रिवाज – नयापन, विरासत – नयी खोजें साथ-साथ चलती हैं!

फैज अहमद फैज से मुजफ्फर इकबाल की बातचीत

फैज अहमद फैज के बहुत सारे इंटरव्‍यूज यहां वहां जहां तहां छपे हैं और काफी लोगों तक पहुंचे हैं, लोगों ने पढ़े भी हैं। उन्‍हीं में से एक इंटरव्‍यू यह भी है। शाइरी, विचार और मुल्‍क पर बहुत मामूली अंदाज में गहरी बातें हैं। खुर्शीद अनवर और श्रुति चतुर्वेदी का शुक्रिया कि उनके सौजन्‍य से यह इंटरव्‍यू मोहल्‍ला तक आ गया पाया : मॉडरेटर

मुजफ्फर इकबाल : प्रगतिशील लेखन आंदोलन के एक विशिष्ट स्तंभ के रूप में आपने इसके उतार-चढ़ाव को करीब से देखा है। अन्य आंदोलनों की भांति ही यह शुरुआत में काफी तेजी से उभरा लेकिन बाद में इसकी गति धीमी पड़ गयी जिससे एक खालीपन आ गया है। बाद के दिनों में इसमें गुटबंदी हो गयी और यह कई छोटे गुटों में बंट गया। मुझे याद आता है कि सन् 1949 में ही आपने प्रगतिशील लेखक संघ से नाता तोड़ लिया था। उर्दू साहित्य में इस आंदोलन के योगदान के बारे में आपका क्या ख्याल है?


फैज अहमद फैज : पहले हमें आंदोलन और संगठन को अलग-अलग देखना होगा। यह कहना सही नहीं है कि प्रगतिशील आंदोलन कई छोटे गुटों में बंट गया था। प्रगतिशील लेखक संघ में तब तक एकता बनी रही, जब तक वह अपने समय और तत्कालीन स्थिति के अनुसार एक उद्देश्य पर चलता रहा। आंदोलन और संगठन तभी अस्तित्व में आये, जब हमारे देश में स्वाधीनता संग्राम जोरों से चल रहा था। तब एक उद्देश्य बिल्कुल स्पष्ट था – राष्ट्रीय स्वाधीनता। उस समय इस उद्देश्य को लेकर कोई मतभेद नहीं रहा।

दूसरी बात यह कि तत्कालीन सामाजिक प्राथमिकता को लेकर भी मतभेद नहीं था। इस पर सहमति थी कि हमेशा से बुनियादी अधिकारों तथा सुविधाओं से वंचित तथा शोषित वर्ग की जिंदगी और उसकी समस्याओं का चित्रण करने की आवश्यकता है। इस पर आम सहमति थी। इस वर्ग में शहरी सफेदपोश लोग, मजदूर तथा समाज के पिछड़े तबकों के वे लोग शामिल थे, जिनका जीवन साहित्य में चित्रण के लिए उपयुक्त कभी नहीं समझा गया। यह भी हमारा अनुमान था कि आजादी के बाद देश में सामाजिक अन्याय समाप्त हो जाएगा।

तीसरा मुद्दा यह था कि काल्पनिक समस्याओं तथा गढ़ी हुई स्थिति पर लिखने के बजाय जीवन का यथार्थवादी चित्रण होना चाहिए। चूंकि इन मुद्दों पर कोई असहमति नहीं थी, इसलिए आंदोलन और संगठन साथ-साथ उभरे तथा दोनों में एकता भी बनी रही।

लेकिन आजादी के बाद हमें यह महसूस हुआ कि अभी हम सिर्फ एक मकसद में कामयाब हुए हैं और दूसरे मकसदों में कामयाबी अभी हासिल होनी है। अब इन मकसदों को हासिल करने के तरीके को लेकर मतभेद उभरा। जनतंत्र या सामाजिक न्याय जैसे मुद्दे पर मतभेद कभी नहीं था। मतभेद तो उद्देश्य की प्राप्ति के रास्ते को लेकर था। कोई एक तरीका चाहता था तो दूसरे के विचार में दूसरा तरीका सही था। इससे संगठन में एकता खत्म हो गयी।

