इस देश के आदिवासियों की जिंदगी इतनी सस्‍ती क्‍यों है?

इन तमाम हत्‍याओं के उत्तरदायी आप हैं मिस्‍टर पी चिदंबरम

♦ ग्लैडसन डुंगडुंग

दिवासी प्रकृति के साथ ही जीते और प्रकृति के साथ ही मरते हैं। वे प्राकृतिक ईश्वर में विश्‍वास करते हैं। इसीलिए सभी अवसरों पर वे प्रकृति की पूजा करते हैं। आदिवासियों की अर्थव्यवस्था पूरी तरह से कृषि और वन पर निर्भर है। वह भी सर्वथा वर्षा पर आश्रित। इसीलिए खेती से पहले और बाद में ग्रामीण एकत्र होकर अपने प्राकृतिक ईश्वर की प्रार्थना करते हैं। इन आदिवासी समुदायों की सर्वथा सर्वसम्मति पर आधारित अपनी जनतांत्रिक व्यवस्था भी है, जो व्यवहारतः ग्रामीण आयोजनों में दिखती है। इसी क्रम में छत्तीसगढ़ के बीजापुर जिले के कोट्टागुडा गांव में कोट्टागुडा, सरकेगुडा और राजपेंटा के ग्रामीण दिनांक 28 जून 2012 को परंपरागत उत्सव बीजपेंडुम (बीजोत्सव) के आयोजन की योजना के मकसद से एकत्र हुए थे ताकि उत्सव आयोजित करने के बाद वे अपने खेतों में बीज बोना शुरू कर सकें, क्योंकि क्षेत्र में मौनसून आ चुका है।

दुर्भाग्यवश, उनमें से 17 लोगों के लिए अपनी तरह की यह आखिरी बैठक साबित हुई। क्षेत्र से माओवादियों के खात्मे के नाम पर तैनात सीआरपीएफ की कोब्रा बटालियन व छत्तीसगढ़ पुलिस ने ग्रामीणों को चारों तरफ से घेरकर उन्हें कोई संकेत दिये बगैर अंधाधुंध गोलियां चला दीं। फलस्वरूप उनमें से 16 को छाती, सिर और शरीर के दूसरे भागों पर गोलियां लगीं और घटनास्थल पर ही उन्होंने दम तोड़ दिया और एक को दूसरी सुबह क्रूरतापूर्वक मार डाला गया। सुरक्षाबलों ने 18 खूंखार माओवादियों को मौत के घाट उतारने का दावा किया है और इस मौके को उन्होंने नक्सलविरोधी अभियान की एक बड़ी कामयाबी के जश्न के रूप में मनाया। इसी तरह केंद्रीय गृहमंत्री पी चिदंबरम ने भी दावा किया कि सुरक्षाबलों ने छत्तीसगढ़ में शीर्ष नक्सल नेताओं को भून डाला और मुठभेड़ पर सवाल उठते ही उन्होंने सफाई देने की कोशिश की।

हालांकि, टीवी चैनलों और अखबारों में मुठभेड़ की ब्रेकिंग न्यूज चलने के साथ ही कहानी पूरी तरह से झूठी लगने लगी। तत्काल ही सभी के दिमाग में एक सवाल कौंध गया कि सीआरपीएफ कैंप से बमुश्किल तीन किमी की दूरी पर स्थित गांव में 18 शीर्ष माओवादी कैसे बैठक कर सकते हैं? अंततः बीजापुर मुठभेड़ की सचाई का खुलासा हो ही गया। छत्तीसगढ़ के आदिवासियों के खिलाफ राज्यपोषित अपराध की अथक रिपोर्टिंग करनेवाले जांबाज पत्रकार अमन सेठी के प्रयास से एक बार फिर सुरक्षाबल के शीर्ष अधिकारियों, छत्तीसगढ़ सरकार व केंद्रीय गृहमंत्री पी चिदंबरम की झूठ खुलकर सामने आ गयी। उनकी रिपोर्ट के अनुसार, सुरक्षाबलों ने ग्रामीणों की शांतिपूर्ण बैठक पर गोलियां दागी। 12-15 वर्ष के पांच बच्चों समेत 20 ग्रामीण मारे गये और चार लड़कियों के साथ बदसलूकी की गयी। खबर का सार यही था कि उस दिन उस गांव में कोई माओवादी नहीं था। आगामी बीजोत्सव को ले विचार-विमर्श के मद्देनजर सभी ग्रामीण एकत्र हुए थे।

