‘औरत के नजरिये से’ कुछ और भी कहना जरूरी है! #Hindi

♦ उदभ्रांत

यह लेख कथादेश में छपे उदभ्रांत के संपादित अंश का संपूर्णांश है। लेखक ने इस लेख की भूमिका में जो भी लिखा है, यह उनके अपने आग्रह और उनकी अपनी समझ है। इसे कथादेश से मोहल्‍ला लाइव के रिश्‍तों के मद्देनजर न देखा जाए, जैसी कि हिंदी में देखने की परंपरा बन गयी है। कथादेश हिंदी की निर्विवादित साहित्यिक पत्रिका है, जिसकी निष्‍ठा साहित्‍य की शिल्‍पगत बहसों से अधिक सामाजिक सरोकारों में अधिक जान पड़ती है। हम आगे शालिनी माथुर, आशुतोष, अनामिका, दीप्ति गुप्‍ता और अर्चना वर्मा के लेख भी प्रकाशित करेंगे। फिलहाल आप उदभ्रांत विचारों को पढ़ें : मॉडरेटर

प्रिय महोदय,

‘कथादेश’ के जून, 2012 अंक में प्रकाशित सुश्री शालिनी माथुर के स्त्री विमर्श संबंधी स्तंभ ‘औरत के नजरिये से’ कुछ और भी कहना जरूरी है’ में पवन करण और अनामिका की दो कविताओं का साहसिक विश्‍लेषण करने वाला आलेख ‘व्याधि पर कविता या कविता की व्याधि’ में आये मुद्दों के संदर्भों में 13 जून, 2012 को संपादक से बात करते हुए मैंने बहस को आगे बढ़ाने की जरूरत महसूस की थी और पूछा था कि अगर उनके मन में मेरे लिए कोई पूर्वग्रह न हो, तो मैं उसमें शरीक होना चाहूंगा। संपादक के यह कहने पर कि कोई पूर्वग्रह नहीं है, मैंने पूछा था जुलाई, 2012 के अंक के लिए आलेख कब तक लिया जा सकता है? उन्होंने 15 जून, 2012 निश्चित तिथि बतायी थी। मैंने 15 जून, 2012 को ही अपना आलेख ‘औरत के नजरिये से’ कुछ और भी कहना जरूरी है’ संपादक और लेखिका शालिनी माथुर को ई-मेल द्वारा भिजवा दिया था, इसके बावजूद जुलाई, 2012 के अंक में उसे नहीं छापा गया। शायद कवियों का ‘कार्टेल’ बचाव हेतु पर्याप्त समय चाहता था, यह सिद्ध हो गया पत्रिका के अगस्त, 2012 के अंक को देखकर, जिसमें अर्चना वर्मा का 5 पृष्‍ठों का ‘प्रसंगवश’, अनामिका का 4 पृष्‍ठों का ‘बहस में उतरा आलेख’ जिसमें दोनों संदर्भित कविताओं का अकारण पुनर्मुद्रण-पुनर्पाठ के बहाने किया गया है – तो शामिल है, मगर मेरे लेख को आधे से अधिक काटकर सिर्फ डेढ़ पृष्‍ठों में सीमित कर दिया। मेरे लेख के संबंधित हिस्सों में इस ‘कार्टेल’ को तर्कसम्मत ढंग से बेनकाब किया गया था और शालिनी माथुर के लेख में आये मुद्दों को बिंदुवार विवेचित किया गया है।

यह संपादक और ‘कार्टेल’ की मिलीभगत से ही संभव हो सकता था, जो संपादकीय नैतिकता के खिलाफ है। (वैसे तो अपने प्रतिवाद में अनामिका ने साफ लिखा ही है कि ‘नैतिकता का ठेका तो, आप लें ही मत!)। मैंने इस संबंध में संपादक को कल 6 अगस्त, 2012 को यह एसएमएस किया – ‘पहले अपना कमिटमेंट भंग करते हुए एक माह डिले किया ताकि उसे पढ़कर कवि और उनके ‘कार्टेल’ को डिफेंस के लिए समय मिल जाए, फिर भी दिल नहीं भरा तो टू दि पॉइंट लेख को आधे से ज्‍यादा काटकर क्या सिद्ध किया? संपादन की कमजोरी, परामर्शदाता का वर्चस्व या मेरे वो वास्तविक पूर्वग्रह जिसके बारे में मेरे पूछने पर इनकार किया था! मुझे उम्मीद है कि लेख का अप्रकाशित हिस्सा अगले अंक में देकर संपादकीय के अनुरूप चलने का साहस दिखाएंगे और अपनी एतद्विशेयक सहमति मुझे एसएमएस या फोन के जरिये अभी सूचित करेंगे।