इसी दौरान जीवन के यथार्थवादी चित्रण पर भी मतभेद सामने आ गये। जब समाज में विभ्रम तथा दिशाहीनता की स्थिति हो तो जनता के सामने दो ही स्थिति होती है : अंतर्मुखी या बहिर्मुखी हो जाएं। कुछ लेखक तब के हालात से ऐसे ऊबे हुए थे कि कहने लगे : ‘भाड़ में जाए यह सब! हम लोग अंतर्मुखी हो जाएं तथा अपने अंतर्मन का संधान करें।’ इसके चलते वस्तुगत बदलाव आया। उनका विचार था कि कोई चीज अंदर से या तो अच्छी या बुरी नहीं होती। इसका परिणाम यह हुआ कि एक तरह का अराजकतावाद, शून्यवाद या आत्मरति जैसा वाद हावी हो गया। इसके लिए न तो आंदोलन, न ही संगठन को दोषी ठहराया जा सकता था। यह परिस्थिति की उपज थी।

मेरा विचार है कि प्रगतिशील आंदोलन अपने लेखकों की खोज नहीं थी। साहित्य में इस प्रकार की प्रवृत्ति हमेशा रही है। हमेशा कुछ ऐसे लेखक रहे जो भविष्य के सपने देखते थे। कुछ ऐसे भी लेखक होते रहे हैं, जो अपने मन को ही ब्रह्मांड तक मानते थे। लेकिन मेरा ख्याल है कि ब्रह्मांड बहुत बड़ा है और उसमें हम लोगों से भी अधिक महत्वपूर्ण चीजें भरी पड़ी हैं। बहरहाल, मेरा यह मानना है कि आज भी साहित्य में जो महत्वपूर्ण है वह उसी विचारधारा की देन है, जिसे प्रगतिशील लेखकों या उसके पूर्वजों-शेख सादी से लेकर इकबाल तक ने अपनाया था। इसलिए यह कोई नई स्थिति नहीं है।

चूंकि हमने अब तक अपने समाज के भावी स्वरूप का निर्धारण नहीं किया है, न ही हम अपने अंतिम उद्देश्य या उद्देश्य-प्राप्ति के रास्ते को लेकर एकमत हैं, इसलिए इस स्थिति के चलते हमारा साहित्य प्रभावित हो रहा है। इन सबों के बावजूद मेरे ख्याल में आज जो भी अच्छा साहित्य लिखा जा रहा है, वह मूल रूप में यथार्थवादी एवं प्रगतिशील है। यह पलायनवाद के बजाय तार्किक और यथार्थवादी तरीके से हमारी समस्याओं का हल ढूंढने की कोशिश करता है।

मुजफ्फर : हम अब आपकी कविता की तरफ आएं। 1952 में जब आपका संकलन दस्त-ए-सबा प्रकाशित हुआ था तब आप जेल में थे। इस संकलन का अच्छा स्वागत हुआ और अचानक आप लोकप्रिय कवि के रूप में जाने जाने लगे। तब आपको कैसा लगा? क्या इसने आपकी आने वाली कविताओं को प्रभावित किया? क्या एक विशेष स्तर बनाये रखने का दबाव आप पर पड़ा?


फैज : जहां तक मशहूर होने का सवाल है, 1943 में मेरा पहला संकलन ‘नक्श-ए-फरियादी’ प्रकाशित हुआ तो मुझे एक कवि मान लिया गया। हां, इस पर मुझे थोड़ी हैरत जरूर हुई थी। आखिर मैंने ऐसा क्या किया था? कुछ कविताएं ही तो लिखी थीं। दूसरा संकलन दस्त-ए-सबा जब प्रकाशित हुआ तो उसमें एक भिन्न प्रकार का अनुभव, जेल का अनुभव भी शामिल था। लोगों को लगा कि उस जमाने के हालात का अच्छा चित्रण हुआ है और उन्हें वह अच्छा लगा। जहां तक मेरा व्यक्तिगत प्रश्न है, मुझे इससे कोई फर्क नहीं पड़ा कि इसे लोगों ने बहुत पसंद किया है। लोग हमेशा मुझ पर मेहरबान रहे हैं। लेकिन इससे मेरी शायरी प्रभावित नहीं हुई क्योंकि मैं वही लिखता हूं, जो मेरा दिल महसूस करे और समझे। दस्त-ए-सबा में एक खास समय के अनुभव हैं। इसके बाद तो कई दौर आए। मैंने जो महसूस किया और लोगों ने महसूस किया, मैंने उसी को शायरी में बांधने की कोशिश की। वह मैं अभी भी कर रहा हूं।

