मैं एक भारतीय आदिवासी हूं, क्‍या मेरी कोई इज्‍जत नहीं है?

सुप्रीम कोर्ट की दया का बदला सरकार सोनी सोरी से ले रही है

♦ हिमांशु कुमार

सोनी सोरी के पत्र के दोनों हिस्‍सों पर क्लिक करके आप साफ-साफ इसका मजमून पढ़ सकते हैं।

सोनी सोरी ने जेल से सुप्रीम कोर्ट के नाम 27 जुलाई को भेजे गये अपने पत्र में कहा है कि ‘आज जीवित हूं तो आपके आदेश की वजह से। आपने सही समय पर आदेश देकर मेरा दोबारा इलाज कराया। … एम्स अस्पताल दिल्ली में इलाज के दौरान बहुत ही खुश थी कि मेरा इलाज इतने अच्छे से हो रहा है। पर जज साहब, आज उसकी कीमत चुकानी पड़ रही है। मुझ पर शर्मनाक अत्याचार और प्रताड़ना की जा रही है। आपसे निवेदन है, मुझ पर दया कीजियेगा। … जज साहब इस वक्‍त मानसिक रूप से अत्यधिक पीड़ित हूं।

(1) मुझे नंगा कर के जमीन पर बिठाया जाता है।
(2) भूख से पीड़ित किया जा रहा है।
(3) मेरे अंगों को छूकर तलाशी ली जाती है।

जज साहब, छतीसगढ़ सरकार, पुलिस प्रशासन मेरे कपड़े कब तक उतरवाते रहेंगे? मैं भी एक भारतीय आदिवासी महिला हूं। मुझमें भी शर्म है। मुझे शर्म लगती है। मैं अपनी लज्जा को बचा नहीं पा रही हूं। शर्मनाक शब्द कह कर मेरी लज्जा पर आरोप लगाते हैं। जज साहब मुझ पर अत्याचार, जुल्म में आज भी कमी नहीं है। आखिर मैंने ऐसा क्या गुनाह किया, जो जुल्म पर जुल्म कर रहे हैं? जज साहब मैंने आप तक अपनी सच्चाई को बयान किया तो क्या गलत किया, जो आज इतनी बड़ी-बड़ी मानसिक प्रताड़ना दी जा रही है? क्या अपने ऊपर हुए जुल्म अत्याचार के खिलाफ लड़ना अपराध है? क्या मुझे जीने का हक नहीं है? क्या जिन बच्चों को मैंने जन्म दिया, उन्हें प्यार देने का अधिकार नहीं है?

सोनी का यह पत्र हम सब के लिए एक चेतावनी है कि कैसे एक सरकार अपने खिलाफ कोर्ट के किसी फैसले का बदला जेल में बंद किसी पर जुल्म कर के ले सकती है। सरकार साफ धमकी दे रही है कि जाओ तुम कोर्ट। ले आओ आदेश हमारे खिलाफ। कितनी बार जाओगे कोर्ट?

सोनी पर यह जुल्म सोनी के अपने किसी अपराध के लिए नहीं किये जा रहे। सोनी पर ये जुल्म सामाजिक कार्यकर्ताओं से उसके संबंधों के कारण किये जा रहे हैं। सामाजिक कार्यकर्ताओं द्वारा छत्तीसगढ़ सरकार के आपराधिक कारनामों को उजागर करने की सजा के रूप में सोनी पर ये अत्याचार किये जा रहे हैं। सोनी सामाजिक कार्यकर्ताओं के किये की सजा भुगत रही है। हम बाहर जितना बोलेंगे, जेल में सोनी पर उतने ही जुल्म बढ़ते जाएंगे।

सोनी को थाने में पीटते समय और बिजली के झटके देते समय एसपी अंकित गर्ग सोनी से यही तो जिद कर रहा था कि सोनी एक झूठा कबूलनामा लिख कर दे दे, जिसमें वो यह लिखे कि अरुंधती राय, स्वामी अग्निवेश, कविता श्रीवास्तव, नंदिनी सुंदर, हिमांशु कुमार, मनीष कुंजाम और उसका वकील सब नक्सली हैं। ताकि इन सभी सामाजिक कार्यकर्ताओं को एक झटके में जेल में डाला जा सके।

सरकार मानती है कि ये सामाजिक कार्यकर्ता छत्तीसगढ़ में आदिवासियों की जमीनों पर कंपनियों का कब्जा नहीं होने दे रहे हैं। इसलिए एक बार अगर इन सामाजिक कार्यकर्ताओं को झूठे मामलों में जेल में डाल दिया जाए, तो छत्तीसगढ़ में आदिवासियों पर सरकारी फौजों के हमलों पर आवाज उठाने वाला कोई नहीं बचेगा। फिर आराम से बस्तर की आदिवासियों की जमीने कंपनियों को बेच कर पैसा कमा सकेंगे।

कोई तो बचाओ इस लड़की को। संसद, सुप्रीम कोर्ट, टीवी और अखबारों के दफ्तर हमारे सामने हैं। और हमारे वक्‍त में ही एक जिंदा इंसान को तिल-तिल कर हमें चिढ़ा-चिढ़ा कर मारा जा रहा है। और सारा देश लोकतंत्र का जश्न मनाते हुए ये सब देख रहा है।

शरीर के एक हिस्से की तकलीफ अगर दूसरे हिस्से को नहीं हो रही है, तो ये शरीर के बीमार होने का लक्षण है। एक सभ्य समाज ऐसा नहीं होता। मैं इसे एक राष्ट्र कैसे मानूं? लगता है हमारा राष्ट्र दूसरा है और सोनी सोरी का दूसरा। नक्सलियों से लड़ कर अपने स्कूल पर फहराये गये काले झंडे को उतार कर तिरंगा फहराने वाली उस आदिवासी लड़की को जेल में नंगा किया जा रहा है और उसे नंगा करने वाले पंद्रह अगस्त को हमें लोकतंत्र का उपदेश देंगे।

दंतेवाड़ा वाणी से कॉपी-पेस्‍ट

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