नयी आर्थिक नीति ही ‘व्यापक जनसंहार का हथियार’ है!

वैश्विक मंदी की इनसाइड स्टोरी : इनसाइड जॉब

♦ राहुल सिंह

स्कर पुरस्कार के लिए नामित फिल्मकार चार्ल्स फर्ग्युसन की ‘इनसाइड जॉब’, सत्ता प्रतिष्ठानों पर बचे विश्वास की बुनियाद हिला देने वाली डाक्‍युमेंट्री फिल्म है। ‘इनसाइड जॉब’ 15 सितंबर 2008 को अमेरिकी अर्थव्यवस्था में आयी सुनामी पर केंद्रित है, जिसने वैश्विक मंदी के खौफनाक मंजर को जन्म दिया था। डाक्‍युमेंट्री इस मंदी के जिम्मेदार कारकों, कारणों और प्रक्रिया को सिलसिलेवार ढंग से रखती है। इस आर्थिक संकट के मूलभूत कारणों तक पहुंचने के लिए चार्ल्स फर्ग्युसन ने वित्तीय मामलों की अंदरूनी जानकारी रखनेवाले अर्थशास्त्रियों, राजनीतिज्ञों, वित्तीय सलाहकारों और पत्रकारों से व्यापक पैमाने पर साक्षात्कार लिया है। इसके लिए जिस व्यापक स्तर पर शोध कार्य को अंजाम दिया है, उसके लिए चार्ल्स फग्युर्सन और उनकी टीम बधाई की हकदार है। डाक्‍युमेंट्री को आवाज मैट डेमन ने दिया है।

डाक्‍युमेंट्री मूलतः पांच भागों में विभक्त है। पहला, हिस्सा बताता है कि हम कैसे आर्थिक संकट के मुहाने तक पहुंचे; दूसरा, उस आर्थिक विकास के गुब्बारे के फूलने को दर्शाता है; तीसरा, आर्थिक संकट से उत्पन्न हालात को संबोधित है; चौथा, व्यवस्था की विश्वसनीयता और जवाबदेही को संदेह के घेरे में रखता है और पांचवां, इस आर्थिक संकट के बाद हम आज कहां खड़े हैं, इस पर रोशनी डालता है। डाक्‍युमेंट्री की शुरुआत ‘आइसलैंड’ के साथ होती है कि कैसे वहां के तीन राष्ट्रीय बैंकों का निजीकरण किया गया, वित्तीय क्षेत्र को कैसे डिरेग्यूलेट किया गया, कैसे वहां के उद्यमी अरबपति की सूची में शामिल होकर सुर्खियों में आये, कैसे अमेरिकन रेटिंग एजेंसियों ने आइसलैंड की अर्थव्यवस्था को ‘ट्रिपल ए’ रेटिंग दी, नतीजतन किस तरह हाउसिंग सेक्टर में एक तेजी आयी और कैसे 2008 में आइसलैंड के बैंकों का दिवाला निकल गया तथा कैसे 6 महीने में बेरोजगारों की संख्या तिगुनी हो गयी।

गोल्डमैन शैक्स, मार्गन स्टेनली, लीमैन ब्रदर्स, मेरील लिंच, बेयर्स स्टर्न्स जैसे इनवेस्टमेंट बैंक ने सिटी ग्रुप और जेपी मार्गन आदि फिनांशियल कोनग्‍लामरेट के साथ मिलकर योजनाओं को वित्तीय सहायता उपलब्ध करायी, जिसे एआईजी, एमबीआईएऔर एएमबीएसी जैसी बीमा कंपनियों ने सुरक्षा प्रदान की। इन योजनाओं को मूडी, स्टैण्डर्ड एंड पूअर्स और फिच जैसी रेटिंग एजेंसियों ने ‘ट्रिपल ए’ रेटिंग दी, जो बेहद सुरक्षित निवेश के हालमार्क की तरह था। इसकी सचाई से पर्दा या तो प्रतिष्ठित अर्थशास्त्री उठा सकते थे या फिर विभिन्न अकादमिक संस्थाओं में अर्थशास्त्र की बारीकियां समझाने वाले शिक्षाविद। लेकिन अर्थशास्त्र के अध्ययन-अध्यापन में लगी हावर्ड, कोलंबिया और मिशिगन जैसे प्रसिद्ध विश्वविद्यालयों के इन शिक्षाविदों ने बजाय इसकी सचाई में से पर्दा उठाने के विभिन्न बिजनेस स्कूलों और इनवेस्टमेंट कंपनियों से बड़ी मात्रा में धनराशि स्वीकार करके उनके पक्ष में जनमत बनाने की शर्मनाक हरकत की। इन शिक्षाविदों ने इन योजनाओं के पक्ष में हवा बनायी। दरअसल विभिन्न बैंकों, रेटिंग एजेंसियों, वित्तीय और बीमा कंपनियों के साथ अकादमिक जगत भी इस संस्कारित झूठ के उत्पादन में शामिल था। डाक्‍युमेंट्री के बीच में लिये गये साक्षात्कारों में इन सवालों पर इन शिक्षाविदों के चेहरे से उड़ते रंगों को सहजता से देखा जा सकता है। इतना ही नहीं इस अपराध में शामिल ट्रेडरों के मनोरंजन के लिए लगातार हाई क्लास यौनकर्मियों की सेवाएं ली गयीं। वाल स्ट्रीट से कुछ ही दूरी पर इस इलीट प्रोस्‍टीच्‍यूशन का मुख्यालय था जिनके संचालकों ने ऑन द रिकार्ड यह स्वीकार किया है कि उनके द्वारा उपलब्ध करायी गयी सेवा का भुगतान कंप्‍यूटर रिपेयर, ट्रेडिंग रिसर्च और मार्केटिंग कंसल्टेंट के नाम पर किया जाता था।