धन्यवाद,
उद्भ्रांत

एसएमएस और फोन से कोई उत्तर न मिलने का अर्थ स्‍पष्‍ट है। अब मैं विवश हूं अपने मित्रों से अनुरोध करने के लिए कि इस रोशनी में मेरे संपूर्ण लेख को अपनी पत्रिका, ब्लॉग, वेब मैगजीन में स्थान दें ताकि पाठकों को ऐसे कवियों और उनके ‘कार्टेल’ की सही जानकारी मिल सके।

इस आशय का एसएमएस मैंने कल ही लेखिका सुश्री शालिनी माथुर को भी किया है। जो इस प्रकार है – ‘गलत मुद्दे पर रंगे हाथों पकड़े जाने के बावजूद ये लोग सारी लाज-शर्म छोड़ कर एक सुनिश्चित और हारी हुई लड़ाई के द्वारा अपनी फेससेविंग हास्यास्पद् कोशिश करते डरे हुए लोग हैं, जिनसे सहानुभूति भी प्रकट नहीं की जा सकती! मेरे टू दि पॉइंट लेख को एक माह डिले कराकर और आधा डिलीट कराकर इन्होंने इनडाइरेक्टली जघन्य अपराध का प्रमाण दे दिया है। आपसे अनुरोध है कि मेरे इस एसएमएस के साथ मेरे संपूर्ण लेख को अपने और मित्रों के ब्लॉगस या वेब मैगजीन अविलंब जारी कराएं ताकि पाठकों को सत्य का पता लग सके।

धन्यवाद,
उद्भ्रांत

आशा है आप तुरंत समुचित कार्रवाई करने की कृपा करेंगे।
सधन्यवाद!
आपका
उद्भ्रांत

थादेश का जून, 2012 का अंक। ‘औरत के नजरिये से’ स्तंभ में ‘व्याधि पर कविता या कविता की व्याधि’ नामक लेख में शालिनी माथुर ने पवन करण की कविता ‘स्तन’ और अनामिका की ‘ब्रेस्ट कैंसर’ को सटीक विश्‍लेषण के ऑपरेशन थिएटर में बुद्धि की मेज पर रख अपने अचूक तर्कों के पैने औजारों की मदद से दोनों कविताओं के रोगग्रस्त अंग/अंगों – उपमानों/रूपकों – की सफल शल्यक्रिया कर दी है। इस जटिल और संवेदनशील ऑपरेशन के दौरान उन्होंने सूसन सोंटैग, जॉन स्टुअर्ट मिल, मैरी वोल्सटन क्राफ्ट, एड्रियन रिच, मार्क ट्वेन, कीट्स, सूसन ग्रिफिन, नाओमी वुल्‍फ, सिल्विया प्लॉथ – उनकी कवयित्री बेटी फ्रीडा हयूज जैसी विदेशी कवियों-लेखकों, चिंतकों, नारीवाद समर्थकों और अश्‍लीलता के आरोप में मुकदमों का सामना कर चुके कथाकार मंटो के साथ कैंसर की ही शिकार हुई और पिछले दिनों बिग बॉस सीरियल से हिंदुस्तान में भी चर्चित ब्रिटिश अभिनेत्री जेड गुडी की जीवनगत स्थितियों, विचारों, कविताओं और मृत्युलेख तक के हवालों तक की भी विशेषज्ञ (स्‍पेशलिस्‍ट) मदद ली है।

यहां दूसरा रूपक एक अदालत का भी हो सकता है, जिसमें जनता (हिंदी के सजग पाठक) की अध्यक्षता वाली स्‍पेशल बेंच के सामने, दोनों कवियों द्वारा स्त्रियों के असाध्य रोग के निवारणार्थ हुई शल्य चिकित्सा के बाद उनके ऐम्प्यूटेड अंगों को माध्यम बनाकर की गयी क्रूर अभिव्यक्तियों को ‘नारीवादी काव्य’ कहने के अक्षम्य अपराध का मिनट-दर-मिनट ब्यौरा देते हुए और उपर्युक्त शख्सियतों के प्रमाण-वचनों के साक्ष्य में धुआंधार बहस करते हुए अंतत: माननीय न्यायाधीशों से ऐसे दुर्दांत अपराधियों को कठोरतम दंड देने की मौन अपेक्षा की गयी है। चूंकि इन कविताओं में भी स्त्री की असाध्य व्याधि और उसके परिणाम को नकारात्मक रूपक में बांधा गया, ऑपरेशन थिएटर और अदालत के ये रूपक अनायास मन में कौंध गये।

