सुनो दुनियावालो, ये वो इंसान था जिसे बिमल रॉय कहते हैं!

♦ मनोबिना राय

यह आलेख सुप्रसिद्ध फिल्मकार बिमल रॉय को याद करते हुए उनकी धर्मपत्नी मनोबिना रॉय ने कई दशक पहले लिखा था। इस आलेख को पुणे के फिल्म अभिलेखागार की ओर से बिमल रॉय पर प्रकाशित मोनोग्राफ में संगृहित किया गया है। इससे हमें बिमल रॉय के जीवन के कई अनछुए पहलुओं और उनकी कला में उनकी पत्नी के अमूल्य योगदान के बारे में पता चलता है। युवा फिल्मकार और लेखक कृष्ण देव ने इस लेख को प्रकाश के रे के संपादन में शीघ्र प्रकाश्‍य मोहल्‍ला लाइव की सिने-स्‍मारिका के लिए अंग्रेजी से अनुदित किया है : मॉडरेटर

मैं नियमित लेखिका नहीं हूं। न ही यह बिमल राय के जीवन चित्र खींचने की कोई कोशिश है। काश, मैं उसकी आत्मकथा लिख पाती। लेकिन ये आग्रह पाकर कि जिस व्यक्ति के साथ मेरे जीवन के तीस साल गुजरे, उसके बारे में संस्मरण लिखूं, तो खुद को रोकना मुश्किल हो गया। जहां तक भी स्मृति के हवाले से याद किया जा सकता है, उसे आप सबसे साझा करने की कोशिश कर रही हूं।

बमुश्किल 12 साल की थी, जब मैंने बिमल को पहली बार देखा था। उस वक्त एक अपरिपक्व मन के लिए सोचना मुश्किल था कि यही इंसान बाद में मेरा हो जाएगा। हमदोनों के परिवारों के बीच अच्छी नजदीकी थी। जब कभी कलकत्ता जाना होता, उसे देखती थी। उससे “मिलती” थी – ये नहीं कह सकती। हां, जब मैट्रिक की परीक्षा के सिलसिले में लंबे समय तक वहां रुकी तो हमारे बीच नजदीकी भी आ गयी। मेरी उम्र 15 साल की थी। आसानी से प्रभावित होने वाली नाजुक उम्र। मेरी मां बीमार हो गयी थी और युवक बिमल ने मेरी मां का बहुत ख्याल रखा और मदद की। मेरी बीमार मां के प्रति उसकी मौन अनुरक्ति और सेवा भाव को देखकर मैं उसके प्रति अचेतन ही लगभग आसक्त सी हो गयी थी। क्या इसमें कोई कृतज्ञता भी थी? खैर, हम बनारस लौट आये। लेकिन इस बार अपने आसपास उस शांत और मृदुभाषी युवक की कमी महसूस हो रही थी, जिसे हम कलकत्ता में विदा कह आये थे। फिर भी वह “प्यार” बिल्कुल नहीं था, जिन अर्थों में हम आज प्यार को जानते हैं।

जल्द ही पता चला कि वह भी मुझे पसंद करता है। अपने दोस्तों से वो कहने लगे – यदि मुझे शादी करनी है तो मैं सिर्फ इसी लड़की से शादी करूंगा। प्रस्ताव आया तो मेरे दर्शनशास्त्र के प्रोफेसर पिता ने सहजता से स्वीकार भी कर लिया। लेकिन विरोधी माहौल बनने में भी देर नहीं हुई। हमारे संबंधियों को यह ख्याल कतई पसंद नहीं आया कि मेरी शादी किसी फिल्मी आदमी से हो। वह समय कुछ और था। शिक्षित परिवारों में फिल्म से जुड़ना अच्छी नजर से नहीं देखा जाता था। खैर, दो साल बाद मेरे मैट्रिक पास करने के बाद वो एक लाजमी मौका भी आया और मैं न्यू थिएटर के कैमरा मैन की पत्नी बन गयी। ‘देवदास’ और ‘मुक्ति’ में उन्होंने स्वतंत्र रूप से कैमरा किया था।