डाक्‍युमेंट्री यह बताती है कि इनवेस्टमेंट बैंक, फिनांशियल कंग्लामरेट, बीमा कंपनियों, रेटिंग एजेंसियों और अकादमिक जगत ने मिलकर अर्थव्यवस्था के न सिर्फ परंपरागत समझ बल्कि परंपरागत ढांचे को भी ध्वस्त कर दिया है। नयी प्रस्तावित व्यवस्था में लाभ सिर्फ इस दुष्चक्र के स्रष्टा को होना है और नुकसान आम जनता का। डाक्‍युमेंट्री पुरजोर ढंग से इस सच को सामने रखती है कि वस्तुतः नयी आर्थिक नीति ही ‘व्यापक जनसंहार का हथियार’ है। वाल स्ट्रीट में ऐसे दुःस्वप्न के स्रष्टाओं का स्वागत है। उनको उपलब्ध करायी जानेवाली सुविधाएं और वेतन इस बात पर निर्भर है कि वे कितना दुस्साहसिक और विश्वसनीय-सा लगनेवाला दुःस्वप्न रचते हैं। ऐसा इसलिए कहा जा रहा है कि 20 ट्रिलियन (20 पर बारह शून्य) डालर के शून्य में गुम हो जाने की दास्तान रचनेवाले इन शातिर दिमागों को कोई सजा नहीं हुई (कुछेक छोटी मछलियों को छोड़कर) बल्कि उन्हें उस दौरान अर्जित भारी कमाई के साथ ससम्मान विदा कर दिया गया। उनकी सम्मानजनक विदाई से ज्यादा चिंताजनक सच यह है कि वे पहले से ज्यादा बेहतर जगहों पर अपनी सेवाएं देने के लिए नियुक्त कर लिये गये।

यह डाक्‍युमेंट्री पूरी शिद्दत से इस सच को रेखांकित करती है कि हम अपराध कथाओं के एक ऐसे दौर में दाखिल हो चुके हैं, जहां सरकार और उसके सत्ता प्रतिष्ठान लुटेरे हो गये हैं। यह मासूम सपनों के भयावह दुःस्वप्नों में बदलने का दौर है। यह एक निरुपायता का समय है, जहां मदद के लिए लगायी गयी आवाज अपने स्त्रोत तक वापस लौटने के लिए अभिशप्त है। यह फिक्शन और नॉन फिक्शन के बीच के फर्क के मिटने का दौर है। यह यथार्थ की जगह एक विश्वसनीय से लगनेवाले आभासीय यथार्थ का समय है।

भारत के मौजूदा आर्थिक हालात के मद्देनजर यह डाक्‍युमेंट्री जरूर देखी जानी चाहिए क्योंकि भारतीय अर्थव्यवस्था के दरवाजे विदेशों के लिए खोल दिये जाने के बाद से जिस ढंग की घटनाएं रह-रह कर थोड़े अंतराल पर भारत के आर्थिक परिदृश्य पर घटित हो रही हैं, वह चिंताजनक है। पिछले कुछ महीनों में भारतीय राजनीति और आर्थिक पटल पर नजर डालें तो इस चिंता का कुछ सिर-पैर नजर आने लगेगा। भ्रष्टाचार निरोधक मजबूत लोकपाल की जगह सिंगल मल्टीब्रांड में सौ फीसदी विदेशी निवेश के बिल का पारित होना। काले धन के मामले पर लगातार टाल-मटोल करती सरकार और बजट सत्र के समय मल्टीब्रांड में सौ फीसदी विदेशी निवेश के लिए विपक्ष को मनाने की भारत सरकार की प्रतिबद्धता। यूरोपीय संकट के मद्देनजर कमजोर होती भारतीय अर्थव्यवस्था और भारतीय मुद्रा का लगातार गिरता स्वास्थ्य कहीं किसी भयावह भविष्य का सूचक न साबित हो। चार्ल्स फर्ग्युसन की यह डाक्‍युमेंट्री भले 2008 की अमेरिकी मंदी पर केंद्रित है पर बुनियादी रूप से यह इक्कीसवीं सदी के पहले दशक में घटित सबसे बड़ी अपराध कथा को सामने लाने का काम करती है, जिसके सूत्रधार पहले से कहीं ज्यादा शक्तिशाली और सुरक्षित जगहों पर अपना ठिकाना बना चुके हैं और फिर से विश्व अर्थव्यवस्था में सेंधमारी की योजना बनाने में लग चुके हैं। यह भविष्य के प्रति आगाह करनेवाली फिल्म है, जिसे जरूर देखा जाना चाहिए।

(राहुल सिंह। युवा आलोचक, कहानीकार। हिंदी की कई साहित्यिक पत्रिकाओं में नियमित लेखन। इन दिनों एएस कॉलेज, देवघर में हिंदी पढ़ाते हैं। राहुल से alochakrahul@gmail.com पर संपर्क करें।)

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