क्या हिंदी की मौजूदा काव्य-संवेदना रुग्ण और अश्लील है?

♦ आशुतोष कुमार

शालिनी माथुर, दीप्ति गुप्‍ता, उदभ्रांत और अर्चना वर्मा का लिखा अब तक आपने पढ़ा। कुछ दिनों पहले आशुतोष कुमार ने भी इस मसले पर एक एफबी नोट जारी किया था, जिस पर खूब बहस हुई थी। पूरी बहस आप इस लिंक पर जाकर पढ़ सकते हैं : www.facebook.com/note : मॉडरेटर


थादेश के जून अंक में ‘व्याधि पर कविता या कविता की व्याधि’ शीर्षक लेख एक जरूरी सवाल उठाता है। बीमारी को कष्ट, असहायता, मृत्यु और घृणा के रूपक में बदलना बीमार व्यक्ति के प्रति एक अमानवीय क्रूरता है। कोढ़ की तरह सड़ना, प्लेग की तरह फैलना, कैंसर की तरह जड़ें जमा लेना प्रचलित मुहावरें हैं। लेकिन ऐसे मुहावरे बीमारी के प्रति समाज में एक नकारात्मक नजरिया बनाते हैं। बीमारी बीमार के लिए शर्मिंदगी का बायस बन जाती है। वह भरसक अपनी बीमारी को छुपाता है। धीरे-धीरे वह समाज से अलगाव में चला जाता है। बीमारी के सामने अकेला पड़ जाता है। ऐसे में इलाज मुश्किल हो जाता है। इलाज हो जाए तो भी उस बीमारी की बदनामी घेरे रहती है। मरने की बाद भी नहीं छोड़ती। हम सब इसे अपने अनुभव से जानते हैं। शायद ही कोई इस पर संदेह करे।

लेखिका शालिनी माथुर ने इस आलेख में स्तन कैंसर से संबंधित दो कविताओं पर विचार किया है। पवन करण की कविता ‘स्तन’ और अनामिका की ‘ब्रेस्ट कैंसर’। उनका कहना है कि इन कविताओं में व्याधि का हृदयहीन क्रूर निरूपण किया गया है। उनका कहना यह भी है कि इन कविताओं में स्त्री-शरीर का निरूपण ‘पोर्नोग्राफिक’ है। सूसन सोंतैंग के हवाले से वे मानती हैं कि ‘शरीर को मनविहीन हृदयहीन वस्तु’ के रूप में निरूपित करना पोर्नोग्राफी है। खास तौर पर स्त्री-शरीर को इस तरह निरूपित करना पुरुष-प्रधान समाज में स्त्री की हीन और अपमानजनक अवस्था को मंजूर करना और पुनर्स्थापित करना है।

अगर स्त्री-शरीर एक उपभोग-वस्तु मात्र है तो बीमारी उसके उपभोग-मूल्य को क्षति पहुंचाती है। इसलिए बीमारी के प्रति नकारात्मक नजरिया स्त्री को उपभोग-वस्तु समझने वाली दृष्टि के मेल में है। यह नजरिया अपने आप में रुग्ण है, और अश्लील भी।

शालिनी का मुख्य मुद्दा यह है कि हिंदी में ऐसी बहुत सी कविताएं लिखी और सराही जा रही हैं, जो ऊपर से तो स्त्री के पक्ष में लिखी गयी जान पड़ती हैं, या ऐसा दावा करती हैं, लेकिन ध्यान से देखने पर पता चलता है कि वे स्त्री के प्रति इसी रुग्ण-अश्लील दृष्टि से लिखी गयीं हैं। अगर ऐसा हो रहा है तो हिंदी की मौजूदा काव्य-संवेदना स्वयं रुग्ण और अश्लील है। सवाल यह है कि क्या सचमुच ऐसा हो रहा है।

आइए, पहले पवन करण की कविता ‘स्तन’ पढ़ते हैं।

इच्छा होती तब वह उनके बीच धंसा लेता अपना सिर
और जब भरा हुआ होता तो तो उन में छुपा लेता अपना मुंह
कर देता उसे अपने आंसुओं से तर

वह उससे कहता तुम यूं ही बैठी रहो सामने
मैं इन्हें जी भर के देखना चाहता हूं
और तब तक उन पर आंखें गडाए रहता
जब तक वह उठ कर भाग नहीं जाती सामने से
या लजा कर अपनी हाथों में छुपा नहीं लेती उन्हें

अंतरंग क्षणों में उन दोनों को
हाथों में थाम कर वह उससे कहता
ये दोनों तुम्हारे पास अमानत हैं मेरी
मेरी खुशियां, इन्हें सम्हाल कर रखना

वह उन दोनों को कभी शहद के छत्ते
तो कभी दशहरी आमों की जोड़ी कहता
उनके बारे में उसकी बातें सुन सुन कर बौराई —
वह भी जब कभी खड़ी हो कर आगे आईने के
इन्हें देखती अपलक तो झूम उठती
वह कई दफे सोचती इन दोनों को एक साथ
उसके मुंह में भर दे और मूंद ले अपनी आंखें

वह जब भी घर से निकलती इन दोनों पर
डाल ही लेती अपनी निगाह ऐसा करते हुए हमेशा
उसे कॉलेज में पढ़े बिहारी आते याद
उस वक्त उस पर इनके बारे में
सुने गये का नशा हो जाता दो गुना

वह उसे कई दफे सबके बीच भी उनकी तरफ
कनखियों से देखता पकड़ लेती
वह शरारती पूछ भी लेता सब ठीक तो है
वह कहती हां जी हां
घर पहुंच कर जांच लेना

मगर रोग, ऐसा घुसा उसके भीतर
कि उनमें से एक को ले कर ही हटा देह से
कोई उपाय भी न था सिवा इसके
उपचार ने उदास होते हुए समझाया

अब वह इस बचे हुए एक के बारे में
कुछ नहीं कहता उससे, वह उसकी तरफ देखता है
और रह जाता है, कसमसा कर
मगर उसे हर समय महसूस होता है
उसकी देह पर घूमते उसके हाथ
क्या ढूंढ रहे हैं, कि इस वक्त वे
उसके मन से भी अधिक मायूस हैं

उस खो चुके के बारे में भले ही
एक-दूसरे से न कहते हों वे कुछ
मगर वह, विवश, जानती है
उसकी देह से उस एक के हट जाने से
कितना कुछ हट गया उनके बीच से


लेख में कविता का बड़ा हिस्सा उद्धृत किया गया है। लेकिन कुछ छूट भी गया है।

कहा गया है कि इस कविता में स्त्री शरीर पुरुष शरीर का खिलौना है, पुरुष के रमण के लिए। यह स्त्री देह के लिए इस कविता में प्रयुक्त उपमानों से जाहिर होता है। पवन करण की कविता की स्त्री भी स्वयं को गोश्त का टुकड़ा ही समझती है। वह वस्तुकृत, विवश और अपमानित है। यह विवश स्त्री पोर्नोग्राफी की क्लासिकल स्त्री छवि है। यह कविता पहले से अपमानित स्त्री को उसके कैंसर से पीड़ित होने और एक अंग गंवा देने के कारण और अधिक अपमानित करती है। ऊपर से कवि एक अपराध और करता है। वह इस कविता को नाम ले कर एक वास्तविक स्त्री को समर्पित करता है, जो सचमुच कैंसर के कारण अपनी देह का एक अंश गंवा चुकी है।

आश्चर्य की बात है कि ऐसी संवेदनशीलता के बावजूद इस लेख में भी उस पीड़ित स्त्री के नाम का उल्लेख करने से गुरेज नहीं किया गया है। यह वैसा ही है, जैसे कोई अखबार में बलात्कार से पीड़ित स्त्री की तस्वीर छापने पर आपत्ति करे और खुद वह तस्वीर छाप दे! इससे आपत्ति करने वाले की संवेदनशीलता के बारे में क्या पता चलता है? यहां एक और सवाल उठता है। साधारण रूप से किसी व्यक्ति विशेष के लिए कोई खास कविता समर्पित करना उसके प्रति विशेष सम्मान प्रगट करना माना जाता है। हां, अगर वह एक अपमानजनक कविता हो तो बात दूसरी है। इस बिंदु पर हम लौटेंगे।

लेकिन सामान्य रूप से कैंसर से पीड़ित महिला के नाम का उल्लेख अपमानजनक क्यों माना जाना चाहिए? लेखिका ऐसा मानती प्रतीत होती है। उसने अपनी यह आपत्ति अनामिका की कविता के संदर्भ में भी दुहरायी है। लिखा है – “सभ्य समाज में … व्यक्ति की विकलांगता को द्योतित करने वाले शब्द कहना उचित नहीं समझा जाता, वहां एक स्त्री के एक ब्रेस्ट को कैंसर के कारण काट दिये जाने पर ऐसी कविता लिखी गयी और नाम ले कर व्याधिग्रस्त स्त्री को समर्पित की गयी।” सवाल है कि आखिर क्यों उचित नहीं समझा जाता। क्या विकलांगता या बीमारी स्वतः अपमानजनक बातें हैं? विकलांगता या बीमारी का मजाक उड़ाना और उसे अपमानित करना निस्संदेह अमानवीय है। लेकिन उन्हें स्वतः अपमानजनक मान लेना और इसलिए उनके बारे में शर्मिंदगी या ‘करुणा’ महसूस करना? ऊपर से दोनों बातें अलग लगती हैं, लेकिन उनके पीछे नजरिया एक ही है। जिन लोगों ने विकलांगता पर केंद्रित ‘सत्यमेव जयते’ का एपिसोड देखा है, उन्हें उस व्यक्ति की याद होगी, जिसने विकलांगों के लिए ‘विशिष्ट समर्थ’ जैसी शब्दावली के इस्तेमाल पर गंभीर आपत्ति की थी। इस प्रकार की सहानुभूति या सम्मान इस धारणा से उपजता है कि विकलांगता या बीमारी ‘सामान्यता’ से एक दुखद विचलन है, जिसे भरसक छुपा कर रखना ही सभ्यता का तकाजा है।

