सेतु समुद्रम, गोहत्या निषेध समेत हर विषय को विभिन्न सक्षम न्यायालयों ने हिंदुत्व या यूं कहें कि संघ, विहिप, भाजपा आदि के पक्ष को सही माना है। तो हम अपने न्यायालय या संविधान की सुनें या गीता विरोधी उचक्कों का, ये फैसला हमें करना होगा।
तो मुकदमा में जज ने क्या कहा, गीता में क्या कहा गया है, अभी तक के तमाम देशी-विदेशी विद्वानों ने गीता के बारे में क्या-क्या कहा है। शंकराचार्य, गांधी, विनोवा प्रभृति महामानवों ने किस तरह गीता की बातों का भाष्य करने, उसका सरल अर्थ प्रस्तुत करने, उसी अनुसार अपने जीवन की दिशा का निर्धारण करने में किस तरह अपना जीवन समर्पित कर दिया यह संदर्भ देना भी यहां भैंस के आगे बीन बजाना ही होगा। चूंकि यहां भगवान कृष्ण और गीता के लिए (पेरियार के बहाने) ‘सड़क पर चप्पल मारने’ जैसा शब्द इस्तेमाल किया गया है तो ये भी कहना होगा कि उन चीजों का अध्ययन करने के लिए इन लोगों को कहना या वो सब उद्धृत करना, सूअर को मिठाई खिलाने की कोशिश जैसा ही होगा। खैर…
बस, संदर्भवश केवल इतना उल्लेख करना पर्याप्त होगा कि आखिर गीता का उद्धरण तो साम्यवादियों के लिए भी मुफीद होता अगर उसे इन लोगों ने ब्राह्मणवादी ग्रंथ न घोषित कर दिया होता। आखिर युद्धरत दो गुटों में से एक अर्जुन को धर्मयुद्ध (आप हिंसा कह लीजिए) के लिए प्रेरित करने (उकसाने) के लिए ही तो यह अठारह अध्याय सुनाया गया था। कुत्ते-बिल्ली की तरह लड़ने और कुछ टुकड़े के लिए लोगों को लड़ा कर इस धरती को नर्क बना देने वाले वामपंथियों-जातिवादियों को तो मार्क्स से अच्छा उद्धरण इनमें मिल सकता था। वो तो यहां भी ‘वर्ग संघर्ष’ जैसी स्थितियों को तलाश ही सकते थे। लेकिन उनकी मुश्किल यह है कि गीता में ‘सत्य और असत्य’ के रूप में दो वर्गों का वर्णन किया गया है, न कि संपत्ति (या उनके सुविधा अनुसार जाति, संप्रदाय) आदि किसी अन्य रूप में। बस गीता में अंतर्निहित सत्य की यही ताकत इन्हें दुम दबा कर भागने को विवश करती है। और चूंकि इस सभ्य देश में इनकी जुबान हलक में ही रहने देने की गारंटी है, तो कम से कम हिंदुओं के बारे में कुछ भी कहते रहना इन्हें रास आता है। वरना कुरआन में क्या-क्या कहा गया है, उसके लिए वैसा असभ्य शब्द इस्तेमाल कर के देखें, अपनी औकात का पता चल जाए इन लोगों को तो।
जहां तक जाति आदि का सवाल है तो यह जानना दिलचस्प होगा कि कौरव पक्ष की तरफ ही तो द्रोणाचार्य और कृपाचार्य आदि के रूप में कई ब्राह्मण खड़े थे, जिन्हें मारने के लिए ‘क्षत्रिय’ अर्जुन को ‘यदुवंशी’ कृष्ण प्रेरित कर रहे थे। यह भी साथ ही पढ़ लीजिए कि रामायण में भी ‘ब्राह्मण’ रावण का ही संहार ‘क्षत्रिय’ राम ने किया था। लेकिन कहां इस आधार पर ब्राह्मण और राजपूतों या अन्य जातियों के बीच में किसी तरह का कोई जाति विभाजन हो गया? यह तो इस महान संस्कृति की सफलता ही मानी जानी चाहिए कि आज भी राम और कृष्ण का पूजन इन लोगों द्वारा ब्राह्मणवाद कहा जाता है। चूंकि यह प्रतिक्रया में लिखा गया लेख है, अतः यह भी साथ ही वर्णित करना जरूरी है कि आज भाजपा के मुख्यमंत्रियों में भी सभी गैर ब्राह्मण ही हैं। यह तो भला हो उस राम-जन्मभूमि आंदोलन का, जिसके कारण उचक्कों द्वारा नाहक जाति के आधार पर टुकड़े-टुकड़े में बांट दिये गये समूहों का एक हिंदुत्व की छतरी तले आना संभव हुआ था। नहीं तो आरक्षण के नाम पर तो किलों-कबीलों में देश को बांट देने में कोई कसर नहीं रख छोड़ा था इन समूहों ने। खैर…
सभी विचारों के प्रति सहिष्णु एकमात्र इस हिंदू संस्कृति की खासियत है कि वह देश, काल और परिस्थिति के अनुसार उसी तरह बदलता है जिस तरह भगवान विष्णु विभिन्न युगों में अलग-अलग रूप में अवतार लेते हैं। यह इसी संस्कृति की खासियत है कि वह विदेशी मजहब की तरह कभी चौदहवीं सदी में पैदा हुए विचार को आज भी उसी रूप में मानना गंवारा नहीं करता। अतः अगर मनुस्मृति या किसी और ग्रंथ में वर्णित कोई बात युगानुकूल नहीं लगी तो उसे विनम्रता से बदल देना, कोई गलती हो जाने को मानव स्वाभाव का हिस्सा मान उसके लिए खेद भी प्रकट करते रहना इस संस्कृति में ही तो संभव है। इस सहज-स्वाभाविक विनम्रता को ‘राजनीति’ समझने वाले तत्वों को बेनकाब करने की जरूरत है।
तटस्थ लोग कृपया गौर करें। पौराणिक सनातन मान्यता भी यह कहता है कि विवाह एक संस्कार है और उसका एकमेव ध्येय संतानोत्पति कर वंश बढ़ाना होता है। इस निमित्त वह अगर जरूरी हुआ, तो बहु-विवाह को भी मान्य करता था। लेकिन जब हमने अपना संविधान बनाया तो स्त्री-पुरुषों को समान दर्जा देते हुए एक से अधिक विवाह को प्रतिबंधित किया। तमाम बहुसंख्यक हिंदू समाज ने उसे स्वीकार भी किया। इसी तरह छुआछूत को आज भी हम सब एक स्वर में निंदनीय मानते हैं और जब भी कभी ऐसी व्यवस्था थी या अभी भी है, तो उस पर खुलेआम लानत भेजते हैं। बाल विवाह, सती प्रथा आदि पर भी दृढ़ता से रोक लगा कर विधवा विवाह आदि को लगभग मान्य कर देना आज के युग में संभव हुआ है। इसके उलट मुस्लिमों ने अपनी उन्हीं मध्ययुगीन मान्यताओं पर अड़े रहना मुनासिब समझा और आज भी वहां चार विवाह तक करने की कानूनी मान्यता समेत अन्य तमाम ऐसे मानवता विरोधी, युग विरोधी कानून कायम हैं, जिसके कारण शाहबानो की न्यायालय द्वारा दी गयी रोटी भी छीन ली जाती है।
तो हिंदुत्व जैसे सहिष्णु और युग अनुसार खुद को बदलते रहने वाले जीवन दर्शन को निंदनीय मानने वाले लेकिन कट्टर समूहों के लिए दो शब्द भी निकालने में जुबान खींच लिये जाने का अभिव्यक्ति का खतरा मोल नहीं लेने वालों ऐसे तत्वों का ज्यादा परवाह करने की जरूरत नहीं है। चूंकि इस जीवन दर्शन में रुदालियों के लिए भी पर्याप्त जगह है। भैरव के रूप में हम कुत्ते को भी कुछ पत्र-पुष्प समर्पित कर ही देते हैं, तो इन गीता-गंगा-गाय विरोधियों को भी कायम रहने देना होगा। यही वायरस हमें हर वक्त प्रतिरोधी वायरस पैदा करते रहने की ताकत देते हैं। हममें इतना नैतिक साहस कायम है कि हम पूर्वजों की किसी गलत कामों का भी विरोध कर सकें। जाति-संप्रदाय आदि आधारित छुआछूत समेत अन्य तमाम भेद-भाव को छोड़ कर एक नये समरस समाज बनाने हेतु हिंदुत्व का यह सनातन जीवन पद्धति गोरियों, गजनबियों, गीता-गंगा-गाय विरोधियों के बावजूद बदस्तूर कायम रहेगा।
चूंकि इन तमाम मुद्दों को बेजा रूप से राजनीति के चश्मे से देखने की कोशिश की गयी है, तो ये भी कहना होगा कि रुदालियां छाती पीटते रहें भाजपा अभी 116 है, कल 270 होगी। अभी आधे दर्जन से अधिक राज्यों में सत्तासीन है, कल दो दर्जन राज्यों में होगी। आज एकमात्र प्रासंगिक विपक्ष है, कल लाल किले के प्राचीर पर भी होगी। और हर मोहल्ले में तब भी कुछ विदूषक इसी तरह कायम रहेंगे, जैसे अभी हैं। आखिर मनोरंजन भी हर एक फ्रेंड की तरह जरूरी होता है यार। कुछ जोकरों को सुधारने की कोशिश करने के के बजाय उनके हाल पर ही छोड़ देना श्रेयष्कर होता है। बाबा तुलसी ने पहले ही कहा है…
मूरख मनहि न चेत, जौं गुरु मिलहि विरंची सम
…
(पंकज झा। माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्वविद्यालय से पत्रकारिता में मास्टर डिग्री लेनेवाले पंकज झा वर्तमान में छत्तीसगढ़ भाजपा के मुखपत्र दीपकमल के संपादक हैं। इसके साथ ही वे विभिन्न अखबारों और पत्रिकाओं के लिए मुक्त लेखन भी करते हैं। उनसे jay7feb@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)










पूरी तरह सहमत हूँ पंकज जी। करारा जवाब।
पंकज जी का लेख अद्भुत है —
१. युद्धरत दो गुटों में से एक अर्जुन को धर्मयुद्ध (आप हिंसा कह लीजिए) के लिए प्रेरित करने (उकसाने) के लिए ही तो यह अठारह अध्याय सुनाया गया था।………
पंकज झाजी अगर यह धरम युद्ध था तो
क्यों कृष्ण ने अपनी सेना पूरा परिवार (यदुवंशी) कौरव के साथ कर दिया क्या आप अपने को एक तरफ और पुरे परिवार को अलग करोगे …………..
दुसरी बात धृतराष्ट्र और पांडू में धृतराष्ट्र बड़े थे लेकिन अंधे होने के कारण पांडू को राजा बनाया गया था लेकिन दुर्योधन अंधा नहीं था अत: राजा बनने का अधिकार उसे था
अगर यह धरम युद्ध था तो कौरवों की सेना और मंत्री में किसी एक ने यहाँ तक कि पांडवो के सबसे बड़े भाई कर्ण ने भी कौरवों का साथ दिया ….
और अगर द्रोपदी का चीरहरण के संदर्भ में युधिस्ठिर को द्रोपदी को (वस्तु के रूप में ) दाव पर लगाने में सरम नहीं आयी और चीरहरण कुवा तो अधर्म और अगर यह अधर्म था तो कृष्ण और पांडवो को तो युद्ध करना चाहिए था वो तो साडी को ही बढाते चले गए ……..
कहानी अभी बाकी है मेरे दोस्त ……….
२. रामायण में भी ‘ब्राह्मण’ रावण का ही संहार ‘क्षत्रिय’ राम ने किया था। रावन एक समतामुलक (Egalitarian society) समाज का राजा था और और राम ब्राह्मणवादी विचारधारा का पोषक था . एक प्रसंग लक्षमन बेहोश, हनुमान संजीवनी लाते समय अयोध्या में भरत से मिले ……. लेकिन भरत न तो स्वयं गए न ही सेना को भेजे वह रे भाई प्रेम …..
रावण ब्राह्मण विभीषण आदमी और सारे राक्षस इधर राम और लक्षमन आदमी और सब बंदर अजीब सेना है ……………
कहानी अभी बाकी है मेरे दोस्त ……….
ब्राह्मण और ब्राह्मणवाद में अंतर होता है, चाणक्य, राहुल सांकृत्यायन और हरिमोहन झा (खट्टर काका के लेखक ) भी ब्राह्मण थे पर उन्होंने ब्राह्मणवाद का विरोध किया …..
