कला में इरोटिका पोर्नोग्राफी नहीं होती है प्राचार्य महोदय!

♦ गोपाल सून्‍य

लाकार अस्तित्वगत जो भी चीजें देखता या अनुभव करता है, उस पर अपनी स्वतंत्र अभिव्यक्ति देने के लिए मुक्त है। बात “कला अवं शिल्प महाविद्यालय, पटना” के एक छात्र की है, जिसको कला महावविद्यालय की एक महिला शिक्षिका ने ऐतिहासिक मुगल तथा राजस्थानी शैली में लघु चित्रण की प्रतिकृति का स्वतंत्र चित्रण करने के लिए कहा। ये कलाकृति महाविद्यालय की वार्षिक परीक्षा में छात्र के उत्तीर्ण होने में सहायक होता। छात्र ने लघु चित्रण (miniature painting) में कामसूत्र पर आधारित रति चित्रण (voyeurism) किया। परिणामस्वरूप छात्र को परीक्षा में अनुत्तीर्ण कर दिया गया। छात्र के कारण पूछे जाने पर महाविद्यालय के प्राचार्य का कहना है कि “किसी भी छात्र के द्वारा एक महिला शिक्षिका को इस तरह का अश्लील चित्र (pornography) नहीं दिया जा सकता है। इस तरह का अश्लील चित्र अस्वीकार्य है, ये फैसला महाविद्यालय के सभी कला शिक्षकों के सहमति से लिया गया है, इसलिए संबंधित छात्र को अनुत्तीर्ण किया गया है।”

आपको ज्ञात हो कि भारतीय सांस्कृतिक या कला इतिहास में काम पर आधारित अनगिनत चित्र और मूर्ति शिल्प का निर्माण होता रहा है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण खजुराहो का मूर्तिशिल्प तथा ऐतिहासिक कामसूत्र पर आधारित किया गया लघुचित्रण है, जो कि हमें राजस्थानी तथा मुगल शैली में देखने को मिल जाता है। इतिहासकारों ने काम पर आधारित कला को प्रेमकाव्य (erotica) अथवा (erotic art) की संज्ञा दी है।

“प्रेमकाव्य (erotica), अश्लील कला (pornography) नहीं है… अश्लील कला (pornography) एक कानूनी शब्द है, यह शब्द यूनान (Greek) से आया है और वेश्या के लिए प्रयुक्त होता है। वास्तव में इसका मूल अर्थ है… वेश्याएं और उनसे जुड़ा हुआ पेशा या रिवाज।” ये वाक्यांश Myth: Erotica is a 20th Century Invention लेख से लिया गया है। इस लेख की लेखिका June Machover Reinisch (PhD) हैं, जो Scientific Study of Sexual and Psychosexual Development की कार्यकारी निदेशिका है।

उपरोक्त बातों का अवलोकन करने पर ये गौर किया जा सकता है कि कला एवं शिल्प महाविद्यालय, पटना के प्राचार्य को न कला इतिहास की समझ है और न ही वहां नियुक्त कला शिक्षकों को। ऐसी संकीर्ण मानसिकता और कम जानकारी वाले कला शिक्षाविद को किसी के भविष्य के साथ खिलवाड़ करने का क्या अधिकार है?

(टिप्‍पणीकार पटना आर्ट कॉलेज के छात्र रहे हैं)

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