देखने की बात है कि लेखिका की यह धारणा उसी के द्वारा आरंभ में ही उद्धृत सूसन सोंतैंग के इस कथन के ठीक विपरीत है – “… कैंसर केवल एक बीमारी है, अभिशाप नहीं, सजा नहीं, शर्मिंदगी नहीं!” जबकि लेखिका बीमार रहीं स्त्रियों के नामोल्लेख मात्र से शर्मिंदा है। बीमारी के प्रति शर्मिंदगी का यह रवैया उसे रुग्ण रूपक में बदलने जैसा ही अपमानजनक और खतरनाक है। यह समाज को सामान्य और असामान्य के खानों में बांट कर बीमार को असामान्य के हीनतर खाने में धकेल देना है। खुद लेखिका के बताये लक्षणों के मुताबिक यह एक पोर्नोग्राफिक नजरिया है।

अब देखा जाए कि क्या ऊपर उद्धृत कविता स्त्री के लिए अपमानजनक है। कविता में पुरुष ‘वह’ स्तनों की उपमा शहद के छत्ते या दशहरी आमों से देता है। वह खुशी मनाने के लिए और ‘दुःख भुलाने के लिए भी’ स्त्री के स्तनों में अपना सर धंसा देता है। हालांकि लेख में यह दूसरी बात नजरंदाज कर दी गयी है। कविता से स्‍पष्‍ट है कि स्तन वास्तव में उसके प्रेम और उसके संपूर्ण जीवन के केंद्रबिंदु जैसे हैं। स्त्री का संपूर्ण व्यक्तित्व दो स्तनों में समाहित है। स्त्री के लिए भी, जो इस स्थिति से, बीमार होने के पहले तक, स्वयं आह्लादित है।

बीमारी के बाद स्थिति में बदलाव आता है।

उसकी देह से उस एक के हट जाने से
कितना कुछ हट गया उनके बीच से

देह का केवल एक अंग हटाया गया, लेकिन उससे ‘कितना कुछ’ हट गया। स्त्री अव्यक्त विवशता के साथ इस बदलाव को महसूस करती है। यह विवशता ‘उस एक’ और ‘कितना कुछ’ के कंट्रास्ट से जाहिर होता है। क्या कविता उस स्त्री की विवशता का मजा ले रही है? या उसका मजाक उड़ा रही है? अगर कविता के इस आखिरी अंश को निकाल दिया जाए, तो ऐसा ही लगेगा। लेकिन यह अंतिम अंश समूची कविता को स्त्री होने की विवशता के एक मार्मिक पाठ में बदल देता है। वह एक झटके में दिखा देता है कि स्त्रीत्व को स्त्री-स्तनों से परिभाषित करने वाली सभ्यता वास्तव में कितनी स्त्रीविरोधी और अमानवीय है। इस सभ्यता में स्त्री पुरुष के उपभोग मात्र के लिए है, और ऐसा होने के लिए विवश है। सही है कि कविता में ऐसे उपमान और उल्लेख भरे पड़े हैं, जो स्त्री को केवल उसके दो स्तनों से परिभाषित करते हैं, आनंद के लिए भी और आश्रय के लिए भी। स्त्री भी इसे प्रसन्नतापूर्वक मंजूर करती है। ऐसा न होता तो दैहिक क्षति एक साधारण दुर्घटना भर होती, वह पुरुष और स्त्री के परस्पर प्रेम और उनके समूचे जीवन और अस्तित्व को प्रभावित नहीं करती। लेकिन कविता में यही होता है। कविता इस स्थिति की विडंबना को पुरुष और स्त्री दोनों की विवशता के रूप में दर्ज करती है।

क्या यह एक काल्पनिक स्थिति है? क्या पुरुष प्रधान समाज में स्त्री की स्थिति और अवस्थिति ठीक ऐसी ही नहीं है? फिर इस ‘विवशता’ के उल्लेख मात्र से यह कविता स्त्रीविरोधी और पोर्नोग्राफिक कैसे हो गयी? अगर कविता का पाठ इस तरह किया जाएगा, तो ‘कत विधि सृजी नारी जग मांही / पराधीन सपनेहु सुख नाहीं’ और ‘मैं नीर भरी दुःख की बदली’ जैसी पंक्तियां भी पोर्नोग्राफिक ठहरायी जाएंगी। स्त्री की विवशता का उल्लेख केवल तभी पोर्नोग्राफिक हो सकता है, जब उसके पीछे मजा लेने वाला नजरिया और उद्देश्य हो। जब ऐसा होता है, तब उस विवशता का उल्लेख ग्राफिक विस्तार के साथ, रस ले ले कर किया जाता है। कोई भी देख सकता है कि प्रस्तुत कविता में ऐसा नहीं है। विस्तृत उल्लेख पुरुष के स्तन-व्यामोह का है, जिसकी स्वाभाविक परिणति स्त्री-पुरुष दोनों की विडंबनापूर्ण विवशता है। कविता साफ साफ उस स्तन-व्यामोह के विरुद्ध खड़ी है, उसके पक्ष में नहीं।

यह जरूर कहा जा सकता है कि स्त्री की विवशता को हमेशा स्वाभाविक और अनिवार्य मान कर नहीं चला जा सकता। स्त्री इस विवशता को नामंजूर कर सकती है। इसके विरुद्ध विद्रोह कर सकती है। उस पुरुष को ठुकरा सकती है, जिसके लिए ‘उस एक’ के न रहने से ‘कितना कुछ’ खो गया है। विवशता आखिरकार एक चुनाव का नतीजा होती है। पुरुष प्रधान सभ्यता में चुनाव पुरुष करता है, स्त्री नहीं। इस लिए स्त्री जब चाहे खुद को उस चुनाव से आजाद कर सकती है। चुनाव करने वाला पुरुष है, इसलिए विवशता भी बुनियादी रूप से उसी की है। वह अपने चुनाव के परिणाम से बच नहीं सकता। स्त्री उससे बंधी हुई नहीं है। लेकिन इस कविता में वह स्त्री विद्रोह नहीं करती। अपनी विवशता से बाहर आने की कोशिश नहीं करती। इस अर्थ में कहा जा सकता है कि इस कविता में एक ‘पुरुष-दृष्टि’ सक्रिय है। कविता स्त्री की विवशता को तो देख पा रही है, लेकिन उसमें निहित विद्रोही संभावनाओं को नहीं। यह कविता में सक्रिय ‘पुरुष-दृष्टि’ की सीमा हो सकती है। विवशता का संवेदनशील रेखांकन विद्रोह की संभावना को समेटे हुए है, लेकिन उसे उजागर नहीं करता। विवशता को देख पाना, उसे न देख पाने या उसका मजा लेने के बराबर नहीं ठहराया जा सकता। इन तीनो स्थितियों में भारी अंतर है। चर्चित लेख में इस अंतर को मिटा दिया गया है। इस लिए जहां एक वाजिब बहस हो सकती थी, वहां गैर-वाजिब इल्जामों की बरसात हो गयी है।

अनामिका की कविता इस वाजिब बहस को आगे बढ़ाने का ठोस आधार मुहैया करती है। आइए, अब इस कविता को पढ़ते हैं।

ब्रेस्ट कैंसर
(वबिता टोपो की उद्दाम जिजीविषा को निवेदित)

दुनिया की सारी स्मृतियों को
दूध पिलाया मैंने,
हां, बहा दीं दूध की नदियां!
तब जाकर
मेरे इन उन्नत पहाड़ों की
गहरी गुफाओं में
जाले लगे!

‘कहते हैं महावैद्य
खा रहे हैं मुझको ये जाले
और मौत की चुहिया
मेरे पहाड़ों में
इस तरह छिपकर बैठी है
कि यह निकलेगी तभी
जब पहाड़ खोदेगा कोई!

निकलेगी चुहिया तो देखूंगी मैं भी
सर्जरी की प्लेट में रखे
खुदे-फुदे नन्‍हें पहाड़ों से
हंसकर कहूंगी – हलो,

कहो, कैसे हो? कैसी रही?
अंततः मैंने तुमसे पा ही ली छुट्टी!

दस बरस की उम्र से
तुम मेरे पीछे पड़े थे,
अंग-संग मेरे लगे ऐसे,
दूभर हुआ सड़क पर चलना!
बुल बुले, अच्छा हुआ, फूटे!
कर दिया मैंने तुम्हें अपने सिस्टम के बाहर।
मेरे ब्लाउज में छिपे, मेरी तकलीफों के हीरे, हलो…
कहो, कैसे हो?’
जैसे कि स्मगलर के जाल में ही बुढ़ा गयी लड़की
करती है कार्यभार पूरा अंतिम वाला -
झट अपने ब्लाउज से बाहर किये
और मेज पर रख दिये अपनी
तकलीफ के हीरे!

अब मेरी कोई नहीं लगतीं ये तकलीफें,
तोड़ लिया है उनसे अपना रिश्ता
जैसे कि निर्मूल आशंका के सताये
एक कोख के जाए
तोड़ लेते हैं संबंध
और दूध का रिश्ता पानी हो जाता है!

जाने दो, जो होता है सो होता है,
मेरे किये जो हो सकता था – मैंने किया,
दुनिया की सारी स्मृतियों को दूध पिलाया मैंने!
हां, बहा दीं दूध की नदियां!
तब जाकर जाले लगे मेरे
उन्नत पहाड़ों की
गहरी गुफाओं में!
लगे तो लगे, उससे क्या!
दूधो नहाएं
और पूतों फलें
मेरी स्मृतियां!