कहां इस आधार पर ब्राह्मण और राजपूतों या अन्य जातियों के बीच में किसी तरह का कोई जाति विभाजन हो गया?
अब ब्राह्मण चाहे तो वो ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शुद्र किसी की भी बहन और लड़की से सादी कर ले या रख ले पर क्षत्रिय अगर ब्राह्मण की बहन या लड़की से सादी का ले तो ये संस्कृति भ्रष्ट होने लगती है (मनुस्मृति )
यह तो इस महान संस्कृति की सफलता ही मानी जानी चाहिए कि ……..
विद्रोही जी कि कविता ——
धरम के मुताबिक़ उनको मिल सकता
बैतरणी का रिजर्वेशन ,
बसरते कि संकल्प दे अपनी बूढी गाय
और खोज लाये सवा रुपया कर्ज,
……..
किसान की गाय
पुरोहित कि घोड़ी होती है (धरम कविता से ……..)
भगवान को स्थापित करने का उद्देश्य सत्ता या व्यक्तित्व निर्मित करना है धर्म या भगवान (Religious Authority) केवल मानव समाज में पाए जाते है इनका ब्रह्माण्ड से कोई सम्बन्ध नहीं है
विद्रोही जी कि कविता ——
धरम देश से बड़ा होता है
उससे भी बढ़ा होता है धरम का निर्माता
जिसके कमजोर बाजुओं की रक्षा में
तराशकर गिरा देते है
पुराने पोथियों में लिखे हुए हथियार
तमाम चट्टान तोडती छोटी-छोटी बाहें,
क्योकि बाम्हन का बेटा
बूढ़े चमार के बलिदान पर जीता है
(धरम कविता से ……..)
@Avinash Das जी अगर मेरा कमेन्ट अच्छा लगे तो इसे लेख के रूप में मोहल्ला लाइव पर छापे
accha jawab diya h……geeta par aarop lagane wale pehle use read kr le to accha hoga…..
भगवद्गीता का श्री दीनानाथ भार्गव ‘दिनेश’ कृत हिन्दी पद्यानुवाद—-
http://wikisource.org/wiki/%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80%E0%A4%B9%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%97%E0%A5%80%E0%A4%A4%E0%A4%BE
प्रिय पंकज झा जी,
जूते भिगो-भिगो कर मारने वाली कहावत को अगर किसी ने शब्दश: सार्थक किया है, तो वह है आपकी लेखनी। आपकी लेखनी को सलाम। श्री प्रमोद रंजन ने जिस तरह की छ्ली भाषा का इस्तेमाल किया था, उसकी प्रतिक्रिया में गुस्सा आना स्वाभाविक है। लेकिन आपने गुस्से में भी संतुलन और नियंत्रण नहीं खोया और तर्कों-तथ्यों के साथ मुंहतोड़ जवाब दिया, इसके लिए आप साधुवाद के पात्र हैं।
आपने मोहल्ला लाइव की घोषित हिंदुत्व विरोधी विचारधारा के बावजूद इस मंच पर जवाब दिया, इसके लिए आपको विशेष धन्यवाद, क्योंकि अक्सर ऐसे मंचों पर एकपक्षीय विचारधारा के कारण मूर्खों का बोलबाला हो जाता है, जिससे आमतौर पर यह संदेश बनता है कि जातिवादी, कुंठित, ईष्र्यालु, बुद्धिहीन लोग ही वास्तविक बुद्धीजीवी हैं और वे ही जीत की ओर बढ़ रहे हैं।
- समदर्शी, भोपाल
जबर्दस्त्त लेख है.इसे कोई नहीं झुटला सकता कि हिंदू धर्म सबसे लचीला धर्म है.जिसमें वक्त के साथ मानवहित में कई बदलाव हुए.और गीता एक धार्मिक ग्रन्थ ही नहीं एक व्यावहारिक जीवन दर्शन है.
पंकज जी ,आप भी किनको समझाने में लगे है.ये तो आज तक अपनी उलटबांसी खुद अपने बीच के लोगों को नहीं समझा पाए.ये दो अक्षर पढ़ने के बाद ‘ढाई आखर’ तक पहुचना ही नहीं चाहते. भेदभाव,मिथक, किस्से-कहानिया हर धर्म का हिस्सा होते है. नहीं तो आज इस्लाम,ईसाई धर्म में भी इतने अलग-अलग मत व प्रखंड ना होते.और समान धर्म वाले मुल्कों इराक,इरान पाकिस्तान अफगानिस्तान,रूस व यूरोपीय देशो में लोग एक दूसरे के खून के प्यासे ना होते. ईसाइयों के समूह कैथोलिक और प्रोस्टेंट के बीच कत्ले-आम की कहांनिया या रेसिज्म की हकीकत जानेगे तो अपने गम भी कम लगने लगेंगे, इसलिए प्रभात रंजन जी पहले तथ्यों को जानो. तोते की तरह जो रटाया गया हो उसे ही मत रटते रहो. मनु की कही हुई एक भी बात का उदाहरण अद्यतन अगर आपके पास मौजूद हो तो बताना… कितने शुद्रो के कानो में पिघला शीशा डाला गया या उनके द्वारा वर्णित सामाजिक व्यवस्था का पालन होता रहा हो, येभी बताना. अन्यथा सामाजिक खाई तो आज आप जैसे मलाईदार दलित(?) और वास्तविक रूप से वंचित दलितों के बीच भी बहुत चौड़ी होती जा रही है और जिस जातीय भेदभाव की दुहाई देकर लोग मलाइ काट रहे है. हालाँकि आप जैसों के दुश्प्रचार पर सनातन धर्म में परम सम्मानित स्थान प्राप्त और जाति से शूद्र महर्षियों नारद, वाल्मीकि(रामायण),व्यास(महाभारत) या महर्षि पाराशर का ज्ञान और उनके द्वारा रचे ग्रन्थ एक करारा प्रहार जैसा हीं है.
कृपया इस लिंक को अवश्य पढ़े. जाति व्यवस्था से जुड़े कुछ महत्वपूर्ण बिंदुओं के बारे में ..
http://agniveer.com/4034/caste-vedas-hi/
सभी आदरणीय टिप्पणीकारों के प्रति आभारी हूँ.मोडरेटर महोदय का भी आभार. लेकिन एक स्पष्टीकरण देना ज़रूरी है कि इस लेख के शीर्षक से मेरी (लेखक की ) ज़ोरदार असहमति है. शीर्षक का आशय लेख के भाव को प्रकट करना होता है जबकि यहाँ बिलकुल उल्टा है. इस उलटबांसी का हम विरोध करते हैं. हम यह बार-बार कहना चाहेंगे कि किसी भी तरह के जातिगत भेदभाव में अपनी अनास्था है. लेख के पाठकागण बेहतर जानते होंगे कि यह लिखा ही इस लिए गया है ताकि हमारे महान हिंदू समाज को जाति-वर्ग के आधार पर भड़काने वालों, लड़ाने वालों का मुंहतोड़ जबाब दिया जा सके. साथ ही हमारे पवित्र देवताओं के बारे में अपशब्दों का इस्तेमाल करने वालों को लतियाया-जुतियाया भी जा सके.पुनः धन्यवाद.
पवित्र देवताओं के बारे में अपशब्दों का इस्तेमाल करने वालों को लतियाया-जुतियाया भी जा सके….यह एक नीच ब्राह्मणवादी ही कह सकता है.
अबे, दकियानूस ब्राह्मण पंकज झा, तेरी विद्या की देवी सरस्वती को उसके बाप ब्रह्मा ने भोगा, ऋषि पत्नी अहल्या की धोखे से तुम्हारे इनर देवता ने चु… की, दबंग कृष्ण ने ब्रज की सैंकड़ों बहु-बेटियों को छेड़ा और निर्बल प्रजा के बीच से सोलह हजार युवतियों को अपने शयनागार और सेज का हिस्सा बनाया.फिर भी, इन्हें पवित्र देवता कहते हो नीच ब्राह्मण!
ये लोकतंत्र में पवित्रता की ब्राह्मणवादी ठेकेदारी करने वाले निर्लज्ज चूतियो! अपनी बहन-बेटी-माँ को इन कथा-प्रताड़ित अबलाओं की जगह रखकर देखो, और फिर कलम चलाओ……
प्रमोद रंजन के आलेख के जवाब में लिखी गयी पंकज झा की दलील गले नहीं उतरती.सफाई चाहे जितनी दी जाए सच को झूठलाया नहीं जा सकता है.हिन्दु धर्म के पोर-पोर में अन्याय का दर्शन भरा हुआ है.दुनिया का एक मात्र धर्म है जिसने मनुष्यों के बीच भेद पैदा किया.उनके जन्म की अलग-अलग अवधारणा बनाई.इस अवधारणा के आधार पर ब्राह्मणों को श्रेष्ठ बताया और बाकी को उससे छोटा.जातियोँ बनाई.नीच कहकर 90 प्रतिशत को उनके मानव अधिकारों से भी वंचित किया.जाति के नाम पर शोषण किया.नीच,अधम और अछूत कहकर तिरस्कार किया.इन तथाकथित नीच और अछूतों को गाँव के दक्षिण में बसाया.इसी धर्म में जानवर को तो पूजा जाता है,लेकिन मनष्यों को प्रताड़ित किया जाता है.यही है हिन्दु धर्म और उसके मानने वालों की सहिष्णुता.यही है इनकी उदारता.
दरअसल, हिन्दु धर्म एक शोषण मूलक ब्राह्मणवादी धर्म है.जरुरत इसकी जड़ों को कमजोर करने की है.फारवर्ड प्रेस और मोहल्ला के साथी इस महान काम में लगे हुए हैं.इनके साथ देश के और करोड़ों लोग हैं जो इस ब्राह्मणवादी धर्म से मुक्ति पाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं.ऐसे सभी लोगों को मिलकर इस संघर्ष को और तीखा करने की जरुरत है.
कमाल है, जिस देश के इतिहास में ब्राह्मणेतर जातियों का ही राज्यों पर वर्चस्व रहा है …..अधिकाँश काल तक प्रायः ब्राह्मणेतर जातियों ने ही राज सुख भोगा है वे ही लोग आज ब्राह्मणों को अपमानित करने में लगे हुए हैं. ब्राह्मण तो सदा कोपीनधारी भिक्षुक रहा है ….भिक्षुक के प्रति इतनी घृणा और ईर्ष्या ? भद्र और अभद्र आचरण ही मनुष्य की जाति का निर्धारक होता है. विश्व के सभी देशों में विभिन्न रूपों और संज्ञाओं में जातियों का अस्तित्व आज भी है …पश्चिमी विद्वान भी इस तथ्य को स्वीकारते हैं. वर्ग भेद को तो कम्युनिस्ट देश भी समाप्त नहीं कर सके. यह भारत ही है जहाँ संत रैदास, कबीर दास , फुले आदि सम्मानित होते हैं. कभी किसी ब्राह्मण ने यह हठ नहीं किया कि उन्हें नहीं हमें सम्मान दो क्योंकि हम ब्राह्मण हैं . क्या कोई बताएगा कि क्षत्रिय राम, यदु कृष्ण, शाक्य गौतम ……आदि में से कौन ब्राह्मण था ? ब्राह्मण यदि समाज पर भारी थे तो उन्हें इन लोगों को अपना पूज्य मानने के लिए क्यों विवश होना पडा? वस्तुतः श्रेष्ठ गुणों को स्वीकारने की प्रवृत्ति ही ब्राह्मणत्व है…विपरीत स्थितियों में भी विवेक न खोने की क्षमता ब्राह्मणत्व है…
भारत में ब्राह्मण का यदि वर्चस्व रहा होता तो समाज के हर क्षेत्र में वही छाया होता …सर्वाधिक संख्या भी उन्हीं की होती …..राजा और सम्राट भी वे ही होते …..वह कभी विपन्न न होता.