यह तो रूपकों की बात हुई, जिसके अंतर्गत कहा जा सकता है कि शालिनी माथुर ने कुशल चिकित्सक की तरह शल्यक्रिया को अंजाम दिया या एक जाने-माने वकील की तरह व्याधिग्रस्त स्त्रियों या ऐम्प्यूटेड अंगों को पर्सोनीफाई करते हुए उनकी ओर से वेदना या स्थितियों का गर्हित मजाक न बनने देने के लिए सफल बहस की। अब बहस को उसकी वास्तविकता में देखा जाय।

संदर्भित कविताओं के काव्‍यांशों को बार-बार उद्धृत कर बारी-बारी से उनकी सूक्ष्म पड़ताल करते हुए शालिनी ने संबंधित कवियों को मौत की भयावहता का प्रतिक्षण सामना कर रहे रोगियों के दुख से आनंदित न होने, पोर्नोग्राफी से बचने और कवियोचित संवेदना के साथ परकाया प्रवेश की सिद्धि पाने की परोक्ष सलाह दी है।

पहले पोर्नोग्राफी को लें।

पोर्नोग्राफर मानसिक रुग्णता से ग्रस्त व्यक्ति है। उसकी आत्मा मर चुकी होती है और वह करुण अथवा वीभत्स स्थितियों तक में मानसिक व्यभिचार में लिप्त रहता है। साहित्यकार भी अपनी कृतियों में कथा की मांग के अनुरूप ऐसे पात्रों, स्थितियों का सृजन करता है जिस कारण उस पर अश्‍लील लेखन के आरोप लगते रहे हैं। मंटो का उल्लेख यहां आया है जिनकी कृतियों पर बिना गहराई से विचार किये अश्‍लीलता का आरोप लगा और उन्हें मुकदमों तक का सामना करना पड़ा। पिछली सदी में यशपाल, जैनेंद्र, अज्ञेय से लेकर चतुरसेन शास्त्री व द्वारका प्रसाद (घेरे के बाहर) जैसे लेखकों के उपन्यासों पर अश्‍लीलता के आरोप लगे और स्वातंत्र्योत्तर काल में कृष्‍णा सोबती, मृदुला गर्ग, मैत्रेयी जैसी लेखिकाओं की कृतियों के साथ कमलेश्‍वर (मांस का दरिया), डॉ माहेश्‍वर (पेशाब) और कामतानाथ (लाशें) के नाम भी इस संदर्भ में स्मरण आते हैं। ‘लाशें’ का नायक तो लाश के साथ संभोगरत होता है। रमाकांत श्रीवास्तव की कहानी ‘मध्यांतर’ में चौराहे पर पड़ी किसी बेहोश या मृत स्त्री की उघाड़ी देह को ढांकने की जगह भीड़ की निगाहें उसकी नंगी टांगों के बीच की जगह का मुजाहिरा करने जैसी मानसिक विकृति प्रदर्शित करती हैं। ‘यारों के यार’ जब ‘नयी कहानियां’ में छपी थी तो बड़ा तूफान खड़ा हुआ था और पूरे साल भर पत्रिका में बहस चलती रही थी।

इस तरह की बहसों में यह निकलकर आया था कि अश्‍लीलता देह या चित्र या शिल्‍प या रचना या वहां प्रयुक्त गालियों में नहीं, लेखक/चित्रकार/मूर्तिकार के नजरिये में होती है। अजंता, ऐलोरा की गुफाओं और खजुराहों के शिल्‍पों में उत्कीर्णित मैथुनरत युगलमूर्तियों में कलात्मकता ही देखी जाती है। जयदेव के ‘गीत गोविंद’ और विद्यापति की पदावलियों में राधा की अनावृत्त देह के सौंदर्यचित्र मिलते हैं, जिनमें अश्‍लीलता नहीं देखी जाएगी। कालिदास के काव्य में ऐसे अंश बहुतायत में मिलेंगे।

