क्‍या पोर्न स्‍टार सनी लियोनी एक विचारधारा का नाम है?

♦ स्नेहवीर गुसाईं

अभी थोड़े दिन पहले ही फिल्‍म पत्रकार अजय ब्रह्मात्‍मज ने पोर्न स्‍टार सन्‍नी लियोनी के साथ अपनी तस्‍वीर फेसबुक पर शेयर की। उनकी मित्र सूची के कई लोगों को ये हरकत नागवार गुजरी और उन्‍हें हद में रहने की सलाह दी गयी है। हमने भी जब उसे री-शेयर किया, तो लोग बिफरे। लिंक देखें: www.facebook.com। स्‍नेहवीर गुसाईं ने इस पूरे मसले को दिल पर ले लिया और वीर-रस से भरा हुआ यह पीस लिख कर हमें भेजा है: मॉडरेटर

Disclaimer: यह लेख सनी लियोनी के नाम पर शोहरत बटोरने का एक फूहड़ प्रयास है। पाठक इसे अपने रिस्क पर पढ़ें।

छियानबे सत्तानबे की बात होगी। टीवी पर एक गाना चलता था। चुरा के दिल मेरा गोरिया चली। इस गाने को देखकर मेरी मां अक्सर पूछती कि इसे गोरिया क्यों कहा जा रहा है? तब मां के इस कमेंट को मैं सीरियसली नहीं लेता था। कुछ सालों के बाद एक पुराने हिंदी गाने का रीमिक्स आया। लाज से मैं मर जाऊं रे… काहे उठाये मेरा घुंघटा। मां ने गाना देखकर फिर से कमेंट किया। इसने तो घुंघटा ओढ़ा ही नहीं है। ये कैसा गाना है। तब तक मैं चीजों को समझने के लिए परिपक्व हो चुका था। इस बार मैंने मां के कमेंट की अनदेखी नहीं की। मैंने इसे अपने तरीके से समझने का प्रयास किया। काफी देर सोचने के बाद मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि आजकल के जमाने में घूंघट के मायने बदल गये हैं। जो तन पर बचा-खुचा रह गया है, उसे ही घूंघट का मेटाफर दिया जा रहा है। बहरहाल अश्‍लीलता पर बहस करना भारतीय मानसिकता का एक प्रमुख स्वभाव है। मैं इसे गलत भी करार नहीं देता। ये सही है परंतु बहस के पीछे की भावना जाने बिना इसे बहस के नतीजे पर पहुंचाना कोरी मूर्खता है। पिछले दिनों भारतीय संस्कृति पर बड़े बड़े हमले हुए हैं। जिनसे पूर्व में स्थापित सुदृढ़ मानसिकता की जड़ें हिल गयी हैं। इनमें से तीन हमलों का जिक्र मैं अपने लेख में करूंगा। ये तीन इस प्रकार हैं।

1) राखी सावंत
2) डीके बोस
3) सनी लियोनी


राखी सावंत के आगमन के साथ एक बड़े जनसमूह को उनके भोंडेपन से आपत्ति हुई। लेकिन बाद में जिस प्रकार उन्‍हें हाथोंहाथ लिया गया, मुझे लगता है उन्‍होंने लोगों की शिकायत दूर कर दी। आजकल वो जवानी की बैंक लुटवा रही हैं। यहां पर एक बात गौर करने वाली है। राखी सावंत भारतीय नारी की उस घुटी हुई मानसिकता का प्रतिनिधित्व करती है, जो किसी भी प्रकार से मुक्त होकर आगे बढ़ना चाहती है। उन्‍हें गलत सही कहने के फेरे में मैं नही पड़ूंगा। आप खुद तय कीजिए।

