इतिहास बनाने वाले हंस नहीं पाते, हंसी उनके लिए बाधा है
♦ अपूर्वानंद
मई दिवस और गणपति में संबंध ही क्या हो सकता है? दोनों की न तुक मिलती है और न ही अनुप्रास की छटा दोनों के पास-पास होने से बिखरती है। फिर गणपति शुद्ध हिंदू देवता हैं, गणेश चतुर्थी के अवसर पर तो उनका नामजाप समझ में आता है, लकिन मई दिवस पर उनका आह्वान? इससे बड़ा दूषण हो ही नहीं सकता और इसका दंड उन्हें तो किसी न किसी रूप में भुगतना ही पड़ेगा। सो हुआ।
सती अनामंत्रित अपने पिता दक्ष के घर गयी थीं और अपमान न सह पाने के कारण उन्हें यज्ञ वेदी में ही कूद कर जल मरना पड़ा। किसी भी जगह बिन बुलाये नहीं जाना चाहिए, इसकी सीख देने के लिए यह कथा वे सुनाते हैं, जिन्हें इस समय भी कुछ कथाएं याद रह गयी हैं। निश्चय ही त्रिथा को यह प्रसंग या तो पता न होगा या वे इसे भूल गयीं, जब मई दिवस पर जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय में एक वामपंथी छात्र संगठन द्वारा आयोजित एक संगीत संध्या में मंच पर वे अनामंत्रित गाने चली गयीं। एक तो वे स्वयं अनपेक्षित, अतः किंचित अस्वस्तिकर उपस्थिति थीं, दूसरे आयोजकों और श्रोताओं को, जो मई दिवस पर संघर्ष और क्रांति के जुझारू गीत सुन कर अपने शरीर के भीतर जोश भरने आये थे, इसकी आशंका थी कि वे इस पवित्र अवसर पर जाने क्या गा देंगी। और आखिरकार उन्होंने इस आशंका को सही साबित कर दिया, जब वे शास्त्रीय संगीत के नाम पर “वक्रतुंड महाकाय…” गाने लगीं। थोड़ी देर पहले जो सैकड़ों शरीर ‘हिल्लेले झकझोर दुनिया’ पर झूम रहे थे, उनसे नहीं-नहीं का शोर उठा। इस छात्र जनता के नेता जन-भावना का आदर करते हुए मंच पर पहुंचे और त्रिथा को अपना गाना बीच में रोक कर मंच से जाना पड़ा।

छायाकार प्रकाश के रे
एक मई को जेएनयू में पाकिस्तान के लाल बैंड को सुनाने हजारों की तादाद में सिर्फ जेएनयू के ही नहीं, दूसरी जगहों के भी छात्र-नौजवान और हमारी तरह के पूर्व-युवा भी पहुंचे थे। इन लोगों के वहां आने की तीन वजहें रही होंगी : कुछ मई दिवस की भावना में शामिल होने, कुछ हिंदुस्तान-पाकिस्तान मैत्री की भावना के साथ और कुछ तो सिर्फ संगीत प्रेम के कारण, जो उन्हें मीलों दूर ले जा कर रात-रात भर जगाता है, आये थे। लाल-बैंड के पहले पटना की संस्था हिरावल की इस आयोजन से संगति थी। अपने सादा अंदाज में उन्होंने जो सुनाया, वह वहां इकट्ठा जन समुदाय की इच्छाओं के मुताबिक ही था। लेकिन उनके जाने के बाद लाल-बैंड के गायक ने मंच पर त्रिथा को बुलाया, जिन्हें कोई जानता नहीं था। वे युवा हैं, अभी संगीत के क्षेत्र में जानी नहीं जातीं। फिर यह बताया गया कि वे तीन गीत सुनाएंगी। त्रिथा ने युवावस्था के कच्चे उत्साह में अपना लाल आंचल लहरा कर कहा कि मैं भी लाल हूं। उस पूरे माहौल में स्वीकार किये जाने का यह आग्रह कैसे ग्रहण किया गया, मालूम नहीं। फिर वे गाने लगीं। लेकिन जो गा रही थीं, वह कोई जन गीत नहीं था, न क्रांतिकारी संगीत ही। वह शास्त्रीय रागों की उनकी आवाज