किसकी “जादूई गोलियों” ने ली बिहार के कसाई की जान?

♦ नवल किशोर कुमार

ब्रह्मेश्‍वर मुखिया की हत्‍या के बाद बिहार में कई तरह की घटनाएं घटी हैं। पटना में जिस तरह रणवीर सेना के समर्थकों ने उत्‍पात मचाया, उससे सुशासन की पोल भी खुली लेकिन फारवर्ड प्रेस ने अपने जुलाई, 2012 अंक में जो रिपोर्ट छापी है, वह अलग ही कहानी कह रही है। इस रिपोर्ट के साथ मुखिया की जांच में शामिल अधिकारियों (व जांच के लिए गठित पांच सदस्‍यीय एसआइटी) की जाति की सूची भी पत्रिका ने छापी है। यह रिपोर्ट एक नये तेवर और नये अंदाज में कई नये सवाल खड़ी करती है। फारवर्ड प्रेस की कई रिपोर्टें अब इसके फेसबुक पेज पर भी आप पढ सकते हैं, fb/forward.press.india

रपिशाच नाम से कुख्यात रणवीर सेना के प्रमुख ब्रह्मेश्वर सिंह उर्फ ब्रह्मेश्वर मुखिया हत्याकांड मामला सुलझने के बजाय उलझता जा रहा है। इस मामले की जांच सीबीआई को सौंपी जा चुकी है, लेकिन चूंकि अभी तक यह मामला सीबीआई द्वारा स्वीकार नहीं किया गया है, इसलिए राज्य सरकार द्वारा गठित एसआईटी (स्पेशल इनवेस्टीगेशन टीम) मामले की जांच कर रही है। इस मामले में अब तक जो तथ्य जगजाहिर हुए हैं, उससे बिहार पुलिस भी कठघरे में खड़ी दिख रही है। हालांकि भोजपुर एसपी एमआर नायक का दावा है कि पूरा मामला दिन के उजाले की तरह साफ हो गया है। मूल विवाद एक जमीन पर कब्‍जे को लेकर था। हरेराम पांडेय, जो आरा शहर के सबसे पुराने रंगदार के रूप में जाने जाता है, के बेटे अभय पांडेय ने घटना के नौ दिन पहले ब्रह्मेश्वर मुखिया को जमीन के मामले में टांग न अड़ाने की बात कही थी। पुलिस का अनुमान है कि हत्या के बाद अभय नोएडा चला गया है और अब तक फरार है। अब तक हरे राम पांडे समेत तीन लोगों को गिरफ्तार किया गया है और उन्हें आरा जेल में रखा गया है।

बताते चलें कि एक जून 2012 को मुखिया की हत्या सुबह चार बजे कर दी गयी, जब नवादा पुलिस थाने के अंतर्गत आने वाले कातिरा मुहल्ले में वह रोजाना की अपनी सैर के लिए निकला था। स्थानीय निवासियों की आपसी बातों को सुनें तो मुखिया की हत्या करने वाले चार लोग थे। उनमें से एक गली के पहले मोड़ पर खड़ा होकर आने वालों पर निगाह रख रहा था। दो लोग मोटरसाइकिल पर सवार थे। जबकि एक के पास वह हथियार था और उसने गोलियां चलायी। वह लाल टी शर्ट पहने था। एक महिला ने बताया कि उस वक्त वह फूल तोड़ रही थी, जब उसने मुखिया जी के चिल्लाने की आवाज सुनी। महिला ने बताया कि उसने गोली चलने की आवाज नहीं सुनी।

दूसरी ओर, पुलिस और पोस्टमार्टम रिपोर्ट बताती है कि मुखिया की हत्या जिन गोलियों के कारण हुई, उनका साइज 7.36 बोर था। पोस्टमार्टम की रिपोर्ट यह भी बताती है कि मुखिया के शरीर से कोई गोली नहीं मिली। गोलियां उस जगह पर भी नहीं मिलीं, जहां मुखिया की हत्या हुई। अलबत्ता पुलिस को गोली के तीन खोखे अवश्य मिले हैं। लेकिन उसका बोर साइज 6.75 बताया गया है न कि 7.36 बोर। इसके अलावा, एक स्वचालित गन की पूरी मैगजीन घटनास्थल पर कथित तौर पर बरामद हुई है।

पोस्टमार्टम कक्ष में उच्च पुलिस अधिकारी?