यह ऐसी कोई समस्या नहीं है और मैं नहीं समझता कि मैं कोई नायाब काम कर रहा हूं। यह बिल्कुल सीधा मामला है। दिल से जो महसूस होता है, उसे मैं व्यंजना देने की कोशिश करता हूं। अगर वहां कहने को कुछ नहीं मिलता तो मैं बाहर झांककर लोगों के दिलों में देखता हूं, उस पर शायरी कहता हूं। मैंने अपना शायरी का मिजाज नहीं बदला है और न ही मैं अपनी शायरी के मिजाज में अपने को कैद पाता हूं।

मुजफ्फर : आपकी शायरी में सूर्योदय का प्रतीक बार-बार आता है। सूर्योदय की ताजगी, उसकी खुलती रोशनी, इन सबों का इस्तेमाल आप बार-बार करते हैं। और आप तो उस पीढ़ी के हैं, जिसके पास अपना सपना था – आजादी का सपना। लेकिन पीछे मुड़कर देखें तो लगता है कि वह सपना टूट कर बिखर गया। आपकी पीढ़ी एक अंधेरे से दूसरे अंधेरे में भटकती रही।

इस बीच सपना तो था लेकिन रोशनी की मीनार न थी। आपकी पीढ़ी के सपनों के छले जाने के दो नतीजे हो सकते थे – पलायनवादी भाववादी साहित्य या फिर तेज-तर्रार साहित्य। लेकिन आपने अपने को इन दोनों अतिवादों से बचाया। वैसे आपकी शायरी में बारीक-सी उदासी तो है, लेकिन वहां पद्य की कोमलता भी है। हकीकत में आगे चल कर ये दो बातें आपकी शायरी में अहम होती गयी हैं। आप ऐसा कैसे कर पाये?


फैज : पहली बात तो यह कि मैं नहीं समझता कि सपना बिखर गया है। यह तो बस कुछ देर का ठहराव है। मीर ने कहा था कि मौत तो एक पड़ाव है, हम थोड़ा आराम कर आगे बढ़ जाएंगे। मीर जैसा उस्ताद शायर जब यह कहे कि मौत के बाद आगे बढ़ने की दूसरी जिंदगी है, तो उसी तरह हम भी अभी मरे नहीं हैं। हमारा देश अभी मरा नहीं है। न ही वह गायब हो गया है। इसलिए सपनों के बिखर जाने का सवाल ही नहीं उठता।

दूसरी बात यह कि सपने को जिंदा रखने का कोई शौक हमें नहीं है, बल्कि बाध्यता है। जिंदगी सपने के बगैर नहीं होती। जीवन तो बड़ा वरदान है और इससे इंकार करना खुदा के वजूद से इंकार करना है। मैंने एक नज्म इसी बात पर लिखी थी। मेरे ख्याल से वह दीवान ‘शाम-ए-शहर-ए-यारां’ में शामिल है। खैर, यथार्थवाद की भी मांग है यह कि जब दुख और निराशा हो तो उसके वजूद से इंकार नहीं करना चाहिए और साथ ही हमें अपने यकीन और उम्मीद को भी नहीं खोना चाहिए। इनके बगैर जिंदा नहीं रहा जा सकता।

मुजफ्फर : मोह भंग से अपने आपको बचाने का यह अच्छा तरीका है लेकिन आप ही की पीढ़ी के कुछ लेखक संतुलन नहीं रख पाये। कुछ एकदम भाववादी हो गये तो कुछ परचम लेकर निकल पड़े। क्या आपको ऐसी हालत का सामना नहीं करना पड़ा? या आप हमेशा जानबूझकर ऐसी हालत से बचते रहे?