शालिनी माथुर ने कविता जैसी संवेदनशील विधा में घुसपैठ कर रही पोर्नोग्राफिक बीमारी की पड़ताल के लिए अपनी परखनली में जिन दो कवियों की कविताएं ली हैं, वे हिंदी कविता के जाने-पहचाने चेहरे हैं। पवन करण युवा कवि हैं और अनामिका निस्‍संदेह पिछले दो-ढाई दशकों की अवधि में उभर कर आयी जानी-मानी कवयित्री हैं। उन्हें ‘शीर्ष कवयित्री’ कहना हिंदी की स्नेहमयी चैधरी, सुनीता जैन और चंपा वैद जैसी कवयित्रियों की अवमानना होगी। पवन करण को भी शालिनी जी ने ‘शीर्ष’ विशेषण दे दिया है। यह ठीक है कि आज के समय में सृजन के क्षेत्र में दस-पंद्रह वर्ष होते ही अथवा एकाध पुरस्कार का जुगाड़ करने के बाद हर युवा कवि में स्वयं को ‘शीर्ष’ पर बैठा देखने-कहने और मनवाने की बेतुकी ललक देखी जा रही है, मगर समीक्षक अथवा संपादक को तो उनके लिए ऐसे विशेषणों से बचना चाहिए। पवन करण को शीला सिद्धांतकर सम्मान ‘स्त्री मेरे भीतर’ संग्रह पर दिया गया था। यद्यपि मैंने पूर्व में पवन की कविताएं पत्र-पत्रिकाओं में देखी थीं और उनमें से कुछ कविताएं अच्छी भी लगी थीं, मगर संदर्भित संग्रह देखने का अवसर मुझे अभी तक नहीं मिला। यही स्थिति अनामिका के साथ है। सम्मान समारोह में मैं उपस्थित था। अनामिका पवन की कविताओं पर बोली थीं। शायद वे निर्णायक मंडल की सदस्य भी थीं। इसलिए यह आश्‍चर्यजनक नहीं है कि कैंसर जैसी व्याधि पर लिखी पवन की कविता ‘स्तन’ के बाद उन्होंने भी उसी व्याधि पर ‘ब्रेस्ट कैंसर’ जैसी कविता लिखी। पवन की कविता संगीतारंजन के लिए और अनामिका की कविता वनिता टोपो के लिए निवेदित है। स्‍पष्‍ट है कि दोनों कवियों के लिए यह व्याधि अनुभव के दायरे के बाहर होगी, मगर कवि के लिए यह जरूरी नहीं होता कि वह सिर्फ अपने अनुभव को ही व्यक्त करे। इसके लिए उसे परकाया प्रवेश की सिद्धि प्राप्त करनी होती है। ऐसा न होने पर वही होता है, जैसा कि संदर्भित कविताओं में दिखाया गया है।

कविता की रचना प्रक्रिया को उद्घाटित करना आसान नहीं है, मगर उसकी बुनियादी शर्त यह तो है ही कि कवि ने संदर्भित व्यक्ति या स्थिति के साथ संपूर्ण तादात्म्य स्थापित कर लिया हो। निराला की ‘वह तोड़ती पत्थर’ या ‘भिखारी’ या नवीन, माखनलाल चतुर्वेदी, दिनकर, नागार्जुन या रघुवीर सहाय या श्रीकांत की अनेक कविताओं को इन संदर्भों में देखा जा सकता है। उनके प्रभाव आज भी हमारे मन पर वैसे ही अंकित हैं। गांधी की हत्या पर लिखी सैकड़ों कविताएं या बच्चन की बंगाल के अकाल पर लिखी लंबी कविता, शमशेर की बैल – इन सारी कविताओं में कवि अपने स्वत्व को विलीन कर उसका संपूर्ण रूपांतरण कर चुकता है तब कालजयी कविता जन्म लेती है। जैसे ‘मेटामॉर्फासिस’ का नायक एक सुबह जब उठता है तो अपने को एक कीड़े में तब्दील हुआ पाता है।

शालिनी मानती हैं कि ये दोनों कविताएं रोगग्रस्त स्त्रियों द्वारा जेड गुडी की तरह अनुमति देने के बाद रची गयी होंगी। मुझे शक है। भले ही कैंसर की व्याधि से ग्रस्त थी, मगर जेड गुडी अभिनेत्री थी। उसका किस्सा दूसरा था। उसकी मानसिकता दूसरी थी, संस्कार दूसरे थे। टीवी प्रसारण के अधिकार देते हुए जरूर उसके मन में उसके शेष परिवार – जो और जैसा हो मुझे उसकी अधिक जानकारी नहीं – के लिए जीवन-निर्वाह के अधिकतम साधन सुलभ कराना भी हो सकता है। पश्चिम की संस्कृति कितनी ही भोगवादी क्यों न हो – इतनी क्रूर और अमानवीय नहीं हो सकती, फ्रीडा ह्यूज की कविता इसका प्रमाण है।

इसलिए मुझे शक है कि उक्त कविताएं संदर्भित स्त्रियों द्वारा अनुमति देने के बाद लिखी गयी हैं। संभव है कि पवन करण ने संगीता रंजन की बीमारी के बारे में सुना हो, पढ़ा हो और स्त्री मेरे भीतर है – इस दावे की परख के लिए उन्होंने उस पर कविता रच दी हो। कालांतर में उनकी प्रशंसक/गुरू/पुरस्कार समिति की जूरी की सदस्य को जब वनिता टोपो का केस पढ़ने या जानने को मिला हो, तो पवन की स्त्री के एक स्तन खोने के बरक्‍स ब्रेस्ट कैंसर के कारण दोनों छातियां गंवाने के मामले ने उनकी कवयित्री की प्रसन्नता दोगुनी बढ़ा दी हो, जिसने हमें ‘ब्रेस्ट कैंसर’ जैसी कालजयी कविता से गुजरने का यह दुर्लभ अवसर दे दिया!