तीन और चार जुलाई 2012 को जेपी राव, कोपा गुंजम और डॉ नंदिनी सुंदर के तीन सदस्यीय तथ्यान्वेषी दल द्वारा कोट्टागुडा, सरकेगुडा और लिंगागिरि गांवों के दौरे के बाद की रिपोर्ट ने और भी दहलानेवाले तथ्यों का खुलासा किया। रिपोर्ट के अनुसार इन गांवों पर 2005 में सलवा जुडुम द्वारा हमले हुए थे और तीनों गांवों के लगभग सभी घर फूंक दिये गये थे। फलस्वरूप सभी ग्रामीण आंध्रप्रदेश पलायन कर गये थे और वर्ष 2009 में ही फिर अपने गांव आ सके। सुरक्षाबलों ने दुबारा उन पर हमला कर सात नाबालिग समेत 17 लोगों को मार डाला। इसके अलावा 9 ग्रामीण जख्मी हुए और पांच महिलाओं के साथ मारपीट और बदसलूकी गयी।

पोल-पट्टी खुलने के बाद केंद्रीय गृहमंत्री और ऑपरेशन ग्रीन हंट के शिल्पकार पी चिदंबरम ने निर्दोष ग्रामीणों की हत्या पर गहरा शोक जताया। एक हठभरा सवाल रह जाता है कि 17 आदिवासियों की नृशंस हत्या पर खेद कह देना भर काफी है क्या? दूसरा, कि इस मामले में राजनीतिक दलों खासकर विपक्षी पार्टी भाजपा चुप क्यों है? क्या 17 निर्दोष गैर आदिवासियों की जघन्य हत्या पर वह ऐसा ही सलूक करती? कांग्रेस शासित राज्य में ऐसी ही घटना होने पर क्या भाजपा चुप रह जाती? बेगुनाह आदिवासियों के नरसंहार के लिए कौन जिम्मेवार है? क्या पी चिदंबरम इसके लिए जिम्मेवार नहीं हैं, जो क्षेत्र से माओवादियों के खात्मे के नाम पर वर्ष 2009 से सुरक्षाबलों की तैनाती करते रहे हैं?

सीआरपीएफ महानिदेशक विजय कुमार यह कह कर बेशर्मी से सुरक्षाबलों के आपराधिक कृत्य का औचित्य सिद्ध करते हैं कि यह जानना नामुमकिन था कि उस रात वे (सुरक्षा बल) गोलियां किन पर चला रहे थे। आगे वह कहते हैं कि वह क्षेत्र एक बड़ा ही रहस्यमय संसार है, जहां कौन नक्सल है और कौन नहीं, यह चिह्नित कर पाना नामुमकिन है। इसलिए यह सवाल उठाया जा सकता है कि उन ग्रामीणों को सुरक्षाबलों ने क्यों भूना, जिनको लेकर वे आश्वस्त नहीं थे कि वे कौन हैं? किसने उन्हें बेगुनाह ग्रामीणों पर गोली चलाने का हुक्म दिया? क्या सुरक्षाबल महज शक के बिना पर किसी पर भी गोली चला सकते हैं? घटना की जांच के लिए नियुक्त एसडीएम कुरुवंशी ग्रामीणों से पूछते हैं कि उन्होंने रात को बैठक क्यों की? वे (कुरुवंशी) गांव भी नहीं जाते हैं और अपने दफ्तर में ही ग्रामीणों को बुलाते हैं, जो स्पष्टतः इंगित करता है कि राज्य का इरादा न सिर्फ आदिवासियों को न्याय में देर करना है, बल्कि यह भी स्पष्ट है कि उनके खिलाफ राज्यपोषित अपराध जारी रहेगा।