फैज : चेतन और उपचेतन में फर्क कहां है, द्वंद्व कहां है? यह जरूर है कि आगे निकलने के लिए दोनों में कशमकश चलती रहती है। हो सकता है कि किसी दिन मन ही मन चीखने लगूं – हम सब कुछ छोड़-छाड़ कर घर बैठ जाएं और अल्लाह का नाम जपते रहें! लेकिन जब मैं सोचता हूं तो इसे बेकार समझता हूं। यह इस पर मुनहसिर है कि आदमी कितना मजबूत है। जब आदमी थक जाता है तो मैदान भी छोड़ सकता है। लेकिन आगे बढ़ने के लिए आदमी में यकीन का होना, विश्वास का होना बड़ा जरूरी है। थोड़ी रोशनी अपने अंदर से मिले, थोड़ी बाहर से दोस्तों और हमदर्दों से मिले तो आदमी का यकीन जिंदा रहता है। अगर आप अपने को दूसरे लोगों से काट लें, अपने-आप में सिमट जाएं तो आप कमजोर होते जाएंगे लेकिन अगर आप आम लोगों के साथ कारवां में चलें तो निराश होने की जरूरत नहीं है।

मुजफ्फर : जैसा कि आपने कहा कि आपकी शायरी यकीन और उम्मीद पर एक लंबे संघर्ष की तरह टिकी है लेकिन आपने समय-समय पर अपने पुराने शायरों की तरह शराब और उस पर शहर की बंदिशों के बारे में भी शे’र कहे हैं। इस तरह की शायरी का मिजाज आपकी संघर्षों तथा रोजमर्रा के नये-नये मसलों वाली मॉडर्न शायरी से नहीं मिलता। आप इस फर्क को कैसे पाटते हैं?


फैज : नहीं-नहीं। यह पुरानी थीम नहीं है। गजल में यह सहूलियत है कि आप पुरानी थीम को पुरानी शब्दावली, बिंबों औैर उपमाओं का इस्तेमाल करते हुए भी आज की हालात से रूबरू शे’र कह सकते हैं। अल्लाह और मुल्ला, ताकतवर और आम लोगों के बीच की कशमकश आज की भी थीम है।

मुजफ्फर : आपकी शायरी पर आपके जेल-जीवन का बड़ा असर रहा है। क्या इसने आपकी शायरी की हद पर कोई अंकुश लगायी?


फैज : नहीं। बल्कि मैं कहूंगा मामला इसके उलट है। जेल-जीवन ने मेरी शायरी को एक नया रंग दिया है। खुली दुनिया में अपनी मशरूफियतों की वजह से आप जिन दुनियावी चीजों पर गौर नहीं कर सकते, जेल में वह ज्यादा साफ दिखने लगता है। आपकी संवेदनशीलता बढ़ जाती है। जेल में आपके पास समय भी बहुत होता है। बाहर रहकर अफ्रीका जैसे मसले पर मैं नहीं लिख पाया लेकिन जेल में अफ्रीका पर नज्म लिखी। जब बाहर था तो उस पर तवज्जो नहीं दे पाया था। इसलिए एक तरह से देखें तो जेल में आपकी दुनिया आपके करीब भी आती है और आपसे दूर भी होती है। दोनों मामलों में एक आजादी होती है कि आप बहुत चीजों के बारे में सोच सकते हैं।

मुजफ्फर : आपकी ताजा किताब ‘मेरे दिल, मेरे मुसाफिर’ पढ़ने वालों को यह महसूस होता है कि ये निर्वासन की कविताएं हैं। घर से दूर रहने का दर्द है। यह बात पहले की किताबों में नहीं है। फिर भी यह आपकी शायरी का एक नया रंग है। क्या आप अपने को देश-निकाला भोगने वाले अंतर्राष्ट्रीय कवियों, जैसे नाजिम हिकमत और महमूद दरवेश की टोली में शामिल समझते हैं?


