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#Aurat … तोड़ कर रस्म के बुत बन्द-ए-क़दामत से निकल

1 September 2012 11 Comments

औरत को डायन और पागल ठहराने के पीछे

♦ सुधा अरोड़ा

हम बचपन से ऐसी स्त्रियों के बारे में सुनते आये हैं, जो एक दिन पागल हो जाती हैं
एक भरी-पूरी गृहस्थी और फैले हुए सामान के बीच एक स्त्री पागल हो जाती है
कहा जाता है, इस औरत पर देवी आ विराजती है
वह एक दिन बेकाबू हो जाती है
वह बाल खोलकर ऊंची आवाज में आंय-बांय बकती है
एक स्त्री का स्वर अचानक अपरिचित हो जाता है
उसके गले से निकलते हैं दूसरों के विचार, गैरों की बददुआएं
किसी दूर के आदमी की धमकियां, सर्वनाश की भविष्यवाणियां
एक जवान स्त्री की बड़बड़ाहट में उसका ऐसा अकेलापन छिपा होता है जिसकी तुलना केवल पुराने खंडहरों से की जा सकती है
एक पागल कही जानी वाली स्त्री को सबसे ज़्यादा याद आता है अपना बचपन और वह हंसने लगती है
एक हंसती हुई स्त्री का झोंटा पकड़कर खींचा जाता है
एक रोती स्त्री के गालों पर तड़ातड़ तमाचे जड़े जाते हैं
एक बदहवास औरत के बदन पर धूप, अगरबत्ती, नीबू, मंत्र और अंगारों को रख दिया जाता है
बेचैन स्त्री की देह ऐंठती है
कांपते कांपते वह बेदम हुई जाती है
अंत में निढाल होकर वह हमारी दुनिया में वापस लौट आती है
एक बेदम हो चुकी स्त्री से कहा जाता है, अच्छा हुआ तुम लौट आयीं किसी के चंगुल से
तब कोई नहीं देख रहा होता कि एक लौटा हुआ चेहरा भय और अपराध के अंधेरे में पत्थर हो चुका है…

विजयकुमार


बात दस साल पुरानी है पर यह सिलसिला आज भी थमा नहीं है। आये दिन गांव देहात में किसी औरत को भीषण सजा और यातना देने के लिए उसे एक दिन डायन घोषित कर दिया जाता है और कुछ व्यक्तियों की साजिश में पूरा का पूरा गांव शामिल होकर उस दमनचक्र में शामिल हो जाता है। 29 मार्च, 2002 देवली के पास मानपुरा गांव, टोंग जिला, राजस्थान, दिन के सवा बारह बजे, अचानक गांव के बारह तेरह लोगों की एक टोली, जिसमें महिलाएं भी शामिल थीं, लोहे की छड़ें और कुल्हाड़ी लेकर एक घर में घुस आयी और वहां रहने वाली मीणा जाति की कमला देवी को चुड़ैल और डाकिन कहते हुए उस पर टूट पड़ी। रामसिंह ने लोहे की छड़ से उसके सिर पर तीन वार किये। उसकी खूब पिटाई की गयी, उसके गुप्तांग पर मिर्च छिड़क दी गयी और उसे डेढ़ घंटे तक गांव के एक दूसरे घर की ओर नग्न अवस्था में घसीटते हुए ले जाया गया।

डाकिन उर्फ डायन को मारने पीटने के इस ‘पुण्यकार्य’ में कई लोग शामिल हो गये। उसे मारते हुए लोग चिल्ला रहे थे, ‘तूने परेशान कर रखा है। हम तुझे जान से खत्म कर देंगे। बोल, तू बच्चों को खाना छोड़ेगी या नहीं? अपने जादू से बाज आएगी या नहीं?’