बिहार पुलिस द्वारा गठित एसआईटी का नेतृत्व कर रहे शाहाबाद रेंज (जिसमें भोजपुर, बक्सर और कैमूर जिले शामिल हैं) के डीआईजी अजिताभ कुमार ने इस बात की पुष्टि 23 जून 2012 को फारवर्ड प्रेस के साथ फोन पर हुई बातचीत में की कि मुखिया के शरीर में गोली के प्रविष्‍ट होने के 6 सूराख और बाहर निकलने के 6 सूराख थे। इसका मतलब यह हुआ कि मुखिया को 6 गोलियां लगीं और सभी उसके शरीर को पार कर बाहर निकल गयीं।

अगर इस तथ्य को सच मान भी लिया जाए तो सवाल यही उठता है कि आखिर गोलियां गयी कहां? जो गोलियां शरीर के अंदर से होकर बाहर जाती हैं, उनमें कोई गति नहीं रहती और वे आमतौर पर घटनास्थल पर ही मिल जाती हैं। क्या जिन गोलियों ने मुखिया की जान ली, वे “मैजिक” गोलियां थीं, जो बंदूक से निकलने के बाद मुखिया कि हत्या करने के बाद गायब हो गयीं?

सबसे बड़ा सवाल यह कि जब मुखिया के शरीर का अंत्यपरीक्षण किया जा रहा था, तब अजिताभ कुमार वहां क्या कर रहे थे? जाहिर तौर पर पोस्टमार्टम कक्ष में डाक्टरों के साथ उनकी उपस्थिति पूरे मामले को संदेहास्पद बनाती है और बिहार पुलिस को कठघरे में खड़ा करता है।

इस संबंध में सूबे के डीजीपी अभयानंद ने फारवर्ड प्रेस को बताया कि चूंकि मामला बहुत संगीन था और पोस्टमार्टम में विलंब न हो, इसके लिए अजिताभ ने डाक्टरों से औपचारिक बात की थी और वह बैठक बंद कमरे में नहीं हुई थी। वहीं इसी मामले में शाहाबाद रेंज के डीआईजी और एसआईटी का नेतृत्व कर रहे अजिताभ कुमार ने बताया कि उन्होंने डाक्टरों के साथ कोई मुलाकात नहीं की। जबकि पटना से प्रकाशित समाचार पत्रों के अनुसार अजिताभ कुमार पोस्टमार्टम की पूरी प्रक्रिया के दौरान आरा सदर अस्पताल के पोस्टमार्टम चैंबर में मौजूद थे। जाहिर तौर पर यदि समाचार पत्रों में प्रकाशित रिपोर्ट सही है, तो यह सवाल उठना लाजमी है कि बिहार पुलिस के इतने आला आफिसर की इस पोस्टतमार्टम में क्‍या दिलचस्पी थी? हम आशा करेंगे कि उनके इरादे कुछ भी रहे हों, यह दो आला अधिकारी कम से कम एक बात तो करें।

उंगली पांडे परिवार की ओर

अब यदि पूरे घटनाक्रम पर निगाह डालें तो मुखिया के परिजनों ने सबसे पहले हत्या के मामले में जदयू के बाहुबली विधायक नरेंद्र कुमार पांडे उर्फ सुनील पांडे पर शक जाहिर किया था। पुलिस ने भी अपनी जांच की शुरुआत इसी बाहुबली को केंद्र में रखकर की थी। इनके पटना स्थित सरकारी आवास पर छापा मारकर इनके निजी ड्राइवर को गिरफ्तार किया गया था। इसके अलावा इनके भाई हुलास पांडे, जो विधान परिषद में निर्दलीय सदस्य हैं, को हिरासत में लेकर दो दिनों तक उनसे पूछताछ की गयी और बाद में उन्हें छोड़ दिया गया।

क्या सचमुच इस हत्या में सुनील पांडे की भूमिका थी? वैसे ब्रह्मेश्वर मुखिया और सुनील पांडे के बीच अदावत बहुत पुरानी है। जानकार बताते हैं कि वर्ष 1993 में एक ईंट भट्टा के मालिक की हत्या के बाद ब्रह्मेश्वर मुखिया और सुनील पांडे क बीच खूनी जंग शुरू हुई। 10 जनवरी 1997 को भोजपुर के तरारी प्रखंड के बागर गांव में ब्रह्मेश्वर मुखिया गुट ने तीन लोगों की हत्या कर दी। इस घटना में मरने वाले सभी भूमिहार थे और इनमें एक महिला भी थी, जो सुनील पांडेय की करीबी रिश्तेदार थी। मु‍खिया के परिजन इस बात की भी पुष्टि करते हैं कि ब्रह्मेश्वर मुखिया की हत्या की मूल वजह कम से कम जमीन पर कब्जा या फिर हरे राम पांडेय जैसे छुटभैये गुंडे के साथ आपसी वर्चस्व नहीं हो सकती। न ही यह हत्या रणवीर सेना के बैंक खाते में पड़े 62 करोड़ रुपये और हजारों आग्नेयास्त्रों के लिए ही हुई।

