बटला हाउस ‘इनकाउंटर’ के चार साल : सवाल अब भी बचे हैं
♦ महताब आलम
बटला हाउस ‘इनकाउंटर’ के चार साल पूरे हो गये। 19 सितंबर 2008 की सुबह, दिल्ली के जामिया नगर इलाके में बटला हाउस स्थित एल 18 फ्लैट में एक कथित पुलिस ‘इनकाउंटर’ के दौरान दो मुस्लिम नौजवान, जिनका नाम आतिफ अमीन और मोहम्मद साजिद, मारे गये थे। पुलिस के मुताबिक इन दोनों का संबंध आतंकी संगठन “इंडियन मुजाहिदीन” से था और इन्हीं लोगों ने 13 सितंबर 2008 को दिल्ली में हुए सीरियल धमाकों की घटना भी अंजाम दी थी। इस विवादित इनकाउंटर में पुलिस द्वारा कथित दो आतंकी के अलावा दिल्ली पुलिस स्पेशल सेल का एक इंस्पेक्टर, जो ‘इनकाउंटर स्पेशलिस्ट’ के नाम से मशहूर था, मोहन चंद शर्मा और एक हवालदार भी घायल हुए थे। बाद में शर्मा की नजदीकी अस्पताल होली फेमिली में मौत हो गयी थी, जबकि हवालदार बच गया। पुलिस के दावे के अनुसार इस मौके पर दो आतंकी घटनास्थल से भागने में कामयाब हो गये जबकि उनके एक साथी मुहम्मद सैफ को वहीं से गिरफ्तार किया गया।
मारे जाने वाले दोनों नौजवानों का संबंध उत्तर प्रदेश के आजमगढ़ जिले से था और ये लोग यहां पढ़ाई-लिखाई के सिलसिले में आये थे। आतिफ अमीन की उम्र लगभग 24 साल थी और वो जामिया में एम ए (मानवाधिकार) प्रथम वर्ष का छात्र था, वहीं साजिद जिसकी उम्र 14 साल थी, दसवीं की पढ़ाई करके यहां ग्यारहवी में दाखिले के लिए आया था। उनके कुछ साथी जामिया नगर में भी रहते थे। फलस्वरूप, इस घटना के बाद जामिया नगर और आजमगढ़ से पुलिस द्वारा उनके साथियों, जानने वालों और दूसरे मुस्लिम नौजवानों की गिरफ्तारी का सिलसिला चल पड़ा। बहुत सारे लोग उठाये गये, जामिया नगर और आजमगढ़ को ‘आतंक की नर्सरी’ कह कर बुलाया जाने लगा।
लेकिन स्थानीय लोगों, मानवाधिकार कार्यकर्ताओं/संगठनों और कुछ पत्रकारों द्वारा इस ‘इनकाउंटर’ की सच्चाई पर पहले दिन से ही सवाल कायम है, जिसका जवाब आज तक नहीं मिल पाया है। इन व्यक्तियों ने पुलिस द्वारा जारी किये हुए विरोधाभासी बयानों को नकारते हुए पूरे मामले की न्यायिक जांच करने की मांग की, जिसे आज तक सरकार ने नहीं माना है। इसीलिए, आज भी, चार साल गुजर जाने के बावजूद इस मांग को लेकर जामिया नगर, लखनऊ और आजमगढ़ में कार्यक्रम हुए और हो रहे हैं। लोगों मानना है कि जब तक इस मांग को स्वीकार नहीं किया जाता हमारी लड़ाई जारी है।
क्या हैं वो सवाल?
पहला सवाल ये था कि क्या पुलिस को पहले से पता था कि उस जगह पर ‘खूंखार-आतंकी’ छिपे हैं? अगर हां, तो पुलिस ने अपने शुरुआती बयानों में क्यूं कहा कि वो तो सिर्फ रेकी करने गये थे। लेकिन क्यूंकि ‘आतंकियों’ ने गोली चला दी, इसलिए जवाबी कार्यवाही करनी पड़ी। और अगर नहीं, तो घटना के दो-तीन घंटे के अंदर ही कैसे पुलिस ने ये घोषित कर दिया कि मारे जाने वाले आतंकी थे? और यही नहीं, अहम सवाल ये है कि अगर पुलिस को पता था, जैसा कि पुलिस ने आतीफ अमीन के मोबाइल को 26 जुलाई 08 से सर्विलांस पर रखे होने का दावा किया था, तो इन लोगों 13 सितंबर का सीरियल ब्लास्ट कैसे किया? पुलिस ने उन्हें पहले गिरफ्तार क्यूं नहीं किया, क्या पुलिस उनके बम धमाकों के इंतजार में थी?