यह मेरा अनुमान है। आमतौर से रचनाकार अपनी रचना में जिसे केंद्र में रखते हैं, उसे कभी पता तक नहीं चलता कि उसके लेखक मित्र या यह खबर पढ़ते-सुनते हुए दूरस्थ किसी लेखक पाठक/श्रोता ने उसकी बीमारी का क्रूर मजाक उड़ाने वाली रचना बुनने की प्रक्रिया प्रारंभ कर दी है!

लेकिन अगर उन्हें पता लग जाए कि उन्हें किस तरह का पात्र बनाया गया है या उनकी असाध्य व्याधि का रस लेकर कैसा रंजक चित्र उपस्थित किया गया है, तो शायद उनकी मानसिकता अंधेरे में बलात्कृत स्त्री की मानसिकता से भिन्न नहीं हो सकती, जिसके चलते ऐसी स्त्री स्वयं को समाज से काटते हुए आत्महत्या जैसा भयानक कदम भी उठा सकती है।

और अगर ऐसा हो तो उसके जिम्मेदार क्या ऐसे कवि या लेखक ही नहीं होंगे? हो सकता है कि आत्महत्या से पूर्व लिखे अपने पत्र में उस चरम स्थिति तक पहुंचाने के बीज-कारण को वे स्मरण न रख पाएं, या दुनिया से विदा होने की चरम उदात्त मन:स्थिति के चलते उसका उल्लेख न करें, लेकिन उससे ऐसी रचनाओं अथवा उनके रचनाकारों का अपराध क्या कम हो जाएगा? सवाल यह भी है कि ऐसे कवि या लेखक-अगर उन्होंने अपनी संवेदनशीलता को गिरवी न रख दिया हो – क्या अपने ऐसे कृत्य के लिए किसी अपराधबोध से गुजरने, अनंतर उसका प्रक्षालन करने का साहस दिखाएंगे?

बच्चन ने अपनी क्लैसिक आत्मकथा में लिखा है कि एक कवि सम्मेलन में अपने अवसादग्रस्त गीतों का पाठ करने के बाद जब वे रात्रि में ट्रेन से लौट रहे थे, तो कवि सम्मेलन में उनके गीतों की फरमाइश कर बार-बार सुनने वाले एक युवक ने उसी ट्रेन से कटकर जब आत्महत्या कर ली, तब उन्हें एहसास हुआ कि वे जो कविता लिख रहे थे, वह मॉरबिड पोइट्री थी, जो समाज के संवेदनशील युवा पर आत्महंता प्रभाव डाल रही थी। इस त्रासदी ने उनके कवि को भीतर तक हिला दिया और जैसे पश्‍चाताप स्वरूप ही उन्होंने ऐसी कविता रचने से स्वयं को सायास मुक्त कर लिया!

कविता करना क्या कोई खेल है? समाज का कवि जैसी संवेदनशील इकाई क्या सैडिस्ट हो सकती है? या इसे यों कहें कि क्या कोई सैडिस्ट कवि हो सकता है? शास्त्रों में कवि को ‘परिभू स्वयंभू’ कहा गया। ईश्‍वर की ही तरह सृष्‍टि की रचना करने वाला। कविता को आनंद देने वाली कृति के अतिरिक्त सामाजिक रुचियों का परिष्‍कार करने वाला भी माना गया है। कवि की इसीलिए हमेशा से बड़ी प्रतिष्‍ठा रही है क्योंकि समाज उससे संस्कारित होता है। ये कविताएं समाज को नहीं, स्त्री देह को नहीं, यहां तक कि संदर्भित जटिलतम व्याधि को भी संस्कारित नहीं करतीं, उल्टे उसके साथ परपीड़क आनंद से भरा खिलवाड़ करती हैं।

शालिनी अपने लेख में कविता के पाठक के सामने निम्न प्रश्‍नों की एक शृंखला रखती हैं :

नारीवादी कवि व्याधि पर कविता रचते समय क्या इस बात पर कभी विचार करते हैं कि उनकी कविता पढ़कर व्याधिग्रस्त समाज कैसा अनुभव करेगा?

साहित्य में क्या स्त्री दृष्‍टि और पुरुष दृष्‍टि अलग-अलग होती हैं?

छंद, लय आदि शिल्‍प वाले अनुशासन से मुक्त तथाकथित कविता का स्वरूप क्या ऐसा होना स्वीकार्य हो सकता है कि किसी विचारवान पाठक को उसमें कविता नहीं, कुछ और विद्रूप झांकते नजर आएं?

