इस मुल्क को जहां से भी देखो, यह कार्टून नजर आएगा
♦ प्रसून तिवारी

हाल ही में कार्टूनिस्ट असीम त्रिवेदी पर देशद्रोह और राष्ट्रीय चिन्हों के अपमान के आरोपों को लेकर बांद्रा (मुंबई) की एक अदालत में पेश किया गया, जिसने उन्हें 16 सितंबर तक की पुलिस हिरासत में भेजने का आदेश दिया। असीम पर देशद्रोह (आईपीसी की धारा 124A) और राष्ट्रीय सम्मान अधिनियम 1971 के अलावा सूचना प्रौद्योगिकी (संशोधित) अधिनियम, 2008 की 66A के उल्लंघन का मामला भी दर्ज किया गया है। इसलिए इसके साथ सोशल मीडिया पर अभिव्यक्ति की स्वत्रंतता का मुद्दा भी इस पूरे मामले से जुड़ जाता है।
जहां तक बात राष्ट्रीय चिन्हों के अपमान को लेकर है, तो हम सभी को ये बात समझनी होगी कि एक प्रगतिशील समाज में एक कलाकार को अपनी भवनाएं व्यक्त करने का पूरा-पूरा मौका दिया जाना चाहिए। कलाकार के काम के पीछे उसकी मूल भावना टटोलनी चाहिए। असीम के कार्टून भ्रष्टाचार और नेता और बाबुओं के गठजोड़ पर तगड़ा प्रहार करते हैं। राष्ट्रीय चिन्हों के अपमान के कई तरीके हो सकते हैं, उसके लिए कार्टून बना कर इतनी मेहनत करने की क्या जरूरत है। क्या असीम इतने अपरिपक्व हैं कि उन्हें कार्टून बनाते वक्त इसके परिणामों का अंदाजा नहीं रहा होगा और अगर ये बात होती तो इस वक्त मुंबई का कोई महंगा वकील उनकी पैरवी कर रहा होता। जबकि सच यह है कि असीम ने यह फैसला लिया है कि वह कोई वकील नहीं करेंगे और न ही अपने बचाव में कुछ कोर्ट में कहेंगे, वह कोर्ट में सिर्फ ब्रिटिश काल में बनाये गये देशद्रोह के कानून और अभिव्यक्ति की स्वंत्रतता का अधिकार छीनने वाले कानून के खिलाफ आवाज उठाएंगे।
कुछ विद्वानों का कहना है कि असीम के कार्टून बेस्वाद, घटिया स्तर के हैं और अपरिपक्व हैं। यदि ऐसा है तो कार्टूनिस्ट के अधिकारों के लिए लड़ने वाली अंतर्राष्ट्रीय संस्था ‘कार्टूनिस्ट राइट्स नेटवर्क इंटरनेशनल’ की ओर से 2012 का ‘करेज इन कार्टूनिंग अवार्ड’ उन्हें किस आधार पर दे दिया गया? असीम ये अवार्ड सीरीया के प्रसिद्ध कार्टूनिस्ट अली फरजत, जिन्हें टाइम मैगजीन की 100 सबसे प्रतिभाशाली लोगों की लिस्ट में शुमार किया जा चुका है, के साथ साझा करेंगे। असीम को यह अर्वाड 15 सितंबर को जार्ज वाशिंगटन यूनिवर्सिटी, वाशिंगटन में दिया जाना था, हिरासत में जाने से पहले अमेरिका उनका वीजा भी नामंजूर कर जा चुका है। इसके अलावा असीम को विएना में कार्टून बनाने के कार्यक्रम में भी निमंत्रित किया जा चुका है।
असीम के मित्र आलोक दीक्षित बताते हैं कि जिस केस में असीम के खिलाफ गैर-जमानती वारंट जारी किया गया, उसके बारे में कोई नोटिस असीम को नहीं दिया गया। जब कानपुर पर उनके आवास पर मुंबई पुलिस उन्हें गिरफ्तार करने पहुंची, तब इस केस के बारे में उन्हें सूचना मिली। असीम आत्मसमर्पण करने के लिए तुरंत मुंबई रवाना हो गये। इससे पहले देशद्रोह का मुकदमा असीम पर इस साल जनवरी में बीढ़ जिले की निचली अदालत में दायर किया गया था। जबकि दिसंबर 2011 में उनकी वेबसाईट www.cartoonagainstcorruption.com बिना कोई नोटिस दिये बंद कर दी गयी थी। कार्टून अभी भी www.cartoonsagainstcorruption.blogspot.com उपलब्ध हैं।
इन सब के बीच असीम और उनके मित्र सोशल मीडिया पर अभिव्यक्ति की स्वत्रंतता को लेकर सेव योर वॉइस (Save Your Voice) ऑन-लाइन आंदोलन तथा जमीनी स्तर पर देश भर में अभियान चला रहे हैं। असीम का मुंबई खुद जाकर गिरफ्तारी देना दरअसल साफ करता है कि एक और युवक सुनहरे करियर का मोह छोड़ सरकार और सत्ता से आर पार की लड़ाई के मूड में है, लेकिन हमें सोचना होगा कि आखिर क्या राष्ट्रीय प्रतीक थोप कर बनते हैं?
