शैतान प्रायोजको, चले भी जाओ कि गुलशन का कारोबार चले!
♦ अविनाश
जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल पर जिन वजहों से इन दिनों सवाल उठ रहे हैं, ठीक वैसी ही वजहें इंडियन एक्सप्रेस की ओर से 16 जनवरी 2012 को दिये गये एक्सीलेंस अवॉर्ड को लेकर भी उठ रहे हैं। जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल पर सवाल हैं कि उसके आयोजकों ने ऐसी कंपनियों से स्पॉन्सरशिप ली है, जो दुनिया भर में जनविरोधी कारनामों के लिए कुख्यात हैं। बैंक ऑफ अमेरिका, जिसने विकिलीक्स को दुनिया भर से मिलने वाली आर्थिक सहायता के लिए सहूलियत देनी बंद कर दी और 132 देशों में 8000 से अधिक परमाणु हथियारों से लैस 702 अमेरिकी सैनिक ठिकानों का संचालक अमेरिकन सेंटर इस फेस्टिवल का प्रायोजक है। कोका कोला जैसे प्रायोजकों पर क्या बहस करना, जिसे पूरे देश में एक तरह की नागरिक स्वीकार्यता मिली हुई है। हालांकि यही वो कंपनी है, जिसने केरल के प्लाचीमाड़ा और राजस्थान के कला डेरा सहित 52 सयंत्रों द्वारा भूजल का भयानक दोहन किया है, जिसकी वजह से इन संयंत्रों के आसपास रहने वाले लोगों को पानी के लिए अपने क्षेत्र से बाहर के साधनों पर आश्रित होना पड़ा है। एक प्रायोजक रिओ टिंटो दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी खनन कंपनी है, जिसका इतिहास फासीवादी और नस्लभेदी सरकारों से गठजोड़ का रहा है और इसके विरुद्ध मानवीय, श्रमिक और पर्यावरण से संबंधित अधिकारों के हनन के असंख्य मामले हैं। कहने को तो मुख्य प्रायोजक डीएससी पर भी सवाल उठ रहे हैं, जिसको केंद्रीय सतर्कता आयोग की जांच के अनुसार कॉमनवेल्थ गेम्स के कई ठेके 23 फीसदी ज्यादा दरों पर दिये गये। हालांकि इस मामले में कंपनी से अधिक दिल्ली की सरकार दोषी है।
ठीक है कि जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल का खर्च करोड़ों का है, लेकिन क्या जरूरी है कि इन खर्चों को जुटाने के लिए ऐसे दरवाजों पर घुटने टेके जाएं, जिन दरवाजों पर साहित्य के सरोकारों की खिल्ली उड़ायी जाती हो? इंडियन एक्सप्रेस एक्सीलेंस अवार्ड ने भी कुछ इसी झोल-झक्कर के साथ इस साल के अवार्ड समारोह के लिए रकम जुटायी है।
10 और 11 जनवरी को इंडियन एक्सप्रेस ने आधे पन्ने का एक विज्ञापन छापा, जिसमें इसकी सूचना थी कि 16 जनवरी को देश के कुछ बेहतरीन पत्रकारों को एक्सीलेंस अवॉर्ड दिया जाएगा। विज्ञापन बता रहा था कि अवार्ड समारोह का मुख्य प्रायोजक जेपी ग्रुप और एक अन्य प्रायोजक माहिको मोनसेंटो है। ये दोनों ही कंपनियां देश भर में चलने वाली बहुत सारी गतिविधियों को प्रायोजित करती रहती हैं, लेकिन एक अखबार की ओर से देश के सर्वश्रेष्ठ पत्रकारों के लिए आयोजित पुरस्कार समारोह का स्पॉन्सर होने से जुड़ी पेचीदगियों को समझा जाना चाहिए।