फैज : एक तरह से देखें तो आपकी बात सही है। लेकिन दूसरी तरह से गलत है। हम लोग देश से बाहर जरूर रह रहे हैं लेकिन वे लोग देश से निकाले गये हैं जबकि मैं अपनी मरजी से देश के बाहर घूमता रहा हूं। किसी ने मुझे देश छोड़ने पर मजबूर नहीं किया। देश से दूर रहने का दर्द वहां है जैसे कोई अपनों से बिछड़कर उदास होता है। लेकिन जो लोग देश छोड़ने पर मजबूर कर दिये गये हैं उनकी उदासी, उनकी असहायता दूसरे किस्म की है।

मुजफ्फर : लेकिन इस तरह के कुछ शे’र तो आपने लिखे हैं।


फैज : यह सही है, लेकिन सच उतना ही नहीं है। मुझे देश छोड़ने का हुक्म नहीं दिया गया था। मुझे लगा कि चीजें उलटी पड़ती जा रही हैं तो मैं कुछ समय के लिए छुट्टी मना लूं। महमूद दरवेश और उसके फिलिस्तीनी भाइयों तथा मेरे हालात में बड़ा फर्क था। उन्हें तो इकट्ठे देश से निकाल दिया गया था। उनका दुख मेरे से बड़ा है। नाजिम हिकमत को चौदह साल की जेल की सजा दी गयी थी। तब उसे देश छोड़कर भागना पड़ा और लौटने का कोई रास्ता नहीं बचा था। लेकिन मुझे बहुत लोगों का प्यार और सम्मान मिला है, बावजूद इसके देश छोड़ने की उदासी कम नहीं हो जाती।

मुजफ्फर : आप अपनी मर्जी से तीन साल तक देश से बाहर रहे, क्या इससे आपकी सोच में बदलाव आया है?


फैज : हां। दूर से आप चीजों को संतुलित ढंग से, साफ-साफ देख-समझ सकते हैं। आप मुल्क के बारे में बहुत भावुक नहीं रहते, उसके बारे में सोच-सोचकर परेशान नहीं रहते। इसलिए आप हालात को बेहतर तरीके से समझ सकते हैं।

मुजफ्फर : आपकी भाषा, उपमा और बिंब सभी तो शास्त्रीय हैं। लेकिन आप उनमें नया मायने भर देते हैं। क्या आपको नया मुहावरा इस्तेमाल करने की तबीयत नहीं होती? कुछ शायर तो ऐसा कर भी रहे हैं।


फैज : हर भाषा की सीमा होती है। उर्दू इससे अलग नहीं है। कभी-कभार मेरी तबियत होती है कि इन बंदिशों को तोड़ दूं, लेकिन वह काम बड़ा शायर ही कर सकता है। मामूली शायर इसे नहीं कर सकते। जबान की बंदिशों के बावजूद नयी चीजें होती रही हैं। मीर, सौदा, नजीर अकबराबादी, गालिब, इकबाल सबों में नयापन का रुझान था। उन लोगों ने अल्फाज, ढांचा वगैरह में बदलाव किया। मैंने भी बंदिश की हद में रहकर ही नयी कोशिशें की, लेकिन मुझमें इससे अधिक कर पाने की हिम्मत नहीं थी। क्योंकि मैं जानता था कि गद्य और कविता अलग-अलग चीजें हैं। शायरी चीजों को समेटती है जबकि गद्य उसे बिखराता है। शायरी लय, छंद के नियमों से चलती है जबकि गद्य में यह बंदिश नहीं है। कविता तो शब्द से ऊपर उठती है जबकि गद्य तो सपाट तल पर चलता है। अब इस फर्क को बनाये रखते हुए नयी बात कहनी पड़ती है। इसके लिए कोई आसान नुस्खा नहीं मिलता है। हर किसी का अपना मिजाज है, इंसपिरेशन है। मुझे तो यह लगता है कि अपने अदब की विरासत का पूरा लाभ मैं नहीं उठा पाया। इसकी गुंजाइश अभी भी है। हमारी नयी पीढ़ी ने अपने को विरासत से काट लिया है, इसलिए वे इससे लाभ उठाना नहीं चाहते। जहां तक एक बिल्कुल नये मिजाज की शायरी का ताल्लुक है, उसके लिए ज्यादा जह़ीन होना पड़ता है। मुझमें वह प्रतिभा नहीं है और मुझे जब ऐसा करने की तबियत होती है, मैं पंजाबी में लिखता हूं।

मुजफ्फर : नयी शायरी वाले क्या पश्चिम से मुतासिर नहीं हैं?