(प्रसून तिवारी। युवा पत्रकार। माखनलाल चतुर्वेदी पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय से डिग्री। इन दिनों इंडिया न्यूज नाम के एक चैनल से जुड़े हैं। उनसे prasoon.ibm@gmail.com पर संपर्क करें।)










असीम कि गिरफ़्तारी में कुछ भी ऐसा नहीं जो नया हो | दरअसल शासक वर्ग का यह चरित्र है कि वो अभिव्यक्ति कि स्वतंत्रता को बर्दास्त नहीं कर सकता | प्राचीन काल से लेकर वर्त्तमानकाल तक दुनिया में ऐसा कोई शासक वर्ग नही हुआ है , जिसने स्वेच्छा से बदलाव को स्वीकारा हो या अपनी आलोचना को पचाया हो | समानता, स्वतंत्रता , गरिमा जैसे शब्द उनके खास जुमले होते हैं, जिसके बल पर वे अपने अस्तित्व को बनाये रखना चाहते हैं | शक्ति के अहंकार में शासक वर्ग ये भूल जाता है कि जब जनता जागती है तो उसे जाना ही होता है | फ़्रांस की क्रांति , रूस की क्रांति से ले कर हाल में ही अरब देशो में चलने वाले बयार की लहर कुछेक उदाहरण हैं | असीम ने वकील न रखकर सही निर्णय लिया है | अभिव्यक्ति कि इस लड़ाई में उनका अकेले लड़ने का फैसला सर्कार के गले में फांस बनेगा | फिलहाल आजादी के समर्थकों को उनका पुरजोर समर्थन करना चाहिए |सरकार को वाल्तेयर का या कथन नही भूलना चाहिए -”मैं तुम्हारी बातों से सहमत नही हूँ लेकिन अपनी अंतिम सांस तक तुम्हे बोलने से नहीं रोकूँगा |”
अगर उन्हे कार्टून की श्रेणी मे रखा जाय तो मुझे लगता है , कार्टूनिस्टो को शर्म के मारे आत्म हत्या कर लेनी पडेगी। घटिया हीं नंही महा घटिया स्तर के कार्टून हैं । भारत माता के बलात्कार , तथा गांधी के द्वारा अन्ना को प्रणाम करने जैसे कार्टून को देखकर लगता है कोई मंदबुद्धि का व्यक्ति पागल जैसी हरकत कर रहा है । हां देशद्रोह जैसी कौन सी बात हुई , मुझे नही पता ,परन्तु ऐसे कार्टून देश की प्रतिष्ठा को तो क्षति पहुचाते हैं । रह गई किसी संस्था द्वारा एवार्ड देने की बात तो हर संस्था का बहुत सारे कार्य किसी छुपे उद्देश्य से होते हैं । फ़ोर्ड फ़ाउंडेशन इसका उदाहरण है ।
आपने भी जो यह संविधान पर पेशाब करते हुये कसाब का कार्टून यहां दिखाया है , उसे हटा लें तो ज्यादा उचित है। किसी लेखन या कार्टून का कोई आधार तो होना चाहिये। असीम ने हिंदुवादी तत्वो की तर्ज पर कसाब को बगैर मुकदमा चलाये , फ़ांसी चढा देने वाले उद्देश्य से यह कार्टून बनाये हैं । आप लोग विद्वान की श्रेणी मे आते हैं लेकिन मेरे जैसा व्यक्ति तो इस तरफ़ के घटिया कार्टून को मस्त्राम की ६४ पेज वाली पुस्तम मानता है ।
मदन जी, मेरे हिसाब से तो असीम त्रिवेदी को फांसी होनी चाहिए। वह कसाब से भी खतरनाक आदमी है। नहीं?
