ओबीसी साहित्‍य : जिनकी सत्ता, उनका साहित्‍य

♦ हरे राम सिंह

राजेंद्र यादव ने फारवर्ड प्रेस के साथ बातचीत में हिंदी साहित्य की पहचान करते हुए कहा था कि सारा साहित्य (दलित साहित्य को छोड़कर) ब्राह्मणवादी साहित्य है; भले ही वह सीधा दिखाई न दे; लेकिन उसी फ्रेम वर्क में है। फणीश्वरनाथ रेणु का मैला आंचल भी! वहीं, अगले पल इसी साक्षात्कार में राजेंद्र कहते हैं कि – “इतिहास उनके होते हैं जो अपनी जिंदगी के फैसले ले सकते हैं।” उसके बाद दलित साहित्य व साहित्यकार से स्वयं को भिन्न रूप में पेश करते हुए वे कहते हैं, “इनके पास (दलितों के पास) कलात्मकता नहीं है, इन्हें कहने का तरीका नहीं आता। इस तरह का अहंकार चीजों को जज करने का और जजमेंट पास करने का हमें दो हजार साल के संस्कारों से मिला है हम उस पावर के हिस्से हैं, जो चीज तय करते हैं। हो सकता है उनकी कला हमसे अलग हो या वे खुद रिजेक्ट करें, अभी तो हम रिजेक्ट कर रहे हैं न। हम बता रहे हैं कि कैसे लिखो, कैसे न लिखो।” (वाक्यं रचना संपादित) (फारवर्ड प्रेस, सितंबर 2011)

राजेंद्र जी जैसे दलित-बहुजन समर्थक लेखक का यह साक्षात्कार कई जरूरी सवालों को जन्म देता है। मसलन,

1) अगर हिंदी साहित्य का वह सब हिस्सा जो दलित साहित्य के अंदर नहीं आता, ब्राह्मणवादी साहित्य है, या उसका फ्रेमवर्क ही ब्राह्मणवादी साहित्य का है, तो क्या आज जरूरी है कि हम (ओबीसी) उसी फ्रेमवर्क से अपना काम चलाएं या उसी के एक हिस्से के रुप में खुद की पहचान करें।

2) क्या सचमुच फणीश्वरनाथ रेणु का “मैला आंचल” ब्राह्मणवादी साहित्य के फ्रेमवर्क में बंधा है? क्या “मैला आंचल” उनके साहित्य से बहुत से मायनों में भिन्न नहीं है?

3) जब, राजेंद्र यादव यह कह रहे हैं कि इतिहास उनके होते हैं, जो अपनी जिंदगी के फैसले खुद ले सकते हैं। तो क्या साहित्य के क्षेत्र में ओबीसी अपना फैसला स्वयं लेता या “ओबीसी साहित्य” को अलग से रेखांकित करता है या उसका सिद्धांत गढ़ता है तो यह गलत है?

4) जब वे (सवर्ण) और दलित साहित्य के क्षेत्र में फैसले स्वयं ले रहे हैं तो क्या यह ओबीसी के पास अधिकार नहीं है कि वह अपना फैसला स्वयं ले और चीजों को स्वयं तय करे, जज करे, जजमेंट पास करे।

5) भारत की आधी से अधिक आबादी ओबीसी की है, तो फिर इसका अपना साहित्य क्यों नहीं हो सकता? अतीत में भी और वर्तमान में भी।

6) जब राजेंद्र यादव यह कहते हैं कि “हम उस पावर के हिस्से हैं, जो चीज तय करते हैं”। तो क्या हम मान लें कि वर्तमान में हम (ओबीसी) सच में पावर का वह हिस्सा हैं, जो चीज तय करता है?