इंडियन एक्सप्रेस के बारे में यह बहुत आम समझदारी है कि वह बड़े बांधों की पुरजोर वकालत करता रहा है। सरदार सरोवर बांध के पक्ष में और नर्मदा बचाओ आंदोलन के खिलाफ इस अखबार ने 2006 में एक बड़ी मुहिम चलायी थी। अक्टूबर 2010 में उत्तर-पूर्व भारत में बड़े पैमाने पर चल रहे हाइड्रो प्रोजेक्ट के लिए जनमत को असमंजस में डालने का काम इसी अखबार ने किया, जबकि उस वक्त के पर्यावरण मंत्री जयराम रमेश ने गोहाटी की एक खुली सभा में इस प्रोजेक्ट का विरोध करते हुए पर्यावरण और मानव सभ्यता के लिए नुकसानदेह बताया था। उन्होंने उत्तर-पूर्व भारत के प्रति अपनी चिंता जाहिर करते हुए प्रधानमंत्री को एक चिट्ठी भी लिखी थी।
यह मालूम होना चाहिए कि जेपी ग्रुप देश में बड़े बांधों का सबसे बड़ा कांट्रैक्टर है। जेपी ग्रुप के पास उत्तर-पूर्व की भी कई सारी जनविरोधी निजी परियोजनाओं सहित अरुणाचल प्रदेश के निचले सियांग में 2700 मेगावाट और हिरांग में 500 मेगावाट वाले हाइड्रोपावर प्रोजेक्ट की ठेकेदारी है। सरदार सरोवर परियोजना की ठेकेदारी भी जेपी ग्रुप के पास है। निर्माण व्यापार और ठेकों से जुड़ी इन मामूली सूचनाओं के साथ यह रेखांकित करना ज्यादा जरूरी है कि जेपी ग्रुप पर सामाजिक, पर्यावरणीय और मानवाधिकार के कई मामलों का उल्लंघन करने का बेहिसाब रिकॉर्ड और आरोप है। इसी जनवरी महीने में सेबी ने जेपी ग्रुप पर वित्तीय अनियमिततओं के लिए साठ लाख रुपये का जुर्माना लगाया है, जिसे शायद ही किसी अखबार ने जगह दी हो। इन तमाम जानकारियों के मद्देनजर अगर आप यह देखेंगे कि पत्रकारिता में बेहतर एथिक्स के साथ न्यायसंगत खोजी काम के लिए शानदार पत्रकारों को जिस समारोह में पुरस्कार दिया जा रहा है, उसका मुख्य प्रायोजक जेपी ग्रुप है, तो आपको लगेगा कि जो चीज चमक रही है, उसके पीछे कितना खतरनाक अंधेरा मौजूद है।
साफ है कि अक्टूबर 2010 में हाइड्रो पावर परियोजनाओं के पक्ष में इंडियन एक्सप्रेस की मुहिम जेपी ग्रुप को मदद पहुंचाने के लिए थी और साफ है जेपी ग्रुप किस तरह से इस मदद की कीमत अदा कर रहा है।
अब इसी पुरस्कार समारोह के दूसरे प्रायोजक माहिको मोनसेंटो की बात करते हैं। 2010 की जनवरी-फरवरी में जयराम रमेश ने विनाशकारी बीटी कॉटन बीज के खिलाफ कई सारी आमसभाएं की। इंडियन एक्सप्रेस ने ठीक इसी वक्त जयराम रमेश के खिलाफ और जीएम फसल के पक्ष में मुहिम शुरू कर दी। यह समझना किसी के लिए भी आसान था कि यह पूरी मुहिम माहिको मोनसेंटो कंपनी को फायदा पहुंचाने के लिए है, जो भारत में जीएम बीज की सबसे बड़ी कंपनी है।