और पाश्चात्य वाद्य-यंत्रों के मेल से की गयी अदाकारी थी। आवाज में दम था तो आशंकित श्रोता-वर्ग पर उन्होंने असर छोड़ा। लेकिन तीसरा गीत ‘गणपति’ जैसे ही उन्होंने शुरू किया, जन-समूह में बेचैनी की लहर दौड़ने लगी। ‘वापस जाओ’, ‘गो बैक’ कह कर उन्हें दुरदुराया जाने लगा। तुरत ही मंच पर आयोजक पहुंच गये और त्रिथा को उन्होंने गाना बंद कर देने को कहा। यह सामूहिक सहमति से कलाभिव्यक्ति की हत्या की एक घटना थी। इसे बिना प्रतिवाद किये हम सब देखते रहे, जो हुसेन से लेकर रामानुजन तक के प्रसंग में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के लिए नारे लगाते हैं।
मेरी किशोरी बेटी ने लौटते हुए पूछा कि लोगों ने त्रिथा को क्यों हटाया। उसे उसकी आवाज की ताकत ने मुतास्सिर किया था। मैंने जब आयोजकों में से एक से अपना प्रतिवाद जताया, तो उसने बुदबुदाते हुए जो कहा, उसका आशय यह था कि किसी धर्मविशेष से जुड़ी चीज को इस मंच पर इजाजत देना ठीक न होता। अगले दिन अपनी एक विदुषी अध्यापक मित्र से मैंने इस प्रसंग पर राय जानना चाही तो उन्होंने त्रिथा को रोक दिये जाने को बिलकुल सही ठहराया। उन्होंने कहा कि मई दिवस जैसे मौके पर गणपति जैसी हिंदू चीज गाने का कोई तुक नहीं था, इसलिए भी कि जेएनयू एक ऐसी जगह है, जहां दलित राजनीति बड़ी मजबूत है।
तब से मैं इस पूरी तर्क पद्धति को समझने की कोशिश कर रहा हूं। त्रिथा के गणपति गायन को अगर धार्मिक होने के कारण अनुचित माना गया तो फिर लाल बैंड के फरीद और बुल्लेशाह को किस तर्क से मुनासिब मान लिया गया? सूफी संगीत धार्मिक और रहस्यवादी तत्वों से मुक्त नहीं होता। दूसरा तर्क यह था कि मई दिवस इस तरह के गायन का सही अवसर नहीं था। किसी और मौके पर त्रिथा इसी समुदाय के सामने यह गातीं, तो कोई आपत्ति न होती। मई दिवस तो संघर्ष के गीत गाने और सुनने का दिन है।
मई दिवस का अवसर है क्या आखिर? मई दिवस श्रमिकों द्वारा सिर्फ काम के घंटे कम किये जाने के संघर्ष की याद नहीं है। काम के घंटे कम किये जाने की मांग के पीछे श्रमिकों की मनुष्य की तरह जीने की अनिवार्य शर्त, यानी, अवकाश हासिल करने की आकांक्षा थी। अवकाश, जिसमें वे उत्पादन की अनिवार्यता के दबाव से मुक्त सृजन कर सकें, या अपना पुनः सृजन कर पाएं। वरना मनोरंजन तो मात्र अभिजन का अधिकार रहा था। गोदान का वह दृश्य याद करें, जिसमें राय साहब रामलीला का आयोजन करते हैं। होरी जैसे लोगों को उसके लिए इंतजाम भर करना है। उसमें होरी भी हिस्सा लेता है, तो इसलिए कि वह ग्रामीण समाज है। शहरी पूंजीवाद मेलजोल के ये अवसर भी नहीं देता। फिर मजदूर श्रमिक एक-दूसरे से मिलें कैसे, जब उनके शरीर मात्र उत्पादक यंत्र भर रह गये हों।