मु‍खिया के परिजनों की बातों की उपेक्षा भी कर दें, तो भी तथ्य कुछ और ही इशारा करते हैं। क्योंकि यह तो साफ हो ही चुका है चरमपंथी वामगुटों ने मुखिया की हत्या नहीं की है। सभी वाम गुट अखबारों में इस बारे में अपनी सफाई दे चुके हैं।

हत्या की राजनीति

ब्रह्मेश्वर सिंह चुनाव लड़ने की तैयारी कर रहा था। इसके लिए उसने प्रतिबंधित रणवीर सेना से जुड़े संगठन राष्ट्रवादी किसान संगठन को फिर से जीवित करना शुरू कर दिया था। उनकी नजर वर्ष 2014 में होने वाले लोकसभा चुनाव पर थी। वह बिहार में सत्ताधारी एनडीए के साथ रहकर चुनावी राजनीति करना चाहता था। लेकिन बथानी टोला नरसंहार मामले में पटना हाईकोर्ट के फैसले के विरोध में राज्य सरकार द्वारा सुप्रीम कोर्ट जाने की बात को लेकर एनडीए से नाराज हो गया था। उसके बाद आरा, गया, औरंगाबाद, पटना और भोजपुर के अनेक स्थानों पर राष्ट्रवादी किसान संगठन के बैनर तेल जनसभाओं को संबोधित करने के दौरान उसने सरकार के खिलाफ आवाज उठानी शुरू कर दी थी। मुखिया के पक्ष में अदालती लड़ाई लड़ने वाले अधिवक्ता रामनिवास शर्मा की मानें, तो मुखिया की हत्या की वजह यह भी हो सकती है।

पोस्टमार्टम रिपोर्ट की ओर दुबारा मुड़ें, तो डाक्टरों ने पाया कि मुखिया को 7.36 बोर की 6 गोलियां मारी गयीं। इस बोर की गोली आमतौर पर स्वचालित मशीनगन में इस्तेमाल होती हैं, जिसे जनरल परपस मशीनगन भी कहा जाता है। भारत में यह हथियार या तो भारतीय सेना के पास होता है या फिर खुफिया विभाग के पास। क्या ये तथ्य इस संभावना की ओर संकेत करते हैं कि बिहार पुलिस की स्पेशल टास्क फोर्स (एसटीएफ) जो ‘एनकाउंटर स्पेशलिस्ट’ के नाम से कुख्यात है, का एक बूढ़े लेकिन परेशान करने वाले व्यक्ति की बहुत ही पेशेवराना ढंग से हत्या करने में किसी प्रकार का हाथ है?

बहरहाल, मुखिया मारा जा चुका है और इसके बाद रणवीर सेना के नये सुप्रीमो का चुनाव कर लिया गया है। परिवारवाद की तर्ज पर रणवीर सेना के जांबाजों ने मुखिया के बेटे इंदूभूषण सिंह को अपना नया सरगना चुन लिया है। राजधानी पटना के राजनीतिक गलियारे में रणवीर सेना यानी मुखिया के शब्दों में ‘अखिल भारतीय किसान संगठन’ का विलय जनता दल यूनाटेड (जदयू) में होने की चर्चा जोरों पर है। हालांकि इस संबंध में भाजपा ने अपना प्रयास नहीं छोड़ा है। प्रदेश भाजपा के कार्यकारी अध्यक्ष डा सीपी ठाकुर इस मामले में खुद निगाह रख रहे हैं। मामला आखिरकार भूमिहारों का है, जो अगर आपके साथ नहीं है, तो आपकी आंख की किरकिरी बन सकते हैं।

अब देखना यह है कि सैंकड़ों दलितों, पिछड़ों और अल्पसंख्यकों की हत्या करने के आरोपी ब्रह्मेश्वर मुखिया की हत्या किसकी जादुई गोलियों ने की? फिलहाल जो संकेत मिल रहे हैं, उनसे बिहार सरकार और पुलिस की भूमिका जवाबों के बजाय सवाल खड़े करने वाली अधिक लग रही है। उम्मीद करनी चा‍हिए कि असलियत सीबीआई जांच के दौरान छन-छन कर सामने आएगी। वैसे इस मामले में सब कुछ कभी न कभी दिन के उजाले की तरह साफ हो जाएगा, यह संदिग्ध ही है। या फिर जिन ‘जादुई’ गोलियों ने ‘बिहार के कसाई’ को मार गिराया, उन्‍हें प्रकट करने के लिए किसी जादूगर की जरूरत पड़ेगी।


(नवल किशोर कुमार। बिहार की पत्रकारिता में युवा सजग चेहरा। प्रतिरोध की खबरों के संयोजक। फॉरवर्ड प्रेस से संवाददाता सह उपसंपादक के तौर पर जुड़े हैं। उनसे editor@apnabihar.org पर संपर्क किया जा सकता है।)

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