आपके इस कटाक्ष के लिये बहुत बहुत धन्यवाद । मै मुस्कुरा रहा हूं आपका उतर पढकर । मैने यह नही कहा कि फ़ासी चढा देना चाहिये। राष्ट्र के प्रतिक का अपमान या भावना के साथ खिलवाड करने की सजा फ़ांसी कैसे हो सकती है। हां कान पकड कर उठक बैठक कराने तथा दोबारा इस तरह की गलती न करने के लिये वादा करवाने की सजा तो दी जानी चाहिये। वैसे यह त्रिवेदी मानसिक रुप से विक्षिप्त जैसा लगता है । कहीं न कहीं , मैं भगवान हूं दुसरा कोई नही , जैसी भावना से ग्रसित। मेरे साथ समस्या है , इस तरह के लोगों की प्रंशंसा नही कर सकता ।
अभी लॉकअप से लिखा हुआ असीम का पत्र पढ़ा. अगर असीम को लगता है – जैसा उसने पत्र में लिखा भी है- कि वो देश का जिम्मेदार नागरिक है तो अपने कार्टूनों के लिए माफी मांग लेनी चाहिए उसे. अपने देश से माफी मांगने में कोई बुराई नहीं है न ही उससे कोई छोटा हो जाता है. अभिव्यक्ति के सैकड़ों तरीके हो सकते हैं. कुछ मुट्ठी भर राष्ट्रीय प्रतीकों को छोड़ कर भी हम अपना आक्रोश अच्छे तरह से व्यक्त कर ही सकते हैं.
मकबूल फ़िदा हुसैन बड़े पेंटर हुए , अभिव्यक्ति की आजादी के पैरोकार भी जबरदस्त थे आखिर लोकतांत्रिक देश के नागरिक जो थे | हिन्दू देवी देवताओं की एकदम नग्न तस्वीर बनाई , देश में अभिव्यक्ति की आजादी थी | किन्तु एक तस्वीर उन्होंने अपनी “माँ” की भी बनाई थी ऊपर से नीचे एकदम साड़ी में लिपटी हुई | क्यों मकबूल फ़िदा हुसैन अपनी माँ की नग्न तस्वीर की काल्पना नहीं कर सका , क्यों मकबूल हुसैन को अपनी माँ की नग्न देह में नारी सौन्दर्य नजर नहीं आया आखिर उसकी माँ और हिन्दू देवी दोनों ही तो स्त्री थी , दोनों का नारी सौन्दर्य एक जैसा होना चाहिए , फ़िदा हुसैन को तब अभिव्यक्ति की आजादी का ध्यान क्यों नहीं आया ? फ़िदा हुसैन की अभिव्यक्ति की आजादी का दंश हिन्दुओं ने झेला ,पीड़ा हिन्दुओं को हुई , अतिक्रमण हमारी धार्मिक भावनाओं का हुआ | अभिव्यक्ति की आजादी तो हो पर उसका प्रभाव दुसरे पर क्या पड़ता है उसकी भी तो समीक्षा का कोई उपाए हो |
आदरणीय मदन जी, कार्टूनिस्ट राइट्स नेटवर्क इंटरनेशनल के गुप्त उद्देश्य मुझे बताएं… मैं असीम और कार्टूनिस्ट राइट्स नेटवर्क इंटरनेशनल के खिलाफ भी लेख लिख दूंगा… वादा…!