कार्ल मार्क्स ने अपनी 1844 की पांडुलिपियों में लिखा, “जब कम्युनिस्ट कामगार एक दूसरे से मिलते है, सिद्धांत, प्रचार, इत्यादि उनका पहला मकसद होता है। लेकिन ठीक उसी वक्त, इस मेल-जोल के चलते उनमें एक नयी आवश्यकता का बोध जागता है – समाज की आवश्यकता। और जो साधन मालूम पड़ता है, साध्य बन जाता है। इस व्यावहारिक प्रक्रिया में सबसे उम्दा नतीजे देखने को आते हैं, जब फ्रेंच समाजवादी श्रमिक साथ-साथ देखे जाते हैं। तंबाकू के मजे लेना, खाना-पीना आदि सिर्फ मिलने का माध्यम भर नहीं रह जाते। मिलना-जुलना, संग-साथ, गप-शप … उनके लिए अपने-आप में पर्याप्त है, बंधुत्व उनके लिए नारा भर नहीं, एक जीवन-तथ्य है… मानवीय गरिमा की प्रभा से उनके श्रम-कठोर शरीर दमकते रहते हैं।”
दिक्कत शायद यह है कि मई दिवस संभवतः श्रमिक के जीवन चक्र का स्वाभाविक अंग नहीं बन पाया है। यह अभी तक श्रम और श्रमिक जीवन के व्याख्याकारों का आयोजन है, जो पुनः उनके जीवन-क्रम में भी कर्तव्यवश है, उससे अभिन्न नहीं है। वरना जो अभिव्यक्ति उनके लिए एक जगह स्वीकार्य है, वह यहां वर्जित कैसे हो जाती? दूसरे रूप में यह मुख्यतः उनका आयोजन है, जो स्वयं श्रम के अनुभव से विलग हो चुके हैं। जिनकी रोजाना की जिंदगी ही एक जंग है, वे जंग के गीत अलग से नहीं रचते। जो वे खुद रचते और गाते रहे हैं, वह क्या मई दिवस के मंचों पर कभी सुना जाता है? और क्या वह कभी स्वीकार्य होगा? वह तो अशिक्षित जन की अपरिष्कृत अभिव्यक्ति होगी।
जिनके जीवन में श्रम के अनुभव कम हैं, संघर्ष के अनुभवों का भी उन्हें आयात करना होता है। एक प्रकार से वे संघर्षरत नहीं, संघर्ष के अनुभव के उपभोक्ता ही रहते हैं। हामिद सर्वहारा है, लेकिन वह ईद मनाता है जबकि उसकी मुक्ति के लिए लड़ने वाले ईद मिलन का आयोजन करते हैं क्योंकि वह उनके लिए जन संपर्क का एक अवसर होता है।
गणपति को किसने रचा होगा? हाथी से चहरे वाले तुंदियल देवता की कल्पना करने की क्षमता क्या गंभीर दार्शनिकों ने की होगी? वह ‘वक्रतुंड’ है और ‘महाकाय’ है, उसे लंबोदर के संबोधन से भी अपमान नहीं लगता। साधारण जन की सर्जनशील प्रतिभा ने ही तो मैथिलों के विद्यापति के लिए शिव जैसे भंगेड़ी और गणेश जैसे हाजिरजवाब को गढ़ा होगा। वह एक कलानुभव है, जो लोक-कल्पना को पर्याप्त अवकाश देता है कि वह उसे तोड़े-मरोड़े और कुछ का कुछ बना दे। वरना वह कला और साहित्य का देवता क्योंकर होता? शब्द से तो उसकी प्रतिबद्धता इतनी है कि व्यास का डिक्टेशन लेते वक्त कलम गिर जाने के कारण, व्यास के सृजन-प्रवाह में बाधा न आये, यह सोच अपना एक दांत तोड़ कर उसी से लिखना उसने जारी रखा और एकदंत लोकप्रिय हुआ। वह खुद भी हंसता है और बच्चों को हंसाता भी है।
लेकिन इतिहास बनाने वाले हंस नहीं पाते, हंसी उनके लिए बाधा है। तभी तो हमारे कवि ने, जिसका नाम अज्ञेय है, लिखा, “जिनका इतिहास होता है | उनके देवता हंसते हुए नहीं होते: | कैसे हंस सकते? | और जिनके देवता हंसते हुए होते हैं | उनका इतिहास नहीं होता | कैसे हो सकता?” अज्ञेय की कविता पढ़ कर मुझे इस पूरे प्रसंग पर अपने क्षोभ की छद्म-गंभीरता का एहसास हुआ। तो कवि का उपदेश ही मान लूं, “इसी बात को लेकर | मुझे आज हंसना चाहिए…” और इस प्रकरण को समाप्त करूं।
♦ उठो मेरी दुनिया, गरीबों को जगा दो!