पिट पिट कर बदहाल हुई औरत के पास कहने को क्या हो सकता है? गांव के ही एक अन्य मीणा के घर में उसे बंद रखा गया, यह कहते हुए कि उस घर की एक लड़की मीरा पर भी चुड़ैल आ बिराजी है और यह कमला का ही जादू है, वही इसे भगा सकती है।

शाम के समय अधमरी अवस्था में उसे वापस उसके घर लाकर डाल दिया गया, इस धमकी के साथ कि खबरदार, परिवार में से किसी ने भी अगर पुलिस में रिपोर्ट करने की कोशिश की, तो पूरे परिवार को खत्म कर देंगे।

जयपुर से कविता श्रीवास्तव ने दो दिन बाद ही इस घटना की सूचना दी थी। बीसेक दिन बाद जब उससे बात हुई तो उसने बताया – याद है, कमला के बारे में बताया था मैंने। अभी वह नहा धोकर सोयी है। लगता है जैसे महीनों से नहीं सोयी।

इस तरह की खबरें सुनकर यह सवाल हमें परेशान करता है कि क्या पूरे गांव के लोगों का जमीर मर गया है कि वे एक बेकसूर औरत को भीड़ द्वारा पिटते हुए देखते रहते हैं और कोई आवाज नहीं उठाता? अकेले राजस्थान में पिछले दो सालों में पांच महिलाओं को डाकिन बताकर उन्हें तरह तरह से प्रताड़ित किया गया है।

भारत के गांवों कस्बों में आज भी प्रताड़ना का यह सिलसिला जारी है। किसी भी औरत को चुड़ैल या डायन घोषित कर उसके साथ मनमाना सुलूक किया जाता है। इसमें कई बार गांव की दूसरी औरतें भी शामिल हो जाती हैं। ऐसी औरतें, जिन्हें उस औरत से कोई जाती नाराजगी या पुराना बैर हो। कुछ औरतें तमाशा या हिंसा देखने के लिहाज से जमा हो जाती हैं। फिल्मों में जैसी हिंसा, तोड़ फोड़, मारपीट दिखाई देती है, रोजमर्रा की वास्तविकता में उसे सामने घटते हुए देखना भी एक विचित्र उन्माद को पोसता है।

गांव की कुछ बुजुर्ग औरतें या पुरुष जो इसके खिलाफ बोलना चाहते भी हैं, लोगों की वहशी भीड़ और जुनून के डर से किनारे खड़े हो जाते हैं। कई बार एक औरत सामूहिक रूप से मार खाते खाते इस कदर बदहवास हो जाती है कि वह हार कर चीखने लगती है – ‘‘हां, हां, मैं डायन हूं, मैं तुम सब का नाश कर दूंगी।’’

इस तरह की घटनाओं में कई बार ‘डायन’ औरत को मार मार कर उसकी हत्या भी कर दी गयी है, पर हर बार हत्यारे छूट जाते हैं क्योंकि हत्यारा कोई एक नहीं, पूरा समूह होता है और गांव की व्यवस्था उसे सहमति देती है।

महाराष्ट्र की एक आदिवासी सामाजिक कार्यकर्ता सखुबाई इसके पीछे के कारणों की जांच में कुछ तथ्यों को सामने रखती है। मुंबई की एक सामाजिक संस्था ‘स्पैरो’ ने सखुबाई से एक मौखिक इतिहास कार्यशाला के दौरान लिये एक साक्षात्कार में इन तथ्यों का खुलासा किया। सखुबाई गावित डहाणु तालुका के मेगपाड़ा बांदघर गांव की एक आदिवासी महिला है। पिछले दस वर्षों से वह ‘काश्तकारी संघटना’ के साथ काम कर रही हैं। यह संघटना छोटे किसानों और भूमिहीन मजदूरों के हित के लिए कार्य करती है। सखुबाई हमेशा औरतों के हक में आवाज उठाती है। ऐसे मर्द जो रात को नशे में धुत होकर अपनी औरत को मारते पीटते हैं, जो एक बीवी के होते हुए दूसरी औरत को घर ले आते हैं और पहली बीवी से उसकी सेवा टहल करने को कहते हैं, सखुबाई ऐसे पुरुषों के खिलाफ औरतों को एक जुट करती है।

‘मुझे भी किसी दिन मौका मिलते ही ये लोग ‘चेटकीण’ (चुड़ैल) बता देंगे। मुझे दबाने के लिए दूसरों को भी भड़काएंगे!’ सखुबाई कहती है, ‘ऐसी औरतें जो मजबूत हैं, जो अपने हक के लिए लड़ती हैं, उन्हें ‘चेटकीण’ बुलाने का मौका ढूंढते हैं ये लोग!’

