वासेपुर पर सांप्रदायिक हमले के पीछे हिंदू मन सक्रिय है!

गेंग्स ऑफ वासेपुर : सत्ता और अपराध का खोखला यथार्थ

♦ विनय सुल्‍तान

गैंग्‍स ऑफ वासेपुर को लेकर बहस की कई दिशाएं हैं। एक नजरिया वरिष्‍ठ समाजशास्‍त्री शिव विश्‍वनाथन का है, जो हमने पहले भी साझा किया है : हिंदुस्‍तान के साथ हुए हर हादसे का रूपक है वासेपुर। दूसरा नजरिया वरिष्‍ठ पत्रकार अरविंद शेष का है, जो मानते हैं कि गैंग्‍स ऑफ वासेपुर में कुटिल मानसिकता के साथ मुसलमानों को नीचा दिखाने की हरसंभव कोशिश की गयी है। उन्‍होंने पत्रकार प्रेक्सिस नाम की साइट पर अपने विचार रखे हैं : फिल्‍म नहीं सामंती कुंठाओं की राजनीति। अरविंद शेष के विचारों से मोहल्‍ला लाइव की ना-इत्तेफाकी सिर्फ इस वजह से नहीं है कि हम फिल्‍म के पार्टनर हैं। दरअसल आधे-अधूरे पूर्वाग्रही मन से सिनेमा को देखने का जो नतीजा होता है, उसी नतीजे की कलम से उन्‍होंने वासेपुर पर अपनी भड़ास निकाली है। वासेपुर की कहानी वहीं के रहने वाले एक युवक ज़ीशान क़ादरी ने लिखी है, जो कि एक पसमांदा यानी पिछड़े मुसलिम समुदाय से आते हैं। अनुराग की भूमिका एक निर्देशक के तौर पर यही है कि उन्‍होंने ज़ीशान की कहानी का यथार्थ सिनेमा के परदे पर रचने की कोशिश की है। सवाल ये है कि एक दलित मुसलमान जीशान का कैसा सवर्ण आग्रह हो सकता है कि वो अपने ही कस्‍बे की कहानी बुनते हुए अपने समाज को खल-समाज के रूप में पेश करे? दरअसल इस फिल्‍म को ऐसे देखना चाहिए कि पहली बार इतने वृहद तरीके से मुसलिम समाज सिनेमा के परदे पर जगह पा सका है। और कहीं न कहीं हमारा सवर्ण हिंदू मन इस बात से तिलमिला उठा है। इसी तिलमिलाहट की अभिव्‍यक्ति में सांप्रदायिकता के हथियार से वासेपुर के प्‍लॉट को मुसलमान विरोधी करार देने की कोशिश हो रही है।

गालियों को लेकर भी जिस तरह वासेपुर पर हमले किये जा रहे हैं, वे गैर-वाजिब हैं। समाज का यथार्थ एक चीज है और उस यथार्थ का सामाजिक-राजनीतिक और लैंगिक अर्थ एक चीज। गालियों के बारे में सबकी वही राय है, जो अरविंद शेष की है। मगर कहानी में यथार्थ को सेंसर करके पवित्रता का फरेब रचने का दौर शायद चला गया है। सलमान खान ने भी अभी थोड़े दिनों पहले अरविंद शेष के विचारों से मिलता-जुलता वक्‍तव्‍य जारी किया था।

अरविंद शेष के लिखे पर युवा पत्रकार विनय सुल्‍तान ने अपनी प्रतिक्रिया भेजी है, हम यहां उसे साझा कर रहे हैं।

मॉडरेटर

स्पष्टीकरण – मैं फिल्म को राजनीति की तरह देखता हूं। मैं समाज को राजनीति की तरह देखता हूं। मैं समीक्षा को राजनीति की तरह देखता हूं।


अरविंद शेष जी,

मैंने “गैंग्‍स ऑफ वासेपुर” पर आपकी समीक्षा पढ़ी। सचमुच कमाल की है। मैं आपकी कई बातों से इत्तेफाक नहीं रखता। दरअसल जिस तरीके से आपने इस पूरी फिल्म की व्‍याख्या “पिछड़ा बनाम सवर्ण”, “भगवा राजनीति की पोषक” या फिर “ब्रम्हेश्वर मुखिया” से इसे जोड़ा है, उसमे कई पेंच हैं।

आपने “चिदंबरम का आजमगढ़” और “अनुराग का वासेपुर” उप-शीर्षक में यह बात गंभीरता से उठायी है कि अनुराग कश्यप ने इस फिल्म के जरिये मुस्लिम बाहुल्य वाले वासेपुर को “गुंडों की बस्ती” के रूप में उकेरा है। हां, हो सकता है कि किसी के मन में इस फिल्म को देखने के बाद नकारात्‍मक छवि उभरे। परंतु क्या पूरे बिहार और झारखंड में जिस प्रकार से संस्थागत अपराध हो रहा है, यह उसका यथार्थ नहीं है। इस हिसाब से दिल्ली, मुंबई, सीवान, दरभंगा, रांची में होने वाले क्राइम की जो रिपोर्ट छपती है, वो भी इन शहरों की नकारात्मक छवि गढ़ती है? क्या इसी प्रकार “पान सिंह तोमर” पूरे चंबल को “डकैतों के जंगल” के रूप में प्रचारित नहीं करती? जिसे आप सामंती मानसिकता पर करारा तमाचा कह रहे हैं!