फैज : बिल्कुल। यह तो मौलाना हाली और मौलाना मुहम्मद हुसैन आजाद के लेखन के साथ शुरू हो गयी थी। उनकी शायरी पश्चिम की नकल थी। वे प्राकृतिक दृश्यों, बेवाओं, अनाथों के बारे में जो लिखते थे, वह सब बकवास था। इसमें देसी खून और जज्बा नहीं था। वह तो महज नकल थी और नकल रचना हो ही नहीं सकती। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि दूसरी तरफ की शायरी का लाभ न उठाया जाए। कीजिए मगर सलीके से। अपनी विरासत की जमीन पर रह कर दूसरी जगहों की चीजों को इस नजरिए से देखिये कि उसमें से कितना और क्या आपके मतलब का है। रिवाज और नयापन, विरासत और नयी खोजें साथ-साथ चलती हैं।

शायरी सिर्फ ख्यालातों और जज्बों को जाहिर करने तक ही महदूद नहीं रहती। यह एक हुनर भी है। हुनर सीखा जाता है। यह संगीत की एक बंदिश की तरह है। इसमें देखना पड़ता है कि सुर मेल खा रहा है या नहीं। इसलिए इन चीजों का ख्याल रखना चाहिए। पश्चिम की राह पर पीछे-पीछे चलने का फैशन हमें कहीं नहीं पहुंचाएगा। पौधे की जड़ मिट्टी में ही होनी चाहिए। इसकी जड़ें मजबूत हों क्योंकि उसके बगैर पौधा जिंदा नहीं रह सकता। वह सूख जाएगा। हां, पौधा बड़ा हो जाए तो नये हालात के मुताबिक उसी पौधे की डालों की छंटाई भी करनी पड़ती है।

मुजफ्फर : दूसरे मुल्कों में मसलन दक्षिण अमरीका के देशों के कुछ कवि आप ही जैसी कविताएं लिख रहे हैं। क्या आप समझते हैं कि इस तरह की कविता क्या अंतर्राष्ट्रीय स्थिति को प्रभावित कर रही है। क्या उससे बदलाव आ रहा है?


फैज : सच यह है कि हमारी शायरी को कोई रिश्ता किसी, अंग्रेजी को छोड़कर जिसके हालात हमसे बिल्कुल अलग हैं, से नहीं रहा है। वैसे कई ऐसे मुल्क हैं जिनसे हमारे हालात मिलते हैं। उनकी और हमारी शायरी में कई चीजें मिलती-जुलती हैं। पिछले दस-बीस सालों में हम अंग्रेजी, फ्रांसीसी या जर्मन शायरी से हटकर लातिनी अमरीकी, घ्यानी, फिलीस्तीनी, अरबी तथा अफ्रीकी शायरी की तरफ मुड़े हैं। और यह बहुत अच्छी बात है। इससे हम उन लेखकों-शायरों के करीब आ सके हैं, जिनके अनुभव हमारे अनुभवों से मिलते हैं।

मुजफ्फर : मार्खेज का उपन्यास ‘ऑटम ऑफ द पेट्रियार्क’ पढ़ते हुए मैंने यह महसूस किया कि वह कहानी हमारे देश में घट सकती थी। तो जब ऐसे लेखन का अनुवाद हमारे यहां होता है तो उसका प्रभाव पड़ता है। लेकिन क्या इसका असर हमारे साहित्य पर भी पड़ता है?