सामाजिक कार्यकर्ताओं को ‘डायन’ कहलाये जाने का अनुभव है। सखुबाई की सहयोगी शिराज बाई ने बाल विवाह के खिलाफ आवाज उठायी थी, तो गांव के कुछ लोगों ने कह दिया, ‘शिराजबाई भूताली आहे!’ कुछ ने कहा, ‘हमारी औरतों को शिराज बाई उल्टी पट्टी पढ़ाती है, हम उसको तो कुछ नहीं बोल सकते पर अपनी औरतों की पिटाई कर उनका दिमाग ठिकाने पर ला सकते हैं।’

औरत को डायन ठहराने के पीछे के कारणों की खोज करें तो कुछ रोंगटे खड़े कर देने वाले तथ्य हाथ लगते हैं। महाराष्ट्र के कैनाड गांव में एक जमींदार ने एक ऐसी औरत को डायन कहकर प्रचारित कर दिया जिसके आदमी की उन्हीं दिनों मौत हुई थी और उसे उसकी जमीन उसकी विधवा के नाम करनी थी। जमींदार ने कहा कि यह डायन अपने पति को खा गयी, इसे गांव से बेदखल करो। ऐसी विधवा औरतें जिनके बच्चे छोटे छोटे हैं, जिन्हें जमीन अपने नाम करवानी है, उन्हें उनकी ही जमीन से बेदखल करने के लिए उनके बारे में अफवाह फैला दी जाती है कि वे जादू-टोना करती हैं। उनके ही पति की मौत की घटना को उन्हें डायन ठहराने के साक्ष्य के रूप में इस्तेमाल किया जाता है। संयोग से अगर उस दौरान गांव के किसी भी बच्चे की किसी भी हारी बीमारी से मौत हो जाए तो उसकी जिम्मेदारी सीधे उस औरत पर डाल दी जाती है, जिसे डायन घोषित कर कुछ लोगों का स्वार्थ सधता है और गांव के अधिकांश लोग झट इस तरह की घटना को डायन के कारण आयी आपदा मानकर अपनी तार्किक बुद्धि को ताक पर रख उस औरत की जान के पीछे हाथ धोकर पड़ जाते हैं।

मानपुरा गांव में कमला देवी के साथ हुई इस घटना की जब छानबीन की गयी और कुछ महिला कार्यकर्ताओं ने, जिसमें जयपुर की कार्यकर्ता कविता श्रीवास्तव भी शामिल थीं, इस मामले में हस्तक्षेप किया तो पता चला कि यह भी ‘बाड़े (जमीन) का मामला’ था। गांव की किसी भी औरत को उसकी जमीन से बेदखल करने के लिए सबसे आसान तरीका उस जमीन पर कब्जा पाने वाले लोगों को यही लगता है कि कांटे को किसी न किसी बहाने से जड़ से ही उखाड़ डालो। कोर्ट कचहरी और मुकदमे के चक्कर में बरसों निकल जाते हैं और हासिल कुछ नहीं होता, वकीलों को घूस देनी पड़ती है फिर भी जमीन हाथ में आने की गारंटी नहीं होती। इसलिए सुनियोजित साजिश को अंधविश्वास का जामा पहना कर गांव वालों को अपने पक्ष में कर लेना उनके लिए आसान होता है क्योंकि गांव के लोगों में इस अंधविश्वास की जड़ें गहरे तक धंसी हुई है और अंधविश्वास को कोई पुलिस या व्यवस्था बदल नहीं सकती।

सुप्रसिद्ध बांग्ला कथाकार महाश्वेता देवी की एक चर्चित कहानी है, ‘बांयेन’, जिसमें गांव में प्रचलित इस अंधविश्वास के दो प्रकार हैं – एक डायन होती है और एक बांयेन। बांयेन को मारा नहीं जाता क्योंकि बांयेन के मरने से गांव के बच्चे जिंदा नहीं बचते, ऐसी मान्यता है। अगर किसी को डायन धर ले तो उसे जला कर मार देते हैं, पर बांयेन के धरने पर उसे जिंदा रखना पड़ता है। एक गांव की सीमा के बाहर एक औरत पगलायी सी घूमती है। अपने ‘बांयेन’ करार दिये जाने की स्थिति से पूरी तरह जागरूक वह खुद ही चलते-चलते लोगों के रास्ते से परे हट जाती है। बांयेन जब कहीं जाती है तो टिन बजाकर लोगों को सचेत करती जाती है। बांयेन को जाते देखकर बच्चे बूढ़े सभी रास्ता छोड़कर हट जाते हैं। बांयेन की नजर पड़ जाए तो खड़ा पेड़ मिनटों में सूख जाता है। गांवों में आज भी इस तरह के अंधविश्वास बखूबी पल रहे हैं।