इस कविता में वह विद्रोह साफ दिखाई दे रहा है, जो पहली कविता में उजागर नहीं हुआ। इस कविता में भी ‘मैं’ अपने स्तन गंवा चुकी है, लेकिन वह इस स्थिति के कारण कोई विवशता महसूस नहीं करती। उलटे आजादी महसूस करती है। भला क्यों? इसीलिए कि वह भी उस पुरुष-सभ्यता की भुक्तभोगी है, जो स्तन-व्यामोह से ग्रस्त है। वह अपनी देह पर गर्व करती है। उससे प्यार करती है। लेकिन इस व्याधिग्रस्त समाज में उसकी देह पीड़ा और अपमान का केंद्र भी है। लेकिन इस अपमान से निराश हो कर वह अपनी देह को स्वयं नष्ट करने नहीं चल पड़ती। बीमारी ने उसके अंग छीने हैं, उसका अस्तित्व, अस्मिता और आत्मसम्मान नहीं। क्या उसे इस अंग-क्षति का मातम मनाना चाहिए या स्वस्थ होने के नाते उल्लसित होना चाहिए? “कैंसर केवल एक बीमारी है, अभिशाप नहीं, सजा नहीं शर्मिंदगी नहीं।” फिर उसका मातम क्यों मनाया जाए? लेकिन शालिनी माथुर की अपेक्षा यही है। उन्हें इस कविता के उल्लास में ‘निर्दयता, क्रूरता और संवेदनहीनता’ दिखाई पडती है। उनके लिए अंग-क्षति एक क्रूर अभिशाप मात्र है। वे सीधे सीधे सूसन सोंतैंग की दृष्टि के खिलाफ खड़ी हैं।

लेखिका को मालूम है कि स्तन-व्यामोह-ग्रस्त समाज में अंग-क्षति का अनुभव स्त्री के लिए एक राहत जैसा भी हो सकता है। लेकिन वे कविता की इस अर्थ-संभावना को नामंजूर कर देती हैं। क्यों? इसलिए कि इस कविता में ‘प्रारंभ से अंत तक वक्षस्थल का वर्णन सौंदर्य-बोधक उपमानों” के साथ किया गया है। क्या सचमुच? क्या इस कविता में उन्नत पहाड़ों का उपमान सौंदर्यबोधक है? कविता में पहाड़ों के पहले दूध की नदियों के जिक्र है। दूध की नदियां प्रवाहित करने वाले पहाड़ क्या इतने स्थूल अर्थ में सौंदर्यबोधक हैं? क्या वे नायिका-भेद और नखशिख-वर्णन की याद दिलाते हैं? क्या मौत की चुहिया, तकलीफ के हीरे, बुलबुले वगैरह शृंगारिक उपमान हैं? निश्चय ही यह आलेख एक उत्कृष्ट उदाहरण है कि कविता को किस तरह नहीं पढ़ना चाहिए!

कविता की ‘मैं’ हटा दिये गये अंगों से कहती है -

“हंसकर कहूंगी – हलो,
कहो, कैसे हो? कैसी रही?
अंततः मैंने तुमसे पा ही ली छुट्टी!”

क्या यहां उन अंगों के प्रति नफरत दिखाई दे रही है? क्या यहां एक गहरा सहेलीपन, आत्मीयता, पीड़ा की साझेदारी, दोस्ताना गिला-शिकवा नहीं दिखाई दे रहा?

लेखिका को केवल पोर्नोग्राफी दिखाई दे रही है। ”पवन करण का पुरुष स्त्री को पोर्नोग्रफर की दृष्टि से निरूपित कर रहा है और अनामिका की स्त्री पोर्नोग्राफर की दृष्टि से निरूपत हो रही है।” उन्हें इन दो कविताओं में पुरुष और स्त्री दृष्टि का भी कोई भेद नहीं दिखाई दे रहा।

पोर्नोग्राफी के विषय में खुद स्त्रीवाद के दायरे में शोध, बहस और विमर्श का जखीरा इतना बड़ा है कि उसे संक्षेप में समेटने के लिए भी एक विशेषांक की जरूरत पड़ेगी। पोर्नोग्राफी के हजारो रूप हैं। पोर्नोग्राफी किसी भी तरह की हो, वह हर हाल में स्त्री के लिए अपमानजनक ही होती है, यह कोई सर्वस्वीकार्य धारणा नहीं है। ऐसी धारणा स्वयं स्त्री के खिलाफ जा सकती है। उदाहरण के तौर पर आज कल ढेर सारे लोगों के लिए चर्चित पोर्न अभिनेत्री सनी लियोन का नाम एक प्रकार के कुत्सित उल्लास का रूपक बन चुका है। कुछ लोग इस नाम का उपयोग एक गाली की तरह स्त्री के आत्म-निर्णय और उसकी आजादी का मजाक उड़ाने के लिए करते हैं। क्या ऐसा करना उचित है? लियोन खुद कहती हैं कि पोर्नोग्राफी उनके लिए अपनी सृजनात्मकता की अभिव्यक्ति का एक खास तरीका है, जिसे उन्होंने अपनी इच्छा से चुना है, और जो उनके लिए गर्व का विषय है।

आखिर पोर्न कलाकार बनने का फैसला खास तौर पर स्त्री के लिए इतना अपमानजनक क्यों होना चाहिए? हमारे देश में अगर कोई फौज या पुलिस में भर्ती हो कर अपने ही लोगों के कत्लेआम के लिए इस्तेमाल किया जाए, तो भी उसे अपमानजनक दृष्टि से नहीं देखा जाता। प्रधानमंत्री ऐसी नीतियां लागू करें, जिनसे लोग तिल तिल कर मरने के लिए मजबूर हों तो भी उसकी नैतिक छवि पर आंच नहीं आती। लेकिन एक स्त्री अगर अपनी निर्वस्त्र तस्वीरें प्रकाशित कर दे तो यह नहीं कि उसे केवल अनैतिक करार दे दिया जाता है, बल्कि उसे मनुष्य की गरिमा से ही खारिज कर दिया जाता है। और इसके लिए निर्वस्त्र होना भी जरूरी नहीं है, उसका जींस या स्कर्ट पहनना भी काफी हो सकता है। यौन-नैतिकता का ऐसा कठोर पुरुषवादी नजरिया स्त्री का उत्पीड़न उसके मन, देह और सामाजिक अस्मिता के स्तर तक करता है।

चर्चित आलेख में कहा गया है कि वह नग्नता के खिलाफ नहीं है, सिर्फ ‘स्त्री शरीर के पोर्नोग्राफिक निरूपण के खिलाफ’ है। तब भी वह उन तमाम स्त्रियों के खिलाफ तो है ही, जो अपनी सृजनात्मकता की अभिव्यक्ति के लिए पोर्न-कलाकार बनती हैं और जो पोर्न देख-पढ़ कर आनंदित होती हैं। साथ ही वह उन तमाम कविताओं के खिलाफ है, जिनमें किसी भी रूप में स्त्री की विवशता, पीड़ा और शारीरिक व्याधि का उल्लेख हुआ हो। क्योंकि ये सारी चीजें स्वतः ‘स्त्री शरीर’ के पोर्नोग्राफिक निरूपण की श्रेणी में आ जाती हैं। क्योंकि ऐसी कविताएं, उनके लेखे, स्त्री की अपमानजनक छवि प्रस्तुत करती हैं या फिर शरीर और मन के बीच द्वैत स्थापित करती हैं। जबकि संभव है कि ऐसी कविताएं इन दोनों बातों के ठीक विरोध में खड़ी हों, जैसा कि हम ऊपर देख चुके हैं। इसका मतलब यह एक ऐसा स्त्रीवाद है, जो स्वयं स्त्री के खिलाफ खड़ा है।

लेखिका द्वारा बारंबार उद्धृत सूसन सोंतैंग ने पोर्नोग्राफी की हमारी समझ को विकसित करने की दिशा में महत्वपूर्ण काम किया है। पोर्नोग्राफी की उनकी धारणा इतनी आसान नहीं है, जितना उसे इस आलेख में जहां-तहां से चुने गये उद्धरणों के आधार पर दिखाया गया है। भले ही सूसन का विश्लेषण पोर्न के सभी रूपों को नहीं समेटता, लेकिन वह उस खास तरह की पोर्नोग्राफी को समझने में हमारी मदद करता है, जिसमें स्त्री के अपमान को पुरुष के आनंद का आधार बनाया जाता है। वे बताती हैं कि पोर्नोग्राफर एक ऐसा व्यक्ति है, जो अपने अंतर्मन में स्त्री की स्वतंत्रता और यौनिकता से डरा हुआ है। वह स्त्री को अधिक से अधिक उत्पीड़ि‍त और नियंत्रित करके अपने मन के डर को झुठलाने की कोशिश करता है। उसका सारा आनंद इस कल्पना में है कि वह स्त्री को मनचाहे ढंग से नियंत्रित कर पा रहा है। लेकिन आखिरकार वह भी जानता है कि दरहकीकत वह ऐसा कर नहीं सकता। उसकी हताशा के अनुपात में पोर्नोग्राफी में हिंसा बढ़ती जाती है। लेकिन वह कितनी भी बढ़ जाए, पोर्नोग्राफी के आनंद का अंत एक जबरिया हासिल किये गये वीर्यपात (चरमसुख नहीं) के साथ होता है, जो उसके बुनियादी डर और हताशा का अंत नहीं करता, बल्कि उसे और बढ़ा देता है।

इतना ही नहीं, पोर्नोग्राफी की बुनियादी विडंबना यह है वह स्त्री को एक वस्तु के रूप में बदलना तो चाहता है, लेकिन अगर सचमुच ऐसा हो जाए, स्त्री पूरी तरह वास्तुकृत हो जाए, तो भी पोर्नोग्राफर का आनंद समाप्त हो जाता है। उसका आनंद आखिरकार वस्तु बनने से स्त्री के इनकार में है। जितना इनकार होगा, उतनी ही हिंसा की गुंजाइश होगी, उतना ही मजा बढ़ जाएगा। उसका आनंद इस तथ्य पर आधारित है कि स्त्री कभी भी पूरी तरह वस्तुकृत नहीं की जा सकती। इसलिए आनंद में ही हताशा के बीज छुपे हुए हैं। डर-हिंसा-आनंद-हताशा-डर – यह एक दुश्चक्र है, जो जारी रहता है। पोर्नोग्राफी इसीलिए एडिक्टिव होती है।

लेखिका सूसन को विस्तार से उद्धृत करने एक बावजूद इस प्रक्रिया-विश्लेषण को अपने लेख में शामिल नहीं करती। क्या इसलिए, कि ऐसा करने इन कविताओं को पोर्नोग्राफिक साबित करने में कोई मदद नहीं मिलती?

आजकल अस्मिता-संबंधी संवेदनशीलता का एक ऐसा रूप देखने को मिलता है, जिसमें विवेक और विचार के लिए जरूरी धीरज का पूरी तरह से बहिष्कार कर दिया गया है। ऐसी मूढ़-अस्मितावादी प्रवृत्ति कलात्मक और साहित्यिक कृतियों का कुपाठ करने में माहिर है। हालिया आंबेडकर-नेहरू कार्टून-विवाद में भी यह प्रवृत्ति दिखाई पड़ी। कार्टून में कोड़े का दिखना ही कोड़े के जरिये किये गये अपमान की सुदूर स्मृतियों को जगा देने के लिए काफी था। अगर ऐसी संवेदनशीलता होगी, तो यह सोचने के लिए समय और धीरज कहां होगा कि कोड़ा उत्पीड़न के यंत्र के रूप में आया है या उत्पीड़न मिटाने की कोशिशों को तेज करने के लिए। ऐसे में कतई मुमकिन है कि जो कोड़ा हमारे हित में उठा हो, उससे ही दुश्मनी ठान ली जाए या उसे दुश्मन को थमा दिया जाए।

शीर्षक सौजन्‍य : जानकी पुल

(आशुतोष कुमार। आलोचक। नेतरहाट, पटना, इलाहाबाद और जेएनयू से पढ़ते हुए इन दिनों दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय में प्राध्‍यापक। जनसंस्‍कृति मंच से जुड़ाव। पुनर्विचार नाम का ब्‍लॉग। उनसे ashuvandana@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

32 Responses to क्या हिंदी की मौजूदा काव्य-संवेदना रुग्ण और अश्लील है?

  1. भाई, यह शीर्षक तो एफबी पर आशुतोष कुमार ने नहीं दिया था बल्कि जानकी पुल ने दिया है. कम से कम शीर्षक तो बदल देते.