जो लोग हिन्दू धर्म को समाप्त करने की बात करते हैं मैं उनका स्वागत करता हूँ. किन्तु इससे पहले मैं यह भी जानना चाहता हूँ कि वे इसके स्थान पर और कौन सा नया धर्म लाना चाहते हैं ? नए से अभिप्राय नितांत नवीन नव आविष्कृत ! क्योंकि यदि प्रचलित सभी धर्मों की तुलना की जाय तो उन्हें हिन्दू धर्म से श्रेष्ठ तभी माना जाना चाहिए जब उन धर्मानुयायी देशों में पूर्ण शान्ति और सुख हो. वहाँ कोई सामाजिक विषमता …कोई पाप…कोई शोषण …कोई अत्याचार …कोई वर्ग भेद …कोई भिखारी ….कोई बलात्कारी न हो. यदि किसी ऐसे धर्म को लाना चाहते हो जो एक आदर्श समाज की गारंटी नहीं दे सकता तो मैं कहूंगा कि हिन्दू धर्म का परित्याग करने वाले लोग राष्ट्रद्रोही हैं. धर्म केवल व्यक्तिगत संपत्ति नहीं है …यह केवल पूजा पध्यति नहीं है…बल्कि यह एक सामाजिक श्रेष्ठता का भाव उत्पन्न करने का ऊर्ध्वगामी तप है. जाइए कभी इज्रायिलियों से पूछिए…यहूदियों से पूछिए क्यों उन्हें हिन्दू धर्म इतना आकर्षित करता है ?
किसी को भी गालियाँ देना बहुत सहज है …भद्रता बनाए रखना बहुत कठिन है…ज़रा भद्र बन कर देखिये कभी …ईमानदार बन कर देखिये कभी …..इसके बाद आपको अधिकार मिल जाएगा कि आप भी कुछ नवीन की स्थापना कर सकें.
उपनाम
मेरे पिता जी उपाध्याय लिखते हैं
मैं मिश्र लिखता हूँ
मेरी पत्नी चतुर्वेदी लिखती है
मेरी बेटी चटर्जी लिखती है
मेरा बेटा बनर्जी लिखता है
मेरा कुत्ता शर्मा लिखता है
मेरी बिल्ली तिवारी लिखती है
मेरा तोता पाण्डेय लिखता है
मेरे दादा जी क्या लिखते थे
यह नहीं बताऊँगा
बस, इतना जान लो
कि हम लोग
अनुसूचित जाति वाली सुविधाओं के सुपात्र है
खबरदार ! जो कभी मुझे भंगी कहा.
“जो लोग हिन्दू धर्म को समाप्त करने की बात करते हैं मैं उनका स्वागत करता हूँ. किन्तु इससे पहले मैं यह भी जानना चाहता हूँ कि वे इसके स्थान पर और कौन सा नया धर्म लाना चाहते हैं ? नए से अभिप्राय नितांत नवीन नव आविष्कृत ! क्योंकि यदि प्रचलित सभी धर्मों की तुलना की जाय तो उन्हें हिन्दू धर्म से श्रेष्ठ तभी माना जाना चाहिए जब उन धर्मानुयायी देशों में पूर्ण शान्ति और सुख हो”
कौशलेन्द्र जी बहुत अच्छी बात कही आपने, भाई इतनी ही समस्या है अगर हिन्दू धर्म से तो किसने रोका है, जाकर धर्म परिवर्तन कर लो…..इस्लाम ग्रहण कर लो या बौद्ध बन जाओ. कुछ लोग बने भी हैं लेकिन ताजुब की बात ये है की वहां भी वही समस्याएं हैं…ये लाख इस्लाम ग्रहण कर लें, कभी खान साहब या शेख साहब अपनी बेटी की शादी इनके घर में नहीं करेंगे….
खैर ये इनकी समस्या है, अगर हिन्दू धर्म से इतनी नफरत है तो छोड़ दो ये धर्म लेकिन हिन्दुओं के देवी देवताओं को क्यों गरियाते हो? अरे फर्जी बुद्धिजीवियों खासकर गिरिजेश्वर और बाबा ब्रह्मचारी जैसे लीचड़ लोग तुम्हारी अगर इतनी ही औकात है तो किसी पैगम्बर को गरिया कर देखो, तुम्हे तुम्हारे घर से खींच कर तुम्हारी ये हालत ये और धर्मों वाले बना देंगे की तुम ऐसे लेख और पत्र तो लिख पाना तो दूर की बात रही बल्कि अपनी माँ बहन को भी पहचानने लायक नहीं रहोगे…
क्यों बे बाबा ब्रह्मचारी, तेरी छोटी बहन की चूत में लगता है बहुत खुजली हो रही है, अबे साले उसकी शादी में मेरे से कर दे, सब ठीक कर दूंगा, और तेरी ब्राह्मणों और हिन्दुओं से शिकायत दूर हो जाएगी. और अगर ज्यादा दिक्कत है हिन्दू धर्म से तो साले किसी कटुए से अपनी बहन की शादी कर दे, अपने कटे लंड से तेरी बहन चोदेगा तो तेरी आत्मा को ज्यादा आराम मिलेगा….साले फ़ोकट में हिन्दुओं को क्यों गरियाता है, जाकर अपने धरम बदल दे और अपनी माँ को मौलवी से चुदवा…
@ गिरिजेश्वर, “इनके साथ देश के और करोड़ों लोग हैं जो इस ब्राह्मणवादी धर्म से मुक्ति पाने के लिए संघर्ष कर रहे हैं”
भाई किसने रोक कर रखा है हिन्दू धर्म में तुम्हे और इन करोड़ों भाइयों को? अभी हिन्दू धर्म छोड़ दो लेकिन फिर भी करोगे क्या? अभी तुम बच्चे हो, कौन तुम्हे अपनाएगा? न तो इस्लाम वाले, और न ही इसाई, तुम्हे अछूत का अछूत ही रहना है जीवनभर…बौध बनोगे तो भी नवबौद्ध ही कहलाओगे…और सारी जिंदगी आरक्षण के सहारे ही गुजारनी है तुम्हे….तुम अभिशप्त हो…ताउम्र के लिए
लगी न साले कट्टर ब्राह्मणवाद की सफल-सुयोग्य पैदाईश! तेरी उस विद्यादायिनी देवी माँ सरस्वती को उसके छिनाल बाप ने ही जमकर चोदा, शायद उसकी बुर फट गयी होगी, हालाँकि अपनी फटी बुर लिए अब भी वह तुम ब्राह्मणवादियों की प्रिय पात्र है…..फिर भी रे निर्लज्ज अंधविश्वासी हिंदू की सुयोग्य औलाद, वैसे बलात्कारी और बाप से चुदवा कर चुपचाप आनंद लेने वाली सरस्वती को पूजते हो और तिलमिला भी रहे हो? अरे, अक्ल के धर्म-अंधे बपचोदी, तुझे यह क्यों नहीं महसूस होता कि यदि ईश्वर नाम का कोई तत्व इस दुनिया का नियामक होता तो तेरी जैसी बेसुरी विकलांग-बुद्धि और धार्मिक रूप से मतांध और मतवाली संतान इस पृथ्वी पर पैदा हो हो कर उसे गन्दा नहीं कर जाती…धर्म-जाति के फसाद नहीं होते, तुम जैसी हरामियों की अगुआई में.
अबे साले तेरे ब्राह्मणवादी बाप ने किस ‘शुभ’ मुहूर्त में तेरी माँ को चोद बीजवपन किया कि तेरे जैसा सिरफिरा हिंदू निकला? अभी तुम्हारे तीन बाप तुल्य मंत्री ब्लू फिल्म देखते पाए गए हैं, देखी न उन हिंदुवादियों कि करतूत! धर्म की शुचिता ला ठेका तुम्हारे ऐसे ही अश्लीलता प्रिय बाप-दादे रखते आये हैं. बाबाओं की लीला भी तो तुमने देखी सुनी होगी जो खूब भोगते रहे हैं तेरी भक्तिन माँ बहनों को.नाजायज धर्म-लंड से पेलवाना भी तुम्हारी माँ बहनों को सुहाता है, धर्म के साये में हुए बलात्कार में भी तेरी माओं बहनों को स्वर्गिक और मोक्षदायक आनंद मिलता है रे ससुरो!
मुसलमानों को रे हरामजादे, तुम्हारे ब्राह्मणवादी बापों, ने भारत में कम प्रताड़ित किया है. अयोध्या में सकड़ों मुसलमान को तुम्हारे बापों ने काटा, गुजरात में तुम्हरी माँ-बहन के चुदाई ठेकेदार ने क्या तांडव मचवाया और तुम्हारी सवर्ण माएं और बहनों ने भी कैसे मुसलमानों को काटने-मरने में चुतमरानी रणचंडी दुर्गा सी हो गयी, इतिहास में दर्ज है. इस सब के बाद भी अभी जाफरी केस में तुम्हारे कुछ बाप-दादा बरी होने वाले हैं. सांसद जाफरी तक को उसके घर में घेर कर और आग लगाकर किसने मार डाला रे बेशर्म मादरचोद कट्टर हिंदू, नहीं पता है तुझको. अबे, औलादेब्राह्मणवादी! किस मुस्लिम ने तुम्हारे इन वैचारिक और उद्दंड अमानवीय हिंदी धर्म भाइयों का क्या बिगाड़ लिया?
हरामजादे ब्राह्मणवादी, सलमान रुश्दी जैसे मुसलमान को तो तुम अपना बहनोई मानोगे, उससे अपनी माँ को चुदवाना पसंद करोगे क्योंकि उसने मुस्लिम धर्म के अन्धविश्वास के विरुद्ध आवाज लगाई जो तुम्हारे हिंदू मन को तुष्टि देता है और ऐसी तुष्टि कि तू अपनी माँ बहन की बुर भी अपनी खुशी के बदले रुश्दी जैसों को चोदने के लिए सौंप दो.पर मेरे जैसा धर्मसुधारक बिना तुमसे तेरी माओं बहनों को चोदाई का उपहार मांगे तेरी विकृत मस्तिष्क की धर्म गन्दगी की मुफ्त सफाई को सामने आये तो भी तेरी फटती है.
कब आधुनिक होओगे रे मादरजात, कंप्यूटर लैपटॉप, मोबाइल जैसे अत्याधुनिक वैज्ञानिक तकनीक को तो अपना लोगे रे मेरे ब्राह्मणवादी सालों, ससुरों पर दिमाग से धार्मिक गन्दगी नहीं निकलोगे, जिओगे सोलहवीं सदी में ही.
अबे मादरचोद तुझे जिस माँ ने जन्म दिया होगा वह पता नहीं किस कट्टर हिंदू से चुदवाई होगी कि तेरे जैसी अमानवीय और पवित्र हिंदू ने उसकी कोख से जन्म लिया.तेरी माँ बहन को मेरे जैसा मानव और केवल मानव हित सोचने वाला चोदेगा तभी तेरे जैसी ब्राह्मणवादी संतति का आना रुकेगा और ब्राह्मणवादियों की खेप पैदा होना बंद होगी.
साले, तेरा देवी देवता किस मिट्टी का बना हुआ है कि तुझ जैसे हरामी के पिल्ले भक्त को भी सह रहा है, मेरे जैसा आदमी तो तुझ जसी ब्राह्मणवादी औलादों की छाती पर मूंग दलने के लिए ही पैदा हुआ है जिसमें तेरे ये ससुरे देवता-भगवान और साली देवी-भगवानी भी गेहूं के साथ घुन की तरह पिसते हैं.ये धर्म से चालित अलोकतांत्रिक ब्राह्मणवादी औलादों! तेरे देवी-देवता तो मूक-बधिर हैं,पर तेरे सड़े दिमाग में तो कुछ अक्ल बाकी होगी, कुछ तो ज्ञान-विज्ञान और तर्क-गणितसीखो, सोलहवी सदी में जीते रहोगे तो ऐसे ही धर्म-मलकुंड चाट चाट कर परेशान होओगे. एक सभ्य सुसंस्कृत अधिकार और कर्तव्यपरायण भारतीय नागरिक का जीवन जीने की राह पकड़ो, लकीर के फकीर बने रहोगे तो ये मिट्टी के माधव राम और कृष्ण तेरी सहायता को तो कभी आयेंगे नहीं, हां, जिनगी भर तुम्हें दुःख देते रहेंगे……जय श्रीराम….जय सीते…जय श्रीकृष्ण…जय राधे….क्षय ब्राह्मणवादी और उसकी मानसिक औलाद….जातिवाद का नाश हो….धर्म की क्षय हो….अंधविश्वासी कूपमंडूकों को स्वस्थ और खुला आकाश मिले, उसके धार्मिक-विकारों का समूल विनाश हो….
“अभी तुम्हारे तीन बाप तुल्य मंत्री ब्लू फिल्म देखते पाए गए हैं, देखी न उन हिंदुवादियों कि करतूत” tune aajtak zindagi mein kabhi blue film nahi dekhi?
“बाबा ब्रह्मचारी उफ़ ब्राह्मणवादियों के माँ बहन का यार” ch*/lan* ke upar utha hota to zindagi mein kuchh ban gaya hota.