तहलका की संपादक शोमा चौधरी ने अपने स्तंभ एडिटर कट में बेहद महत्वपूर्ण प्रश्न उठाया है कि बस्तर का जीवन इतना सस्ता क्यों है? इस सवाल का सीधा सादा जवाब है कि चूंकि भारतीय राज्य अमूमन यह विश्वास करता है कि देशभर में जंगल में रहनेवाले आदिवासी माओवादी या नक्सली हैं, जो कि निवेश के वातावरण के लिए सबसे बड़ी चुनौती हैं। भारत के अर्थशास्त्री प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह इसके नागरिकों के प्रति संवैधानिक दायित्व की अपेक्षा हमेशा ही निवेश के वातावरण को लेकर परेशान रहते हैं। दरअसल भारतीय राज्य ने किसी भी कीमत पर आदिवासी क्षेत्रों के संसाधनों पर कब्जा करना तय कर लिया है, जो कि भारत के महाशक्ति बनने का मार्ग प्रशस्त करेगा। इसीलिए विकास और प्रगति के नाम पर जल, जंगल, जमीन और अन्य संसाधन भारतीय राज्य को सौंपने से इनकार कर चुके आदिवासियों की हत्या करने के लिए वन क्षेत्रों में सुरक्षाबलों की तैनाती की गयी है।

हालांकि, जैसे ही हम फर्जी मुठभेड़ पर सवाल उठाते हैं, तो हम से प्रतिप्रश्न किया जाता है कि माओवादियों द्वारा सुरक्षाबलों की हत्या पर हम चुप क्यों रहते हैं? इस सवाल का जवाब दूसरे सवाल में मिल सकता है, जब गत साठ सालों में जिन जंगलों में वे नहीं पहुंच सके, तो उन जंगलों में अब भारतीय राज्य सुरक्षा बलों को क्यों भेज रहा है? क्या ग्रामीणों की सुरक्षा के लिए या फिर खनिज की लूट को आसान करने के लिए? यदि भारतीय जनता की सुरक्षा के लिए सुरक्षाबलों को वहां भेज जाता है, तो फिर वही सुरक्षा बल बेगुनाह ग्रामीणों की रक्षा के बजाय उनकी हत्या, उनका उत्पीड़न व महिलाओं से बलात्कार क्यों करता है? आखिर किसकी सुरक्षा के लिए वनों में सुरक्षा बल तैनात किये जाते हैं? क्या सच यह नहीं है कि वनक्षेत्रों में सुरक्षाबलों की तैनाती जनता को बचाने की बजाय कारपोरेट हित की रक्षा के लिए की जाती है?

बौद्धिक तर्क चाहे जो भी हों, लेकिन सच्‍चाई है कि वर्ष 2009 के बाद नक्सल-विरोधी अभियान के नाम पर देश भर में सैकड़ों बेगुनाह नागरिकों की हत्या की गयी है, लेकिन आज तक एक भी प्रमुख जांच नहीं बैठी। इसलिए कारपोरेट गृहमंत्री पी चिदंबरम को हर हाल में इस्तीफा दे देना चाहिए। इसलिए भी, क्योंकि छत्तीसगढ़ के कोट्टागुडा, सरकेगुडा और राजपेंटा के बेगुनाह 17 आदिवासियों समेत सभी बेगुनाह ग्रामीणों की जघन्य हत्या के एकमात्र जिम्मेवार वे ही हैं। पी चिदंबरम से सवाल पूछा जाना चाहिए कि 17 बेगुनाह लोगों की बेशकीमती जान ले लेने के बाद खेद भर कह देना काफी है क्या? क्या नक्सलविरोधी अभियान के नाम पर देश भर में हुए फर्जी मुठभेड़ों के मामलों में वे सीबीआई जांच करवाएंगे? और क्या बेगुनाह नागरिकों की हत्या करने के लिए वे शीर्ष सैन्य अधिकारियों को दंडित करेंगे या फिर इस जघन्य हत्या पर उत्सव मनाते रहने देंगे? याद कीजिए, चिदंबरम साहब डाइन आपके दरवाजे पर ही रुकेगी।

(ग्‍लैडसन डुंगडुंग। मानवाधिकार कार्यकर्ता, लेखक। उलगुलान का सौदा नाम की किताब से चर्चा में आये। आईआईएचआर, नयी दिल्‍ली से ह्यूमन राइट्स में पोस्‍ट ग्रैजुएट किया। नेशनल सेंटर फॉर एडवोकेसी स्‍टडीज, पुणे से इंटर्नशिप की। फिलहाल वो झारखंड इंडिजिनस पीपुल्‍स फोरम के संयोजक हैं। उनसे gladsonhractivist@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

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