♦ एक आभिजात्य सनक में बदलता जा रहा है तैमूर का “लाल”
♦ सुर न हो, तो सिर्फ शब्द से काम नहीं चलता लाल बाश्शाओ!
♦ क्रांतिकारी व्यवहार का विकल्प महज लफ्फाजी नहीं हो सकती
♦ मजहबी दहशतगर्द अवाम के साथ नहीं, सामराज के साथ हैं!
♦ पाक के हालात समझेंगे, तो “लाल बैंड” भी समझ में आएगा
[सौजन्य : नासिरुद्दीन वाया जनसत्ता]
(अपूर्वानंद। वरिष्ठ आलोचक और मानवाधिकार कार्यकर्ता। दिल्ली विश्वविद्यालय में प्राध्यापक। पटना में लंबे समय तक संस्कृति की आंदोलनकारी गतिविधियों की अगुवाई की। अशोक वाजपेयी के समय महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा से जुड़े रहे। उनसे apoorvanand@kafila.org पर संपर्क किया जा सकता है।)










क्लिनिक जाते वक़्त सड़क के एक किनारे रास्ते में एक बड़ा पेड़ देखता था जिस पर मजदूर औरते शाम को दिया जलाकर कुछ कुछ गाती रहती थी कुछ कारणों से उस पेड़ को काट दिया गया . पर दिया जलाकर उस जगह मजदूर औरते अब भी दिख जाती है .एक अजीब किस्म की “असहिष्णुता ” ओर नया “छूआ छूत” पनप रहा है इस सो काल्ड बौदिक समाज में जिसने मजदूर दिवस को हाई जैक कर लिया है .वे मजदूर दिवस पर मजदूर के मन में क्या है वो न जानकर अपनी मर्जी से चीजों को थोपते है . इन लोगो को रही मासूम रजा का आधा गाँव पढना चाहिए या इस्मत चुगताई का कागजी पैराहन तब वे कल्चर ,एक ऐसे समाज को समझ पायेगे जिसमे अलग अलग सोच के आदमी कैसे एक दूसरे की भावनाओं का आदर करते हुए एक लोकतान्त्रिक समाज रचते है .
गणपति को किसने रचा होगा? हाथी से चहरे वाले तुंदियल देवता की कल्पना करने की क्षमता क्या गंभीर दार्शनिकों ने की होगी? वह ‘वक्रतुंड’ है और ‘महाकाय’ है, उसे लंबोदर के संबोधन से भी अपमान नहीं लगता। साधारण जन की सर्जनशील प्रतिभा ने ही तो मैथिलों के विद्यापति के लिए शिव जैसे भंगेड़ी और गणेश जैसे हाजिरजवाब को गढ़ा होगा।
is adbhut jankari ke liye sukriya
वरना मनोरंजन तो मात्र अभिजन का अधिकार रहा था। गोदान का वह दृश्य याद करें, जिसमें राय साहब रामलीला का आयोजन करते हैं। होरी जैसे लोगों को उसके लिए इंतजाम भर करना है। उसमें होरी भी हिस्सा लेता है, तो इसलिए कि वह ग्रामीण समाज है। शहरी पूंजीवाद मेलजोल के ये अवसर भी नहीं देता। फिर मजदूर श्रमिक एक-दूसरे से मिलें कैसे, जब उनके शरीर मात्र उत्पादक यंत्र भर रह गये हों।
ye maidan mara ! hori ke najariye se ‘manorajan’ko dekhana ek ‘manoranjan’ hi hai.
तब से मैं इस पूरी तर्क पद्धति को समझने की कोशिश कर रहा हूं। त्रिथा के गणपति गायन को अगर धार्मिक होने के कारण अनुचित माना गया तो फिर लाल बैंड के फरीद और बुल्लेशाह को किस तर्क से मुनासिब मान लिया गया?
in rahasyavadi khoho se nikalane ki jaroorat hai sir,nahi to ham marxvad banam vakrtund karate hi rah jayenge.