क्या स्त्री शरीर पुरुष शरीर का खिलौना है?

क्या स्त्री देह मनविहीन या हृदयहीन वस्तु है?

जब विकलांगता को पारिभाषित करने वाले समाज में प्रचलित हीनताबोधक शब्दों की जगह समाज का संस्कारित तबका बेहतर शब्दों का प्रयोग कर सकता है तो कविता जैसे संवेदनशील रूप में, कटे हुए अंग को लेकर एक कवि के द्वारा व्याधिग्रस्त-व्यक्ति की संज्ञा को आमफहम करने की प्रवृत्ति क्या उचित कही जा सकती है?

क्या व्याधि की भी कोई स्मृति होती है/हो सकती है?

‘सही प्रयोग’ और ‘लगभग सही प्रयोग’ में क्या अंतर है?

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का ठेका क्या कवियों ने ही ले रखा है? उनकी कविताएं पढ़ने वाले पाठक क्या उस अधिकार से वंचित हैं कि ऐसी कविताएं पढ़कर भी खामोश रहें?

क्या शेयर मार्केट का कार्टेल हिंदी कवियों के कार्टेल में तब्दील हो गया है?

इन सवालों के उत्तर ढूंढते हुए हम हिंदी के साहित्यिक परिदृश्‍य की हौलनाक तस्वीर से रू-ब-रू होते हैं, जिसमें कवि हैं, आलोचक हैं, संपादक हैं, जिनके अलग-अलग गिरोह बने हैं और जो अपने सदस्य कवि या कवयित्री को प्रकाशन, पुरस्कार, सम्मान आदि के जरिये उठाने-गिराने के दुष्‍कृत्य में तल्लीन हैं; बिना इसकी परवाह किये कि इनसे अलग हिंदी का एक सजग पाठक वर्ग भी है जो इनकी एक-एक हरकत पर नजर रखे है और अंततोगत्वा जिसके सामने ऐसा हर कवि या कवयित्री अपने अपमूल्यित रचना कर्म का हश्र देखने को बाध्य होगा।

अब सवालों पर गौर करें :

दूसरे कवियों के बारे में नहीं कह सकते, मगर संदर्भित कवियों ने इस संबंध में कोई विचार नहीं किया होगा।

आजकल बहुत से लोग ऐसा मानने लगे हैं, जैसे कि दलित विमर्श वाले मानते हैं। लेकिन सच यह है कि रचनाकार न स्त्री है न पुरुष – या फिर वह दोनों ही है – जैसे कि ब्रह्म!

जवाबी प्रश्‍न। जब हिंदी कविता के स्वयंभू कवियों ने अनुशासन की जटिलता से स्वयं को मुक्त कर लिया तो उन्हें पाठक की परवाह क्यों होगी?

यह दुर्भाग्यपूर्ण सच है कि स्त्री विमर्श के ज्‍यादातर पुरोधाओं के लिए स्त्री शरीर पुरुष शरीर का खिलौना मात्र है!

मनुस्मृति से लेकर इस उत्तर आधुनिक समय तक हुईं अधिकांश घटनाएं स्त्री की देह के भीतर मन या हृदय ही नहीं – बुद्धि को भी – नकारती हैं, नजरअंदाज करती हैं – यद्यपि प्रत्येक समय में अपवाद स्वरूप स्त्री ने अपना सही स्वरूप (मैं उसे प्रतिपक्ष नहीं कहूंगा) प्रमाणित किया है। अठारहवीं सदी से इसमें उत्तरोत्तर प्रगति भी हुई है। मगर जरूरी नहीं कि वह हिंदी के सभी नारीवादी कवि-कवयित्रियों तक पहुंच सकी हो।

आप या मेरे जैसे पाठक या पाठिका के लिए अनुचित होगी, मगर संबंधित कवि या कवयित्री के लिए वैसा होता, तो ऐसी कविताएं जन्म ही क्यों लेतीं?

