बिहार रंगमंच में बाबाओं का अवतार और ‘किरपा’ की बारिश

♦ अश्विनी कुमार पंकज

बिहार की रंग संस्थाओं और रंगकर्मियों पर भारत सरकार के संस्कृति मंत्रालय द्वारा इस वर्ष जिस तरह से ‘किरपा’ बरसी है, वह हैरत में डालने से ज्यादा थिएटर में ‘निर्मल बाबाओं’ के अवतारों की नयी कहानियां कहती हैं। बिहार के एक खास क्षेत्र और एक नामीगिरामी रंगकर्मी के ग्रुप के लोगों पर ही जब सरकारी ग्रांटों की ‘किरपा’ बरसे, तो थिएटर के उन निर्मल बाबाओं की शिनाख्त जरूरी हो जाती है, जो किरपा के नियंत्रक ठेकेदार बने हुए हैं। आप सबको मालूम ही होगा कि रंगमंच और प्रदर्श्यकारी कलाओं के विकास के लिए भारत सरकार का संस्कृति मंत्रालय कई तरह के ग्रांट देता है। इनमें दो प्रमुख ग्रांट हैं – सैलरी ग्रांट और प्रोडक्शन ग्रांट।

जून 2012 में मंत्रालय की एक्सपर्ट कमिटी ने बिहार की जिन संस्थाओं और रंगकर्मियों को यह ग्रांट दिया है, उसके अवलोकन से न सिर्फ एक-दो खास ग्रुप के वर्चस्व का पता चलता है बल्कि इसके भी संकेत मिलते हैं कि बिहार के थिएटर पर समाज के अन्य आयामों की ही तरह ही दबंग जातियों का कब्जा बरकरार है।

सबसे पहले बात करते हैं सैलरी ग्रांट की। सैलरी ग्रांट के तहत एक गुरु को प्रति माह 10,000 रु और कलाकारों को प्रति माह 6,000 रु की राशि का प्रावधान है। मौजूदा वित्तीय वर्ष में जिन संस्थाओं का सैलरी ग्रांट के लिए नवीनीकरण हुआ है, उनमें राजधानी पटना के बाद बेगूसराय ऐसा जिला है, जहां मासिक वेतन पाने वाले 47 रंगकर्मी हैं। पटना में यह संख्या 70 है। भोजपुर और मगध का क्षेत्र संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार की कृपा से बाहर है और यहां एक भी सांस्कृतिक/नाट्य संस्थान ऐसा नहीं है, जिसे केंद्र सरकार की सैलरी ग्रांट मिल रही हो। सैलरी ग्रांट पटना के सूत्रधार-खगौल (10), निर्माण कला मंच (23), शौर्य (13), प्रांगण कल्चरल ऑर्गनाइजेशन (11), मंथन कला परिषद (7) और प्रयास (6) संस्थाओं को पहले से मिल रहा है, जिन्हें वर्ष 2012-13 में भी जारी रखने की स्वीकृति संस्कृति मंत्रालय ने दी है। इसी तरह बेगूसराय दूसरा जिला है, जहां चार संस्थाओं आशीर्वाद रंगमंडल (16), आहूति नाट्य एकेडमी (11), सांस्कृतिक विकास केंद्र (9) और द फैक्ट आर्ट एंड कल्चरल सोसायटी (11) को मंत्रालय की सहायता मिल रही है। इनके अतिरिक्त फारबिसगंज की माटी (18), पूर्णिया के शकुंतला सेवा सदन (6) एवं भरत नाट्य कला केंद्र (11), अररिया के जागृति नाट्य कला केंद्र (11), समस्तीपुर के लोक कला विकास संस्थान (3) और मुजफ्फरपुर के सुरंगमा कला केंद्र (13) को इस वर्ष भी सैलरी ग्रांट नियमित की गयी है। वित्तीय वर्ष 2012-13 में सैलरी ग्रांट पाने वाली नयी संस्थाएं हैं – डिवाइन सोशल डेवलपमेंट ऑर्गनाइजेशन (5), और रागा एन एसोसिएशन ऑफ आर्ट, एजुकेशन एंड सोशल वेलफेयर (7), पटना एवं बेगूसराय की संस्था नवोदित (2)। सबसे ज्यादा कलाकारों के लिए सैलरी ग्रांट पाने वाली संस्थाएं हैं – निर्माण कला मंच, पटना (23), माटी, फारबिसगंज (18) और आशीर्वाद रंगमंडल, बेगूसराय (16)। (स्रोतः संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार का पत्रांक F.10-02/2011-P। Arts(Vol-III) ) जो बिहार के रंगकर्मी हैं, वे आसानी से इस सूची में उस खास ग्रुप को पहचान सकते हैं।