अकर्मण्यता का पाठ पढ़ाने वाली भगवद्गीता वेदविरोधी भी है.
वेदों और गीता का विषयगत विश्लेषण इस निर्णय पर ले जाता है कि ये दोनों धर्म ग्रंथ एक ही ‘धर्म’ के नहीं हो सकते और न ही इनका रचयिता एक ही तथाकथित परमात्मा हो सकता है.
वेदों में जगह जगह इच्छा और कामना पर बल दिया गया है:
कुर्वन्नेवेह कर्माणि जिजीविषेच्छतं समाः
एवं त्वयि नान्यथेतोऽस्ति न कर्म लिप्यते नरे.
-यजु 40/2
अर्थातः हे मनुष्यों, कर्म करतेहुए सौ वर्ष जीने की इच्छा करो.
जबकि गीता कहती है-
मा कर्मफलहेतुर्भूः
-गीता 2/47
अयुक्त- काकारेण फले सक्तो निबध्यते
-गीता 5/12
अर्थात फल की इच्छा रखने वाले व्यक्ति फल में आसक्त होते हैँऔर बंधन में पड़ते हैं.
वेदों की ऐसी खाल तो नास्तिकों ने भी नहीं उतारी होगी जैसी गीताने उतारी है. गीता में वेदों के नाम पर गलत बयानी की गई है. वेदोंमें कहीं भी ईश्वर को ‘पुरूषोत्तम’ नहीं कहा गया है लेकिन गीता के 15वें अध्याय में गीता का वक्ता स्वयंभू ईश्वर कहता हैः
अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथित- पुरूषोत्तमः
-गीता15/18
अर्थात मैं लोक और वेद में ‘पुरूषोत्तम’ के नाम से प्रसिद्ध हूं.
वेदों में अवतारवाद का सिद्धांत है, वेदों में परमात्मा के अवतार धारण करने का कहीं उल्लेखनहीं मिलता, पर गीता का यह एक प्रमुख सिद्धांत है
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत
अभ्युतथानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्
धर्म संस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे
-गीता 4/7-8
अर्थात जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की उन्नति होती है, तब तब मैं अर्थात (कृष्ण) पैदा होता हूं, साधुओ की रक्षा और पापियों के विनाश के लिए तथा धर्म को स्थापित करने के लिए मैं हर युग में पैदा होता हूं.
एक धर्म के दो धर्मग्रंथों में ऐसा पारस्पारिक विरोध हिन्दू धर्म में ही हो सकता है. हिन्दूओँको दोनों धर्म ग्रंथों में से एकको पूरी तरह अस्वीकार करना पड़ेगा.
आर्यसमाजियों ने पिछली शताब्दीमें ही वेद और गीता के इस पारस्पारिक विरोध को पहचान कर अपने अपने ढंग से इस का समाधान करने की कोशिशें शुरू कर दी थीं.
दयानंद सरस्वती के शिष्य भीमसेन शर्मा ने इस ओर ध्यान दिया और कदम भी उठाया. उन्होंने देखा कि गीता का ईश्वर साकार हैजो वेदों में कथित निराकार ईश्वर के सिद्धांत के विपरीत है. अत: उन्होंने जिस-जिस श्लोक में ‘अहं’ या ‘मा’ पद देखा उस उस श्लोक को झट अर्ध चन्द्रदे कर बाहर निकाल दिया और लगभग 238 श्लोकों को प्रक्षिप्त बता कर निकाल बाहर किया.
इस दिशा में एक दूसरे आर्यसमाजी विद्वान आर्यमुनि ने इस यक्ष प्रश्न के समाधान के लिए एक और ढंग अपनाया. उन्होंने जहां ‘अहं’पद देख वहां उस का अर्थ ‘ईश्वर’ कर दिया और जहां ‘मा’ शब्द मिला, वहां उसका अर्थ वैदिक धर्म कर दिया (देखें नरदेव शास्त्री वेदतीर्थ कृत ‘आर्य समाज का इतिहास, पृ. 235). किंतु भीमसेन के प्रयास की तुलना में यह दूसराप्रयास उपहास्पद है.
इनके अतिरिक्त इस दिशा में और भी प्रयास किए गए. भूमित्र शर्मा आर्योपदेशक और शिदत्त शास्त्रीने भास्कर प्रेस मेरठ से गीता का एक संस्करण छपवाया जिसमें केवल 13 अध्याय रखे. बाद में लाहौर से एक और संस्करण निकाला गया. उसमें केवल 70 श्लोक रखे गए. शेष 630 श्लोक निकाल फेंके गए.
यह काट छांट का तरीका भी कारगार सिद्ध न हुआ. आर्यसमाजी वेद और गीता में से एक के वरण और दूसरे के परित्याग पर उतारू हैं.
आर्यसमाजियों के इन प्रयासों से वेद और गीता के मध्य की खाई और गहरी हो गई है.
वेद आदि ब्रह्म द्वारा रची हुई है. सुनिए कृष्ण के द्वारा ही-
ॐ तत्सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविधः स्पृतः
ब्राह्मणास्तेन वेदाश्च यज्ञाश्च विहिता पुरा.
-गीता 17/23
अर्थात हे अर्जुन, ओम् तत, सत ऐसेयह तीन प्रकार का सच्चिदानंदधन ब्रह्म का नाम कहा है, उसी से सृष्टि के आदिकाल में ब्राह्मण और वेदा यज्ञ आदि रचे गए हैं.
गीता में कृष्ण स्पष्ट घोषणा कर रहे हैं कि सब से प्रमुख वेद सामवेद मैं ही हूं-
वेदानां सामवेदा स्मि
-गीता 10/22
गीता में कृष्ण ने अधिकांश समय आत्मप्रचार में लगाया है. गीता के अधिकांश श्लोकों में ‘अस्मद’ शब्द का किसी न किसी विभक्ति में प्रयोग किया गया है. ‘अस्मद’ शब्द उत्तम पुरूष के लिए प्रयोग किया जाता है. हिन्दी में इसका स्थानापन्न शब्द ‘मैं’ है.
गीता में कुल 700 श्लोक हैं. कृष्ण ने 620 श्लोक कहे,
375 बार ‘मैं’ का प्रयोग किया. इससे यह निष्कर्ष निकाला जा सकता है पूरी गीता में कृष्ण मैं, मुझको, मैंने, मेरे लिए, मेराआदि शब्दों द्वारा अपनी ही बात कहते रहे हैं. अर्जुन के लिए जो कुछ कहा वह अपनी बात समझने का जोर डालने के लिए.
न जाने कैसा विचित्र समय था और कैसे अज्ञानी लोग थे? नीति तो यहबताती है कि अपने गुणों का स्वयं बखान करने से इंद्र भी छोटा बन जाता है.
‘इंद्रोऽपि लघुतां याति स्वयं प्रख्यापितैर्गुणै’.
बाबा ब्रह्मचारी जी,
ब्रह्मा या इंद्र ने जो किया, उसका फल यह है कि सबसे बड़े देवों की त्रयी में शामिल होने के बावजूद ब्रह्मा की, और देवताओं का राजा होने के बावजूद इंद्र की पूजा नहीं होती (हां, ब्रह्मा के मामले में पुष्कर का मंदिर एक अपवाद है)। जो अपने देवों को भी तिरस्कृत-बहिष्कृत कर दे, ऐसी न्यायप्रिय आजादी सिर्फ हिंदुत्व में ही है।
रही बात कृष्ण की सोलह हजार रानियों की, तो उसके पीछे तथ्य यह है कि कंस के वध के बाद जब कृष्ण ने उसके कारागार से बंदियों को मुक्त किया, तो उनमें ये सोलह हजार रानियां-राजकुमारियां भी थीं, जिन्हें कंस बलपूर्वक उठा ले आया था। जब कृष्ण ने उनसे उनकी इच्छा पूछी, तो सभी ने उन्हें वरण करने की इच्छा जताई। कारण यह कि जब इस जमाने में अपहृत या जबरदस्ती की शिकार युवती को दोष न होने के बावजूद उसके परिजन ही स्वीकार नहीं कर पाते, तो उस जमाने में ऐसी अपहृत युवतियों को कौन स्वीकार करता? लेकिन कृष्ण की महानता थी कि उन्होंने उन सभी को अपनी ब्याहता पत्नी का दर्जा देकर सामाजिक स्वीकृति दिलाई। जाहिर है, इसके पीछे ‘यौन आनंदÓ जैसा कुछ नहीं था।
पिछले दिनों मैंने खबर पढ़ी थी कि पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी ने जनगणना करने वालों को आदेश दिया था कि देश में जिस बच्चे के पिता का नाम अज्ञात हो, उसके पिता के रूप में उनका (जरदारी का) नाम लिखा जाए। इस तरह जरदारी पाकिस्तान के लाखों अनाथ बच्चों के दस्तावेजी पिता हो गए। मेरा सवाल यह है कि कुछ सौ बरसों बाद यह आश्चर्यजनक तथ्य बताया जाएगा कि जरदारी लाखों बच्चों के पिता थे, तो क्या आप उन्हें ‘व्याभिचारीÓ कहना चाहेंगे? (जरदारी पर भ्रष्टाचार के आरोप अपनी जगह कायम हैं।)
गिरिजेश्वर जी,
हिंदू धर्म में ऐसा कोई संस्कार नहीं है, जिसमें सफाईकर्मियों, धोबियों, लोहारों, बढ़इयों आदि की अनिवार्य भूमिका न हो। चाहे मामला जन्म का हो, मृत्यु का या शादी-ब्याह का। शादी में एक धोबन अपनी मांग का सिंदूर देती है, जिसे सुहाग देना कहते हैं। तेरहवीं में जब तक कोई सफाईकर्मी खाना न खा ले, तब तक माना जाता है कि मृतक तक भोजन नहीं पहुंचा। यह हिंदुत्व ही है, जिसने छोटे कहे जाने वाले कामों को भी बड़ा महत्व दिया है। हां, छुआछूत की आपकी बात बिल्कुल सच है, जिस पर इस जमाने के हिंदू शर्मिंदा भी हैं। रोटी-बेटी का संबंध भी इसी छुआछूत से निर्धारित हुआ, लेकिन अब ये बंधन टूट रहे हैं। हां, यह सच है कि इन बंधनों के टूटने की गति अभी कम है, जिसे बढ़ाने की कोशिशें होनी चाहिए।
नीलाक्षी जी,
बहुत-बहुत धन्यवाद। आपने तो हिंदुत्व की बड़ी अच्छी खूबी बताई, जिस पर शायद आने खुद भी ध्यान नहीं दिया। गौर कीजिए, यह एकमात्र धर्म है, जो दो विपरीत विचारों-सिद्धांतों को भी बराबर मान्यता देता है। हिंदुत्व में ही पूरी आजादी है। आप राम, कृष्ण, देवी, देवता किसी को नहीं मानते, तब भी आप हिंदू हो सकते हैं। आप वेद को नहीं मानते, तब भी आप हिंदू रहते ही हैं। वेदों की निंदा करने वाले जैन मत के कट्टर अनुयायी, मेरे सारे जैन मित्र खुद को हिंदू ही कहते हैं। आपका मंदिर जाना जरूरी नहीं, पूजापाठ करना जरूरी नहीं। मूर्तिपूजा अनिवार्य नहीं। हिंदुत्व में इतनी स्वतंत्रता है कि कुछ भी अनिवार्य तो दूर की बात, आवश्यक भी नहीं है। सबकुछ आपकी श्रद्धा, आस्था और शक्ति पर छोड़ा गया है।
इसलिए, आप सभी मित्रों को पूरी स्वतंत्रता है कि जो मानना चाहें, मानें, जो न मानना चाहें, उसे न मानें।
सादर,
समदर्शी, भोपाल
वाह वाह.माँ हिन्दी के अमर सपूतों. क्या भाषा है.क्या विमर्श हैं.
एक दूसरे की माँ-बहनों से क्या रिश्तेदारियां हैं..
शयनकक्ष से सरस्वती तक
सरस्वती से सलमान रश्दी तक
मन खुश कर दिया तुम लोगों ने
तुम लोग शायद समझते भी नहीं होगे कि तुम कितनी बड़ी राष्ट्रसेवा कर रहे हो
कितने गरीबों को पोर्नोग्राफी देखने की जरूरत नहीं पड़ती
व्यक्ति का पैसा बचता है देश की बिजली.