ह तो हुई गांव की बात। अब शहरी जीवन पर आएं। क्या आपने कभी किसी मानसिक अस्पताल की औरतों से बात की है? वे औरतें जो वहां बतौर मरीज अपनी जिंदगी बिता रही हैं, उनमें से कई आपको ऐसी मिलेंगी जिन्हें बड़े सुनियोजित तरीके से पागल बना दिया जाता है।

हिंदी फिल्म जगत के एक बड़े अभिनेता की पत्नी एक महिला संगठन में सहायता के लिए आया करती थीं। उनके बारे में सुन रखा था कि वह एक बिगड़ा हुआ केस हैं और मानसिक रूप से पूरी तरह विक्षिप्त हैं, पर जब उनसे कई बैठकों में लंबी बातचीत की गयी, तो वह बहुत धीरे धीरे अपनी चुप्पी से बाहर आयीं और यह बता पाने के लायक हुई कि कैसे उन्हें धीरे धीरे विक्षिप्तता की कगार पर पहुंचाया गया। अक्सर सत्ता और शक्तिसंपन्‍न ऐसे संभ्रांत पुरुष जिनके विवाहेतर संबंध होते हैं, अपने अनैतिक संबंधों को जायज ठहराने के लिए और अपनी ब्याहता पत्नी से छुटकारा पाने के लिए उस पर मानसिक रूप से अस्वस्थ होने का आरोप लगा देते हैं। कई बार अपने हीन भाव और असुरक्षा की भावना को ढांपने के लिए भी ऐसे आरोप लगाये जाते हैं, जो मुद्दे को पूरी तरह ऐसी दिशा में ले जाए, जहां यातना के असली औजार छिप जाएं। यह आरोप एकाएक नहीं आता। आमतौर पर पुरुष अपने विवाहेतर संबंधों में अपनी पत्नी की दखलंदाजी नहीं चाहता। सबसे अहम बात यह कि वह ऐसे संबंध रखने को न सिर्फ अनैतिक नहीं मानता बल्कि इसे अपना अधिकार समझता है। उसकी यह समझ पुरुषवर्चस्ववादी समाज की ही देन है। साम दाम दंड भेद – हर तरीके से वह पहले प्यार से, फिर डरा धमका कर लगातार इसी कोशिश में रहता है कि पत्नी अपने ‘पत्नी’ होने के ओहदे को अपनी पूंजी समझते हुए उस ओहदे पर प्रसन्नता से आसीन रहे और पति के संबंधों को लेकर चेहरे पर शिकन न लाये। अगर पत्नी अपने ओहदे भर से संतुष्ट नहीं रहती और बार बार पत्नी होने का हक जताती है तो पति उसे उसकी सही ‘जगह’ दिखा देता है। लगातार तनाव में रहते हुए उसके व्यवहार में जो हताशा, अस्थिरता और निराशा आ जाती है, उसका सहारा लेकर पति उसे मानसिक रूप से असंतुलित घोषित कर देता है और अपने दूसरे संबंध के लिए अपने मित्रों और परिचितों से सहानुभूति और सामाजिक स्वीकृति चाहता है। मध्यवर्गीय महिलाओं से लेकर ऊंची सोसायटी की महिलाओं तक को अक्सर मानसिक चिकित्सक के क्‍लीनिक से होते हुए मानसिक अस्पतालों की दहलीज पर देखा गया है।

गली बार आपका सामना किसी मध्यवर्ग या संभ्रांत परिवार की ऐसी शादीशुदा महिला से हो जो मानसिक रूप से विक्षिप्त घोषित कर दी गयी है तो उसे एक सामान्य पागलपन का केस समझकर खारिज न कर दें, यह निश्चित मानिए कि वह अपने भीतर एक सुनियोजित साजिश का इतिहास संजोये है।