  2. सॉरी, मैंने नीचे जानकी पुल का सौजन्य नहीं देखा था. अपनी जल्दबाज टिप्पणी के लिए क्षमाप्रार्थी हूं. कृपया मेरे पहले कमेन्ट को हटा दें. मुझसे हट नहीं रहा.

  3. admin says:

    आपकी प्रतिक्रिया से पहले शीर्षक सौजन्‍य दे दिया गया है… सौजन्‍यता के मामले में मैं दूसरों से बेहतर हूं :)

  4. मैं अपनी जल्दबाजी के लिए क्षमा मांग चुका हूं. मैं जानता हूं कि सौजन्यता के मामले में आपका ट्रैक रेकॉर्ड बेहतर है.

  5. Sanjeev Chandan says:

    आप तक इस लेख को पहुँचाने की एक दावेदारी मेरी भी है , जिसका आपने एक टिपण्णी में उल्लेख किया भी है. धन्यवाद मोहल्ला पर इसके पुनरायोजन के लिए. बात अभी बाकी है, अनामिका जी का खुद का लेख और सितम्बर अंक में कतःदेश में आ रहे कुछ और लेख .

  6. ilakshi gupta says:

    easy language me accha lekh…

  7. Rahul Gaur says:

    आशुतोष जी को एक विवेक-पूर्ण आलेख के लिये साधुवाद!
    दोनों कवितायें सुंदर है या नहीं, ये अपनी – अपनी रूचि और समझ का मामला है (मुझे दोनों अच्छी लगीं), पर इन्हे पोर्नोग्राफी कहना ज्यादती है.

  8. Mahendra Singh says:

    राहुल गौर जी आपको कवितायें अच्छी लगीं क्योंकि न तो आपको कभी कैंसर हुआ है और न ही आपकी माताजी, बहन या आपकी पत्नी को !! जब आप के घर में आपके किसी सगे को कैंसर होगा तो उसको यह कवितायें सुना कर पूछियेगा उसको कितनी अच्छी लगीं यह कवितायें….

  9. Mahendra Singh says:

    आशुतोष जी, आप तो प्रोफ़ेसर हैं, कविताएँ पढ़ाते होंगे, और शायद अनामिका के सहकर्मी भी हैं और शायद इसी कारण उनकी तरफदारी भी कर रहे हैं क्योंकि आपका लेख दीप्ति और शालिनी जी द्वारा उठाये गए मूल मुद्दे से पाठकों का ध्यान हटाकर कर अश्लीलता के उचित और अनुचित होने की बहस में बड़े शातिराना तरीके से उलझा देता है. जबकि मूल सवाल को आपके लेख में स्पर्श भी नहीं किया किया गया – क्या कोई भी साहित्यिक विधा खासकर कविता जैसी विधा किसी भयावह रोग, रोगी के व्यक्तिगत संघर्ष, और रोग जनित विकलांगता और उससे उपजे अवसाद (जो पीड़ा कवि ने स्वयं कभी नहीं सही) से काव्य रचने की अनुमति देती है? यहाँ यह कवितायें पोर्नोग्राफी हैं या नहीं यह सवाल नहीं है, सवाल यह है कि क्या यह कवितायें भी हैं या क्या ऐसी कवितायें लिखी भी जानी चाहिए?

    मैं चाहूँगा कि बजाय सूसन सोंतैंग पर बहस करने के जिसका इन कविताओं से कोई लेना देना नहीं है अगर आप फ्रीदा प्लाथ की “माय मदर” कविता का विश्लेषण करते और अपनी राय जाहिर करते कि किसी अनामिका जैसे professional कवि को किसी अन्य व्यक्ति की व्यक्तिगत त्रासदी (जो उस व्यक्ति की अपनी नितांत व्यक्तिगत पीड़ा है) पर कविता लिखने का कितना हक है?

    अन्य पाठकों के लिए जो फ्रीदा प्लाथ की कविता से अनजान हैं, यहाँ उनकी प्रसिद्ध कविता जो उन्होंने अपनी मां की त्रासदपूर्ण मृत्यु (फ्रीदा की मां सिल्विया प्लाथ ने अवसाद के चलते ओवेन में सर डालकर आत्महत्या की थी) पर फिल्म बनाने वालों की सोच और संवेदनहीनता पर लिखी थी, प्रस्तुत है:

    My Mother – Frieda Hughes

    They are killing her again,
    She said she did it
    One Year in every ten,
    But they do it annually, or weekly,
    Some do it daily,
    Carrying her death around in their heads,
    And practising it. She saves them
    The trouble of their own;
    They can die through her
    Without ever making
    The decision. My buried mother
    Is up-dug for repeat performances.

    Now they want to make a film
    For anyone lacking the ability
    To imagine the body, head in oven,
    Orphaning children. Then
    It can be rewound
    So they can watch her die
    Right from the beginning again.

    The peanut-eaters, entertained
    At my mother’s death, will go home,
    Each carrying their memory of her,
    Lifeless – a souvenir.
    Maybe they’ll buy the video.
    Watching someone on TV
    Means all they have to do
    Is press pause
    If they want to boil a kettle,
    While my mother holds her breath on screen
    To finish dying after tea.

    The filmmakers have collected
    The body parts.
    They want me to see.
    But they requiere dressings to cover the joins
    And disguise the prosthetics
    In their remake of my mother.
    They want to use her poetry
    As stichting and sutures
    To give it credibility.
    They think I should love it-
    Having her back again, they think
    I should give them my mother`s words
    to fill the mouth of their monster,
    Their Sylvia Suicide Doll.
    Who will walk and talk
    And die at will,
    And die, and die
    And forever be dying.

  10. Mahendra Singh says:

    “निश्चय ही यह आलेख एक उत्कृष्ट उदाहरण है कि कविता को किस तरह नहीं पढ़ना चाहिए!”

    तो क्या किस कविता को किस तरह पढना चाहिए इसकी तमीज पाठकों को जाकर किसी प्रोफ़ेसर से सीखनी पड़ेगी? गनीमत है कि कबीर, रैदास, और शेक्सपिएर को पढने के लिए अभी तक किसी ऐसे ब्राह्मणवादी प्रोफ़ेसर का फरमान नहीं आया है कि कबीर की किस कविता को किस तरह से पढना चाहिए, शायद आएगा भी नहीं क्योंकि कबीर या रैदास ने कभी इतना कठिन काव्य रचा भी नहीं जिसके लिए दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफ़ेसर के instructions का सहारा लेना पड़े.

  11. Mahendra Singh says:

    जिस तरह अनेक ब्राह्मणवादी प्रोफेसरों के लाखों अकादमिक व्याख्याओं के बावजूद तुलसीदास की पंक्तियाँ “ढोल गंवार शूद्र पशु नारी….” आजतक दलितों, लेखकों और विचारकों के गले से नीचे नहीं उतर पायीं, वैसे ही आशुतोष की अनामिका की कैंसर रोगियों के प्रति संवेदनहीनता से भरी उस कविता की अकादमिक व्याख्या और आशुतोष जैसे खालिस प्राध्यापकीय चिंतकों के अकादमिक निर्देश (कि ऐसी कविता के अन्य क्या अर्थ हो सकते हैं) के बावजूद उसे कभी भी कैंसर रोगियों और नारियों (जिन्होंने यह कटु यथार्थ स्वयं भोगा है) को आक्रोशित/दुखी होने से नहीं रोक सकेंगे !!

    जिस प्रकार “ढोल गंवार शूद्र पशु नारी….” का कोई और पाठ नहीं हो सकता है सिवाय इसके कि और जब-जब ये पंक्तियाँ बोली या लिखी जाती हैं, दलितों और नारियों को घोर पीड़ा ही देती हैं. उसी प्रकार अनामिका कि पंक्तियाँ “वह उन दोनों को कभी शहद के छत्ते तो कभी दशहरी आमों की जोड़ी कहता” एक स्तन कैंसर से जूझती स्त्री की पीड़ा को कभी नहीं व्यक्त करती हैं बल्कि उसकी पीड़ा के “देहीकरण” का बेशर्म चित्रण है!! अब हम तुलसी से तो नहीं कह सकते कि अपनी पंक्तियों के लिए क्षमा मांगे लेकिन अनामिका चूँकि हमारे समय में हैं और जीवित हैं इसीलिए इतनी उम्मीद तो करते ही हैं कि वे अपने तीक्ष्ण, पीड़ादायक, और स्त्री के कष्ट के “देहीकरण” के लिए समस्त कैंसर रोगियों और स्त्रियों से क्षमा मांगेंगी….

  12. Rahul Gaur says:

    महेन्द्र जी
    मैं आशा करता हूं कि आप की गहरी सम्वेदनशीलता और कविता की समझ परिवार में किसी कैंसर रोगी को देख कर नहीं उपजी होगी.
    मेरे प्रति आप की सद्-भावना के लिये धन्यवाद.

  13. Mahendra Singh says:

    राहुल गौर जी, हालाँकि मैं यहाँ व्यक्तिगत बातें नहीं बताना चाहता क्योंकि डर है कि अनामिका और पवन जैसे लम्पट कवि और आप जैसे “कविता प्रेमी” पाठक उसे भी अपनी रचना का विषय न बना लें. लेकिन मुझे इसका करीब से अनुभव है और आपकी आशा के विपरीत मैंने अपने परिवार में कैंसर को करीब से देखा है और मेरी संवेदना या पीड़ा भी उससे उपजी पीड़ा है और शायद इसीलिए मुझे आपकी तरह दूसरों की बीमारी पर लिखी हुई कविता में रसानुभूति नहीं होती है.

    वैसे जैसा मैंने पहले भी कहा है कि मैं उस दिन का इंतज़ार करूँगा जब आपको ऐसी पीड़ा का सामना खुद करना पड़े तब देखता हूँ क्या तब भी आप अनामिका की कविता का इसी तरह आनंद ले पाएंगे और अपनी अकादमिक साहित्यिकता की समझ ऐसे ही बनाये रह पायेंगे जैसे अभी कर रहे हैं….हाँ यह सद-भावना ही है क्योंकि जब बगैर किसी पीड़ा को महसूस किये हुए आपकी कविता की समझ इतनी “महान” है, तब शायद आपकी कविता की समझ और विकसित हो जाएगी जब आप कैंसर की पीड़ा को अपने करीब से महसूस करेंगे !!

  14. महेंद्र जी, फ्रीदा प्लाथ की इस कविता से वही लोग अनजान होंगे, जिन्होंने मूल चर्चित आलेख नहीं पढ़ा होगा. कविता का एक अंश ठीक ऐसे ही संदर्भ और तर्क-प्रसंग में वहाँ भी आया है. आप की टीपों की भाषा और तर्कपद्धति भी मूल लेख से मेल खाती है. कविता पढ़ने की पद्धति पर किसी मतवैभिन्य की गुंजाइश को न मानना लेकिन कवियों को कविता लिखने के कायदे क़ानून सिखाने और न सीखने पर माफी मंगवाने या मज़ा चखा देने की हनक रखना. आमीन.

  15. prasoon priyadarshi says:

    ye kavita nahi iska ek ek paragraph 2mb ka chota-chota porn clipping hai…..pawan karan jee kripya kavita se pahle disclmair jaroor jari karen…kyunki text…… video se jyada ghatak hota hai….iska effect jyada dino tak rahta hai….

  16. Mahendra Singh says:

    आशुतोष जी ये किसने कहा कि आपने फ्रीदा प्लाथ की कविता नहीं पढी जो इतना बिगड़ खड़े हुए….वैसे भी हिंदी साहित्य पढ़ाते हैं तो अंग्रेज कवि और लेखकों को तो पढना ही पड़ेगा नहीं तो १) छात्रों पर रोब कैसे झाडेंगे, २) आखिर जब तथाकथित आधुनिक कविता/कहानी/या किसी उपन्यास के मूल प्रेरणा श्रोत तो अंग्रेजी या पाश्चात्य साहित्यिक कृतियाँ ही हैं तो उद्गम की तरफ देखना ही पड़ेगा आपको…..

    खैर, मूल विषय पर फिर आते हैं, फ्रीदा की कविता को उधृत करने से मेरा उद्देश्य यह नहीं था कि आपके ज्ञान को कमतर साबित कर सकूँ, भला मेरी ऐसी हिम्मत कैसे हो सकती है कि एक हिंदी के वह भी साम्यवादी प्रोफ़ेसर के बारे में ऐसा सोच भी सकूँ. करेला वो भी नीम चढ़ा…!! मेरा मतलब यह जानना था कि आपका क्या कहना है एक कवि के विचारों के बारे में जो इस बात पर अपनी नाराज़गी साफ़ साफ़ एक कविता के रूप में जाहिर करती है कि किसी के जीवन की व्यक्तिगत त्रासदी किसी अन्य लेखक, फ़िल्मकार या कलाकार के लिए कला का विषय नहीं हो सकते…या नहीं होने चाहिए…या फिर अगर होते हैं तो किस तरह उस व्यक्ति या उसके परिवार की भावनाओं को दुःख पहुंचा सकते हैं….? यहाँ जिस व्यक्ति या रोगी समूह पर कविता लिखी गयी उस व्यक्ति या समूह की भी भावनाएं आहत हो सकती हैं इस मुद्दे पर तो कोई बात ही नहीं कर रहा, लोग सुसन ग्रिफिन के पोर्नोग्राफी पर व्यक्त किये विचारों के पीछे पड़े हैं….इसी को कहते हैं हिंदी प्राध्यापकीय शैली का क्लास रूम विश्लेषण..!!

    रही बात “मज़ा चखा देने की हनक रखना” की, भाई ये कहाँ से पढ़ लिया आपने मेरे किसी टीप में. अरे मैं हिंदी की आधुनिक कविता नहीं लिख रहा हूँ जो आप उसके कई अर्थ निकालने लगे. हाँ माफ़ी मांगने की बात कही है और उस पर कायम हूँ क्योंकि मेरे हिसाब से और जहाँ तक मेरी सोच है कि समस्त कैंसर रोगियों और उनके परिवारों के लिए उक्त कवितायेँ आहत करने वाली हैं और मैं उसके लिए कवि से माफ़ी मांगने की उम्मीद करता हूँ. लेकिन मज़ा चखा लेने वाली बात तो मैंने कहीं भी नहीं कही – मानना पड़ेगा आपकी कल्पना की उड़ान बड़ी तेज है. खैर कोई बात नहीं, मैं समझ सकता हूँ कि दोष आपका नहीं आपके धंधे का है….हिंदी के प्रोफ़ेसर होने से आदत जो चुकी है हर असहमति के सुर पर छात्रों को मजा चखा देने की हनक रखने की तो वैसे ही आप औरों के बारे में भी सोचने लगे….भाई अपने प्राध्यापकीय आभा मंडल से थोडा बाहर निकलिए – सारे लोग आपकी tarah मज़ा चखा देने की धमकी नहीं देते फिरते….

    रही बात मेरी तर्क पद्धति की, भाई मैं आपका विद्यार्थी नहीं हूँ, मुझे आपसे सीखने या जानने की जरुरत भी नहीं कि मेरी तर्क पद्धति क्या होनी चाहिए….अपने छात्रों की तर्क पद्धति सुधारने की कोशिश करें ताकि कुछ अच्छे विद्यार्थी निकल सकें जो अंगरेजी साहित्य या आलोचना की पद्धति की नक़ल के बजाय कुछ मौलिक साहित्य या आलोचना के सिद्धांत गढ़ सकें….!!

  17. आहत भावनाएं .जी. ईसा मसीह की सलीब , बाबरी मस्जिद की शहादत , हुसैन की बेदखली , पारिवारिक -खाप -हत्याएं ,मध्ययुग से आज तक चली आ रही विच -हंटिंग -सब के पीछे आहत भावनाएं ही तो हैं . इन्हें केवल दूर से प्रणाम किया जा सकता है . प्रणाम .

  18. महेंद्र सिंह , मज़ा चखाने की दुआ करती ये अनमोल पंक्तियाँ क्या आप के नाम से किसी और ने लिखी हैं ?

    ”…..अनामिका और पवन किरण के लिए सिर्फ यही कामना कर सकता हूँ कि भगवान् करे कि जल्दी ही पवन किरण के जननांग में कैंसर हो जाए और अनामिका के स्तनों और योनि में कैंसर हो जाए और फिर मैं इसी प्रकार की कोई वीभत्स रस की कवितायें लिख सकूँ पवन किरण के कैंसर ग्रस्त लिंग और अनामिका की कैंसर ग्रस्त योनि के लिए….!! आशा है मुझे यह कवितायेँ लिखने का अवसर शीघ्र ही मिलेगा….”

  19. आशुतोष जी, मूल सवाल से आप भाग रहे हैं. महेंद्र सिंह शुरू से निजी हो गए हैं इसलिए आपको भागने का चोर रास्ता भी मिलता दिख रहा है. लेकिन महेंद्र जी का मूल प्रश्न जायज है. जिसका जवाब आप नहीं दे रहे हैं.

    महेंद्र जी के शब्दों को मैं अपनी भाषा देते हुए कहना चाहूँगा कि यहाँ मूल सवाल यह नहीं है कि यह कवितायें पोर्नोग्राफी हैं या नहीं. मूल सवाल है कि क्या ये कवितायेँ एक भयावह रोग, रोगी के व्यक्तिगत संघर्ष, और रोग जनित विकलांगता और उससे उपजे अवसाद का अश्लील ढंग से हिंसक उपहास नहीं उड़ाती ?

    अनामिका की कविता तो मेरे तईं क्रूरता और अश्लीलता के चरम बिंदु पर पहुँची हुई है. पवन करण को तो हम एक काम कुंठित सामन्ती पुरुष के रूप में देख सकते हैं जिसे स्त्री के स्तन बस उसके संग किये “मौज” की याद दिलाते हैं. पवन करण के बीमार जेहन की विवेचना की जा सकती है लेकिन अनामिका को कैसे देखें ??

    दोनों कवितायेँ पीड़ित के प्रति जरा भी संवेदनशीलता नहीं दिखती. दोनों कवितायेँ अपने मूल में सादवादी परपीड़ा का सुख उठाती दिखती हैं.

    आपका का आखिरी कमेन्ट भी बड़ा लचर है. आहत भावनाएँ पीडितों की भी होती हैं जिनका ख्याल आप भले ना रखना चाहें अन्य लोग रखना चाहते हैं. जैसे किसी को डोम, चमार, रखैल, लंगड़ा, कुबड़ा कहना अमानवीय है उसी तरह किसी जानलेवा रोग से पीड़ित की भावनाओं का उपहास उड़ाना हिंसक क्रूरता है.

  20. रंगनाथजी , असल में यह बहस इतनी सारी जगहों पर फ़ैल गयी है कि एक जगह समेटना मुश्किल है . खैर , आप के सवाल का सीधा उत्तर है –नहीं , क्योंकि इन कविताओं का यह विषय नहीं है . यहाँ मेरी फेसबुक दीवार पर चली बहसों में से एक से अपनी एक टीप उठा कर चेंप रहा हूँ . शायद कुछ मतलब निकले .
    ”सच है कि इन कविताओं को किसी कैंसर पीडिता के कष्टों की करुण कहानी पढ़ने की उम्मीद से पढ़ा जाएगा तो निराशा ही नहीं हाथ लगेगी, आघात भी लगेगा. लेकिन मेरी टूटी फूटी समझ कहती है कि ये कवितायेँ बीमारी पर नहीं हैं . बीमारी के बहाने हमारी सभ्यता के स्तन- व्यामोह पर टीप्पणी की गयी है . इन कविताओं ने घृणा और आक्रोश के जिस बवंडर को जन्म दिया है , आखिरकार वह इस स्तन -व्यामोह ग्रस्त सभ्यता के ही खिलाफ है . इस लिए यह मेरी नज़र में इन कविताओं की सफलता का मुंहबोलता सबूत है .भले ही उस क्रोध का निशाना खुद ये कवितायें बनी जा रही हों .कुत्सित सतही आलोचना कविता के अर्थग्रहण को कितना दुष्कर बना सकती है , यह हमारे समय का एक दारुण दृश्य है . ऊपर से हमारे ‘रामचन्द्र -महावीर’ निर्मित मर्यादावादी संस्कार .इन कविताओं के विरुद्ध हमले का जवाब देना उन्हें कालजयी साबित करने के निमित्त नहीं है . अभी अभी हमने देखा है कि भ्रमपूर्ण आलोचना ने हमारी पाठ्यपुस्तकों से देश के महानतम कार्टूनिस्टों की अर्थपूर्ण कार्टून रचनाओं को निकाल बाहर किया है . अब कवियों की बारी आयी है , जिन से माफी मंगवाने और न मानने पर उन्हें बिजली के निकटतम खम्भे पर लटका देने की तैयारी है . इस संकट के अहसास ने ही हमन जैसे आलसी को कुछ लिखने के लिए मजबूर किया , जिस से और कुछ हुआ हो या न हुआ हो , हमन ‘कार्टेल वाले ‘ जरूर हो गए हैं . -:)

  21. मैं यह भी कहना चाहूँगा की ‘अध्यापकीय आडम्बर’ वाली बात से भी मैं सहमत हूँ. मैं इसे ‘अकादमिक आडम्बर’ कहना चाहूँगा. मुझे Intellectual Impostures by Alan Sokal and Jean Bricmont की याद आ गई.

    आपकी बोझिल और अबूझ बातों से एक पैर उद्धृत करना चाहूँगा.

    “इतना ही नहीं, पोर्नोग्राफी की बुनियादी विडंबना यह है वह स्त्री को एक वस्तु के रूप में बदलना तो चाहता है, लेकिन अगर सचमुच ऐसा हो जाए, स्त्री पूरी तरह वास्तुकृत हो जाए, तो भी पोर्नोग्राफर का आनंद समाप्त हो जाता है। उसका आनंद आखिरकार वस्तु बनने से स्त्री के इनकार में है। जितना इनकार होगा, उतनी ही हिंसा की गुंजाइश होगी, उतना ही मजा बढ़ जाएगा। उसका आनंद इस तथ्य पर आधारित है कि स्त्री कभी भी पूरी तरह वस्तुकृत नहीं की जा सकती। इसलिए आनंद में ही हताशा के बीज छुपे हुए हैं। डर-हिंसा-आनंद-हताशा-डर – यह एक दुश्चक्र है, जो जारी रहता है। पोर्नोग्राफी इसीलिए एडिक्टिव होती है”

    आप कहना क्या चाहते हैं ?? और मैं फ़िलहाल आपके कहे का विखंडन भी नहीं करना चाहता. इसको उद्धृत भी सिर्फ इसलिए कर रह हूँ कि बिना पढ़े वाह-वाह करने वाले भी इस पहेली को बूझ सकें.

    बहरहाल, पहले हम इन दोनों कविताओं पर बात कर लें उसके बाद आपकी स्थापनाओं पर भी बात कर लेंगे.

  22. मैं यह भी कहना चाहूँगा की ‘अध्यापकीय आडम्बर’ वाली बात से भी मैं सहमत हूँ. मैं इसे ‘अकादमिक आडम्बर’ कहना चाहूँगा. मुझे Intellectual Impostures by Alan Sokal and Jean Bricmont की याद आ गई.

    आपकी पहेलीनुमा बातों से एक पैरा उद्धृत करना चाहूँगा.

    “इतना ही नहीं, पोर्नोग्राफी की बुनियादी विडंबना यह है वह स्त्री को एक वस्तु के रूप में बदलना तो चाहता है, लेकिन अगर सचमुच ऐसा हो जाए, स्त्री पूरी तरह वास्तुकृत हो जाए, तो भी पोर्नोग्राफर का आनंद समाप्त हो जाता है। उसका आनंद आखिरकार वस्तु बनने से स्त्री के इनकार में है। जितना इनकार होगा, उतनी ही हिंसा की गुंजाइश होगी, उतना ही मजा बढ़ जाएगा। उसका आनंद इस तथ्य पर आधारित है कि स्त्री कभी भी पूरी तरह वस्तुकृत नहीं की जा सकती। इसलिए आनंद में ही हताशा के बीज छुपे हुए हैं। डर-हिंसा-आनंद-हताशा-डर – यह एक दुश्चक्र है, जो जारी रहता है। पोर्नोग्राफी इसीलिए एडिक्टिव होती है”

    आप कहना क्या चाहते हैं ?? और मैं फ़िलहाल आपके कहे का विखंडन भी नहीं करना चाहता. इसको उद्धृत भी सिर्फ इसलिए कर रह हूँ कि बिना पढ़े वाह-वाह करने वाले भी इस पहेली को बूझ सकें.

    बहरहाल, पहले हम इन दोनों कविताओं पर बात कर लें उसके बाद आपकी स्थापनाओं पर भी बात कर लेंगे.

  23. “ये कवितायेँ बीमारी पर नहीं हैं. बीमारी के बहाने हमारी सभ्यता के स्तन- व्यामोह पर टीप्पणी की गयी है”

    क्या आपको ऐसा लगता है ?

    मुझे तो यह उलटबांसी ही लग रही है लेकिन मैं आपकी वाल पर चली बहस को इत्मीनान से देख कर ही आगे कुछ लिखूंगा.

  24. sujit sinha says:

    मैं महेंद्र सिंह जी और रंगनाथ जी के बातों से सहमत हूँ | ये कविता व्याधि के बहाने पोर्नोग्राफिक टेक्स्ट ही हैं | और दुर्भाग्य देखिये इनमे से एक कविता की रचनाकार महिला ही हैं | आशुतोष जी भले अपने लंबे आलमबरदार भाषा से मूल बातों को झुथियाने कि कोशिस करें, लेकिन प्रगतिशीलता के नाम पर केवल रंडुआ नाच ही वे कर पा रहे हैं | रंडुआ नाच का अस्तित्व भी अपनी जगह महत्वपूर्ण है , लेकिन विलास के लिए समय और मंच दूसरे होने चाहिए | अंत में मैं यही अर्ज करना चाहता हूँ कि मैं कम पडा-लिखा आदमी हूँ ,इसलिए बेहतर दंग से बहस नही कर सकता | लेकिन इस विषय पर और भी बहस कि जरूरत है | आशा है कि महेंद्र जी , रंग्नाथ जी, और आशुतोष जी के साथ कुछ और लोग जुड़कर बहस को नयी दिशा देंगे |

  25. Mahendra Singh says:

    @आशुतोष कुमार, क्षमा चाहूँगा थोड़ी देर से जवाब देने के लिए….वैसे वे पंक्तियाँ मैंने ही लिखी हैं पर उसमे मैंने “मजा चखाने की बात” कहाँ लिखी है? मैंने अनामिका और पवन करण को सिर्फ कैंसर ही तो हो जाने की कामना की है ताकि जिस बीमारी को दूसरे में देख कर उनमे इतनी कविता प्रस्फुटित हो रही है, स्वयं भोगे हुए यथार्थ या त्रासदी से जनित होने के कारण तो वह कविता और भी मजबूत हो जाएगी !! यह तो मेरे हिसाब से मजा चखाने वाली बात न होकर उनकी कविताओं के मजबूत होने की मेरी सदिच्छा है !!

    खैर ये तो मेरी सदिच्छा थी जिसे आप समझ नहीं पाए, लेकिन एक बात से मैं जरुर हतप्रभ हूँ वो यह कि आपको मेरी उक्त पंक्तियाँ क्यों ख़राब लग गयीं ??? मैं अनुमान कर सकता हूँ कि अनामिका जी आपकी मित्र हैं इसीलिए उन्हें कैंसर हो जाने की कल्पना से ही आप तिलमिला से गए !! मैं दरअसल यही तो आपको महसूस कराना चाह रहा था कि जब आप अपने किसी अभिन्न मित्र (किसी परिवार के सदस्य को भी नहीं, स्वयं को तो जाने ही दीजिये) को ही कैंसर हो जाने की कल्पना मात्र से इतना तिलमिला उठे और उसे मजा चखाने जैसा कुछ समझ बैठे तो आप अंदाजा लगा सकते हैं कि जो व्यक्ति इस पीड़ा से स्वयं गुजर रहा है उस पर क्या बीतती होगी और अपनी दुर्दशा पर किसी अन्य द्वारा कविता लिखे जाने पर वह क्या महसूस करेगा? अब इस पर भी आपको समझ न आये तो इसे आपके अन्दर बैठे अकादमिक प्रोफ़ेसर के द्वारा किसी गंभीर बीमारी से ग्रस्त और परिणामस्वरूप अंग-भंग हो जाने से उत्पन्न अवसादग्रस्त व्यक्ति पर एक वीभत्स कविता लिखे जाने और उसे अपने ढंग से व्याख्यायित किये जाने की और उसमे कलात्मकता ढूंढें जाने की जिद के सिवाय मैं कुछ और नहीं समझूंगा !! यह भी एक कारण है कि हिंदी कविता और साहित्य आम जन से दूर हो गया, आप लोग आम लोग क्या सोचते हैं इसकी कोई परवाह नहीं करते, सिर्फ और सिर्फ क्लासरूम और साहित्यिक गोष्ठियों में बहस के मसाले की तलाश में रहते हैं…..धन्य हो गुरुदेव….जिस कवि में किसी बीमार, रोगी, विकलांग के लिए संवेदना न हो और उनमे वह कविता का विषय ढूँढता रहे वह कवि तो क्या इंसान भी कहलाने लायक नहीं है…

    रंगनाथ जी, क्षमा चाहूँगा व्यक्तिगत होने के लिए, आपकी बात से सहमत हूँ, मुझे व्यक्तिगत नहीं होना चाहिए था. पर क्या करूँ जब कवि स्वयं ही व्यक्तिगत होकर कैंसर रोगी के नाम से संबोधित कविता लिख रहा है तो लगा कि ऐसे हृदयहीन कवि को उसी तरह व्यक्तिगत होकर वह पीड़ा महसूस कराने की कोशिश की जाये और शायद यह उद्देश्य सफल भी हुआ. आशुतोष कुमार भले ही अपने प्राध्यापकीय दंभ में यह स्वीकार न करें पर तिलमिला तो उठे ही कैंसर हो जाने की कल्पना मात्र से, कुछ तो सिहरन हुई होगी यह सोचकर कि कैसा होगा अगर यह व्याधि उन्हें या उनकी मित्र अनामिका को हो जाए…इसी उम्मीद के साथ कि शायद कुछ सोच सकें अगली बार किसी और की नितांत ही व्यक्तिगत पीड़ा पर लिखी कविता पर अपनी कलात्मक और अकादमिक व्याख्या लिखने से पहले….!!

  26. Mahendra Singh says:

    आशुतोष कुमार की टीप से “अभी अभी हमने देखा है कि भ्रमपूर्ण आलोचना ने हमारी पाठ्यपुस्तकों से देश के महानतम कार्टूनिस्टों की अर्थपूर्ण कार्टून रचनाओं को निकाल बाहर किया है” ताज्जुब हुआ कि यह बात आप अब कह रहे हैं जब यह मुद्दा शांत हो गया है नहीं तो जब यह मामला गरम था तो आप भी दिलीप मंडल के साथ थे. देखिये कहीं मंडल जी आपकी यह टीप देख न लें और फिर आपकी बाबासाहब के प्रति प्रतिबद्धता को शक की दृष्टि से देखा जाने लगे. खैर आपके देर से सही पर इस साहस की दाद देनी पड़ेगी!! भगवान् बुद्ध आपको दिलीप मंडलों के प्रकोप से बचाएं !!

    खैर अब मूल मुद्दे पर आते हैं, आपकी उसी टीप का एक अन्य हिस्सा – “अब कवियों की बारी आयी है, जिन से माफी मंगवाने और न मानने पर उन्हें बिजली के निकटतम खम्भे पर लटका देने की तैयारी है”

    माफ़ी मंगवाना और न मानने पर बिजली के खम्भे पर लटकाना दो बिलकुल अलग अलग बाते हैं? जहाँ खुद ही किसी भी छोटी गलती या लापरवाही के लिए माफ़ी माँगना या उसकी अपेक्षा करना किसी भी संभ्य समाज का हिस्सा होते हैं (यहाँ तक कि आप उसकी अपेक्षा अपने छोटे से बच्चे से भी करते हैं अगर उसने केवल मस्ती में भी किसी की भावना को दुःख पहुँचाया है तो) वहीं बिजली के खम्भे पर लटकाने का काम तो नक्सली या वामपंथी या फिर तोगड़िया जैसे लोग करते आये हैं. मैंने या किसी अन्य चाहे वो शालिनी माथुर हों या दीप्ति, किसी ने भी अनामिका या पवन करण को बिजली के खम्भे पर लटकाने को तो कभी नहीं कहा हाँ लेकिन एक संभ्य समाज के नागरिक होने के कारण और अनामिका और पवन करण को भी उसी समाज का अंग मानने के कारण उनसे माफ़ी की उम्मीद जरुर करते हैं. जैसा मैंने पहले भी कहा है कि आपकी कल्पना शक्ति बड़ी गज़ब की है, बहुत सारी चीज़ें खुद ही सोच लेते हैं – जैसे “मजा चखाना” या फिर “बिजली के खम्भे पर लटकाना”….अरे गुरुदेव काहे इतना घालमेल कर रहे हैं? भाई यहाँ हम लोग कोई नक्सली या वामपंथी देशों जैसे चाइना, नोर्थ कोरिया, या फिर क्यूबा के नागरिक नहीं है जो हर किसी असहमति के सुर वाले को बिजली के खम्भे पर लटकाते फिरें…कृपा करके अपनी आतंरिक सोच को अन्य लोगों पर की सोच पर न थोपें…!!

  27. Mahendra Singh says:

    “ईसा मसीह की सलीब , बाबरी मस्जिद की शहादत , हुसैन की बेदखली , पारिवारिक -खाप -हत्याएं ,मध्ययुग से आज तक चली आ रही विच -हंटिंग -सब के पीछे आहत भावनाएं ही तो हैं . इन्हें केवल दूर से प्रणाम किया जा सकता है”

    आशुतोष कुमार, अच्छी बात कही है आपने. ये सब आहत भावनाएं हैं और यह सच है कि हम आहत भावनाओं के युग में रह रहे हैं. पर यह भी सच है कि अभी आप इन भावनाओं को कितनी ही दूर से नमस्कार क्यों न करें जब इनमे से कोई भी भावना आपसे जुड़ती है तो आप की भावना भी आहत होती है और आप अपने को रोक नहीं पाते और तुरंत जिसने भावनाएं दुखाई हैं उन्हें सलीब पर चढाने की मांग करने लगते हैं….अभी तो ठीक ठीक हफ्ता भी नहीं गुजरा जब आखरी बार आपकी भावना आहत हुई थी जब आप दूर से नमस्कार न करके दौड़े दौड़े मानेसर गए थे मारुती उद्योग के मालिकों और प्रबंधकों को सलीब पर चढाने की जुगत भिडाने..या कम से कम ऐसा करने का फेसबुकीय आवाहन/आर्तनाद कर रहे थे….!! जनाब यह तो सरासर जुल्म-ओ-सितम है हम पर के आपके आंसू तो आंसू हैं और दूसरों के आंसू ग्लिसरीन जनित नमकीन पानी……

    खैर ये सब छोड़िये, ईसा मसीह की सलीब , बाबरी मस्जिद की शहादत , हुसैन की बेदखली इन सब पर कवितायें लिख लिख कर आप जैसे राजनीति प्रेरित बुद्धिजीवियों ने उन घटनाओं के पीड़ितों को वोट बैंक बना डाला है, अब बस एक रहम करिए वो ये कि मेहरबानी करके कैंसर रोगियों को अपनी कविताओं और आपनी आलोचकीय व्याख्याओं से बख्श दीजिये…पर लगता है कि आप लोग मानने वाले नहीं हैं – मुझे आशंका है कि आपने या अनामिका या पवन भाई ने इंडियन कौंसिल ऑफ़ मेडिकल रिसर्च की वह रिपोर्ट पढ़ ली है जिसमे वर्ष 2020 तक हर वर्ष कैंसर रोगियों के 1,148,757 नए मामले पाए जाने की अनुमान व्यक्त किया गया है. आप जैसे बुद्धिजीवियों की नज़र में 2019 के आम चुनाव के मद्देनज़र इतने ढेर सारे कैंसर रोगियों की उपस्थिति shayad एक नए और untapped वोट बैंक के रूप में दिखने लगी हो…वाह गुरुदेव क्या दूरदृष्टि है, कैंसर पीड़ितों को भी नहीं छोड़ा….उन्हें भी वोट बैंक बना डाला…कोटिशः प्रणाम !!!

  28. Mahendra Singh says:

    आशुतोष कुमार, पूरी उम्मीद है कि आप फिर भड़क उठेंगे अगर मैं कहूँ कि इस बहुचर्चित अपितु कुख्यात पुलित्ज़र पुरस्कार प्राप्त फोटोग्राफ के बारे में मैं आपका ध्यान आकर्षित करना चाहता हूँ……

    http://www.nytimes.com/imagepages/2009/04/15/arts/15jaar_CA0.ready.html

    पर आपके भड़क उठने के समस्त खतरों के बावजूद यह कहना प्रासंगिक होगा कि इस मरते हुए बच्चे की तस्वीर उतार कर पुरस्कार प्राप्त करके यह फोटोग्राफर केविन कार्टर रातों रात मशहूर हो गया था. उसने भी अनामिका की तरह इस तस्वीर में कलात्मकता ढूँढने की कोशिश की, कामयाब भी हुआ, पुरस्कार मिला….लेकिन यहाँ थोडा फर्क था केविन और अनामिका में, केविन में थोड़ी शर्म बाकी थी, लोगों के आलोचना करने पर उसने आत्म-मंथन किया और शायद उसे लगा कि उसने गलत किया – जी नहीं सका….अपने अंतिम नोट में लिखा:

    “………………………………………………….. I am haunted by the vivid memories of killings and corpses and anger and pain … of starving or wounded children, of trigger-happy madmen, often police, of killer executioners … I have gone to join Ken [recently deceased colleague Ken Oosterbroek] if I am that lucky.”

    पता नहीं अनामिका को किसी कैंसर रोगी की स्थिति पर लिखी अपनी उपहासात्मक कविता पढ़कर कभी इतनी भी ग्लानि होती होगी या नहीं कि वो कैंसर रोगियों से माफ़ी मांगने का साहस कर सकें… .!!

    ये हिंदी कवि और साहित्यकार हैं, कोई संवेदना नहीं बची इनमे….बस ढिठाई है जो ठूंस ठूंस कर भरी है – पश्चिम से प्रेरणा प्राप्त करने की, कुछ मामलों में तो चोरी भी करने की !! बस नहीं है जो वो है इमानदारी और साहस किसी पीड़ित समूह से जाने अनजाने उनका दिल दुखाने के लिए माफ़ी मांगने का, काश ये भी इन्होने पश्चिम से सीखा होता…

  29. महेंद्र सिंह , कविता और कला की आप की समझ बहुत ऊंचे स्तर की है . आप का अनुमान- विज्ञान भी उतना ही ऊंचा है .भाषा के भी आप बेताज बादशाह हैं . इन विषयों पर आप से विमर्श करने की मेरी स्थिति नहीं है .आपकी अनमोल पंक्तियों को इस लिए उदृत किया था कि इस बातचीत के पाठक देख सकें कि बीमारी की यह कैसी सम्वेदनशीलता है , जो दूसरों के बीमार होने की कामना करती है .स्त्री के प्रति यह कैसा सम्मान भाव है , और नामोल्लेख के प्रति यह कैसी सम्वेदनशीलता है , जो नाम ले कर किसी स्त्री के लिए ऐसी अपमानजनक भाषा लिखवाता है .
    अगर ये कवितायें दो कौड़ी की हैं तो इनसे इतनी आग काहे लगी हुयी है , उन्हें इतिहास के कबाड में गुम हो जाने क्यों नहीं दिया जाता. क्या इस लिए नहीं कि इन कविताओं में एक ऐसी स्त्री सामने आईहै जो अपनी देह , यौनिकता और दैहिक बीमारी को ले कर न तो शर्मिंदा है , न अपराधबोधग्रस्त है , न भयभीत है ?
    ऐसी स्त्री हमें पसंद नहीं है .ऐसी स्त्रियों को क्षमा नहीं किया जाएगा . उनसे क्षमा मंगवाई जायेगी .उन्हें मज़ा चखाया जाएगा . उन्हें कहीं सचमुच के और कहीं भाषा के बिजली के खम्भे पर लटकाया जायेगा.
    कहें हम कुछ भी , लेकिन स्त्री को हम हमेशा उसी कातर , असहाय , विवश , कारुणिक दशा में देखना चाहते हैं ,जैसा उसे धर्मग्रन्थों से ले कर घासलेटी साहित्य तक में दिखाया जाता है .
    ये महान कविताएँ न हों , लेकिन प्रवृत्तिनिरूपक (ट्रेंडसेटर) कवितायें हैं .इन्हें पंडितों के कोप का भाजन बनना पडेगा , वैसे ही जैसे प्रत्येक नयी काव्य प्रवृत्ति को बनना पडता है .