राजेंद्र यादव के सुर में सुर मिलाते हुए वीरेंद्र यादव भी फारवर्ड प्रेस में लिखते हैं कि “दलित साहित्य की तर्ज पर ओबीसी साहित्य की परिकल्पना एक विवादास्पद और जोखिम भरा मुद्दा है। विशेषकर तब जब इसे ओबीसी समाज की सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक स्थितियों से विच्छिन्न करके जाति विशेष की पहचान तक सीमित रखा जाए। प्रश्न यह है कि यदि प्रभुत्वशाली अभिन्न साहित्य परंपरा के बरक्स पिछड़े समुदाय की श्रमशील परंपरा की तलाश की जाती है तो वह साहित्य की विषयवस्तु के आधार पर की जानी चाहिए या कि लेखक की जाति के आधार पर?” (बहुजन साहित्य वार्षिकी, अप्रैल 2012, पृष्ठ संख्या 24)

वीरेंद्र कहते हैं कि “ओबीसी साहित्य की परिकल्पना विवादास्पद और जोखिम भरा है।” हिंदी के बौद्धिकों में साहस की इतनी कमी क्यों है? हिंदी का पिछली एक सदी का इतिहास बताता है कि जोखिम नहीं उठाने के कारण ही हिंदी का विमर्श क्षेत्र सिकुड़ता गया है। समय ने “ओबीसी साहित्य” को जन्म दिया है। उसे रोकने का साफ मतलब यह हुआ कि हम हिंदी साहित्य के विकास को किसी न किसी रूप में रोक रहे हैं क्योंकि हमारे भीतर सवर्ण मानसिकता का “अहंकार” बैठा है। ओबीसी साहित्य को वर्ग के आधार पर और विषय वस्तु के आधार पर देखना अलग बात है। वीरेंद्र यादव यह पहले से ही कैसे अनुमान लगा बैठे कि ओबीसी साहित्य की पहचान जाति विशेष की पहचान तक सीमित होगी ? क्या “ओबीसी” शब्द जाति का सूचक है? क्या यह भारतीय वर्ग का नाम नहीं है? पिछड़ा वर्ग की अंग्रेजी “बैकवर्ड क्लास” ही है न कि कुछ और है?

प्रेमचंद, राहुल सांकृत्यायन, पांडेय बेचन शर्मा “उग्र”, रांगेय राघव, नागार्जुन, डा धर्मवीर भारती, डा लक्ष्मीकांत वर्मा, राही मासूम रजा की प्रगतिशीलता मात्र से पिछड़ों की प्रगतिशीलता व श्रमशीलता से इनका साहित्यिक इतिहास खड़ा हो जाएगा? क्या अभी तक वे (ओबीसी) इनके ही फैसले मात्र पर अपनी जिंदगी, इतिहास, साहित्य छोड़ दें?

राजेन्द्र यादव और वीरेंद्र यादव का साहित्य सबका है; पर उन्हें और उनके साहित्य को ‘ओबीसी’ द्वारा पैदा किया गया है। इनके जातीय अनुभवों को विकसित करने में करोड़ों लोगों की भूमिका रही है। मार्क्सवादी आलोचक डा ललन प्रसाद सिंह ने बीएचयू में यह स्पष्ट शब्दों में कहा था कि ओबीसी का सौंदर्यशास्त्र मार्क्सवाद पर आधारित है। कबीर, जोतिराव फूले, मार्क्स और बुद्ध इसके केंद्र में हैं। वीरेंद्र यादव ने ओबीसी साहित्य को मात्र जाति से जोड़कर इसे सीमित करने का प्रयास किया है। दलित-ओबीसी के संबंध में वीरेंद्र जी का नजरिया साफ नहीं है।

राजेंद यादव क्या यह बता सकते हैं कि साहित्य अकादमी सम्मान (हिंदी), ज्ञानपीठ अवार्ड (हिंदी) अबतक सबसे अधिक सवर्णों या ब्राह्मणों को क्यूं मिला? क्या वे बता सकते हैं कि कुम्हार, निषाद, चेरो, खरवार, कोयरी, अहीर, के इतिहास पर अबतक बड़ा कार्य क्यूं नहीं हुए? राजेंद्र-वीरेंद्र जी आप खुद अपनी बातों का स्मरण कीजिए – “सत्ता जिनके पास होगी साहित्य उनका होगा या जो सत्ता के अधीन हैं उनका होगा?” अब निर्णय लेना होगा हम कहां खड़े हैं?

हरेराम सिंह वीरकुंवर सिंह यू‍निवर्सिटी में हिंदी साहित्य के विद्यार्थी हैं और उनकी यह टिप्‍पणी फारवर्ड प्रेस के जुलाई, 2012 अंक में प्रकाशित हुई है।

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