शीर्षक सौजन्‍य : कैफी आजमी की कविता ‘औरत’ से

(सुधा अरोड़ा। वरिष्‍ठ लेखिका और स्‍तंभकार। महिला संगठनों और महिला सलाहकार केंद्रों के सामाजिक कार्यों से जुड़ाव। जीवनयात्रा की शुरुआत लाहौर से। इन दिनों मुंबई में रहती हैं। उनके बारे में इस लिंक पर विस्‍तृत जानकारी है, www.abhivyakti-hindi.org। उनसे sudhaarora@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

11 Comments »

  • sujit sinha said:

    सौ फीसदी सहमत | पुरुष वर्चस्ववादी समाज में नारियों को आये दिन हजारों यातनाएं झेलने ही पड़ते हैं | मैं एक अनुभव शेअर कर रहां हूँ | यह 07-08 साल पुराणी बात है | जमुई के एक गावं(मेरे पापा वाहन सरकारी नौकरी करते थे ) में एक महिला थी, जिसे डायन माना जाता था और सामाजिक बहिष्कार किया जाता था | वो गरीब परिवार से थी और उसके गोतिया लोग धनी थे |निश्चित रूप से ऐसा प्रोपेगेंडा उनके गोतिया लोगों के द्वारा प्रचारित था कि अमुक महिला डायन है | अपने समाज का भी दुर्भाग्य है कि वो अफवाहों पर जीता है |शोषकों की बातें ज्यादा सुनी जाती है गोया कि राजा की बात मानना धर्म है | खैर उस परिवार का ऐसा बहिष्कार था कि न कोई उसके यहाँ जाता , न उन्हें कहीं बुलाया जाता था |उस महिला को एक लड़का है, दीपक | वो भी अलग-थलग महसूस करता था | क्लास में बच्चे उससे बात नही करते थे | जब सारी बातें मुझे पता चली तों मैं दीपक से यूँ ही मिला | उस समय में ग्रजुएशन कर रहा था | जिंदगी को लेकर कई अच्छी कल्पनाएँ और आदर्श हिलोरें मार रहे थे | उस लड़के की सौम्यता से प्रभावित होकर मैं उसे अपने यहाँ ट्यूशन के लिए बुलाने लगा | दीपक उस समय आठवें में पड़ता था | ये बात मेरे परिवार (विशेषकर मेरे पापा )समेत पूरे लोगों को नागवार लगी | मुझे कई प्रकार (कभी प्यार से तों कभी धमकाकर) से समझाया जाने लगा | लेकिन पता नहीं किस अंत:प्रेरणा से प्रेरित होकर मैंने किसी की नहीं सुनी |धीरे-धीरे उस परिवार में मेरा आना जाना होने लगा | महिला,(दीपक की माँ, जिसे मैं चाची कहने लगा था ) बेहद सीधी थी | कुछ हद तक मानसिक कमजोर भी थी(हो सकता है ,ताने झेलने के कारण ऐसा हुआ हो )| मुझे लगा ये कमजोर औरत किसी को केसे मार सकती है |दीपक को मैं पदाता रहा | उसके घर पर मैं खाता-पीता भी था | लेकिन मुझे कभी खांसी भी न हुई | दीपक को भर सक मैं समझाता रहा कि इन बातों से कूछ नही होता | वो केवल अपनी पदाई करे | आगे के वर्षों में मैं दिल्ली आ गया | लेकिन दीपक के साथ रिश्ता बना रहा | आज दीपक यूनियन बैंक ऑफ इंडिया में पीओ है | चाची भी स्वस्थ हैं और अपने बेटे के साथ है | उस परिवार से आज भी मेरा रिश्ता कायम है |आज मैं कभी-कभी मजाक में चाची से कहता हूँ कि मुझे भी डायन विद्या सिखा दे | फिर हमलोग हँसने लगते हैं |ये है ,एक डायन कथा | आज , अब भी जब मैं ऐसी बातें सुनता हूँ तों मन क्षुब्द हो जाता है |क्यों केवल गरीब , दलित महिलाएं ही डायन होती है ? बहरहाल जिंदगी में एक दिलासा भी है कि मैंने आवाज उठाई थी, किसी पीड़ित परिवार का साथ दिया था |

  • Deepti Gupta said:

    सुजित जी,

    सुधा जी के आलेख के सन्दर्भ में आपने अपना एक ऐसा व्यक्तिगत अनुभव हमारे साथ बाँटा जो पुरुष वर्चस्व से बिंधे, उस समाज की क्रूर तस्वीर पेश करता है,जहां कमज़ोर और गरीब महिला की सीधी – सरल पहचान को, डायन और चुड़ैल के रूप में किस आसानी से रूपांतरित कर दिया जाता है ! इस तरह के अनेक (पागल,मानसिक रोगी) जामे पहना कर, सामाजिक रूप से औरत को बहिष्कृत कर- उसे मानसिक और भावनात्मक यंत्रणा देना एक लम्बे अरसे से चला रहा है ! पुरुष वर्चस्व की इस कूटनीति का शिकार दीन-हीन औरतें ही नहीं, वरन पढ़ी लिखी, आत्मनिर्भर औरते भी होती हैं ! खैर……!

    आपके गाँव की इस घटना और उसमे आपकी सहानुभूति एवं संकल्पपूर्ण उद्धारक की भूमिका को देखकर मन में विचार आया कि – काश ! सभी लोग आप जैसे होते तो कितना अच्छा होता..!

    दीप्ति

  • sujit sinha said:

    दीप्ति जी,
    धन्यवाद |मैं साधारण पडा-लिखा व्यक्ति हूँ | दिल्ली में एक सरकारी महकमा में क्लर्की करता हूँ | आपका रिस्पांस पा कर आह्लादित हूँ |गाँव का समाज आज मीडिया में उपेक्षित है |कई द्रवित कर देने वाली घटनाएँ घटती रहती है |मेरी भाषा औसत है और मैं अपने विचारों को समेकित रूप से बाँध भी नही पाता हूँ |अस्तु, कुछ नही लिखता | बस आप लोग जैसे पडकर अपना उन्नयन करने कि कोशिस करता रहता हूँ | आपके कमेंट्स से मेरा हौंसला बडा है | और हां, आपके एक शब्द ‘उद्धारक’(मेरे सन्दर्भ में )से मैं सहमत नही हूँ | ये आपका प्यार और बडप्पन ही है |

  • rashmi ravija said:

    बहुत ही कड़वी सच्चाई बयाँ की गयी है,इस आलेख में.
    अक्सर ऐसा ही होता है. .जो स्त्री भी लीक से थोड़ा हट कर चले…या अपने ऊपर किए गए अत्याचारों के खिलाफ आवाज़ उठाये , विरोध करे या फिर अपने अधिकारों की मांग करे…अपने मन की कहने में ना झिझके उसे गाँवों में डायन और शहरों में तथाकथित शिक्षित लोगों द्वारा पागल घोषित कर दिया जाता है.
    कुछ ही दिनों पहले नार्वे में भारतीय दंपत्ति ,जिनके बच्चे नार्वे सरकार ने फ़ॉस्टर पैरेंट्स को दे दिए थे. उन पति-पत्नी के बीच आपस में मतभेद हुए और पति ने झट से मिडीया के सामने कह दिया कि ‘उनकी पत्नी मानसिक रोगिणी है और वे उस से तलाक चाहते हैं. ‘ अगले ही दिन वे अपने इस बयान से पलट भी गए.

    पति सिर्फ, विवाहेतर सम्बन्ध कायम रखने के लिए ही पत्नी को ‘पागल’ नहीं करार देता है.किन्तु अगर पत्नी घरेलू हिंसा का विरोध करे तब भी उसे मानसिक रोगी बता दिया जाता है. मैने भी इसी विषय पर एक पोस्ट लिखी थी..जिसमे अपने बचपन की एक घटना का उल्लेख किया था .