बस अब मोहल्ला लाइव का कन्नड़ संस्करण भी शुरू कर दो, फिर किसी भाजपाई मंत्री को विधानसभा में पोर्न नहीं देखना पड़ेगा, मंत्री पद भी बच जाएगा, राष्ट्र का चाल चेहरा और चरित्र भी.
भाजपाई होकर भी नेट पर सेंसर करने की मुहीम में कपिल सिब्बल की मदद कर रहे हो? शर्म नहीं आती तुम्हे? ऐसी बहसों के बाद अगर कोई नेट पर या पोर्टल्स पर प्रतिबन्ध लगाने की बात करे तो किस मुंह से उसे रोकोगे बेहूदे?
मुझे पता नहीं कि मोहल्ला को इस कांग्रेसी मुहीम में शामिल होने के कितने पैसे मिले हैं पर तुम?
सच ही कहा है किसी ने कि बुद्धिमान बाभन कांग्रेसी हो जाता है (उत्तर प्रदेश में बसपाई) और बुरबक बाभन भाजपाई. साबित करके ही मानोगे का रे बोका.
ज़रा सा भी इज्जत बची हो तुम्हारी तो इस बहस के लिए माफी मांगो. या फिर साफ़ साफ़ पूछ रहा हूँ जवाब दो कि क्या तुम अपनी माँ/बहन/बेटी को (उनका सम्मान हमेशा सलामत रहे -आमीन )यह बहस पढ़ने दे सकते हो. मैं अपनी माँ बहनों को नहीं दे सकता.
मैं अपने घर में मोहल्लालाइव को चाइल्डलाक के अंदर रखता हूँ? और आप?
मेरा बच्चा सुरक्षित, और आपका?
चिलमवा बोलता है तो कहते हो कि बोल रहा है. लेकिन बोलने को मजबूर कर देते हो. आप लोगों का हाल किसी भी तरह से बाल ठाकरे और योगी आदित्यनाथ जैसे लोगो से अलग नहीं है, और खराब भले हो. तथाकथित अगड़ों ने तथाकति दलितों या अन्य पिछडों पर अत्याचार किया. ठीक है भाई पाप किया. तो अब क्या? आप उनके औलादों को काटेंगे? आप (और आप जैसे लोग) चाहते क्या हैं? बदला????
फिर तर्कशास्त्र के इसी परिभाषा के हिसाब में योगी आदित्यनाथ, बाल ठाकरे और प्रवीन तोगडिया भी तो ठीक ही करते हैं. फर्क है आप पिछडों के लिए लड़ते हैं और वो हिंदुओं के नाम पर. आखिर कौन इनकार करेगा की इस्लाम के 700-800 साल के शासन में हिंदुओं पर अकथ्य अत्याचार नहीं हुआ. माना कि आप पर पहले से होता था, तो जिनपर पहली बार हुआ उन्हें प्रतिकार करने का हक तो है न. फिर और 2-4 गुजरात बनाना चाहिए क्या?
मनुस्मृति को कोई नहीं पूछता आज. कोई भी किसी भी सार्वजनिक मंच से उसकी प्रशंसा नहीं करता लेकिन आप हैं कि उसको मिटने नहीं देना चाहते. मनु के सबसे बड़े प्रशंशक तो आप जैसे लोग ही हैं. जैसे कि जिन्ना के अडवाणी. कोई भी मनुस्मृति की बात नहीं करता, वहाँ भी जहाँ दलितों पर अमानवीय अत्याचार हुए हैं, उसके लिए किसी मनुस्मृति की आवश्यकता नहीं है. बाबूजी बिना किसी रेफरेंस ले सिखा के मरे थे कि कैसे औकात बतानी चमटोली वालो को.
सभ्यताओं के बनने के दौर कई जायज-नाजायज चीजे हुई हैं. सभी धर्मग्रंथों में इसका प्रमाण मिलता है. कुर-आन में भी कई और गीता इत्यादि से कई गुना अधिक आपत्तिजनक चीजे हैं. तो कुर-आन को गाली देकर किसी को चोट पहुँचाना जरूरी है क्या? हाँ जरूर है, उस समाज में जहाँ कुर-आन को जबरदस्ती थोपा जाए. आप को गीता अच्छी नहीं लगती तो मत पढ़ो. कोई गीता का ज्ञान आप पर थोप रहा है क्या? हमें तो गांधी भी नहीं ठीक नहीं लगती, लेकिन चौराहे पर गाली नहीं देता. जानता हूँ गांधी से लोगों की भावनाये जुडी हुई हैं. भारत बाबा साहब के संविधान से चल रहा है कि मनु के स्मृति से? मरने दो मनुस्मृति को उसकी मौत.
जहाँ तक मेरे बात है तो मैंने गीता का संक्षिप्त पढ़ा है. सहमति-असहमति अपनी जगह, लेकिन गीता महान ग्रन्थ है इससे कौन इनकार कर सकता है, अगर कोई धर्मग्रन्थ महान हो सकता है तो. कुछ श्लोक जातिवादी लगे लेकिन उसको पढ़े बिना कोई प्राचीन भारत को समझ सकता है क्या?
तो चिलमवा यही कहेगा कि कुछ कंस्ट्रक्टिव बात करिये, ये जो है बाल, उसकी खाल निकल के क्या मिलेगा. दलितों और पिछडों के लिया अभी बहुत कुछ किया जाना है. और हाँ चिलमवा से नाम न पूछियेगा, क्योंकि नाम में उपनाम होता है. और उपनाम से लोग कूई-न-कोई ‘वादी’ हो ही जाते हैं. इतना तो जान ही लीजिए ब्राह्मण नहीं हूँ.
स्मृति पुराण अदि वेदों की ही अपने अपने तरीकों से व्याख्यायें हैं. इतनी व्याख्याओं की आवश्यकता इसलिए पडी ताकि विभिन्न क्षमताओं वाले लोग अपने अपने स्तर से तत्व को समझ सकें. एक बात और …कोई तत्व दर्शन, मीमांसा, वैशेषिक आदि की बात क्यों नहीं करता ? इनके आधार पर हिन्दू धर्म को गालियाँ क्यों नहीं देता ? इसका भी कारण है …….मैक्स मूलर और मैडम व्लात्सवोत्सकी जैसे लोगों ने इनकी महत्ता को स्वीकार किया है . वर्त्तमान लोगों में फ्रिट्ज ऑफ़ काप्रा जैसे विश्व के शीर्षस्थ भौतिविदों ने प्राच्य दर्शनों पर कई पुस्तकें लिखी हैं. विकृत आलोचना से पूर्व कृपया डॉक्टर काप्रा की द टर्निंग पॉइंट और द टाओ ऑफ़ फिजिक्स पढ़ने की कृपा करें. चित्र कला के छात्र को फिजिक्स समझ में नहीं आती तो क्या वह फिजिक्स के अस्तित्व को नकार सकता है या उसे वैज्ञानिकों का पाखण्ड कहा सकता है ? भारतीय दर्शन और पश्चिमी विज्ञान को यदि समझ सको तो पाओगे कि दोनों में अद्भुत साम्यता है ….क्या आपको पता है कि आधुनिक टीकाकरण का आविष्कार भिंड और बनारस के ब्राह्मणों ने किया था. चेचक के प्रकोप से अपने परिवार के बच्चों को खोने के डर से अंग्रेज अपने परिवार को इंग्लैण्ड भेज देते थे. इन दुष्ट ब्राह्मणों ने ही उन्हें आश्वस्त किया कि वे एक बार केवल एक बच्चे को टीका लगाने दें ……
….बाद में लाभ मिलने पर उस अंग्रेज ने इस घटना का ज़िक्र अपने शासकीय पत्र में करते हुए इंग्लैण्ड की सरकार से इस प्रक्रिया को वहाँ भी लागू करवाए जाने की अनुशंसा की. क्या देवी-देवताओं को मानने वाले ब्राह्मण विज्ञान से अनभिज्ञ थे ? सन १८०० से पूर्व पूरे यूरोप में हल नहीं चलता था …जब भारत से यह ज्ञान वहां पहुंचा इसके ५० वर्षों बाद ही डरते-डरते वहां के लोगों ने इसे अपनाया …..ये सारी बातें आप इंग्लैण्ड की सेन्ट्रल लाइब्रेरी में जाकर पढ़िए. ये मैंने कुछ उदाहरण भर दिए हैं ….बाकी भारत के लोगों ने विश्व को क्या दिया यह आप शेष विश्व के ग्रंथालयों में जाकर देख लें.
अभी हमारा वर्त्तमान आस्था और विश्वास के संकट से जूझ रहा है. हमारे दोहरे मानकों और उथले ज्ञान ने हमारा सर्वनाश कर दिया है. पहले सुपात्र को विद्या की पात्रता थी आज कुपात्रों द्वारा सब को डिग्रियाँ बाटी जा रही हैं. (मेडिकल आदि में लागू इंट्रेंस एक्जाम क्या है ?क्या यह सुपात्रता परीक्षण नहीं है ?) जिसका परिणाम है लोगों का चारित्रिक पतन. भारतीय प्रशासनिक सेवा के अधिकारी आकंठ भ्रष्टाचार में डूबे हैं. वे किसी भी धर्म या जाति के हों भ्रष्टाचार के मामले में उनकी एक ही जाति है. यदि अहिंदू इतने चरित्रवान हैं तो वह कहीं दिखाई क्यों नहीं देता ?
पीलियाग्रस्त आँखों वाले ‘समदर्शी’ साहब!
कृष्ण के देवत्व का हरण-क्षरण होने से तो आपने उसे पाक साफ साबित कर बचा लिया, सरस्वती और ब्रह्मा यानी बेटी बाप के यौन सम्बन्ध पर आपकी कौन सी पवित्रता पोषक और पाप निवारक लाइन होगी?
स्त्री और दलित-शूद्र जैसे व्यापक तबके के लिए सरस्वती की विद्या से वंचित करने के शास्त्रीय फरमान और स्वयं सरस्वती द्वारा भी इस पर मौन बरतने पर आप अपना किस तरह से न्याय निर्णय सुनायेंगे?
मंदिरों में पंडिताई के एकाधिकार की ब्राह्मण-बपौती को आप कैसे देखते हैं? हिंदू इतर धर्माचरण में तो किसी जाति या वंश विशेष को ऐसा संरक्षण प्राप्त नहीं है.
मंदिरों में उनके पुजारियों और पुजारी के चेले-चपाटियों द्वारा स्त्री शील भंग होने के अनेक साबित प्रसंगों को आप कैसे देखते हैं?
आदरणीय बाबा साहब ब्रह्मचारी!
मैं पहले ही लिख चुका हूं कि ब्रह्मा के ‘पाप’ की सजा उनकी संतानों ने ही दी और उनकी पूजा बंद कर दी।
सरस्वती ने कभी किसी को वंचित नहीं किया। न ही शिक्षा पर ब्राह्मणों का एकाधिकार रहा। कृपया स्व. श्री राजीव दीक्षित के आजादी बचाओ आंदोलन द्वारा प्रकाशित-प्रसारित श्री धर्मपाल लिखित पुस्तिकाओं का अध्ययन कीजिए। इनमें उन्होंने सप्रमाण, दस्तावेजों का हवाला देते हुए बताया है कि अंग्रेजों के आने से पहले दक्षिण भारत में गांवों में कितने लाख छोटे-छोटे विद्यालय चलते थे, जहां तथाकथित शूद्र और पिछड़ी जाति के शिक्षकों की प्रधानता थी। ये तो अंग्रेज थे, जिन्होंने भारत की इस प्राचीन शिक्षा प्रणाली को ध्वस्त करके एक बड़े समुदाय को वंचित कर दिया।
आपको कहना सही है कि लंबे समय तक मंदिरों में पंडिताई का अधिकार ब्राह्मण-बपौती रहा, लेकिन इसके लिए धर्म दोषी नहीं है। अगर यह धर्म का मूल सिद्धांत होता, तो आज हिंदुओं का सबसे व्यापक संगठन अखिल विश्व गायत्री परिवार इस सिद्धांत को बदलने का साहस नहीं कर पाता। आपकी जानकारी के लिए बता दूं कि गायत्री परिवार द्वारा संचालित मंदिरों में पूजा-पाठ का दायित्व निभाने के लिए जन्मना ब्राह्मण होना जरूरी नहीं है। इन मंदिरों में न जाने कितने तथाकथित शूद्र, पिछड़ी जाति में जन्म लेने लोग ब्राह्मण रूप में पूजा-पाठ, यज्ञ-हवन इत्यादि करवा रहे हैं और लोग पूरी श्रद्धा से उनके पैर छूते हैं, क्योंकि वे वास्तविक ‘ब्राह्मण’ हैं।
रही बात आपके कथनानुसार यौन शोषण की, तो इसमें धर्म या देवी-देवता कैसे दोषी हो गए? क्या हजारों ईसाई पादरियों पर यौन शोषण के आरोप सिद्ध हो जाने और स्वयं पोप द्वारा माफी मांगे जाने से ईसा मसीह दोषी हो गए? या फिर श्रीलंका में बौद्ध बहुमत द्वारा तमिलों पर अत्याचार हुए तो क्या आपके मतानुसार स्वयं भगवान बुद्ध दोषी हो गए?