इसके बाद आप सैयद का कुरैशी कमाल उप-शीर्षक में इस पूरी फिल्म की समाजशास्त्रीय विवेचना करते हुए इसे पसमांदा और पठानों के बीच के संघर्ष के रूप में समेटने का प्रयास करते हैं। आपके हिसाब से बड़े सोचे-समझे तरीके से खान को कुरैशी किया गया, जिससे पिछड़े मुस्लिमों को नीचा दिखाया जा सके। आपको यह अच्छे से पता होगा कि फिल्म के पहले भाग में जब पीयूष इस कहानी की भूमिका बांधते हैं, तब यह कहते हैं – “कुरैशी दबाते थे और सब दबाते थे” – यानी 1940-50 के वक्त पिछड़े दबाते थे और सवर्ण दबाते थे। यहां आपकी समाजशास्त्रीय व्याख्या मुझे समझ में नहीं आती। मेरे नजरिये से तो यह दो आपराधिक गुटों के बीच वर्चस्व की लड़ाई है। इसके अलावा कहानी का मुख्य खलनायक कौन है? इस नजरिये से देखने पर तो यह सांप्रदायिक फिल्म हो जाती है। अब आप बताएं कि सवर्ण-पिछड़े संघर्ष के रूप में इसे देखने के निहितार्थ क्या हैं?

आपके हिसाब से पठानों का चित्रण शानदार तरीके से हुआ है। सरदार खान वेश्यागामी है। उसका बेटा फैजल अपनी मां को किसी और के साथ संबंध बनाते देख लेता है। वो खुद अपने पिता के प्रति संवेदनहीन है। अंततः वो अपने ही भाई द्वारा वर्चस्व की लड़ाई में मार दिया जाता है। क्या ये आपके नजरिये में महिमा मंडन है? दरअसल यह एक यथार्थवादी फिल्म है, जो कि फैजल खान और उसके पिता सरदार खान के इर्द-गिर्द घूमती है। वो बस इसलिए नायक हैं, क्योंकि वो अपने पिता की हत्या का बदला लेने की कोशिश में लगे रहते हैं। रामाधीर सिंह बस इसलिए खलनायक है क्योंकि वो सरदार, उसके पिता और बड़े बेटे ही हत्या सुल्तान से करवाता है।

नरभक्षी ब्रम्‍हेश्वर मुखिया और “जिया तू बिहार के लाला” के बीच का जो संबंध आपने जोड़ा है, वो भी मुझे थोड़ा अजीब लगा। इस फिल्म का संगीत 23 मई को जारी किया गया। और यह फिल्म ठीक एक महीने बाद 22 जून को रीलीज हुई। इस बीच जो भी वीडियो इस गाने के उपलब्ध थे, उसमे कहीं भी सरदार को मरते हुए नहीं दिखाया गया। बिहार और पूरे देश को नरभक्षी मुखिया से निजात मिली पहली जून को। अब जब आप खुद इसे इत्तेफाक मान रहे हैं, तो इसके रचनाकार को क्यों दोष दे रहे हैं – यह मेरी समझ से परे है। मेरे नजरिये से मसाला सिनेमा के स्थान पर यथार्थवादी सिनेमा का बनना एक सुखद घटना-विकास है।

क्षेपक एक – मैं गालियों को ले कर आपके नुक्ता-ए-नजर का स्वागत करता हूं। गलियां स्त्री को संपत्ति के रूप में स्थापित करती हैं। मैं भी अक्सर गलियों का प्रयोग करता हूं। अब प्रयास करके इसे छोड़ दूंगा।
क्षेपक दो – मैं बेझिझक स्वीकार करता हूं कि आप सिनेमा में मुझसे बेहतर समझदारी रखते हैं। पर छिछली समझदारी के साथ ही सही मैं मतभेद रखने का पूरा अधिकार रखता हूं।
क्षेपक तीन – यह फिल्म यथार्थवादी होते हुए भी सामाजिक सरोकार से कोई वास्ता नहीं रखती। अतः मैं इसे सृजनात्मक ऊर्जा का अपव्यय मानता हूं।

(विनय सुल्‍तान। स्‍वतंत्र युवा पत्रकार। भारतीय जनसंचार संस्‍थान IIMC से पत्रकारिता की डिग्री। उनसे vnyiover4u@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

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