वैसे ..बेचारे देशभक्त कार्टूनिस्ट को ..भारत माता का अपमान तब नहीं दिख रहा था जब माओईस्ट गैंग के कहने पर उनकी IAC गैंग ने
भारत माता को ‘साम्प्रदायिक’ मान कर स्टेज से उखाड़ फेंक गांधी का फोटो चस्पा कर दिया था | तभी उसी समय असीम त्रिवेदी को इस केजरीवाल-अरुंधती गैंग के कार्टून बना देने चाहिए थे |
कुछ भी कहो .. खान्गेसी-बिकी मीडिया-माओयिस्ट कुनबे को ‘भ्रष्टाचार हटाओ’ राग अलाप अलाप कर देशद्रोहियों को राजनीति में ‘फूटेज’ दिलवा
कर जनता के सामने ‘लाईम लाईट’ में लाना खूब आता है |
# केजरीवाल खूब चमके इस मुद्दे पर फिर से मीडिया में
Agar aseem ke banaye gye cartoon se un par desh-droh ka case kiya ja sakta hai. . To Bheem Rao Ambedkar ke peeth par Jawahar Lal Nehru ke kode maarne wale cartoon ke liye kis kis ko saza di jaayegi. . Cartunist ko, NCRT ke Director ko, ya Kapil sibbal ko
मैं ये मानता हूँ कि असीम जी के साथ जो हो रहा है वो गलत हो रहा है, लेकिन उनके कुछ कार्टून्स से मुझे कष्ट भी पहुँचा था। जिन राष्ट्रीय प्रतीक चिन्हों का सहारा लेते हुए उन्होंने कार्टून बनाए थे उन्हें इस दौर के किसी नेता ने मान्यता नहीं दी थी। ये उन लोगों की थाती है जिन्होंने आजादी दिलाने के लिए अपना सर्वस्व न्यौछावर कर दिया। तो थोड़ा सा कष्ट भी हुआ था मुझे। पर जब मैं असीम की जगह खुद को रखता हूँ तो लगता है कि उनका ऐसा करना भी जायज ही है… किसी थाने की इमारत पर सत्यमैय जयते का लिखा होना कभी-कभी भ्रष्टमेव जयते का ही आभास करा देता है… और रही बात संसद को कमो़ड के रूप में दिखाने की… तो इस पर मेरा मानना है कि यहाँ असीम जी कुछ नरमी बरत गए…
प्रसून जी क्या एवार्ड मिल जाना एक प्रमाणपत्र है सही होने का ? असीम के कार्टून मे कसाब को संविधान के उपर पेशाब करते हुये दिखाया गया है , आप बतायें इस कार्टून के माध्यम से क्या कहना चाहते हैं आसीम ? हमारा संविधान भ्रष्टाचार को बढावा देता है ? प्रसून जी मुझे नही पता संविधान को असीम ने पढा है या नही परन्तु अगर पढा है तो शायद वह समझ नही पाया । मेरी छोटी बुद्धि के अनुसार असीम यह दर्शाना चाहते थें कि कसाब को फ़ासी मे हो रही देर का कारण संविधान हैं । कसाब का मुकदमा बहुत हीं सही तरीके से और पारदर्शिता के साथ चल रहा है । उसने अपराध किया है या नही इसका फ़ैसला न्यायालय करता है । सामान्य लोग मीडिया मे जो छपता है उसे हीं साक्ष्य मान लेते हैं । कसाब के खिलाफ़ पुलिस ने जो साक्ष्य दिया है वह है बरामद हथियार, विडियो फ़ुटेज, बातचीत के रिकार्ड , निवास, अपराध को स्वीकार करना । न्यायालय मे सरकार अपने साक्ष्यों को प्रस्तुत करेगी और कसाब को कानूनन अधिकार होगा उन साक्ष्यो को गलत साबित करने योग्य साक्ष्य लाये। यह हमारे देश के कानून की खुबी है। बगैर सफ़ाइ का अवसर दिये किसी को मात्र पुलिस द्वारे प्रस्तुत साक्ष्यों के आधार पर सजा होने लगे तो हम आप सब को कभी भी पुलिस जेल भेजकर सजा करवा सकती है। बिनायक सेन को फ़ासी लग चुकि होती अगर पुलिस के साक्ष्य के आधार पर सजा होने की बात होती तो । हां उस संस्था के बारे मे पता कर के बताता हूं ।
मैं सिर्फ एक बात कहना चाहता हूं… असीम की नीयत सभी कार्टून बनाने के पीछे अच्छी है… और ये वही अंतर है जिसकी वजह से हम भगत सिंह और आतंकवादी में फर्क करते हैं…
Abhiviyakti ki aajadi bhi ek laxman rekha hai.! Aseem trivedi jitni lajdi is baat ko swikar le , bhavisye unke liye utna he accha hoga
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