सबसे बड़ी बात, जो आपको खुले दिल से माननी चाहिए कि सिर्फ हिंदू धर्म ही बदलने का साहस रखता है। छुआछूत, सतीप्रथा, जातिवाद, अंधविश्वासी कर्मकांड, इन तमाम बुराइयों को बुराई मानने का साहस हिंदुत्व ने ही किया। क्योंकि हम जान गए कि ये कुरीतियां हैं, धर्म का हिस्सा नहीं हैं। और आप जानते ही हैं कि जब कोई अपनी बुराई स्वीकार कर लेता है, उसी क्षण से उस बुराई के खत्म होने और उसके बदलने की शुरुआत हो जाती है।
सादर,
‘पीलियाग्रस्त आँखों वाला’ समदर्शी, भोपाल
पीलियाग्रस्त आँखों वाले समदर्शी साहब, समझ रहा हूँ, आप भगवत महिमा को मुझे मनवाए बिना नहीं मानने वाले, फिर भी….
तो सरस्वती को विद्या का देवी मानना ही पड़ेगा, वह भी आपके मार्के की समदर्शी तो कम से कम बुझना ही पड़ेगा! आप क्या मानते हैं, इस देवी की व्याप्ति हिंदुओं तक ही क्यों है. क्या यह हिंदुओं को ही विद्या पान कराने के लिए अवतरित हुईं? जिसने सरस्वती को न कभी पाया, न उसका नाम सुना, न उसकी संस्कृति और जमीन पार उसका अस्तित्व रहा, उसके लिए भी क्या विद्या-देवी बतौर सरस्वती को ही स्वीकारना पड़ेगा, या…? मेरा यहाँ इशारा और प्रश्न सारा समझ गए होंगे आप? क्योंकि सो-कॉल्ड सरस्वती की अक्षत-कृपा से न्याय हुए तो आप लगते हैं निस्संदेह.
मेरी मोटी समझ में जब धर्म है तो अन्धविश्वास रहेगा ही. धर्म में विश्वास या आस्था नाम का कोई तथ्य नहीं हो सकता, वहाँ तथ्य है तो महज अंधविश्वास और अन्धास्था.एक लिंक है नीचे http://a5.sphotos.ak.fbcdn.net/hphotos-ak-snc7/s320x320/407816_10150654283224188_686059187_11318854_1309631702_n.jpg इसपर भी हो सके तो अपने धर्म-रक्षक विचार रखियेगा पीलियाग्रस्त……समदर्शी साहब!
@समदर्शी : आदरणीय भाई, ऊपर लिंक http://a5.sphotos.ak.fbcdn.net/hphotos-ak-snc7/s320x320/407816_10150654283224188_686059187_11318854_1309631702_n.jpg में केवल रेखांकननुमा फोटू गया है,Brahma needs this : the male mother with four genitals, given birth to chathurvarna.उस फोटो पर एक टिप्पणी के साथ फोटू पर विचारे और फिर कुछ कहें.ब्रह्मा ने अपने मुख से जो जन्म दिया ब्राह्मणों को, और अन्य अलग अलग अंगों से दूसरी जातियों को, इसपर आपके क्या विचार हैं? और यहाँ अप्रासंगिक सा प्रश्न यह नत्थी कि क्या आप विज्ञान के ज्ञान को भी मानते हैं? आशा और ‘शुभ’कामना कि यहाँ आप विज्ञान पर धर्मास्था की जय करने में सक्षम हों!
पुनश्च, याद दिलाऊं आपको बिहार के ग्रामीण क्षेत्रों में ब्रह्मा की खूब पूजा होती है, लगभग हर गाँव में ब्रह्मस्थान आपको मिल जायेगा.अतः याद रखिये कि ‘उस’ ब्रह्मा की महत्ता भी बरक़रार है….
परम आदरणीय बाबा ब्रह्मचारी जी,
आपने पिछली टिप्पणी के अंत में ग्रामीण क्षेत्रों की जो जानकारी दी है, उसके आधार पर मेरे इस अनुमान की पुष्टि हो गई है कि आप रत्नगर्भा धरती से उत्पन्न हुए महान समाज सुधारक महापुरुष हैं।
मैं स्वीकार करता हूं कि मैं अकिंचन, एक बौद्धिक और तर्कसंगत बहस की उम्मीद में अब तक अपनी ऊर्जा लगाए हुए था, लेकिन अब आपके बारे में मिली नई जानकारी के प्रकाश में मैं अपना नाम वापस लेता हूं।
पुनश्च : यदि आप कृपापूर्वक दूसरे मजहबों के ‘पाखंडों’ के बारे में भी इसी तरह साहस के साथ, अपनी पहचान कराने वाली इसी भाषा-शैली के साथ कलम चलाएंगे, तो भले ही मैं नास्तिक न हो जाऊं, लेकिन आपको वास्तविक ‘समदर्शी’ जरूर मान लूंगा।
बाबा ब्रह्मचारी aap wo dharm bataye jismein burai nahi hai?
“बाबा ब्रह्मचारी उफ़ ब्राह्मणवादियों के माँ बहन का यार”
“बाबा ब्रह्मचारी उफ़ ब्राह्मणवादियों के माँ बहन का यार”
तू तो साले पक्का कटुआ ही है अब ये बात पक्की हो गयी. तेरी माँ बहन को अगर चोदा गया गुजरात में तो अच्छा ही हुआ…या इसके पहले अगर इतिहास में भी किसी हिन्दू ने कटुओं की मैया चोदी तो तेरी बहन की फुद्दी में बहुत खुजली हो रही है. पर ये बता माधरचोद, तेरी माँ को कटे लंड से चुदाने की जरूरत क्या थी?? मेरा मतलब ये है की साले वही खाड़ी देश में रहना था न तेरे माँ की फुद्दी को चोदने वाले बाबर और अकबर को….अबे साले माधरचोद कुत्ते अब अगर तू हिंदुस्तान में आएगा तो तू भी चुदेगा और तेरी माँ भी चुदेगी और तेरे फ़रिश्ते भी चुदेंगे….
अबे सेल कटे लंड से चुदी हुई औरतों की औलादों जब हिंदुस्तान में आ ही गया है तू और तेरे बाकि मुहम्मद साहब की औलादों….तो अपनी बहन और माँ तो चुदवाने के लिए तैयार ही रहना चाहिए…तुझे….
@”बाबा ब्रह्मचारी उफ़ ब्राह्मणवादियों के माँ बहन का यार”
“,पर तेरे सड़े दिमाग में तो कुछ अक्ल बाकी होगी, कुछ तो ज्ञान-विज्ञान और तर्क-गणितसीखो, सोलहवी सदी में जीते रहोगे तो ऐसे ही धर्म-मलकुंड चाट चाट कर परेशान होओगे.”
अरे तेरी बहन के लौंडे…साले कैसा ज्ञान विज्ञान…तेरी सड़कछाप भाषा से तो नहीं लगता की तू कुछ ज्ञान विज्ञान भी जानता है…अरे साले जुलाहे की औलाद, परचून की दूकान खोलने और सस्ती पत्रकारिता करने से तू क्या ग्यानी बन जायेगा….अरे साले पहले अपने इस्लाम की गन्दगी की तरफ देख …अपने बाप की तरफ देख की कैसे उसने अपने ही चचेरी बहन से शादी कर ली…ये कटुए तो चोदने में अपनी बहन को भी नहीं छोड़ते, अपनी बहन की फुद्दी भी चाट लेते हैं अगर उसने इनकी माँ का दूध न पिया हो…. साले अपने इस्लाम के बारे में पढ़ बहन्द्चोद, पहले अपने मोहम्मद साहब से पूछ….साले तू क्या मुझे ठीक करेगा…मैं तुझे जिंदगी भर सताऊंगा और साले तेरी जवान होती बेटी को भी चोदुंगा….अरे साले कटुए की औलाद…इतनी दिक्कत है हिंदुस्तान से तो भाग जा, तू तो साले भाग ही गया है अपने बूढ़े माँ और बाप को भी ले जा…वैसे भी तू तो अपने धंधे पर ही रहता है, तेरी बीवी को तेरा कटे लंड वाला बूढा बाप चोदेगा…
रही बात ज्ञान विज्ञान सीखने की, तो मुझे मत समझा अपना ये भाषण, अपनी जवान होती बेटी को पढ़ा गणित और विज्ञान. साले ये बता कितने कटुए हैं जिन्होंने गणित और विज्ञानं में नाम कमाया है…जो कटुए भी थोडा पढ़े लिखे हैं वो साले असली मुस्लमान नहीं हैं, किसी न किसी हिन्दू के ही चोदे हुए हैं…साले विदेशों में भी जो हिन्दुस्तानी ज्ञान विज्ञान में आगे हैं, उनमे हिन्दू ही हैं…अधिकतर….आजतक सिर्फ एक कटुए पाकिस्तानी को नोबेल prize मिला है वो भी अहमदी कटुआ है…जिसको बाकि कटुए कटुआ ही नहीं मानते…अब जैसे तुम साले खुद जुलाहे हो…तुम्हे भी कोई शेख और खान कटुआ नहीं मानता….तुम सब वर्णसंकर कटुए हो….थोडा थोडा हमारा खून भी है तुम्हारे अन्दर तभी साले फुदक रहे हो….इतना…नहीं तो असली कटुए होते तो कहीं बैठकर किसी कसाई घर में बकरा हलाल कर रहे होते… फ़ोकट में इतने भाव क्यों खाते हो….
रुके रहो..अभी ज्यादा ज्ञान विज्ञान के चाकर में पड़ोगे तो पता चलेगा जब तुम्हारी जवान होती बेटी, किसी काले लौंडे से चुदवा कर अपना पेट फुला कर घर आएगी,….तब उसके गर्भपात के लिए तुम्हे ज्ञान विज्ञान और गणित पढने की जरुरत पड़ेगी…उसके लिए बचा कर रखो साले कमीने….अपनी बुधिया माँ और बुढ़ाते बाप को पहले गणित पढ़ो साले कटुए की औलाद….लानत है तेरे खुदा और तेरे मुहमद साहब पर…सब के सब साले निहायत हरामी थे और तू भी उन्ही की हरामी औलाद है…साले तेरा कुत्ता खुदा तेरी ही रूह में घुसकर तुझे तेरी बुढिया माँ की सूखती हुई छूट में तेरा लंड डलवाए और मैं दूर से देखता हुआ ताली बजाऊँ ऐसी बड़ी ख्वाइश है…तेरा बेगरत खुदा करे की ऐसा ही हो…आमीन….
याद रख तू साले जब तक अपनी इस हरामखोरी याने हिन्दुओं को गाली देने की आदत से बाज नहीं आएगा…मैं ऐसे ही तेरी माँ बहन की चूत में झांकता रहूँगा और तेरी जवान होती बेटी की चूत का रस पीने की फ़िराक में रहूँगा…मेरा तो जन्म ही तेरे जैसे हरामखोरों की बहु बेटियां और माएं और बीवियां चोदने के लिए हुआ है..याद रखना…तेरा पीछा तो मैं तेरी कब्र तक नहीं चोदुंगा,….और तेरी कब्र में भी जाकर तेरी गांड में लकड़ी खूंटा गाड कर ही दम लूँगा और तेरे मरने के बाद तेरी बीवी के चूत में अपना लंड गदुन्गा…अब बता साले कितना लडेगा तू मुझसे….