किसी भी व्याधि की स्मृति नहीं हो सकती, जब तक उसका मानवीकरण न हो। मगर यहां तो व्याधि के मानवीकरण की जद्दोजहद नहीं। व्याधिग्रस्त स्त्री की स्मृति है, मगर उसमें कहीं दु:ख नहीं, पीड़ा नहीं, हताशा नहीं, अवसाद नहीं, व्याधि से मुक्त होने का संतोश नहीं। इसके उलट इनमें व्याधिग्रस्त होने को लेकर किसी कवि द्वारा खिलवाड़ करने और स्त्री की अस्मिता को अपमानित करने का भाव ही मुखर है। शेष तो आप स्वयं समझदार हैं।

‘सही प्रयोग’ या ‘लगभग सही प्रयोग’ सिर्फ वाग्जाल है। या तो सही प्रयोग होगा, या सही प्रयोग नहीं होगा; अर्थात् गलत प्रयोग होगा।

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता तो पाठक के पास भी है, मगर संबंधित कवियों को ऐसा लगता होगा कि उनके यश के चकाचौंध में पाठक बेचारा अपने को अभिव्यक्त करने का साहस कहां जुटा पाएगा! अभी तक के समय ने उसके भ्रम को सिद्ध भी किया है। किस सामान्य पाठक ने आज तक इस पर बात की? वह बेचारा करता भी तो उसे छापता कौन? किताब तो कई वर्ष पहले छपी, मगर आप जैसी विद्वान पाठिका भी पिछले वर्ष ही उसे नोटिस में ले पायीं और अगर आपके पास यह स्तंभ न होता तो आप उसे प्रकाशित भी शायद न करवा पातीं! तो साहित्य में ऐसा ही भेड़ियाधसान चलता है मैडम! आपको बधाई कि आप उस आम पाठक की प्रतिनिधि के तौर पर साहसपूर्वक अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के उस तथाकथित कानूनी अधिकार का उपयोग कर पाने की स्थिति में हैं?

‘कवियों का कार्टेल’ की जगह ‘हिंदी आलोचना अथवा ‘सम्मान देने-दिलाने वाली संस्थाओं का कार्टेल’ वाला पद अधिक उपयुक्त होगा।

अब यहां कुछ सवाल मेरी ओर से भी।

कार्टेल जिस तरह शेयर मार्केट में शेयरों को उठाने-गिराने का कार्य करता है, उसमें ज्‍यादातर अच्छे शेयर पिटते हैं और खराब शेयर चढ़ जाते हैं। कार्टेल का उद्देश्य ही यही होता है, तभी उसे या उससे जुड़ी कंपनियों को एक दिन या कुछ घंटों के भीतर ही लाखों-करोड़ों का लाभ हो पाता है। कम पूंजी वाला आम निवेशक इसी कारण अंत में लुट-पिटकर बाहर हो जाता है, जिसकी ऐसी दशा पर दो आंसू बहाने वाला भी कोई नहीं मिलता! साहित्य के शेयर मार्केट में भी ऐसा ही हो रहा है।

पवन करण को मिले एक पुरस्कार का तो मैं साक्षी रहा हूं। आपका कहना है कि उन्हें सात पुरस्कार मिले हैं और (या इसलिए) वे शीर्ष कवि हैं! अनामिका ऐसा पुरस्कार प्रदान करने वाली कवयित्री हैं तो जाहिर है कि वे तो और भी ऊंचे शीर्ष पर होंगी! लेकिन इस समाज में एक सजग, सचेत बुद्धिजीवी की भूमिका निभाते हुए क्या आप सचमुच नहीं जान सकीं कि पुरस्कारादि कैसे लिये-दिये जाते हैं? साहित्य में इनका अपना कार्टेल है, इसे अब गै़र साहित्यिक लोग भी जान और पहचान चुके हैं।

अब जब अपने लेख द्वारा आपने इन्हें तथाकथित ‘शीर्ष’ से उतार कर उनकी सही जमीन दिखाने का काम कर ही दिया है, तो उनका कार्टेल क्या खामोश बैठा रह जाएगा? वह बांस की खपच्चियों की मदद से उन्हें पुन: त्रिशंकु की तरह ‘शीर्ष’ के स्वर्ग की ओर धकेलने का प्रयास तो अवश्‍य करेगा। नतीजा यह होगा कि आपकी परखनली से प्रमाणित होकर निकलीं ऐसी क्रूर, हिंसक, हृदयहीन कविताओं के ये सर्जक साहित्य के शेयर मार्केट में कुछ समय के लिए नीचे आकर फिर पूर्ववत रूप में जगमगाते नजर आएंगे! चर्चा तो होती ही रहेगी। तो क्या यह मानना सही नहीं होगा कि इस तरह इन्हें ताजा चर्चा में लाने का श्रेय आप जैसी सजग लेखिका द्वारा भी हो ही गया? आज के शातिर समय में बहुत से लोग चर्चा में बने रहने के लिए गालियां तक खाने को तैयार रहते हैं – ‘बदनाम भी होंगे तो क्या नाम न होगा’ वाली तर्ज पर! यही स्थिति देखकर नयी पीढ़ी को भी यही सब करने का हौसला मिलता है।