बहुत शानदार टिप्पणी है. यही तो मार्क्सवादियों का छद्म है, या कहें कि छद्म मार्क्सवादियों का धत्कर्म है! सारे हिन्दू कर्मकांड करते हुए भी पब्लिकली हिन्दू नाम-धाम देखते ही भड़क जाते है. अगर अली-अली मंच पर गाना नाचना ठीक है तो फिर गणपति वंदना क्यों नहीं? इतना छद्म करेंगे तो देखिये जो नहीं है वह भी हिन्दू भी दक्षिणपंथी हो जाएगा. यह टिपण्णी ओम थानवी जी के लेख आवाजाही का हक़ की याद दिलाती है जिसमें ऐसी ही छद्म वामपंथिता से बचने की बात कही गयी थी कि राष्ट्रिय स्वयं सेवक संघ और हुडदंगी बजरंगी लोग जो संकीर्णता से हमारे समाज का तानाबाना छिन्नभिन्न कर रहे हैं, वही आचरण साम्यवादी क्यों दिखाने लगते हैं. उस टिप्पणी पर जनसत्ता में बहस छिड़ी है जिसमें कल कथाकार तेजेंद्र शर्मा ने दिलचस्प उदहारण दिया है कि “आप मुसलमान हो कर मार्क्सवादी हो सकते हैं, मगर हिन्दू हो कर नहीं हो सकते। हिन्दू से पहली मांग होती है कि आप सेक्यूलर हो जाइये। जबकि मुसलमान पार्टी की मीटिंग में से उठ कर नमाज़ पढ़कर वापिस मीटिंग में शामिल हो सकता है।” सारे बंगाली मार्क्सवादी दुर्गापूजा किस धूमधाम से मनाते हैं हम सब जानते है. धर्म अफीम ज़रूर है, परन्तु मौके और सुविधा के अनुसार ही. यही भारतीय मार्क्सवादियों का पाखण्ड है.
शानदार टिप्पणी.
कला की स्वच्छंदता से प्यार करने वाले यह कैसे भुला दे सकते हैं कि उस का भी एक छंद होता है . स्वच्छंद माने स्व धन छंद.छंद टूटने पर प्रतिकूल प्रतिक्रिया स्वाभाविक है . अप्पूर्वानंद जी खुद ही कह रहे हैं कि तीर्था उस कार्यक्रम की योजना में शामिल नहीं थीं . बिन बुलाये आन पहुंचीं थीं. लेकिन उन्हें रोका नहीं गया . उन्होंने पहले पश्चिमी वाद्यों के साथ तीन चार शास्त्रीय टप्पे सुनाये , जिस पर उन्हें खूब तालियाँ मिलीं . हाँ , वक्रतुंड के लिए उस वक्त श्रोता मानसिक रूप से तैयार न थे , और फ्यूज़न में वह वैसे भी अजीब लग रहा था . इस पर श्रोता समुदाय से हाहा कर उठी तो समझदारी से तीर्था ने खुद को संयमित कर लिया . जे एन यू के यही श्रोता स्पिक मैके और दीगर आयोजनों में शास्त्रीय भजनों को रात भर मगन हो कर सुनते हैं .इस लिए इस घटना को ”कला के सामूहिक संहार” के रूप में चित्रित करना ज्यादती है . उधर कई रेडिकल हाशियावादी इसी बात पर सख्त नाराज़ हैं कि तीर्था को मंच पर आने ही क्यों दिया गया .
मेरे विचार से
१. यह जेएनयूएसयू का कार्यक्रम था, इसलिए छात्रों को यह हक था कि जो चीज़ उनकी संवेदनाओं से टकराती है, जिसे सुनने वो वहाँ नहीं आये हैं, तो उसका विरोध करें .. अपूर्वानंद जी शौक से कैम्पस में मंगलाचरण का कार्यक्रम करवाएं, तमाम पूजाएँ तो होती ही हैं, हम (जिन्हें नहीं जाना है)जाएँगे ही नहीं.