फैज : हां। इन अनुवादों का भारी महत्व है, क्योंकि इससे अन्य देशों की रचनाधर्मिता को जानने-समझने का मौका मिलता है। हम अपने हालातों को बेहतर तरीके से देखने लगते हैं। मसलन तुर्की तथा अरबी से हमारे यहां जो अनुवाद हुए हैं, उससे हमारे साहित्य का फलक बड़ा हुआ है।

मुजफ्फर : अब आज की शायरी के बारे में कुछ कहें। अपने साथ के शायरों तथा नये शायरों के बारे में आपका क्या खयाल है?


फैज : मुझे लगता है कि मानसिक अराजकता और भ्रमों के बावजूद हमारे यहां काफी अच्छी शायरी हो रही है। नये शायरों के भविष्य के बारे में बयान देने में हमेशा मुश्किल आती है क्योंकि आपको नहीं मालूम कि वे कब तक अच्छी शायरी करते रहेंगे। फिर भी हमारी शायरी ठूंठ कभी नहीं हुई। हमारे यहां अच्छे कवि, लेखक और आलोचक हैं, लेकिन इसने कभी आंदोलन का रूप नहीं लिया है जैसे कभी प्रगतिशील लेखक आंदोलन हुआ करता था। फिर भी हमारे यहां नयी प्रतिभाओं की कमी नहीं है। हमारे यहां लहरें तो हैं लेकिन धारा नहीं बनी है। फिर भी हमें अपने साहित्य के बारे में चिंता करने की जरूरत नहीं है। उर्दू के अलावा पंजाबी, बलूची, सिंधी और पश्तो भी तो हैं। पहली बार लोग इन जुबानों पर ध्यान दे रहे हैं। इनमें बहुत जानदार शायरी लिखी जा रही है। गद्य-लेखकों की भी पहचान बन रही है। अदब का कारवां बढ़ता जा रहा है…

मुजफ्फर : आप कैसे लिखते हैं?


फैज : मैं कैसे लिखता हूं? मुझे ठीक से नहीं मालूम। फिर भी कुछ-कुछ ऐसा होता है। किताब पढ़ते समय कोई एक लाइन, एक इमेज या लय मेरे दिमाग में अटक जाती है। वह दिमाग में मंडराती रहती है। कई बार संगीत सुनते वक्त कोई लय असर छोड़ जाती है। कई बार एक घटना एक लाइन लिखवा लेती है, बाद में उसी पर पूरी नज्म बन जाती है। गजल के लिए पहले एक मिसरा उभरता है और उसी की जमीन पर गजल मुकम्मल हो जाती है। हां, नज्म के लिए सोचकर, योजना बनाकर चलना पड़ता है। शुरू में केवल कुछ लाइनें सूझती हैं और उसके बाद बढ़ईगिरी वाला काम शुरू होता है। अगर शुरू की लाइनें और इमेज धारदार हों, उसकी लय भी ठीक हो तो बढ़ईगिरी चलती रहती है। लय में कोई गलत सुर न लगे, वरना हाथ रुक जाएगा।

कई बार किसी घटना, भावना या अनुभव का प्रभाव इतना गहरा होता है कि पूरी कविता एकबारगी ही उभर जाती है। वहीं दूसरी कविताएं मुकम्मल होने में महीना ले लेती हैं।

मुजफ्फर : आपने कभी ऐसी कोई महत्वपूर्ण कविता लिखनी चाही हो जिसे आपके लेखन में विशेष स्थान मिल सके और आप उसे न लिख पाये हों?


फैज : एक-दो बार मैंने लंबी कविता लिखनी चाही। ‘सर-ए-वादी-ए-सीना’ को मैं एक लंबी नज्म के रूप में लिखना चाहता था। लिखना शुरू भी किया, आखिर बोर होकर छोड़ दिया। ‘दस्त-ए-सबा’ की एक नज्म ‘जेल की सुबह’ को मैं लंबी नज्म बनाना चाहता था, उसमें अपने सारे अनुभवों को पिरोना चाहता था, लेकिन कर नहीं पाया।

अनुवाद अरुण प्रकाश
साभार समरथ (इंडियन इंस्‍टीच्‍यूट ऑफ सोशल डेमोक्रेसी
वाया पाकिस्तान दूसरा पहल

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