@nmk
“बाबा ब्रह्मचारी उफ़ ब्राह्मणवादियों के माँ बहन का यार” को ब्लू फिल्म देखने की क्या जरूरत है….ये तो कटुआ है वो भी दलित कटुआ…इसके ghar की औरतें तो पोर्न स्टार से भी ज्यादा रसीली होती हैं…गाँव के पंडित जी भी मज़ा लेते हैं और मौलवी साहब भी….भाजपा के मंत्रियों को इसके घर का पता दे देना चाहिए, बेचारे फिर कभी मोबाइल पर नहीं देखेंगे…
@“बाबा ब्रह्मचारी उफ़ ब्राह्मणवादियों के माँ बहन का यार”
“लकीर के फकीर बने रहोगे तो ये मिट्टी के माधव राम और कृष्ण तेरी सहायता को तो कभी आयेंगे नहीं, हां, जिनगी भर तुम्हें दुःख देते रहेंगे……जय श्रीराम….जय सीते…जय श्रीकृष्ण…जय राधे….क्षय ब्राह्मणवादी और उसकी मानसिक औलाद….जातिवाद का नाश हो….धर्म की क्षय हो….अंधविश्वासी कूपमंडूकों को स्वस्थ और खुला आकाश मिले, उसके धार्मिक-विकारों का समूल विनाश हो…”.
अरे माधरचोद दूर देश में बैठकर ऐसा स्यापा करने से कुछ नहीं होने वाला….न तो जातिवाद का नाश होगा और न ही धर्म का….साले कटुए तेरे चेहरे से ही लगता है की तू साले लड़कियों का धंधा करता है…और वहां जाकर भी चकला घर ही चला रहा है…या किसी परचून की दूकान….साले बड़ा आया धर्म सुधर करने वाला…पहले अपने लोअफर भाइयों और बहनों जो हिंदुस्तान में अभी भी साद रहे हैं उनको सूधार साले जुलाहे की नाजायज औलाद ….कैसा चल रहा है तेरा भंडुए का धंधा…??
नाश तो तेरा हो जायेगा…जब कुछ दिनों में साले तुम्हारी लड़की किसी अफ़्रीकी लड़के से गर्भवती हो जाएगी….और तेरी बीवी किसी गोरे पडोसी से चुदवा कर भाग जाएगी और तू “अल्लाहु अकबर अल्लाहु अकबर करता रहेगा….साले गंदी नाली के सड़े कीड़े….तेरी किस्मत में तेरी बेटी को भी रंडी होना ही लिखा है…वैसे बता तेरी बेटी का रेट क्या है? साले बड़ा विज्ञान और गणित की बात करता है तेरा कटुआ खुदा करे की तेरी मौत कैंसर से या फिर रोड एक्सिडेंट या फिर कोढ़ से हो जाये…साले गाय का मांस खाने वाले तेरे घावों से इतनी बदबू आएगी की तेरी चिकनी चमेली बेटी या अपने ज़माने की वहीदा रहमान टाइप बुढ़िया बीवी जिसका मासिक धर्म आना बंद हो गया है, वो भी तेरे बदबूदार जख्मों को साफ़ करने नहीं आएगी और तू साले तबलची जैसा दिखने वाला अपने लम्बे लम्बे बालों में खिजाब लगा लगा कर त्वचा कैंसर से मर जायेगा….मर जा साले तू कमीने…इस धरती पर तू बोझा है…
“पुनश्च, याद दिलाऊं आपको बिहार के ग्रामीण क्षेत्रों में ब्रह्मा की खूब पूजा होती है, लगभग हर गाँव में ब्रह्मस्थान आपको मिल जायेगा.अतः याद रखिये कि ‘उस’ ब्रह्मा की महत्ता भी बरक़रार है….”
यह सिर्फ इनकी अज्ञानता का परिचायक है….जिसको ये महोदय ब्रह्मा बता रहे हैं वह हिन्दू mythology के ब्रह्मा देवता नहीं हैं. गांवों में ब्र्हमपुजा का मतलब होता है किसी स्थानीय दिवंगत पूज्यनीय ब्रह्मण की आत्मा, जिसकी पूजा स्थानीय निवासी लगभग कुल देवता और स्थानीय देवता के तौर पर करते हैं. और ज्यादातर गांवों में उनके अपने ब्रह्म होते हैं जो एक दूसरे से अलग होते हैं….हिन्दू धर्म की जटिलताएं समझाना इनके बस का नहीं है और इन महोदय को सलाह है की बगैर किसी धर्म की सूक्ष्मताओं को समझे बगैर उसकी आलोचना न करें…
वैसे इन मूर्ख महोदय को कोई क्या बताये की कटुओं के पैगाबर मुहमद साहब खुद इन्सेस्ट प्रक्टिस करते थे और आम मुसलमानों के घर में भाई बहनों की आपस में शादियाँ होती हैं…जबकि हिन्दुओं में समगोत्रिय विवाह भी मना है…
“अकर्मण्यता का पाठ पढ़ाने वाली भगवद्गीता वेदविरोधी भी है.”
अब इस मूर्ख महिला नीलाक्षी को कौन समझाये की गीता का सबसे प्रचलित श्लोक “कर्मण्ये वाधिकारस्ते ……” सबसे पहले कर्म करने की ही प्रेरणा देता है…..पता नहीं कैसे किस विद्यालय से इस औरत ने शिक्षा प्राप्त की है जो साधारण संस्कृत भी नहीं आती है इसे…लगता है किसी आरक्षित श्रेणी में इसका स्कूल में दाखिला हुआ होगा और कुछ कर नहीं पायी इसलिए वकालत पढ़ लिया तभी “कर्मण्ये वाधिकारस्ते…” का अर्थ यह महिला अकर्मण्यता से लगाती है….जा जा पहले किसी स्कूल में फिर से अनारक्षित कोटे में दाखिला करा फिर तुझे इन श्लोकों का अर्थ समझ आएगा…..
तुम्हारे जात भाई यानी सवर्ण देवी देवताओं के गांडमडौअल, पेला पेली, चुदाई-गंथाई के किस्से तुम्हारे ही परदादा-छेड़दादा द्वारा लिखे मादरचोद और शैतान ब्राह्मणों द्वारा लिखे गए हैं जिन्हें ब्राह्मणवादी दलित शूद्र तक ओढना बिछौना बनाये हुए हैं, वे जब चेतेंगे, अधिकारचेतन होंगे तो अपने त्राता देवी देवताओं को अपने घरों से फेंक ही डालेंगे, साथ ही साथ अपनी माँ बहन के साथ ज्यादती का बदला हर ब्राह्मणवादी सवर्ण की पवित्र लौंडियों और जवान चोदने लायक औरतों को मन भर चोद कर लेंगे और तेरी सारी अकड़ और ऐंठ जाती रहेगी. लाभ उन मुस्टंडे बिन कवर कटे कठोर लंडों को भी खूब मिलेगा जिनके पूर्वज मुस्लिम काल में राजपूतानियों, ब्राह्मणी आदि को खूब चोदते-भोगते आये हैं और जिनके स्पर्म से तुम संकर पैदाइश हो. सवर्णों में खान टाइटल तो मुस्लिम मर्द और सवर्ण औरत के समागम का जगमगाता उदहारण है.
हम तो सात्विक स्वाद के आदमी ठहरे. ब्राह्मणवादी सवर्ण घरों की कथा जानते हैं. भाथियारे होते हैं ये, कोई क्वारी भी इन घरों की अपने नाते-रिश्तेदारों से चुदवाये ठुकवाए बिना नहीं रहती. शादी भी इन घरों में जवानी बीत जाने पर होती है, सो, ये ललनाएं दलित पिछड़ी जात के अपने मजदूर-बनिहार से भी खूब मस्ती में चुदवादी हैं, यह और बात है कि और अवसरों पर इन्हीं से वे छूत भी बरतती हैं. पानी पीकर जात पूछना-इन सवर्ण ब्रह्मणवादियों का ही आचरित पक्ष है. लगता है, दलित-पिछड़े-मुस्लिम-बौद्ध सभी की समवेत और भरपूर व समांग चुदाई से जब इन ब्राह्मणवादी सवर्ण घरों में बच्चे पैदा होने लगेंगे तब जाकर सवर्ण पवित्रता और उच्च्ताबोध का इनका भूत उतरेगा…..
@”मोहल्ला पर मौजूद पवित्र सवर्णों की माँ बहन का नौजवान चोदवैया”
अरे तेरी बहन के लौंडे, साले तेरी बात करने के लहजे से अब मुझे याद आया की पंडित राम प्रसाद के घर में जो एक भरपूर जवानी वाली कसमसाते जोबन से मदमस्त औरत आती थी जो अक्सर उनके पशुओं की चारा देती थी….तू उसी का बेटा है….अरे नवजवान…अब मैं समझा की तू इतना कमीना कैसे हो गया…अरे बेटा गरमजोशी में ये मत भूलो की तुझमे जो इतना दिमाग आया है वो या तो पंडित रामप्रसाद जी की दें है या फिर मेरा खून भी तेरी रगों में दौड़ रहा है. न हो तो डीएनए टेस्ट करवा लो…मैं गारंटी से कह सकता हूँ की तेरा चूतिया जुलाहा/चमार बाप तो खेतों में काम करते करते ही थक जाता था. उसे तेरी माल टाइप की माँ को चोदने की फुर्सत कहाँ…ये तो भला हो पंडित जी का की राम राम करते हुए भी तेरी माँ की जवानी की प्यास बुझाते थे और एक बार तो जब पंडित जी का व्रत चल रहा था तो उन्होंने मुझे कह दिया था की मैं ही तेरी मन को चोंदुं, फिर मैं भला आदरणीय पंडित जी की बात कैसे टाल सकता था…मैंने भी उस जेठ की दुपहरी को तेरी मन के फुदकते चूत को खूब चाटा था और अपना वीर्य भी उसी में गिरा दिया था… बड़ा मज़ा दिया था रे तेरी माँ ने मुझे उस दिन…फिर कई महीनों के बाद पता चला गया की उसके एक बच्चा पैदा हुआ, तो नहीं मालूम था की वो तू ही है…अरे कमीने बधाई हो….आज मुझे मेरा बेटा मिल गया है…
अरे साले कमीने reservation के भरोसे कॉलेज की डिग्री लेने से कुछ नहीं होने वाला…भले ही तू मेरे चोदने से या शायद पंडित जी के चोदने से पैदा हुआ, पर तुझे हमने अपना नाम तो नहीं दिया न…तो साले ऐसे ही रह जायेगा….वैसे तेरी बेटी भी सुना अब जवान हो रही है…मेरा लंड अब पूरा खड़ा तो नहीं हो पाता है पर विअग्रा खा कर मैं उसे भी मस्त कर दूंगा ऐसा वादा करता हूँ……
अरे माधरचोद वर्णशंकर कटुए वो भी दलित…साले तेरे मनाने से छेंका (जैसे बिल्ली के भाग से छींका नहीं टूटता) नहीं टूटने वाला…अभी भी सवर्ण ही इंडिया में राज कर रहे हैं..देख तेरे जैसे दलित कटुए तो बंगलादेश में भी नरक ही भोग ही रहे हैं..और विदेशों में भी छोटा मोटा काम ही कर रहे हैं…जैसे कोई नाइ की दुकान खोल लेता है और कोई परचून की…कोई मर्द होकर भी नुर्से बन जाता है..मैं जनता हूँ एक dalit katue को जो नंबर १ चूतिया है, कनाडा में जाकर साला मजदूर का काम कर रहा है…वैसे तुम साले दलित और दलित कटुए कितने भी पढ़ लिख लो वो कमीनापन कहाँ से लाओगे, देख साले मायावती को…आधे से ज्यादा पंडित जी लोग ही उसकी पार्टी में लेकर मज़ा ले रहे हैं..और तेरे बूढ़े बाप जैसे दलित अपने चुतियापे के कारन कोई तरक्की नहीं कर प् रहे….८०% कटुए तो अभी भी गरीब ही रहने वाले हैं, कोई सब्जी बेचेगा और कोई दरजी की दूकान खोल लेगा…रही बात जो पैसे वाले कटुए हैं वो आतंकवादी बनकर या तस्करी करके अपनी ही कौम को बर्बाद करेंगे…
रही बात तेरी बिटिया और तेरी बीवी की तो दोनों को आज ही मेरे पास भेज देना, एक मेरा लंड चाटेगी और दूसरी का चूत मैं चाटूंगा
कहाँ हो माधरचोद सारे दलित, चमार, और निम्न-कोटि के मुस्लमान जैसे जुलाहे….