२. बाबा फरीद के गाने लाल द्वारा पहले गाए गए हैं, और धर्म के अन्दर ही धर्म के पाखण्ड से ऊपर उठने की बात उनमें हैं, मुझे किसी भी दिन यह तय करने में कोई परेशानी नहीं होगी कि जन-संतों, कबीर, रैदास, मीरा, बुल्लेशाह, शाह बाहू, बाबा फरीद की रचनाएँ सनातनी श्लोकों से अलग कर देखी जाएँ, अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता हर धर्म को मिली है, लेकिन हम अपने कार्यक्रमों में क्या गाया जाना चाहिए और क्या नहीं यह निर्णय कर सकते हैं..
३. लेखक के विचार में हमारे अवाम में जो भी प्रचलित है वह जनवादी है, मुझे याद पड़ता है ऐसा ही कोई तर्क जनाब प्रभाष जोशी ने सती प्रथा पर दिया था, जिसके कारण तमाम तगड़ी पत्रकारिता के बावजूद उनका विरोध जरूरी हो गया था. मैं मानता हूँ कि धर्म और जन समुदाय का जो जुड़ाव है उसे समझने की जरूरत है, लेकिन क्या धर्म, और उसके भी प्रचलित तरीकों के ही जरिये मजदूरों-आम लोगों से नज़दीकी रिश्ता कायम किया जा सकता है? और क्या इस हिसाब से शिवसेना अवाम के बहुत नज़दीक है? क्योंकि बड़े बड़े गणेशोत्सव उनकी खासियत रहे हैं.
यह बड़ा जटिल सवाल है कि अवाम क्या चाहेगी यह कौन तय करेगा, लेकिन मुझे लगता है कि अवाम को नए प्रतीकों से जोड़ने की कोशिश अगर होगी तो वो प्रशंसनीय है, तिलक ने आजादी के आन्दोलन के दौरान गणेशोत्सव -दुर्गोत्सव वगैरह का प्रयोग किया था, लेकिन आज के हालात बदल चुके हैं, हमें नए प्रतीकों की जरूरत है. रही बात संघर्ष के अनुभवों की तो हम में से कई को बिना धार्मिक प्रतीकों को साथ लिए भी संघर्ष का अनुभव है.
सादर
इकबाल अभिमन्यु
one important intervention on the issue of Tritha’s singing Vakratund Mahakay at May Day programme at JNU:
http://bargad.org/2012/05/09/tritha-jnu-vakratunda-mahakaya/
आपने एक बार फिर से सोचने पर विवश कर दिया
[...] [...]
पिता-पुत्र सम्वाद!
हिमालय के सफेदपोश पहाड़…
बैठे हुए हैं इस पर पद्मासन लगाए
अधखुली आँखें
वहीं पर मौज़ूद हैं पर्वत-पुत्री गौरी
ऋद्धि-सिद्धि के साथ-साथ
गणेश भी हैं गोद में!
कार्त्तिक कहीं गए हैं घूमने
बसहा खड़ा ‘पाज’ कर रहा है
और क्या चाहिए उनको?
“प्रिय बटुक, पता है तुम्हें-
कुण्ठा क्या है?
क्या है संत्रास?
क्या है मृत्युबोध?
कैसा होता है आक्रोश का विस्फोट?
अल्पजीवी और लघुप्राण व्यक्ति से मिले हो तुम?”
गणेश तुरंत उतर गए गोद से
चार हाथ की दूरी पर खड़े होकर
लंबे और लाल होंठ हिलाते हुए बोले-
“बता तो मैं दूंगा…
पर आप समझेंगे नहीं!
हिमालय की सफ़ेदपोश पहाड़ों को छोड़ कर
नीचे के इलाकों की ओर देखा है कभी?”
पिता को मौन गंभीर देख कर
माँ की तरफ देखने लगे गणेश
तभी, सहज स्नेह से अभिभूत पार्वती बोली…
“इस तरह भी कोई उल्टा-सीधा बाप को देता है जवाब?
जाओ गणेश, क्या कहूँ तुम्हें…
अपने बड़े भाई से कुछ तो सीखा होता!”
–बाबा नागार्जुन की मैथिली कविता का त्रिपुरारि कुमार शर्मा द्वारा किया गया हिंदी अनुवाद। साभार- जानकी पुल
[...] घटना है. इस घटना की आलोचना करते हुए अपूर्वानंद ने और साथी मीरा ने इसे क्रमशः [...]
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