ऐसे साथी पालते क्यों हैं, जो आपकी ही आजादी नहीं चाहते?

♦ ओम थानवी


मूलतः फेसबुक के मित्रों के बीच साझा (नंद जी का नोट पहले उसी में मिला) मेरी टिप्पणी पर नंद जी को लगा है कि मेरी आखिरी पंक्तियां अनावश्यक हैं (हालांकि कहने का तात्पर्य यह था कि अज्ञेय का “मूल स्वर” वह नहीं है, जो नंद जी प्रशंसा के बाद अनुभव कर रहे हैं; वरना वह स्वर नंद जी को इतना अपनी ओर न खींचता), मुझे भी लगता है कि तमाम ‘पुनर्परीक्षा’ के बाद आप घूमते-फिरते वहीं आ जाते हैं, जहां से चले थे। यह ऐसा ही है कि कभी नामवर जी कहा करते थे, “अज्ञेय सीमित सामाजिक सरोकारों के कवि हैं… हिंदी के बिहारी हैं।” अब वे ऐसा नहीं मानते। वे उन्हें अब निरा प्रयोगवादी भी नहीं कहते। हाल में नेशनल बुक ट्रस्ट के लिए उन्होंने जो अज्ञेय पर पुस्तक संपादित की है, उसकी भूमिका देख लीजिए। अज्ञेय को “अमृत-पुत्र” कहते हुए वे लिखते हैं : “सच तो यह है कि अज्ञेय ने अपनी अप्रतिहत सृजन-यात्रा में प्रयोग के पड़ाव से आगे बढ़ कर अपना एक नया भरा-पूरा काव्य-संसार रचा, जो सभी वादों से ऊपर है और टिकाऊ भी।”

‘अपने अपने अज्ञेय’ का लोकार्पण करते हुए भी पिछले पखवाड़े उन्होंने कहा कि अज्ञेय अपने दौर के सबसे बड़े कवि थे; उनका योगदान वैसा ही है, जैसा किसी दौर में तुलसी का था। मुझमें यह योग्यता नहीं कि नामवर जी पर टीका करूं; पर इतना तो है ही कि अज्ञेय के साहित्य का मूल स्वर अब नामवर जो को भी कुछ आश्वस्त करता है। यह अकारण नहीं है कि ‘असाध्य वीणा’ और ‘नाच’ जैसी कविताओं का जिक्र प्रशंसात्मक लहजे में वे बार-बार करते हैं, जो कहीं से सीधे-सीधे “सामाजिक बदलाव की समाजवादी प्रक्रिया” के प्रति “आश्वस्ति” का इजहार नहीं करतीं। सो मेरा निवेदन इतना ही है कि अपनी गांठें खोल कर परीक्षा-पुनर्परीक्षा आदि करें, वरना प्रेत-बाधा दो कदम आगे, दो कदम पीछे वाला काम करती रहेगी। नंद जी में खुली दृष्टि की सलाहियत है : जयपुर में दूरदर्शन के अज्ञेय उत्सव में उनका संबोधन मुझे याद है। यह जरूर है कि थोड़ा खुला तेवर दिखाया नहीं कि अपने लोग ही टांग खींचने लगते हैं। ऐसे क्षुद्र लोग कहां नहीं हैं। नामवर जी ने मुझे बताया था कि एनबीटी वाला संचयन संपादित करने पर ‘साथियों’ ने उन्हें बुरा-भला कहा। ऐसे साथियों का साथ पालते क्यों हैं, जो आपकी अपनी स्वतंत्रता बर्दाश्त नहीं करते, औरों की क्या करेंगे!

मुश्किल यह है कि हमारे यहां कविता को एक सांचे – बल्कि खांचों – में देखने की कोशिश ज्यादा हुई है। मसलन, प्रकृति या प्रेम की कविता को पता नहीं किस फतवे के चलते एक दौर में मानो जनविरोधी ही करार दे दिया गया। जबकि बड़े-बड़े विचारवादी प्रेम कविताएं लिखते हैं। पाब्लो नेरूदा श्रेष्ठ उदाहरण हैं। चीन और जापान के काव्य में प्रकृति भरी है। रूसी कवियों में भी प्रेम उमड़ता था। कविता पढ़ते हुए अगर कोई सोच-विचार ही करना चाहे तो उसे यह देखना चाहिए कि क्या कविता में जीवन है? क्या वह मानव, और मानवता, में आस्था रखती है? अगर यह नजरिया रहे तो हम प्रकृति और प्रेम को भी जीवन के घेरे में ही देखेंगे, उससे जुदा करके नहीं। अज्ञेय मुझे कवि-रूप में पसंद हैं (इसे आप भक्ति, अंधभक्ति, श्रद्धा, वंदना आदि चाहे जिस अलंकरण से सजा दें!) तो इसीलिए कि उनके काव्य में लालित्य तो है ही, उसमें भरपूर जीवन है और वह मानववादी है। मानव उन्हें “भीड़ों” में भी दिख जाता है – “अंगारे सा, भगवान सा”! … कविता में कथ्य की पड़ताल मेरी राय में इतनी ही काफी होगी, अगर आप आगे यह देखना, अनुभव करना भी चाहें कि कविता इसके बाद काव्य यानी रचना के विधाई मानदंडों पर कितनी खरी उतरती है। वरना एक मार्क्सवादी मित्र-संपादक ने जब मेरी इस बात पर विश्वास नहीं किया कि अज्ञेय ने मजदूरों-किसानों के हक में भी कविताएं लिखी हैं और आहत-वंचित तबके के हक में भी, तो मैंने अगले रोज उन्हें अज्ञेय की पचास “जनोन्मुखी” कविताएं भिजवा दी थीं; करीब तीस उन्होंने बाद में अपनी पत्रिका में प्रकाशित भी कीं, पर इस कलगी के साथ कि “हालांकि ये अज्ञेय कि प्रतिनिधि कविताएं नहीं हैं”!! … मजे की बात यह है कि अज्ञेय ने “प्रतिनिधि कविताएं” नाम से कोई संचयन कभी पेश ही नहीं किया। “प्रिय कविताएं” जरूर मिल जाएंगीं। पर वे उनको प्रिय रही कविताएं हैं, आपको कोई दूसरी प्रिय हो सकती हैं, क्यों नहीं कोई प्रिय न हों! यह आपकी स्वाधीनता है, और अज्ञेय के लिए सबसे बड़ा मूल्य यही था।

Om Thanvi Image(ओम थानवी। भाषाई विविधता और वैचारिक असहमतियों का सम्‍मान करने वाले विलक्षण पत्रकार। राजस्‍थान पत्रिका से पत्रकारीय करियर की शुरुआत। वहां से प्रभाष जी उन्‍हें जनसत्ता, चंडीगढ़ संस्‍करण में स्‍थानीय संपादक बना कर ले गये। फिलहाल जनसत्ता समूह के कार्यकारी संपादक। उनसे om.thanvi@ expressindia.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

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