दूसरा धमाका डीके बोस के सही मतलब और भावना समझ में आ जाने के बाद होता है। सच कहूं तो फिल्म में फूहड़ता के अलावा मुझे कोई मैसेज नहीं समझ आया। शायद निर्देशक कोई मैसेज देना भी नहीं चाहता था। यहां पर दो चीजें गौर करने वाली हैं। पहली बात, जो लोग सोचते हैं कि आजकल का युवा गाली-गलौज पसंद करता है और उसे सिनेमा के आधुनिकीकरण के नाम पर जो मर्जी बेच दो, वो एक बड़े मुगालते में जी रहे हैं। अगर परखना चाहते हैं, तो ऐसी दूसरी फिल्म बनाइए और खुद देख लीजिए। इस फिल्म को एक नये प्रयोग के रूप में देखा गया, पर ऐसा प्रयोग बार-बार सफल नहीं होता। दूसरी बात ये है कि डीके बोस की तरह ही अश्‍लीलता चुपके-चुपके हमारे समाज में घुसती जा रही है। जब तक हमारी समझ में आएगा, बहुत देर हो चुकी होगी। समझ साफ करने के लिए एक और बात कहूंगा कि खुलापन और नंगेपन में बहुत महीन सा फर्क है और अक्सर हम इस फर्क को मिस कर जाते हैं। मैं भी इसका शिकार हुआ हूं, अत: साधू बनने का दावा नहीं करता। ये बातें मेरे अवचेतन से स्वीकृत होकर फिसल नहीं गयी, मैं इन बातों पर सोचता हूं। यही कारण है कि ये लेख लिख रहा हूं।

तीसरा धमाका सनी लियोनी के रूप में हुआ। पाठको, मैं आपको एक बात साफ कर देना चाहता हूं। सनी लियोनी को एक योजना के तहत भारत लाया गया है और वो योजना पूरी भी हो रही है। एक पॉर्न स्टार को टीवी में देखकर भारतीयों की दबी-कुचली वासना को एक सहारा मिल जाएगा और ये नया मसाला खूब बिकेगा। ऐसा ही हुआ भी। उन्‍हें भारत लाने के पीछे एक पॉर्न स्टार को समाज में स्वीकृत करवाना या एक महिला के रूप में उसे सम्मान दिलाने का उद्देश्‍य तो कतई नहीं था। हैरत की बात तो ये है कि उनके अंदर भी कोई ऐसी भावना या विचार नहीं है। वो खुद कितना सोचती हैं, ये हम उस टीवी रियेलटी शो में देख चुके हैं। इस मामले में राखी सावंत उनसे बीस ठहरती हैं। वो जानती हैं कि जब भी कोई औरत उनकी तरह आगे आकर नाच-गाना शुरू करेगी, समाज में उसे वेश्‍या ही समझा जाएगा। इस विचार को तोड़ने न सही, कम से कम बदलने भर की कोशिश तो करती ही हैं। जहां तक बात सनी लियोनी की है, अब वो हिट हो चुकी हैं। सो उनके नाम को बेचने वाले उन्‍हें एक आधुनिक नारी का रैपर चढ़ाने की कोशिश कर रहे हैं। एक जानकार ने उन्‍हें वास्कोडिगामा कह दिया। मेरी समझ नहीं आया कि वो वास्कोडिगामा को अश्‍लील करार दे रहे हैं या सनी लियोनी को खोजकर्ता साबित कर रहे हैं। और अगर वो लियोनी को खोजकर्ता कहते हैं, तो आखिर वो यहां खोजने क्या आयी हैं?

जब किसी प्राकृतिक प्रवृत्ति को गलत करार देकर उस पर रोक लगाने की कोशिश की जाती है, तो वो और भी वीभत्‍स रूप में सामने आती है।

हमारे समाज में सामूहिक रूप से तो सेक्सुएलिटी पर सदियों से बैन लगा है। लेकिन जैसे ही उसे कोई रास्ता या छद्म विचारधारा मिल जाती है, तो वहां से विकृत विचारों का एक सोता फूट पड़ता है। सनी लियोनी ऐसी ही विचारधारा है।

और अंत में : पाठको, हो सकता है आपमें से कई लोग मेरे विचार से सहमत न हों। अगर मेरी ओर से कोई गलती हुई हो, तो कृपया मुझे ठीक करने का कष्ट कीजिएगा ताकि एक स्वस्थ सोच आगे बढ़ सके।

(स्नेहवीर गुसाईं। पेशे से सिनेमाकर्मी। पत्रकारिता और फोटोग्रफी से भी जुड़े रहे हैं। कविता, गजल और लेखों के माध्यम से अपनी बात समाज तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं। उनसे snehveer23@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

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