मेरा सीधा सवाल आपसे यह है कि नारी विमर्श पर दूसरे कवि भी कविताएं लिख रहे हैं। स्नेहमयी चैधरी से लेकर सविता सिंह और नीलेश रघुवंशी तक। उनकी कविताओं पर आपकी नजर क्यों नहीं जाती? आत्मोल्लेख को अशिष्‍टता माना जा सकता है, मगर इस अंधेरे समय में उसका खतरा उठाते हुए भी अब यह बताना जरूरी लगता है कि स्त्री-केंद्रित कविताओं का मेरा एक कविता संग्रह ‘इस्तरी’ दो वर्ष पूर्व प्रकाशित हुआ था (सौभाग्य से जो प्रायोजित पुरस्कारों से वंचित रहा!)। उसकी 18 कविताएं डॉ परमानंद श्रीवास्तव के लेख ‘उद्भ्रांत की स्त्री-विषयक कविताएं’ के साथ ‘इरावती’ में छपी थीं। उनमें से कुछ – ‘अधेड़ होती औरत’, ‘बड़ी हो रही बेटियां’, ‘स्त्री की जगह’, ‘इस्तरी’, ‘डायन’ और ‘तलाक-तलाक’ मैंने गत वर्ष 12 दिसंबर, 2011 को लखनऊ स्थित दैनिक ‘जनसंदेश टाइम्स’ के कार्यालय में मुद्राराक्षस की अध्यक्षता में हुए अपने उस एकल काव्यपाठ के दौरान पढ़ी थीं, जिसमें आप भी उपस्थित थीं और मेरे संपूर्ण काव्यपाठ पर आपने समेकित वक्तव्य दिया था। जानता हूं कि सुनी-सुनायी कविताओं के आधार पर कुछ लिखा नहीं जा सकता। मगर यह तो आप जान ही चुकी थीं कि और भी कवि हैं जो स्त्री-विमर्श पर गंभीरता से कार्य कर रहे हैं। उनकी तरफ आपकी दृष्‍टि क्यों नहीं गयी? इसी तरह बरसों पहले मेरी मित्र सुधा अरोड़ा जब ‘कथादेश’ में ही अपना चर्चित कॉलम लिख रही थीं, तब दूरभाषवार्ता के दौरान उन्हीं दिनों ‘वर्तमान साहित्य’ में प्रकाशित लंबी कविता ‘एक थी सुरसती’ की प्रशंसा करते हुए उन्होंने उसे ‘स्त्री त्रासदी का महाकाव्य’ कहा था, मगर उसके बारे में कभी एक पंक्ति तक नहीं लिखी! लिखने के लिए उनके पास हमारे मित्र कवि के जीवन की त्रासदी वाला पारिवारिक प्रसंग भर था। हमारे समय और समाज की सजग, प्रखर और तेजस्वी नारीवादी लेखिकाओं का समूचे परिदृश्‍य को आकलन करने वाला दृष्‍टिकोण कहीं एकांगी ही होकर तो नहीं रह गया है?

खराब रचनाओं की भीड़ में अच्छी रचनाएं पहले तो लोगों तक पहुंचती नहीं, उनके पहुंचने से पहले ही खराब रचना को साहित्य का कार्टेल इस कदर चर्चा में ला देता है कि जिन्हें अच्छी रचनाओं की पहचान हो सकती है, वे भी उन खराब रचनाओं के अवगुणों को ढूंढने और उसे उजागर करने में अपना सारा श्रम और शक्ति लगा देते हैं। फलस्वरूप अच्छी रचनाओं की ओर ध्यान देने-दिलाने का उनके पास समय ही नहीं बचता! उन्हें इस तथ्य पर ध्यान देना चाहिए कि खराब रचनाएं या रचनाकार अपनी चैंकाऊ नकारात्मकता और कॉर्टेल-पोषित होने के कारण लगातार चर्चा में बने रहते हैं। अच्छी रचनाओं को यह सुविधा नहीं मिलती और उन्हें भवभूति के अनंत समय और विराट पृथ्वी की बाट जोहनी पड़ती है! अर्थशास्‍त्र के इस नियम से आप भी वाकिफ होंगी कि खोटा सिक्का अच्छे सिक्के को चलन से बाहर कर देता है। यह नियम साहित्य के अर्थशास्‍त्र में भी लागू होता है! इस कारण औरत के हक में लड़ाई मजबूत नहीं हो पाती और उसके नजरिये से जो लेखन सामने आता है, उसमें इतना विलंब हो चुका होता है कि वह अपने मूल उद्देश्य की प्रभावी ढंग से प्रतिपूर्ति करने में पूर्णतया सक्षम नहीं हो पाता।

उदभ्रांत से संपर्क करें : बी 463, केंद्रीय विहार, सेक्टर 51, नोएडा 201303, मोबाइल 09818854678

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