इस पूरी कहानी की जमीन आप देख रहे हैं कि कैसे तैयार हुई… कैसे जेपी ग्रुप और मोनसेंटो कंपनी से इंडियन एक्सप्रेस ने अपने रिश्ते बनाये और कहां पर उसका इस्तेमाल किया? यह साफ-साफ व्यावसायिक हितों की आपसदारी है, जिसे समझा जाना चाहिए। इस पूरे मसले पर देश भर के 17 नामचीन शख्सीयतों ने इंडियन एक्सप्रेस को अपना प्रतिवाद पत्र सौंपा, लेकिन कोतवाल खुद अपनी चोरी के खिलाफ क्या कार्रवाई करेगा। ज्यादा से ज्यादा आश्वासन की भाषा में बात करेगा या भ्रम फैलाने की कोशिश करेगा। जैसे पिछले साल भी जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल का स्पॉन्सर ऊपर उल्लेखित सारी कंपनियां थीं – और जब इन बातों पर चिंता व्यक्त करते हुए बयान दिये गये, तब फेस्टिवल निदेशकों ने कहा था कि पहले किसी ने इस ओर हमारा ध्यान नहीं दिलाया था और अगर ये तथ्य सामने लाये जाएंगे, तब हम जरूर उन पर ध्यान देंगे, लेकिन 2012 में भी उन्होंने ऐसा नहीं किया। इंडियन एक्सप्रेस ने तो इतना भी नहीं किया।
मीडिया और साहित्य के इस नये चमकते दृश्य-परिदृश्य की पृष्ठभूमि में हमें मुक्तिबोध की कविता अंधेरे में का यह अंश जरूर पढ़ना चाहिए,
भव्याकार भवनों के विवरों में छिप गये
समाचारपत्रों के पतियों के मुख स्थल।
गढ़े जाते संवाद,
गढ़ी जाती समीक्षा,
गढ़ी जाती टिप्पणी जन-मन-उर-शूर।
बौद्धिक वर्ग है क्रीतदास,
किराये के विचारों का उदभास।
[कथादेश के फरवरी अंक से साभार]
(अविनाश। मोहल्ला लाइव के मॉडरेटर। प्रभात खबर, एनडीटीवी और दैनिक भास्कर से जुड़े रहे हैं। राजेंद्र सिंह की संस्था तरुण भारत संघ में भी रहे। उनसे avinash@mohallalive.com पर संपर्क किया जा सकता है।)










Dukhad!
गंभीर सवाल उठाए हैं आपने। मीडिया की इस गंदगी को कौन साफ कर सकता है? न सिर्फ कारपोरेट बल्कि अन्य समूह जिनके भिन्न हित हो सकते हैं वे भी मीडिया का गलत इस्तेमाल करते हैं। \
और साहित्यकारों का भी वही दायित्व समाज के प्रति है जो पत्रकारों का है।
अविनाश जी, कारपोरेट घरानों की पैरोकारी करने के कारण से ही ‘मीडिया जगत’ में जन्मती है ‘राडियायें ‘ – किसे दोष दें? चाहे वह इन्डियन एक्सप्रेस हो या राजस्थान पत्रिका हो या भास्कर हो या ऐसा ही अन्य कोई ‘बिग पेपर’ हो – इन सबकी नीतियां एक समान सी ही नज़र आती हैं. आज के बाजारवादी दौर में ‘मीडिया’ अब ‘मिशन’ नहीं, बल्कि ‘कारोबार’ बन कर रह गया है और कारोबारी के समान ही इसका भी चाल-चेहरा-चरित्र बन गया है. इस सन्दर्भ में दिवंगत राज कपूर की फिल्म ‘मेरा नाम जोकर’ का यह गीत याद आता है – ‘ये दुनिया है प्यारे…..’
मैं इस पोस्ट पर एक टिप्पणी करना चाहता हूँ पर मोहल्ला की टिप्पणी नीति से सर्वथा अनभिज्ञ हूँ. यदि बिना गाली-गलौज के, अभद्र और अशालीन शब्दों के प्रयोग के बिना की गयी टिप्पणी को मोहल्ला की पोस्ट्स से हटाया न जाता हो तो कृपया इंगित करें. उस स्तिथि में मैं जरूर कुछ लिखना चाहूंगा..
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