बिमल का स्वतंत्र निर्देशक के तौर पर पहला काम था – न्यू थिएटर का ‘उदेर पाथेय’, जो बिल्कुल अलग किस्म की फिल्म थी और जिसे लोगों ने हाथों हाथ ले लिया। इसके साथ ही वह मशहूर हो गया – निर्देशक बिमल राय। इसके अलावा बिमल की अन्य मशहूर फिल्में थीं – ‘अंजनगढ़’, ‘पहला आदमी’ और ‘मंत्रमुग्ध’। सभी फिल्में न्यू थिएटर से ही बाद के दिनों में आयी थीं। तब तक बिमल राय का नाम सफल हिंदी फिल्मों का पर्याय बन गया था।

हालांकि, न्यू थिएटर जाना-माना संस्थान था लेकिन तब तक वहां आर्थिक संकट गहराने लगा था। न्यू थिएटर से जुड़े लोगों ने रोजी रोटी के नये मुकाम तलाशने शुरू कर दिये। तब तक बंबई देश का हॉलीवुड बन गया था। बिमल बंबई आ गये और ‘बांबे टॉकीज’ के साथ उनका करार भी हो गया। पांचवें दशक की शुरुआत में बिमल की फिल्म ‘मा’ आयी और देश की फिल्म राजधानी में उसके पांव जमने शुरू हो गये।

स्वभाव से शांत होने के बावजूद बिमल राय दोस्ती के कायल इंसान थे … और दोस्ती हमेशा स्वार्थहीन होती थी। बिमल कलकत्ता के अपने पुराने साथियों को भी बंबई ले आये। समय के साथ सबने दौलत और शोहरत हासिल की। हृषिकेश मुखर्जी, महेंद्र पॉल, नबेंदु घोष, नाजिर हुसैन और असित सेन उनमें खास थे। सिने-प्रतिभाओं से भरे एक ही कंपार्टमेंट में यात्रा करते हुए सभी साथ-साथ बंबई आये थे।


बिमल रॉय का परिवार

हितेन चौधरी जैसे मेजबान हो तो रहने की कोई समस्या कैसे होती। ‘बंबई टाकीज’ पर राज करने वाली देविका रानी तब तक अपने सम्राज्य को अलविदा कह चुकी थी। कलकत्ते से आ रहे दस्ते के लिए उन्होंने मलाड का पूरा बंगला खाली कर दिया था। हम न केवल साथ-साथ आये बल्कि साथ ही उस बंगले में रहे भी। हमारी टीम भावना भी काबिल-ए-तारीफ थी। तमाम पुरुषों के बीच मैं अकेली महिला उन सबका ख्याल लेने के लिए थी। परंपरागत लिहाज से मैं सबकी “बोऊदी” (भाभी) थी। अपने रोजमर्रा की जिंदगी के लिए सभी मुझ पर आश्रित थे। हर रोज ही पिकनिक था। सामान्‍य तौर पर पारिवारिक जीवन की अभ्यस्त मैं मलाड में रहते हुए ही समूह के आपसी प्रेम की भावना को जान पायी। इस अनूठे परिवार का नेतृत्व करते हुए बिमल बहुत खुश रहते थे। अक्सर, लगभग हर रोज ही हमारे यहां अतिरिक्त भोजनार्थियों का जमावड़ा होता था।

कलकत्ता में मैं अपने बड़े परिवार की ‘छोटी बहू’ थी और मुश्किल से ही पति का साथ मिलता था। और बंबई में भी कहानी कुछ ऐसी ही थी। लेकिन मुझे हमेशा संतुष्टि का एक एहसास होता था। मैं जानती थी, बिमल मुझे बहुत प्यार करते हैं। हालांकि कभी इसे फिल्मी डायलॉग के अंदाज में उसने कहा नहीं। वो बहुत ही शांत फिर भी बेहद मुखर होते थे। मुझे यह एहसास हमेशा रहा कि मेरे लिए और मेरी भावनाओं के लिए उनके दिल में गहरा सम्मान है। एक पत्नी इससे ज्यादा क्या मांगे या अपेक्षा रखे।