भौगोलिक एवं सांस्कृतिक नजरिये से देखें, तो सैलरी ग्रांट बिहार के पांच उत्तरी जिलों में ही सबसे ज्यादा जा रहा है। कुल 194 में से सैलरी ग्रांट पाने वाले 99 कलाकार बेगूसराय, पूर्णिया, फारबिसगंज, अररिया और समस्तीपुर से हैं। भोजपुर और मगध (पटना छोड़कर) पूरी तरह से इस लाभ से वंचित है। जबकि मगध और भोजपुर का रंगकर्म अपनी रंगपरंपरा के लिए विख्यात है।

इसी तरह वर्ष 2012-13 के लिए प्रोडक्शन ग्रांट पाने वाले 29 में से सात ग्रांटी अकेले बेगूसराय जिले के हैं। इनमें सबसे अधिक प्रोडक्शन राशि 4,50,000 रु निर्माण कला मंच, पटना को ‘कंपनी उस्ताद’ के लिए मिली है, जबकि अन्य सभी को एक से 3,50,000 तक की प्रोडक्शन ग्रांट की मंजूरी हुई है। ध्यान देने वाली बात यह भी है कि निर्माण कला मंच ने अपने ही कलाकार बनफूल नायक, सिमडेगा (झारखंड) के नाम से दो लाख (‘धरती आबा’ के लिए) और शारदा सिंह, पटना के नाम से (‘आषाढ़ का एक दिन’ के लिए) 3,50,000 रुपये की व्यक्तिगत ग्रांट ली है। पिछले वित्तीय वर्ष 2011-12 में भी पटना के जिन चार लोगों को प्रोडक्शन ग्रांट मिला था, उसमें पटना के सुमन कुमार (हिरावल) को तीन लाख (बासी खबर), डिवाइन सोशल डेवलपमेंट ऑर्गनाइजेशन को दो लाख (मेहरारून के दुर्दसा), निर्माण कला मंच (बटोही) को तीन लाख और संजय उपाध्याय (गगन दमामा बाज्यो) को पांच लाख शामिल हैं। (स्रोतः संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार का पत्रांक F.10-02/2011-P.Arts )

आपसब पूरी लिस्ट देखें और बताएं कि बिहार में प्रोडक्शन ग्रांट पाने वाले ये 29 रंगकर्मी और संस्थाएं वाकई में 29 हैं या फिर कुल मिलाकर यह एक-दो ग्रुप ही है।

इसलिए कोई अगर यह कहता है कि भोजपुर, मगध या बिहार के अन्य रंगकर्मियों व नाट्य संस्थाओं ने ग्रांट पाने के लिए आवेदन ही नहीं किया होगा, या वे पात्रता ही नहीं पूरी करते होंगे, तो यह बात समझ से परे है। ग्रांट पाने वालों में जरूर कुछ व्यक्ति और संस्थाएं इस ग्रुपिज्म से बाहर होंगे, इससे इनकार नहीं है। कई ग्रांट से बेहतर काम भी कर रहे होंगे, पर हकीकत यही है कि ग्रांट पानेवाले कलाकारों में अधिकांश तक ‘किरपा’ उसी तरह से पहुंचती होगी, जैसे इस देश में विकास का पैसा अंतिम आदमी तक पहुंचता है। फिर किरपा पाने के लिए निर्मल बाबाओं को कुछ ‘भेंट’ भी चढ़ाना ही होता होगा।

आप सभी के अवलोकन के लिए वर्ष 2012-13 के लिए संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा विभिन्न योजनाओं के अंतर्गत स्वीकृत ग्रांट सूची का लिंक यहां डाल रहे हैं ताकि आप अपने-अपने राज्यों व जिलों में थिएटर के लिए अनुदान पाने वालों व्यक्तियों व संस्थाओं को जान सकें। थिएटर के निर्मल बाबाओं की शिनाख्त करते हुए ग्रांट की ‘ग्रांड पॉलटिक्स’ और बिहार के रंगमंच पर काबिज जातिगत दबंगई को समझ सकें।

(अश्विनी कुमार पंकज। वरिष्‍ठ पत्रकार। झारखंड के विभिन्‍न जनांदोलनों से जुड़ाव। रांची से निकलने वाली संताली पत्रिका जोहार सहिया के संपादक। इंटरनेट पत्रिका अखड़ा की टीम के सदस्‍य। वे रंगमंच पर केंद्रित रंगवार्ता नाम की एक पत्रिका का संपादन भी कर रहे हैं। इन दिनों आलोचना की एक पुस्‍तक आदिवासी सौंदर्यशास्‍त्र लिख रहे हैं। उनसे akpankaj@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

You may also like...

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *