क्या हिंदी की मौजूदा काव्य-संवेदना रुग्ण और अश्लील है?

♦ आशुतोष कुमार

शालिनी माथुर, दीप्ति गुप्‍ता, उदभ्रांत और अर्चना वर्मा का लिखा अब तक आपने पढ़ा। कुछ दिनों पहले आशुतोष कुमार ने भी इस मसले पर एक एफबी नोट जारी किया था, जिस पर खूब बहस हुई थी। पूरी बहस आप इस लिंक पर जाकर पढ़ सकते हैं : www.facebook.com/note : मॉडरेटर


थादेश के जून अंक में ‘व्याधि पर कविता या कविता की व्याधि’ शीर्षक लेख एक जरूरी सवाल उठाता है। बीमारी को कष्ट, असहायता, मृत्यु और घृणा के रूपक में बदलना बीमार व्यक्ति के प्रति एक अमानवीय क्रूरता है। कोढ़ की तरह सड़ना, प्लेग की तरह फैलना, कैंसर की तरह जड़ें जमा लेना प्रचलित मुहावरें हैं। लेकिन ऐसे मुहावरे बीमारी के प्रति समाज में एक नकारात्मक नजरिया बनाते हैं। बीमारी बीमार के लिए शर्मिंदगी का बायस बन जाती है। वह भरसक अपनी बीमारी को छुपाता है। धीरे-धीरे वह समाज से अलगाव में चला जाता है। बीमारी के सामने अकेला पड़ जाता है। ऐसे में इलाज मुश्किल हो जाता है। इलाज हो जाए तो भी उस बीमारी की बदनामी घेरे रहती है। मरने की बाद भी नहीं छोड़ती। हम सब इसे अपने अनुभव से जानते हैं। शायद ही कोई इस पर संदेह करे।

लेखिका शालिनी माथुर ने इस आलेख में स्तन कैंसर से संबंधित दो कविताओं पर विचार किया है। पवन करण की कविता ‘स्तन’ और अनामिका की ‘ब्रेस्ट कैंसर’। उनका कहना है कि इन कविताओं में व्याधि का हृदयहीन क्रूर निरूपण किया गया है। उनका कहना यह भी है कि इन कविताओं में स्त्री-शरीर का निरूपण ‘पोर्नोग्राफिक’ है। सूसन सोंतैंग के हवाले से वे मानती हैं कि ‘शरीर को मनविहीन हृदयहीन वस्तु’ के रूप में निरूपित करना पोर्नोग्राफी है। खास तौर पर स्त्री-शरीर को इस तरह निरूपित करना पुरुष-प्रधान समाज में स्त्री की हीन और अपमानजनक अवस्था को मंजूर करना और पुनर्स्थापित करना है।

अगर स्त्री-शरीर एक उपभोग-वस्तु मात्र है तो बीमारी उसके उपभोग-मूल्य को क्षति पहुंचाती है। इसलिए बीमारी के प्रति नकारात्मक नजरिया स्त्री को उपभोग-वस्तु समझने वाली दृष्टि के मेल में है। यह नजरिया अपने आप में रुग्ण है, और अश्लील भी।

शालिनी का मुख्य मुद्दा यह है कि हिंदी में ऐसी बहुत सी कविताएं लिखी और सराही जा रही हैं, जो ऊपर से तो स्त्री के पक्ष में लिखी गयी जान पड़ती हैं, या ऐसा दावा करती हैं, लेकिन ध्यान से देखने पर पता चलता है कि वे स्त्री के प्रति इसी रुग्ण-अश्लील दृष्टि से लिखी गयीं हैं। अगर ऐसा हो रहा है तो हिंदी की मौजूदा काव्य-संवेदना स्वयं रुग्ण और अश्लील है। सवाल यह है कि क्या सचमुच ऐसा हो रहा है।

आइए, पहले पवन करण की कविता ‘स्तन’ पढ़ते हैं।

इच्छा होती तब वह उनके बीच धंसा लेता अपना सिर
और जब भरा हुआ होता तो तो उन में छुपा लेता अपना मुंह
कर देता उसे अपने आंसुओं से तर

वह उससे कहता तुम यूं ही बैठी रहो सामने
मैं इन्हें जी भर के देखना चाहता हूं
और तब तक उन पर आंखें गडाए रहता
जब तक वह उठ कर भाग नहीं जाती सामने से
या लजा कर अपनी हाथों में छुपा नहीं लेती उन्हें

अंतरंग क्षणों में उन दोनों को
हाथों में थाम कर वह उससे कहता
ये दोनों तुम्हारे पास अमानत हैं मेरी
मेरी खुशियां, इन्हें सम्हाल कर रखना

वह उन दोनों को कभी शहद के छत्ते
तो कभी दशहरी आमों की जोड़ी कहता
उनके बारे में उसकी बातें सुन सुन कर बौराई —
वह भी जब कभी खड़ी हो कर आगे आईने के
इन्हें देखती अपलक तो झूम उठती
वह कई दफे सोचती इन दोनों को एक साथ
उसके मुंह में भर दे और मूंद ले अपनी आंखें

वह जब भी घर से निकलती इन दोनों पर
डाल ही लेती अपनी निगाह ऐसा करते हुए हमेशा
उसे कॉलेज में पढ़े बिहारी आते याद
उस वक्त उस पर इनके बारे में
सुने गये का नशा हो जाता दो गुना

वह उसे कई दफे सबके बीच भी उनकी तरफ
कनखियों से देखता पकड़ लेती
वह शरारती पूछ भी लेता सब ठीक तो है
वह कहती हां जी हां
घर पहुंच कर जांच लेना

मगर रोग, ऐसा घुसा उसके भीतर
कि उनमें से एक को ले कर ही हटा देह से
कोई उपाय भी न था सिवा इसके
उपचार ने उदास होते हुए समझाया

अब वह इस बचे हुए एक के बारे में
कुछ नहीं कहता उससे, वह उसकी तरफ देखता है
और रह जाता है, कसमसा कर
मगर उसे हर समय महसूस होता है
उसकी देह पर घूमते उसके हाथ
क्या ढूंढ रहे हैं, कि इस वक्त वे
उसके मन से भी अधिक मायूस हैं

उस खो चुके के बारे में भले ही
एक-दूसरे से न कहते हों वे कुछ
मगर वह, विवश, जानती है
उसकी देह से उस एक के हट जाने से
कितना कुछ हट गया उनके बीच से


लेख में कविता का बड़ा हिस्सा उद्धृत किया गया है। लेकिन कुछ छूट भी गया है।

कहा गया है कि इस कविता में स्त्री शरीर पुरुष शरीर का खिलौना है, पुरुष के रमण के लिए। यह स्त्री देह के लिए इस कविता में प्रयुक्त उपमानों से जाहिर होता है। पवन करण की कविता की स्त्री भी स्वयं को गोश्त का टुकड़ा ही समझती है। वह वस्तुकृत, विवश और अपमानित है। यह विवश स्त्री पोर्नोग्राफी की क्लासिकल स्त्री छवि है। यह कविता पहले से अपमानित स्त्री को उसके कैंसर से पीड़ित होने और एक अंग गंवा देने के कारण और अधिक अपमानित करती है। ऊपर से कवि एक अपराध और करता है। वह इस कविता को नाम ले कर एक वास्तविक स्त्री को समर्पित करता है, जो सचमुच कैंसर के कारण अपनी देह का एक अंश गंवा चुकी है।

आश्चर्य की बात है कि ऐसी संवेदनशीलता के बावजूद इस लेख में भी उस पीड़ित स्त्री के नाम का उल्लेख करने से गुरेज नहीं किया गया है। यह वैसा ही है, जैसे कोई अखबार में बलात्कार से पीड़ित स्त्री की तस्वीर छापने पर आपत्ति करे और खुद वह तस्वीर छाप दे! इससे आपत्ति करने वाले की संवेदनशीलता के बारे में क्या पता चलता है? यहां एक और सवाल उठता है। साधारण रूप से किसी व्यक्ति विशेष के लिए कोई खास कविता समर्पित करना उसके प्रति विशेष सम्मान प्रगट करना माना जाता है। हां, अगर वह एक अपमानजनक कविता हो तो बात दूसरी है। इस बिंदु पर हम लौटेंगे।

लेकिन सामान्य रूप से कैंसर से पीड़ित महिला के नाम का उल्लेख अपमानजनक क्यों माना जाना चाहिए? लेखिका ऐसा मानती प्रतीत होती है। उसने अपनी यह आपत्ति अनामिका की कविता के संदर्भ में भी दुहरायी है। लिखा है – “सभ्य समाज में … व्यक्ति की विकलांगता को द्योतित करने वाले शब्द कहना उचित नहीं समझा जाता, वहां एक स्त्री के एक ब्रेस्ट को कैंसर के कारण काट दिये जाने पर ऐसी कविता लिखी गयी और नाम ले कर व्याधिग्रस्त स्त्री को समर्पित की गयी।” सवाल है कि आखिर क्यों उचित नहीं समझा जाता। क्या विकलांगता या बीमारी स्वतः अपमानजनक बातें हैं? विकलांगता या बीमारी का मजाक उड़ाना और उसे अपमानित करना निस्संदेह अमानवीय है। लेकिन उन्हें स्वतः अपमानजनक मान लेना और इसलिए उनके बारे में शर्मिंदगी या ‘करुणा’ महसूस करना? ऊपर से दोनों बातें अलग लगती हैं, लेकिन उनके पीछे नजरिया एक ही है। जिन लोगों ने विकलांगता पर केंद्रित ‘सत्यमेव जयते’ का एपिसोड देखा है, उन्हें उस व्यक्ति की याद होगी, जिसने विकलांगों के लिए ‘विशिष्ट समर्थ’ जैसी शब्दावली के इस्तेमाल पर गंभीर आपत्ति की थी। इस प्रकार की सहानुभूति या सम्मान इस धारणा से उपजता है कि विकलांगता या बीमारी ‘सामान्यता’ से एक दुखद विचलन है, जिसे भरसक छुपा कर रखना ही सभ्यता का तकाजा है।

देखने की बात है कि लेखिका की यह धारणा उसी के द्वारा आरंभ में ही उद्धृत सूसन सोंतैंग के इस कथन के ठीक विपरीत है – “… कैंसर केवल एक बीमारी है, अभिशाप नहीं, सजा नहीं, शर्मिंदगी नहीं!” जबकि लेखिका बीमार रहीं स्त्रियों के नामोल्लेख मात्र से शर्मिंदा है। बीमारी के प्रति शर्मिंदगी का यह रवैया उसे रुग्ण रूपक में बदलने जैसा ही अपमानजनक और खतरनाक है। यह समाज को सामान्य और असामान्य के खानों में बांट कर बीमार को असामान्य के हीनतर खाने में धकेल देना है। खुद लेखिका के बताये लक्षणों के मुताबिक यह एक पोर्नोग्राफिक नजरिया है।

अब देखा जाए कि क्या ऊपर उद्धृत कविता स्त्री के लिए अपमानजनक है। कविता में पुरुष ‘वह’ स्तनों की उपमा शहद के छत्ते या दशहरी आमों से देता है। वह खुशी मनाने के लिए और ‘दुःख भुलाने के लिए भी’ स्त्री के स्तनों में अपना सर धंसा देता है। हालांकि लेख में यह दूसरी बात नजरंदाज कर दी गयी है। कविता से स्‍पष्‍ट है कि स्तन वास्तव में उसके प्रेम और उसके संपूर्ण जीवन के केंद्रबिंदु जैसे हैं। स्त्री का संपूर्ण व्यक्तित्व दो स्तनों में समाहित है। स्त्री के लिए भी, जो इस स्थिति से, बीमार होने के पहले तक, स्वयं आह्लादित है।

बीमारी के बाद स्थिति में बदलाव आता है।

उसकी देह से उस एक के हट जाने से
कितना कुछ हट गया उनके बीच से

देह का केवल एक अंग हटाया गया, लेकिन उससे ‘कितना कुछ’ हट गया। स्त्री अव्यक्त विवशता के साथ इस बदलाव को महसूस करती है। यह विवशता ‘उस एक’ और ‘कितना कुछ’ के कंट्रास्ट से जाहिर होता है। क्या कविता उस स्त्री की विवशता का मजा ले रही है? या उसका मजाक उड़ा रही है? अगर कविता के इस आखिरी अंश को निकाल दिया जाए, तो ऐसा ही लगेगा। लेकिन यह अंतिम अंश समूची कविता को स्त्री होने की विवशता के एक मार्मिक पाठ में बदल देता है। वह एक झटके में दिखा देता है कि स्त्रीत्व को स्त्री-स्तनों से परिभाषित करने वाली सभ्यता वास्तव में कितनी स्त्रीविरोधी और अमानवीय है। इस सभ्यता में स्त्री पुरुष के उपभोग मात्र के लिए है, और ऐसा होने के लिए विवश है। सही है कि कविता में ऐसे उपमान और उल्लेख भरे पड़े हैं, जो स्त्री को केवल उसके दो स्तनों से परिभाषित करते हैं, आनंद के लिए भी और आश्रय के लिए भी। स्त्री भी इसे प्रसन्नतापूर्वक मंजूर करती है। ऐसा न होता तो दैहिक क्षति एक साधारण दुर्घटना भर होती, वह पुरुष और स्त्री के परस्पर प्रेम और उनके समूचे जीवन और अस्तित्व को प्रभावित नहीं करती। लेकिन कविता में यही होता है। कविता इस स्थिति की विडंबना को पुरुष और स्त्री दोनों की विवशता के रूप में दर्ज करती है।

क्या यह एक काल्पनिक स्थिति है? क्या पुरुष प्रधान समाज में स्त्री की स्थिति और अवस्थिति ठीक ऐसी ही नहीं है? फिर इस ‘विवशता’ के उल्लेख मात्र से यह कविता स्त्रीविरोधी और पोर्नोग्राफिक कैसे हो गयी? अगर कविता का पाठ इस तरह किया जाएगा, तो ‘कत विधि सृजी नारी जग मांही / पराधीन सपनेहु सुख नाहीं’ और ‘मैं नीर भरी दुःख की बदली’ जैसी पंक्तियां भी पोर्नोग्राफिक ठहरायी जाएंगी। स्त्री की विवशता का उल्लेख केवल तभी पोर्नोग्राफिक हो सकता है, जब उसके पीछे मजा लेने वाला नजरिया और उद्देश्य हो। जब ऐसा होता है, तब उस विवशता का उल्लेख ग्राफिक विस्तार के साथ, रस ले ले कर किया जाता है। कोई भी देख सकता है कि प्रस्तुत कविता में ऐसा नहीं है। विस्तृत उल्लेख पुरुष के स्तन-व्यामोह का है, जिसकी स्वाभाविक परिणति स्त्री-पुरुष दोनों की विडंबनापूर्ण विवशता है। कविता साफ साफ उस स्तन-व्यामोह के विरुद्ध खड़ी है, उसके पक्ष में नहीं।

यह जरूर कहा जा सकता है कि स्त्री की विवशता को हमेशा स्वाभाविक और अनिवार्य मान कर नहीं चला जा सकता। स्त्री इस विवशता को नामंजूर कर सकती है। इसके विरुद्ध विद्रोह कर सकती है। उस पुरुष को ठुकरा सकती है, जिसके लिए ‘उस एक’ के न रहने से ‘कितना कुछ’ खो गया है। विवशता आखिरकार एक चुनाव का नतीजा होती है। पुरुष प्रधान सभ्यता में चुनाव पुरुष करता है, स्त्री नहीं। इस लिए स्त्री जब चाहे खुद को उस चुनाव से आजाद कर सकती है। चुनाव करने वाला पुरुष है, इसलिए विवशता भी बुनियादी रूप से उसी की है। वह अपने चुनाव के परिणाम से बच नहीं सकता। स्त्री उससे बंधी हुई नहीं है। लेकिन इस कविता में वह स्त्री विद्रोह नहीं करती। अपनी विवशता से बाहर आने की कोशिश नहीं करती। इस अर्थ में कहा जा सकता है कि इस कविता में एक ‘पुरुष-दृष्टि’ सक्रिय है। कविता स्त्री की विवशता को तो देख पा रही है, लेकिन उसमें निहित विद्रोही संभावनाओं को नहीं। यह कविता में सक्रिय ‘पुरुष-दृष्टि’ की सीमा हो सकती है। विवशता का संवेदनशील रेखांकन विद्रोह की संभावना को समेटे हुए है, लेकिन उसे उजागर नहीं करता। विवशता को देख पाना, उसे न देख पाने या उसका मजा लेने के बराबर नहीं ठहराया जा सकता। इन तीनो स्थितियों में भारी अंतर है। चर्चित लेख में इस अंतर को मिटा दिया गया है। इस लिए जहां एक वाजिब बहस हो सकती थी, वहां गैर-वाजिब इल्जामों की बरसात हो गयी है।

अनामिका की कविता इस वाजिब बहस को आगे बढ़ाने का ठोस आधार मुहैया करती है। आइए, अब इस कविता को पढ़ते हैं।

ब्रेस्ट कैंसर
(वबिता टोपो की उद्दाम जिजीविषा को निवेदित)

दुनिया की सारी स्मृतियों को
दूध पिलाया मैंने,
हां, बहा दीं दूध की नदियां!
तब जाकर
मेरे इन उन्नत पहाड़ों की
गहरी गुफाओं में
जाले लगे!

‘कहते हैं महावैद्य
खा रहे हैं मुझको ये जाले
और मौत की चुहिया
मेरे पहाड़ों में
इस तरह छिपकर बैठी है
कि यह निकलेगी तभी
जब पहाड़ खोदेगा कोई!

निकलेगी चुहिया तो देखूंगी मैं भी
सर्जरी की प्लेट में रखे
खुदे-फुदे नन्‍हें पहाड़ों से
हंसकर कहूंगी – हलो,

कहो, कैसे हो? कैसी रही?
अंततः मैंने तुमसे पा ही ली छुट्टी!

दस बरस की उम्र से
तुम मेरे पीछे पड़े थे,
अंग-संग मेरे लगे ऐसे,
दूभर हुआ सड़क पर चलना!
बुल बुले, अच्छा हुआ, फूटे!
कर दिया मैंने तुम्हें अपने सिस्टम के बाहर।
मेरे ब्लाउज में छिपे, मेरी तकलीफों के हीरे, हलो…
कहो, कैसे हो?’
जैसे कि स्मगलर के जाल में ही बुढ़ा गयी लड़की
करती है कार्यभार पूरा अंतिम वाला –
झट अपने ब्लाउज से बाहर किये
और मेज पर रख दिये अपनी
तकलीफ के हीरे!

अब मेरी कोई नहीं लगतीं ये तकलीफें,
तोड़ लिया है उनसे अपना रिश्ता
जैसे कि निर्मूल आशंका के सताये
एक कोख के जाए
तोड़ लेते हैं संबंध
और दूध का रिश्ता पानी हो जाता है!

जाने दो, जो होता है सो होता है,
मेरे किये जो हो सकता था – मैंने किया,
दुनिया की सारी स्मृतियों को दूध पिलाया मैंने!
हां, बहा दीं दूध की नदियां!
तब जाकर जाले लगे मेरे
उन्नत पहाड़ों की
गहरी गुफाओं में!
लगे तो लगे, उससे क्या!
दूधो नहाएं
और पूतों फलें
मेरी स्मृतियां!


इस कविता में वह विद्रोह साफ दिखाई दे रहा है, जो पहली कविता में उजागर नहीं हुआ। इस कविता में भी ‘मैं’ अपने स्तन गंवा चुकी है, लेकिन वह इस स्थिति के कारण कोई विवशता महसूस नहीं करती। उलटे आजादी महसूस करती है। भला क्यों? इसीलिए कि वह भी उस पुरुष-सभ्यता की भुक्तभोगी है, जो स्तन-व्यामोह से ग्रस्त है। वह अपनी देह पर गर्व करती है। उससे प्यार करती है। लेकिन इस व्याधिग्रस्त समाज में उसकी देह पीड़ा और अपमान का केंद्र भी है। लेकिन इस अपमान से निराश हो कर वह अपनी देह को स्वयं नष्ट करने नहीं चल पड़ती। बीमारी ने उसके अंग छीने हैं, उसका अस्तित्व, अस्मिता और आत्मसम्मान नहीं। क्या उसे इस अंग-क्षति का मातम मनाना चाहिए या स्वस्थ होने के नाते उल्लसित होना चाहिए? “कैंसर केवल एक बीमारी है, अभिशाप नहीं, सजा नहीं शर्मिंदगी नहीं।” फिर उसका मातम क्यों मनाया जाए? लेकिन शालिनी माथुर की अपेक्षा यही है। उन्हें इस कविता के उल्लास में ‘निर्दयता, क्रूरता और संवेदनहीनता’ दिखाई पडती है। उनके लिए अंग-क्षति एक क्रूर अभिशाप मात्र है। वे सीधे सीधे सूसन सोंतैंग की दृष्टि के खिलाफ खड़ी हैं।

लेखिका को मालूम है कि स्तन-व्यामोह-ग्रस्त समाज में अंग-क्षति का अनुभव स्त्री के लिए एक राहत जैसा भी हो सकता है। लेकिन वे कविता की इस अर्थ-संभावना को नामंजूर कर देती हैं। क्यों? इसलिए कि इस कविता में ‘प्रारंभ से अंत तक वक्षस्थल का वर्णन सौंदर्य-बोधक उपमानों” के साथ किया गया है। क्या सचमुच? क्या इस कविता में उन्नत पहाड़ों का उपमान सौंदर्यबोधक है? कविता में पहाड़ों के पहले दूध की नदियों के जिक्र है। दूध की नदियां प्रवाहित करने वाले पहाड़ क्या इतने स्थूल अर्थ में सौंदर्यबोधक हैं? क्या वे नायिका-भेद और नखशिख-वर्णन की याद दिलाते हैं? क्या मौत की चुहिया, तकलीफ के हीरे, बुलबुले वगैरह शृंगारिक उपमान हैं? निश्चय ही यह आलेख एक उत्कृष्ट उदाहरण है कि कविता को किस तरह नहीं पढ़ना चाहिए!

कविता की ‘मैं’ हटा दिये गये अंगों से कहती है –

“हंसकर कहूंगी – हलो,
कहो, कैसे हो? कैसी रही?
अंततः मैंने तुमसे पा ही ली छुट्टी!”

क्या यहां उन अंगों के प्रति नफरत दिखाई दे रही है? क्या यहां एक गहरा सहेलीपन, आत्मीयता, पीड़ा की साझेदारी, दोस्ताना गिला-शिकवा नहीं दिखाई दे रहा?

लेखिका को केवल पोर्नोग्राफी दिखाई दे रही है। ”पवन करण का पुरुष स्त्री को पोर्नोग्रफर की दृष्टि से निरूपित कर रहा है और अनामिका की स्त्री पोर्नोग्राफर की दृष्टि से निरूपत हो रही है।” उन्हें इन दो कविताओं में पुरुष और स्त्री दृष्टि का भी कोई भेद नहीं दिखाई दे रहा।

पोर्नोग्राफी के विषय में खुद स्त्रीवाद के दायरे में शोध, बहस और विमर्श का जखीरा इतना बड़ा है कि उसे संक्षेप में समेटने के लिए भी एक विशेषांक की जरूरत पड़ेगी। पोर्नोग्राफी के हजारो रूप हैं। पोर्नोग्राफी किसी भी तरह की हो, वह हर हाल में स्त्री के लिए अपमानजनक ही होती है, यह कोई सर्वस्वीकार्य धारणा नहीं है। ऐसी धारणा स्वयं स्त्री के खिलाफ जा सकती है। उदाहरण के तौर पर आज कल ढेर सारे लोगों के लिए चर्चित पोर्न अभिनेत्री सनी लियोन का नाम एक प्रकार के कुत्सित उल्लास का रूपक बन चुका है। कुछ लोग इस नाम का उपयोग एक गाली की तरह स्त्री के आत्म-निर्णय और उसकी आजादी का मजाक उड़ाने के लिए करते हैं। क्या ऐसा करना उचित है? लियोन खुद कहती हैं कि पोर्नोग्राफी उनके लिए अपनी सृजनात्मकता की अभिव्यक्ति का एक खास तरीका है, जिसे उन्होंने अपनी इच्छा से चुना है, और जो उनके लिए गर्व का विषय है।

आखिर पोर्न कलाकार बनने का फैसला खास तौर पर स्त्री के लिए इतना अपमानजनक क्यों होना चाहिए? हमारे देश में अगर कोई फौज या पुलिस में भर्ती हो कर अपने ही लोगों के कत्लेआम के लिए इस्तेमाल किया जाए, तो भी उसे अपमानजनक दृष्टि से नहीं देखा जाता। प्रधानमंत्री ऐसी नीतियां लागू करें, जिनसे लोग तिल तिल कर मरने के लिए मजबूर हों तो भी उसकी नैतिक छवि पर आंच नहीं आती। लेकिन एक स्त्री अगर अपनी निर्वस्त्र तस्वीरें प्रकाशित कर दे तो यह नहीं कि उसे केवल अनैतिक करार दे दिया जाता है, बल्कि उसे मनुष्य की गरिमा से ही खारिज कर दिया जाता है। और इसके लिए निर्वस्त्र होना भी जरूरी नहीं है, उसका जींस या स्कर्ट पहनना भी काफी हो सकता है। यौन-नैतिकता का ऐसा कठोर पुरुषवादी नजरिया स्त्री का उत्पीड़न उसके मन, देह और सामाजिक अस्मिता के स्तर तक करता है।

चर्चित आलेख में कहा गया है कि वह नग्नता के खिलाफ नहीं है, सिर्फ ‘स्त्री शरीर के पोर्नोग्राफिक निरूपण के खिलाफ’ है। तब भी वह उन तमाम स्त्रियों के खिलाफ तो है ही, जो अपनी सृजनात्मकता की अभिव्यक्ति के लिए पोर्न-कलाकार बनती हैं और जो पोर्न देख-पढ़ कर आनंदित होती हैं। साथ ही वह उन तमाम कविताओं के खिलाफ है, जिनमें किसी भी रूप में स्त्री की विवशता, पीड़ा और शारीरिक व्याधि का उल्लेख हुआ हो। क्योंकि ये सारी चीजें स्वतः ‘स्त्री शरीर’ के पोर्नोग्राफिक निरूपण की श्रेणी में आ जाती हैं। क्योंकि ऐसी कविताएं, उनके लेखे, स्त्री की अपमानजनक छवि प्रस्तुत करती हैं या फिर शरीर और मन के बीच द्वैत स्थापित करती हैं। जबकि संभव है कि ऐसी कविताएं इन दोनों बातों के ठीक विरोध में खड़ी हों, जैसा कि हम ऊपर देख चुके हैं। इसका मतलब यह एक ऐसा स्त्रीवाद है, जो स्वयं स्त्री के खिलाफ खड़ा है।

लेखिका द्वारा बारंबार उद्धृत सूसन सोंतैंग ने पोर्नोग्राफी की हमारी समझ को विकसित करने की दिशा में महत्वपूर्ण काम किया है। पोर्नोग्राफी की उनकी धारणा इतनी आसान नहीं है, जितना उसे इस आलेख में जहां-तहां से चुने गये उद्धरणों के आधार पर दिखाया गया है। भले ही सूसन का विश्लेषण पोर्न के सभी रूपों को नहीं समेटता, लेकिन वह उस खास तरह की पोर्नोग्राफी को समझने में हमारी मदद करता है, जिसमें स्त्री के अपमान को पुरुष के आनंद का आधार बनाया जाता है। वे बताती हैं कि पोर्नोग्राफर एक ऐसा व्यक्ति है, जो अपने अंतर्मन में स्त्री की स्वतंत्रता और यौनिकता से डरा हुआ है। वह स्त्री को अधिक से अधिक उत्पीड़ि‍त और नियंत्रित करके अपने मन के डर को झुठलाने की कोशिश करता है। उसका सारा आनंद इस कल्पना में है कि वह स्त्री को मनचाहे ढंग से नियंत्रित कर पा रहा है। लेकिन आखिरकार वह भी जानता है कि दरहकीकत वह ऐसा कर नहीं सकता। उसकी हताशा के अनुपात में पोर्नोग्राफी में हिंसा बढ़ती जाती है। लेकिन वह कितनी भी बढ़ जाए, पोर्नोग्राफी के आनंद का अंत एक जबरिया हासिल किये गये वीर्यपात (चरमसुख नहीं) के साथ होता है, जो उसके बुनियादी डर और हताशा का अंत नहीं करता, बल्कि उसे और बढ़ा देता है।

इतना ही नहीं, पोर्नोग्राफी की बुनियादी विडंबना यह है वह स्त्री को एक वस्तु के रूप में बदलना तो चाहता है, लेकिन अगर सचमुच ऐसा हो जाए, स्त्री पूरी तरह वास्तुकृत हो जाए, तो भी पोर्नोग्राफर का आनंद समाप्त हो जाता है। उसका आनंद आखिरकार वस्तु बनने से स्त्री के इनकार में है। जितना इनकार होगा, उतनी ही हिंसा की गुंजाइश होगी, उतना ही मजा बढ़ जाएगा। उसका आनंद इस तथ्य पर आधारित है कि स्त्री कभी भी पूरी तरह वस्तुकृत नहीं की जा सकती। इसलिए आनंद में ही हताशा के बीज छुपे हुए हैं। डर-हिंसा-आनंद-हताशा-डर – यह एक दुश्चक्र है, जो जारी रहता है। पोर्नोग्राफी इसीलिए एडिक्टिव होती है।

लेखिका सूसन को विस्तार से उद्धृत करने एक बावजूद इस प्रक्रिया-विश्लेषण को अपने लेख में शामिल नहीं करती। क्या इसलिए, कि ऐसा करने इन कविताओं को पोर्नोग्राफिक साबित करने में कोई मदद नहीं मिलती?

आजकल अस्मिता-संबंधी संवेदनशीलता का एक ऐसा रूप देखने को मिलता है, जिसमें विवेक और विचार के लिए जरूरी धीरज का पूरी तरह से बहिष्कार कर दिया गया है। ऐसी मूढ़-अस्मितावादी प्रवृत्ति कलात्मक और साहित्यिक कृतियों का कुपाठ करने में माहिर है। हालिया आंबेडकर-नेहरू कार्टून-विवाद में भी यह प्रवृत्ति दिखाई पड़ी। कार्टून में कोड़े का दिखना ही कोड़े के जरिये किये गये अपमान की सुदूर स्मृतियों को जगा देने के लिए काफी था। अगर ऐसी संवेदनशीलता होगी, तो यह सोचने के लिए समय और धीरज कहां होगा कि कोड़ा उत्पीड़न के यंत्र के रूप में आया है या उत्पीड़न मिटाने की कोशिशों को तेज करने के लिए। ऐसे में कतई मुमकिन है कि जो कोड़ा हमारे हित में उठा हो, उससे ही दुश्मनी ठान ली जाए या उसे दुश्मन को थमा दिया जाए।

शीर्षक सौजन्‍य : जानकी पुल

(आशुतोष कुमार। आलोचक। नेतरहाट, पटना, इलाहाबाद और जेएनयू से पढ़ते हुए इन दिनों दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय में प्राध्‍यापक। जनसंस्‍कृति मंच से जुड़ाव। पुनर्विचार नाम का ब्‍लॉग। उनसे ashuvandana@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

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