‘परीणिता’ और ‘दो बीघा जमीन’ एक साथ ही बनी। इसके लिए बिमल को और भी लोगों की जरूरत आ पड़ी। सलिल चौधरी आये, कमल बसु, सुधेंदु भी। दो से भले चार, लेकिन घर की अपनी सीमा थी। फिर नये घर की तलाश शुरू हुई। धीरे-धीरे लोग अपने-अपने ठिकानों पर चले गये। शायद जिंदगी की यही रीति है। लोग मिलते ही हैं अलग होने के लिए। हालांकि रास्ते अलग नहीं हुए, जैसा मुहावरे से लगता है। एक साथ नहीं रहते हुए भी सब लोग एक साथ काम कर रहे थे और बेहद घनिष्‍टता से।

ये वक्त हो सकता था कि मैं बिमल के और करीब होने की उम्मीद करती। लेकिन ऐसा मेरे हिस्से में था ही नहीं। बिमल न केवल सिनेमा में बल्कि अन्य कई गतिविधियों में मशरूफ होते गये। देश और देश से बाहर – बुलावे आते रहते थे। करीब सभी अंतर्राष्ट्रीय फिल्म समारोहों में बिमल को शिरकत करनी होती थी। कई जगह ज्यूरी के तौर पर भी जाना होता था।

कभी-कभी मैं साथ भी गयी। मसलन – मास्को। घर पर बिमल IMPPA के अध्‍यक्ष होते थे, सालों तक। कभी कभी लोक सेवा आयोग के पैनल में होते तो कभी पुणे फिल्म इंस्टीच्‍यूट की स्थापना में व्यस्त होते। अधिक तनाव ने सेहत पर बुरा असर डाला और उनकी सेहत अचानक बिगड़ गयी जिसकी वजह से मौत भी वक्त से पहले आ पड़ी। वो कहते हैं न, “खुदा जिन्हें प्यार करते हैं; कम उम्र में मर जाते हैं”। ये ख्याल ही मेरे लिए एकमात्र तसल्ली था। परिवार को बिमल की लोकप्रियता की कीमत चुकानी पड़ी। पर शायद परिवार में किसी की विशिष्टता का सच ऐसा ही होता है।

बिमल राय मशरूफ इंसान थे, फिल्म बनाने में मशरूफ। लेकिन बिमल ‘फिल्मी टाइप’ के बिल्कुल नहीं थे। बल्कि, वो अपने परिवार को हमेशा फिल्मी माहौल से दूर रखना चाहते थे। हमारे घर में फिल्म पत्रिकाएं नहीं आती थीं। खुद तो परंपरावादी थे ही, अपने परिवार के भी शुद्धतावादी होने के पक्षधर थे। आमतौर पर बिमल को अपने परिवार, अपनी भारतीय परिवार परंपरा पर बहुत गर्व होता था। उनके मुताबिक परिवार में महिलाओं का स्थान हमेशा ऊंचा होना चाहिए। महिलाओं के लिए इस सम्मान को उनकी फिल्मों में भी देखा जाता था – ‘बिराज बहू’, ‘परिणीता’, ‘सुजाता’ या ‘बंदिनी’ – सभी फिल्मों में। इन्हीं वजहों से बिमल को सम्मान मिलता रहा, फिल्मी सफलताएं तो दीगर बात है। जो भी बिमल राय को जानते हैं, उन सबके दिलों में उनके लिए खास मुकाम है। जब वो हमारे बीच नहीं हैं, हम उन्हीं स्मृतियों के सहारे मार्गदर्शन पाते हैं। उनकी याद अक्सर वो यादगार पंक्तियां दुहाराने को कहती है – “उसकी जिंदगी सादी थी और आदमजात स्वभाव ऐसे मौजूद थे कि ईश्वर भी खड़ा होकर इस दुनियां से कह उठे – ‘ये वो इंसान था!’…”

[ आज (12 जुलाई) बिमल रॉय का जन्‍मदिन है। ]

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