    “एक दिन हम बच्चे दस वर्षीया मीता के घर के पास ही खेल रहे थे कि उसके घर से ऊँची-ऊँची आवाजें सुनाई देने लगीं. मीता ..उसका छोटा भाई और हम कुछ बच्चे बाहर दरवाजे के पास दुबक कर सुनने लगे. मीता के नाना-नानी आए हुए थे . उसकी माँ जोर-जोर से ऊँची आवाज़ में बोल रही थीं..” ये इतना मारते-पीटते हैं…आपलोग कभी कुछ नहीं कहते..वगैरह वगैरह..” मीता के पति गरज रहे थे, “ये पागल हो गयी है..कुछ भी बोलती है..इसे पागलखाने में भर्ती कराना पड़ेगा ” मुझे लगा…उसके नाना-नानी उनका विरोध करेंगें…पर शब्दशः तो नहीं याद पर दोनों अपनी बेटी को ही दोषी ठहरा रहे थे कि “उसे गुस्सा क्यूँ दिलाती हो..आदि..आदि “…मीता की माँ के मन में शायद बहुत दिनों का गुबार जमा था..वे बोलती जा रही थीं…इस पर उसके माता-पिता भी उसके पति के सुर में सुर मिलाने लगे कि “ऐसे बोलोगी तो सचमुच तुम्हे पागलखाने में भर्ती कराना पड़ेगा” ये सुनते ही…मीता और उसका छोटा भाई दौड़ कर अंदर जाकर माँ से लिपट कर रोने लगे. उसकी माँ उन्हें लेकर भीतर चली गयीं. सब शांत हो गया. हम बच्चे लौट आए. कुछ दिनों बाद उसके नाना-नानी चले गए और मीता की माँ हमसे वैसे ही प्यार से पेश आती रहीं.

  • rashmi ravija said:

    “मीता के पति की जगह मीता के पिता पढ़ें” *

  • Sanjeev Chandan said:

    एक बदहवास औरत के बदन पर धूप, अगरबत्ती, नीबू, मंत्र और अंगारों को रख दिया जाता है
    बेचैन स्त्री की देह ऐंठती है
    कांपते कांपते वह बेदम हुई जाती है
    अंत में निढाल होकर वह हमारी दुनिया में वापस लौट आती है
    एक बेदम हो चुकी स्त्री से कहा जाता है, अच्छा हुआ तुम लौट आयीं किसी के चंगुल से
    तब कोई नहीं देख रहा होता कि एक लौटा हुआ चेहरा भय और अपराध के अंधेरे में पत्थर हो चुका है…

  • Sudha Arora said:

    लोकगायिका विजया भारती ने अपने पत्रकार पति के खिलाफ घरेलू हिंसा की शिकायत दर्ज की तो फौरन पत्रकार पति ने अपना बयान दिया कि अपनी पत्नी को प्रमुख मनोचिकित्सक के पास वे ले जा चुके हैं . उनका इशारा पत्नी के मानसिक असंतुलन की ओर था . और कि वे जानते हैं कि रात को विजया उनके साथ ही खाना खायेंगी ! समय इतना आगे बढ़ चुका है , पर घरेलू हिंसा का पैटर्न वही सदियों पुराना है , उसमें कोई फर्क नहीं आया ! औरत की बिलख के बरक्स पति का आत्मविश्वास ठसक के साथ खड़ा है ! कितना बदल पायेंगे हम इसे ?

  • अर्पिता said:

    सामजिक बहिष्कार करना तो अब के समय में संभव नहीं है हम लोगों से….निश्चित ही ऐसी खबरें और घटनायें पढकर-देखकर हम सब मन ही मन दोहराते होंगे और स्वयं को सही साबित करने की तजवीजें ढूंढते हैं …..

    दुखद और शर्मनाक है !!!!!!

  • kamini said:

    nari jindagi itani si kahani bhar nahi hai ki use purush jala de aur baijhane ke baad us ki rakh ko aapane paon tale mal kar uda de.agar aisi bat hoti to kab ki nashat ho gai hoti.Apar prem ,mamata Ssakti aur sahanubhuti kI vah murtiman svarup islie nari ko purush varg hamesha bahala fusala kar apne pakchh me rakhana chahata hai.kahan milegi usko jaisa kritagya prani.magar ahankar krodh aur sankirnta ne usake budhi ko avarudha kar diya
    hai .agar aba bhi ve satark nahi hue to isaka bahut bura parinam samaaj ko bhugatana padegaa

  • Sandhya Navodita said:

    बहुत गम्भीर और संवेदनशील लेख.सुधा अरोरा जी ने बेहद मार्मिकता से विषय को उठाया है.

  • नीलाम्बुज said:

    इतिहास में पहली स्त्री-हत्या
    उसके बेटे ने अपने बाप के कहने पर की।
    जमदग्नि ने कहा कि ओ परशुराम !
    मैं तुमसे कहता हूँ कि अपनी माँ वध कर दो
    और परशुराम ने कर दिया । -रमाशंकर यादव ‘विद्रोही’

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