  30. Mahendra Singh says:

    कविता और कला की जैसी तैसी जो भी समझ मेरी है वह मुद्दा नहीं है – मुद्दा यह कि अनामिका और पवन करण की क्या समझ है कविता और कला के बारे में ख़ास कर तब जब वे एक गंभीर रोग से पीड़ित एक व्यक्ति ही नहीं अपितु एक समूह विशेष की संवेदना को अपनी ढाल बनाकर अपनी यौन विषयक उत्सुकताओं के समाधान पाने की कोशिश या यौनिक उन्मुक्तता के विस्तार को पाने का प्रयास कर रहे हैं. कुछ भी गलत नहीं है नारी का स्वयं अपने यौनिकता के नित नए आयामों को खोजना या फिर किसी पुरुष (यहाँ पवन करण पढ़ें) का नारीवाद की आड़ में नारी अंगो के नित नए रहस्यों के अन्वेषण में (जैसा पवन करण ने अपनी इस कविता में किया भी है) लेकिन इस प्रश्न से ये तथाकथित कवि या फिर आप जैसे इन कविताओं के प्रशंसक भाग नहीं सकते कि नारी की यौन मुक्ति की आकांक्षा को आयाम देने के लिए भला क्यूँ कर कैंसर की पीड़ा का पार्श्व-संगीत चलाने की आवश्यकता आन पडी?? क्या यह एक प्रकार से स्वयं में ही नहीं imply करता कि कविता की यह “स्त्री” पाठकों से करुणा और दया की अपेक्षा कर रही है? इस कविता के protagonist में इतना भी साहस नहीं कि पुरुषों के रचे स्तन व्यामोह से ग्रस्त समाज को ऐसे ही चुनौती दे सके और वह अपने कैंसर ग्रस्त होने का इंतज़ार करती रही ताकि जब कैंसर फैले तब वह अपने स्तनों को कटवा कर पुरुष की कामुक दृष्टि से मुक्ति पा सके!! वाह भाई क्या परले दर्जे का नारीवाद है…नारीवाद की इस नयी परिभाषा को पढ़कर स्वयं Simone de Beauvoir भी Eiffel tower से कूदकर आत्महत्या कर लेती….!! खैर यह नारी पात्र नारीवादी तो कम परन्तु masochistic ज्यादा लग रही है जो पुरुषों के सताने पर कैंसर होने का इंतज़ार करती है ताकि वह अपने “अंगों” से मुक्ति पा सके. वैसे इसमें trendsetting जैसा तो कुछ भी नहीं, बाहर तो छोडिये अपने हिंदुस्तान में ही मीना कुमारी से लेकर ऐश्वर्या राय तक कई लोगों ने ऐसी कई भूमिकाएं की हैं जो आपके और अनामिका द्वारा गढ़ी गयी नारीवाद की इस नयी परिभाषा के खांचे में फिट बैठती हैं. यह घासलेटी साहित्य या फ़ॉर्मूला हिंदी फिल्म जैसा नहीं है तो और क्या है जहाँ पाठकों से किसी गंभीर बीमारी के नाम पर करुणा आमंत्रित की जाती है और फिर कभी शहीद होने की आकांक्षा प्रकट की जाती है या फिर अपनी विकलांगता का महिमा मंडन किया जाता है या फिर आपकी इस कविता के सन्दर्भ में कहूँ तो नारीवादी या नारी के यौनमुक्त होने के दावे किये जाते हैं.

    रही बात मेरी संवेदनशीलता की, फिर कहूँगा कि यहाँ मेरी संवेदनशीलता विषय नहीं है विषय है अनामिका की संवेदनशीलता का. हालांकि मैं पहले ही बता चुका हूँ कि मेरा प्रयोजन क्या था फिर भी कहूँगा कि इसका उद्देश्य था कि आपकी संवेदनशीलता नापना. और मैं सफल भी हुआ यह जानकार आप अनामिका को कैंसर होने की कल्पना मात्र से उद्द्वेलित हो उठे……….ठीक भी है आखिर आपकी मित्र हैं….. फिर आप कैसे किसी और को हुई बीमारी पर कविता लिखे जाने के समर्थक हो सकते हैं?

    वैसे भी आप जैसे वामपंथी उग्र विचारधारा के व्यक्ति क्यों दूसरे से संवेदनशीलता की अपेक्षा करते हैं जब आप स्वयं किसी बीमार के प्रति पहले ही संवेदनहीनता की शुरुआत कर चुके हों. पहले यह कविता लिखी गयी जिस पर मैंने प्रतिक्रिया दी थी न कि मैंने पहले प्रतिक्रिया दे दी और वह कविता बाद में लिखी गयी. भाई आप लोग तो मानेसर में एक प्रबंधक को मार ही चुके हैं, आप द्वारा समर्थित नक्सलियों ने कितने ही सरकारी कर्मचारियों को मार डाला, ठीक भी है, जुल्म पहले सरकार ने किया तो स्वाभाविक है प्रतिक्रिया स्वरुप नक्सलियों ने सरकारी लोगों को मारा. मैं बिलकुल आपके ही साथ हूँ, आपकी ही विचारधारा पर चल रहा हूँ. प्रेमचंद ने गरीबों का मज़ाक उड़ाया “कफ़न” में, आपके हिंदी साहित्य के मनुवादियों ने चाहे वे कायस्थ प्रेमचंद हों या फिर राजपूत उदय प्रकाश सबने ने मिलकर एक साजिश रची और होरी से लेकर मोहनदास तक के नकली पात्र गढ़ कर सारे अकादमी पुरस्कारों पर कब्ज़ा कर लिया और ओम प्रकाश बाल्मीकि या मुद्राराक्षस ऐसे कितने ही अच्छे लेखक जिनकी रचनाएं उनका भोगा हुआ यथार्थ हैं ताकते ही रह गए. फिर भी आप उम्मीद करते हैं कि आपके अलावा और सभी संवेदनशील बने रहें !!! धन्य हैं आप….!!! चरणवंदन……!!!

    “यह कैसी सम्वेदनशीलता है, जो नाम ले कर किसी स्त्री के लिए ऐसी अपमानजनक भाषा लिखवाता है” भाई दोनों कवितायें साफ़ साफ़ दो असली कैंसर रोगियों का नाम लेकर लिखी गयी हैं और उनकी इज्ज़त का फालूदा आप की तथाकथित trendsetter कवियत्री पहले ही निकाल चुकी हैं, ऐसे में यह सवाल उनसे न कर के आप मुझसे उम्मीद करते हैं कि मैं अनामिका का नाम लेकर उन्हें कैंसर होने की कल्पना भी न करूँ? आप तो आहत भावनाओं को दूर से प्रणाम करने के दावे कर रहे थे अब आपकी अपनी भावनाएं क्यों आहत हो रही हैं? भाई आप किसी और की संवेदना दुखायेंगे तो क्या अगला बैठकर आपकी संवेदना की माला जपता रहेगा…?? भाई क्या बात है आप तो अपने ही अतिवादी वामपंथी विचारों से पीछे भाग रहे हैं !! ….क्या मामला है भाई अभी तक भगत सिंह बने बैठे थे और जब वापस अपने पर पडी तो गाँधी वादी बन बैठे ?? कैसी संवेदना और नैतिकता भइय्या?? बकौल मुक्तिबोध जरुर पूछना चाहूँगा कि “आपका क्या पोलिटिक्स है बॉस” ???

  31. Deepti Gupta says:

    यदि हम पूरे विश्व के देशों पर, उनके सभ्य, सुसंस्कृत और शिष्ट कलेवर पर एक सरसरी नज़र डाले तो भाषा, भाव और अर्थ जो किसी भी देश और उसकी संस्कृति का एक अहम हिस्सा होते हैं; उन्हें दृष्टि में रखते हुए – अमेरिका में, १९७२ में, George Carlin द्वारा अग्रेजी के ५० (लेकिन विशेषरूप से ७) उन शब्दों की सूची तैयार की गई, जिनका प्रयोग अमेरिकन टेलीविज़न, रेडियों और आम जनता में वर्जित माना गया और जो शिष्ट और संभ्रांत समाजम में प्रयुक्त नहीं होते ! बाद में U.S.Supreme Court ने भी उनके प्रयोग पर बाकायदा कानूनी मोहर लगाई ! इसी तरह जर्मनी में शिक्षित, सभी समाज में kunt, kootch आदि शब्दों के प्रयोग की वर्जना मान्य है ! ठीक इस वैश्विक संस्कृति के तहत, अपने देश में किसी को भी भंगी, चमार नहीं कहा जा सकता, पढ़े-लिखे लोगों की गोष्ठियों, मंचों, उनके भाषण, लेखन में अभद्र भाषा का प्रयोग नहीं किया जा सकता , इतना ही नहीं, अश्लील, कामुक भावो को जगाने वाली, या हिंसा भडकाने वाली शब्दावाली चाहे वह मौखिक हो या लिखित – समाज की, देश की सुख – शांति को बनाए रखने के लिए, वर्जित है ! मतलब कि – इस तरह की भाषा और भाव, उक्तियाँ और अभिव्यक्तियाँ नैतिक, सामजिक, सांस्कृतिक और कानूनी – सभी दृष्टियों स ‘अपराध’मानी गई है !
    क्या आपत्तिजनक लेखन करने वालों को, फूहड़ कविताएं और कहानियाँ लिखने वालों को इतनी सी बात समझ नहीं आती ? नहीं आती तो, उनके लिए सद बुद्धि की कामना तो की जा सकती है !
    God Fobid…….!! समझदार को इशारा काफी ! बच्चो को तो एकबारगी समझा भी लिया जाए लेकिन आयु, अनुभव और समझ में पके लोगों को समझना – ‘पत्थर को गलाने’ जैसा कठिन काम है !’
    चिंतित,
    दीप्ति

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