उ प्र के इलेक्शन में देखो चाहे कोई सर्कार banaye, राज तो ब्रह्मण और उच्च जातियां ही करने वाली हैं…मायावती जो कांशीराम के कलराज मिश्र के लंड से चुदवा कर मुख्यमंत्री बनी हमेशा ब्राह्मणों के हाथ का ही खिलौना बनी रहती है, कभी भी किसी चमार का भला नहीं कर पायी…भला तो हो रहा है सवर्ण कमीनों का जो सर्वजन के नाम पर गाँव में आज भी तुम्हारे दलित साथियों का बेडा गर्क करते रहते हैं…साथियों तुम्हारा जीवन अँधेरे से भरा हुआ है…अगर अभी भी जात पात के चक्कर से baahar नहीं निकले तो नाली के कीड़े ही बने रहोगे ताउम्र…
अबे मदरचोद सवर्ण हरामी दी ग्रेट ब्राह्मणवादी, किसिम किसिम के नाम के वर्णसंकर, साले कायर सवर्ण, जन्मजात शुद्धता की अकड़ तो अब तेरी भुला ही गयी है अब अक्ल भी भुला गयी. बपचोदनी सरस्वती भी अब तुम्हें सुमति नहीं दे नहीं रही. देखा न रे भोथरी बुद्धि की सवर्ण औलाद(तभी तो लगता है किसी भोथरे दिमाग वाले दलित या शूद्र या मुस्लिम से चुदवाकर तुझे तेरी सवर्ण माँ ने तुझे पैदा किया है), सवर्णों को कैसे दलित माया ने यूपी में पटखनी दे रखी है. कैसे सारे अवसरवादी मादरचोद सवर्ण सारे बीएसपी के टिकट पर चुने गए और मायावती के चरण छू छू पिछले चुनाव के बाद शपथ ग्रहण कर रहे थे मंत्री-संत्री पद की. कहाँ तो तेरी माओं की बूरों से दलित दाई तुम जैसे बच्चों को निकला कर थी पर रे हरामखोर सवर्ण-पुत्र दलितों से तुम्हें दर्द होता है. उस समय तुम्हारी माओं की बूरों को छूत न लगी, धोबी के धोए कपडे पहन चमका लोगे ले मादरचोद सवर्ण ब्राह्मणवादी पर उससे तुम छूत भी बरतोगे.
अबे हरामी के पिल्ले सवर्ण, आदमी बनो, मानव बनो……दो-चार तेरे जैसे ब्रह्मणवादी-सामंती-दकियानूस पवित्र सवर्णों ने ही सारे समाज को मलिन कर रखा है वर्ण आम सवर्ण अब लोकतान्त्रिक मिजाज़ बनने लगे है.
अरे बहनचोद दलित, तू साले अभी भी जिन्दा है…यहाँ साले इन्टरनेट पर बैठ कर बकवास कर रहा है जाकर देख अपने गाँव में तेरी बहन को कोई लोकल सवर्ण और पिछड़ी जाति वाला दबंग चोद रहा होगा…पहले अपनी बहन कि इज्ज़त बचा. साले आरक्षण के बूते डिग्री तो प् गया पर साले किसी कॉर्पोरेट में तो तुझे नौकरी नहीं मिलेगी….ठीक है माना कि तेरा जन्म गाँव के पंडित जी के खड़े लंड से चुदी हुई तेरी कसमसाती जवानी वाली माँ कि चूत से हुआ है और इसीलिए इतनी इतनी हिम्मत आ गयी है कि तू आरक्षण लेकर शहर चला आया पर कमीने हरामी की औलाद, पंडित जी ने अपना वीर्य तेरी माँ कि चूत में डालते हुए अपनी प्रखर बुद्धि वाला गुण तो तुझे दिया ही नहीं. इसीलिए तू यहाँ बैठकर इन्टरनेट पर बकवास कर लेगा पर कभी कुछ बड़ा काम नहीं कर पायेगा…ज्यादा से ज्यादा सरकारी नौकरी कर लेगा जिसमे तेरी तनखाह ही बढ़ेगी और जिंदगी भर घूस खा खा कर diebetes का शिकार होकर घूमेगा और तेरा इलाज़ भी वही आरक्षण प्राप्त किये चमार और दलित डॉक्टर ही करेंगे जिससे तू अपनी मौत के २० साल पहले ही मर जायेगा साले. अरे साले गन्दी नाली के दलित कीड़े तेरी जिंदगी में सिर्फ यंत्रणा ही सहना है. देख साले तेरी मायावती को कैसा चुतिया बनाकर उसके सवर्ण मंत्री देश बर्बाद कर रहे हैं…पूरा का पूरा उत्तर प्रदेश का स्वस्थ्य विभाग बर्बाद हो चूका है. अब मायावती कि चूत तो वैसी भी बूढी हो चुकी है, लेकिन तेरी माँ और बहन का का क्या होगा जिसकी चूत को पंडित जी चोद चोद कर सडा चुके हैं और अब तेरी माल बहन को और तेरी बुढ़िया माँ को गोनोरिया और एड्स जैसी बीमारियाँ लग चुकी हैं..उनका इलाज़ कौन करेगा साले माधरचोद….साले बड़ा खुश होता है अपने आरक्षण पर…जब तेरी मायवती के भ्रस्ताचार से ग्रस्त खाद्य पदार्थों के खाने तेरा हार्ट अटैक होगा तो तेरा आपरेसन वही पासी और चमार का लड़का करेगा जिसका मेडिकल कॉलेज में अडमीसन १०० में से ३० नंबर पाने से भी हो गया था..बता साले तब वैसे चुतिया डॉक्टर तेरे सड़े हुए हार्ट की क्या हालत करने वाला है….साले तू तो बिना मौत के वैसे ही मर जाएगा…
हमारा क्या है हम लोग तो पैसे वाले लोग हैं, जाकर किसी पंचसितारा अस्पताल में जैसे अपोलो और फोर्टिस में इलाज़ कराएँगे और कुछ लोग तो विदेश भी जाकर इलाज़ करा सकते हैं…तू तो साला दुबई के अलावा कहीं जाने कि औकात नहीं रखता जहाँ के शेख तुझे तीसरे दर्जे का नागरिक का दर्जा देते हैं…ज्यादा से ज्यादा कनाडा चला जायेगा जैसे एक दलित जुलाहा जो यहाँ बहुत चर्र-चर्र करता है गया हुआ है और साला परचून कि दुकान खोलकर बैठा है….वहां जाकर भी साले तेरी औकात नहीं कि तू किसी अच्छे अस्पताल में इलाज़ करा सके. कनाडा के किसी सरकारी अस्पताल में लम्बी लाइन लगा कर ६ महीने अपने हार्ट के आप्रेसन का इंतज़ार करेगा तब तक तेरी मौत वैसे ही हो जाएगी….मुझे तो तुझ पर बड़ी दया आ रही है पहले तेरी तेरे गाँव के पंडित जी से चुदी हुई बुढ़िया माँ की गोनोरिया पर, फिर तेरी बहन को हुए एड्स पर, और तुझे होने वाले हार्ट कि बीमारी पर….
यहाँ बैठा बकवास कर रहा है साले जाकर अपने अन्धकार मय भविष्य कि चिंता कर….नहीं तो तेरी बीवी भी चुदेगी और बेटी भी…साले माधरचोद तू साले पंडित जी से चुदवा कर भी कुछ उनका ज्ञान नहीं प्राप्त कर सका….और जिंदगी भर तिल तिल कर मरने को अभिशप्त है…hahahahahhahahahahahahahhaa….aur bol saale…dekhen kitna bolta hai tu…
अरे साले सूअर कि औलाद तुम साले सुधर जाओ, नहीं तो वैसे भी पढ़े लिखे चमार अब वही काम करने लगे हैं जो हम सवर्ण करते थे…मंदिर जाते हैं, पूजा करते हैं और हिन्दू धर्म में श्रधा रखते हैं..तू साले चिल्ला रहा है क्योंकि तू साले कुछ कर नहीं पाया…साले सिस्टम का अंग बन जा तभी मज़ा ले पायेगा..नहीं तो वही इन्टरनेट पैर बैठ कर चिल्लाता रहेगा और कुछ नहीं कर पायेगा..साले तुम दलित भी हो और दरिद्र भी…माधरचोद तेरी माँ क्या टट्टी खाने सूअर का मांस खाती थी तेरी बातों से टट्टी कि ही बदबू आती है…अरे साले पंडित जी के लंड से चुदवाने के बाद उसे सूअर का मांस खाकर तेरे जैसा नालायक सूअर के पिल्लै को जन्मने कि क्या जरुरत थी…साले फ़ोकट में बाकी शरीफ दलितों का दिमाग ख़राब कर रहा है…..
Dear Modretor and pankajzaa sahab bahas mai coment karneki ichha nahi tey magar samaaj mai kuch galat hota dekh Dil tilmilaata hai or likhne kahne bina nahi rahpaata hu,lekh or uoske rivuos padkar muje lagaa ek chhota sa ciber wor yaa dharm youdh chhid gayaa hai mohalla live ke is lekh may mai maanta hu ki dharmik granth ki bahas badi tej or garmili rahti hay lekin iskaa matlab ye to nahi ke sawsth charcha ke bajaaye is tarah khulam khullaa gaaliyo ki baarish karde,uopar ke readars ne bahut sahi likha mai maanta hu ki वाह वाह.माँ हिन्दी के अमर सपूतों. क्या भाषा है.क्या विमर्श हैं.
एक दूसरे की माँ-बहनों से क्या रिश्तेदारियां हैं..
शयनकक्ष से सरस्वती तक
सरस्वती से सलमान रश्दी तक
मन खुश कर दिया तुम लोगों ने
तुम लोग शायद समझते भी नहीं होगे कि तुम कितनी बड़ी राष्ट्रसेवा कर रहे हो
कितने गरीबों को पोर्नोग्राफी देखने की जरूरत नहीं पड़ती
व्यक्ति का पैसा बचता है देश की बिजली.
बस अब मोहल्ला लाइव का कन्नड़ संस्करण भी शुरू कर दो, फिर किसी भाजपाई मंत्री को विधानसभा में पोर्न नहीं देखना पड़ेगा, मंत्री पद भी बच जाएगा, राष्ट्र का चाल चेहरा और चरित्र भी.
modretor ji Aap ne lekh ki shuru mae hi writer pankajaa sb kaa Aabhar to maana lekin samarthk nahi likh kar apne aap ko secure kar liyaa haalaa ki प्रमोद रंजन के लेख ki prtikriyaa mai pankaj jaah ji ko lekh ke liye Aapne hi anurodh kiyaa thaa App meri baat samaj gaye hoge,bahut naajuk maslaa hai dhiyaan dena jaruri hai aap ke pad ki jimmedaari bi kathin hai aap dekh rahe ho kalam se nikli huvi taaqat ko khair bhagvaan Allah ham sabko sad buddhi de,Aamin
@ अहमद जी, धन्यवाद् कि आपने यह मुद्दा उठाया. पहली बात तो धर्म निंदा वाले लेख मोहल्ला पर लिखे नहीं जाने चाहिए….जब एक तरफ दुनिया चाँद पर जा रही है तो प्रमोंद रंजन जैसे लोग जाति प्रथा कि गंदगी और किसी एक धर्म के खिलाफ लेख लिख कर गड़े मुर्दे उखाड़ रहे हैं. अहमद जी आप समझदार मालूम होते हैं. भाई पहले तो प्रमोद रंजन को किसी देवी देवता को निन्दित करने वाले लेख नहीं लिखने चाहिए, फिर ऊपर से कुछ विकृत मानसिकता के लोग जैसे बाबा ब्रह्मचारी और गिरिजेश्वर जैसे छद्म नामों वाले लोग आकर सरस्वती और अन्य देवी देवताओं को गरियाने लगे. अरे भाई जब तुम गरियाओगे तो हमें भी ऊपर वाले ने जबान दे रखी है..हम क्या चुप रहेंगे….भाई तुम सरस्वती को गरियोगे तो हम आंबेडकर और मायावती और मोहम्मद साहब और उनके खुदा को गरियायेंगे आखिर सहने के लिए हमी हैं क्या……
अच्छी बात ये है कि अहमद भाई कि आप moderator को समझाये कि विवादस्पद लेख न छापें…दुनियां में और भी अच्छी चीज़ें हैं बाते करने के लिए….अगर टट्टी कुरेदोगे तो बदबू तो आएगी ही न…..कुछ विज्ञान, मानवता, देश और समाज कि तरक्की कि बाते करो न कि मोहम्मद साहब और उनकी ढेर सारी बीवियों कि बातें और न ही कैसे आंबेडकर का चरित्र बहुत ख़राब था जो उन्होंने एक पत्नी के होते हुए दूसरी पत्नी से शादी कर ली और पहली भोली भली ग्रामीण और कम पढी लिखी पत्नी को छोड दिया….अब ऐसी बातें करोगे तो खामखाह ही और बातें भी निकलेगी…
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