दूसरा अहम सवाल : क्या इस मुठभेड़ में शामिल पुलिस पार्टी ने बुलेट-प्रूफ जैकेट पहन रखा था? और अगर पहन रखा था तो मोहन चंद शर्मा और बलवंत कैसे घायल हुए? और अगर नहीं, जैसा कि पुलिस के दावा किया था, तो इतने अहम मामले में इतनी असावधानी क्यूं बरती गयी और क्या उन्हें मालूम नहीं था कि वो ‘खूंखार-आतंकी’ उन पर गोली चला सकते हैं और ऐसे में रिस्क लेना उचित नहीं होगा? पुलिस का एक बयान ये भी कहता है कि पुलिस पार्टी बुलेट प्रूफ जाकेट इसलिए पहन कर नहीं गयी क्यूंकि बात फैल जाती और आतंकी भांप लेते और फरार हो जाते। लेकिन उसी समय इस घटना की एफआईआर में कहा गया है कि पुलिस ने रेड करने से पहले दो स्थानीय लोगों को अपने साथ लेना चाहा, पर वो नहीं आये, क्या ऐसा करने बात नहीं फैलती?
तीसरा अहम सवाल : साजिद और आतिफ के शरीर पर मिली चोट, जख्म और गोलियों के निशान क्या बताते हैं? दोनों को दफनाने से पहले, उनके शरीर की ली गयी तस्वीरों से पता चलता है कि वो किसी मुठभेड़ में नहीं मारे गये हैं। साजिद के सर में ऊपर से चार गोलियों के निशान हैं, ये कैसे संभव हुआ? क्या ये निशान ये नहीं दर्शाता कि उसे बिठाकर, उसके सर पर ऊपर से गोली मारी गयी है? या फिर पुलिस वालों ने छत से चिपक कर ऊपर से गोली मारी? इसी प्रकार सवाल ये भी है कि आतिफ की पीठ की चमड़ी पूरी तरह कैसे छिली? उसके पैर पर भी ताजे जख्म के निशान पाये गये, ये सब कैसे मुमकिन हुआ?
चौथा सवाल : एक अहम सवाल ये भी है कि दो ‘आतंकी’ कैसे भागे? जबकि पुलिस का खुद का दावा है कि उन्होंने कार्यवाही से पहले उस गली को पूरी तरह से जाम कर दिया था। यहां पर एक उल्लेखनीय बात ये भी है कि जिस बिल्डिंग में ये घटना हुई, उसमें अंदर जाने और बाहर निकलने का सिर्फ एक ही रास्ता है, और ये घटना चौथी मंजिल पर हुई थी, जहां से भागने का भी कोई रास्ता नहीं है। क्या वो वहां से जिन्न या भूत बनकर भाग गये?
पांचवा सवाल : पुलिस ने दावा किया कि साजिद, जिसकी उम्र 14 साल थी, बम बनाने में माहिर था। सवाल ये उठता है कि अगर ऐसा था तो वहां से ऐसी कोई चीज बरामद क्यूं नहीं हुई? आपको जानकर हैरानी होगी कि पुलिस ने जिन चीजों की बरामदगी दिखायी है, उसमें पंचतंत्र की कहानियों की किताब भी है! आखिर सवाल ये है कि पुलिस क्या साबित करना चाहती है? सवाल ये भी है कि राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की गाइडलाइंस के अनुसार प्रत्येक अप्राकृतिक मौत की तरह इस घटना की भी न्यायिक जांच क्यूं नहीं करवायी गयी? क्यों लेफ्टिनेंट गवर्नर ने इस पर रोक लगा दी? कुल मिलाकर सवाल बहुत हैं और इन्हीं सवालों ने इस घटना के फर्जी होने पर, या कम से कम इसकी वास्तविकता पर सवालिया निशान खड़ा किया हुआ है। और पूरी घटना की न्यायिक जांच की मांग अभी तक जारी है। लेकिन सरकार है कि उसके कान पर जूं ही नहीं रेंगती।
सरकार का जांच न कराने के पीछे बुनियादी तर्क ये है कि वो इस मसले की जांच इसलिए नहीं करवा सकती क्यूंकि इससे पुलिस का ‘मोरल डाउन’ हो जाएगा! सरकार ये भी तर्क देती है क्यूंकि एनएचआरसी जांच कर चुकी है इसलिए मामला साफ हो चुका है। कभी-कभी सरकार ये भी तर्क देती है कि क्यूंकि इस घटना में एक पुलिस वाला भी मारा गया, इसलिए ये साबित होता है कि मामला वास्तविक था और इस पर कोई सवाल नहीं खड़ा किया जा सकता!
तो क्या सरकारी दावे सही हैं?
पहला दावा कि इसकी जांच कराने से पुलिस का ‘मोराल डाउन’ हो जाएगा। आखिर सरकार किस पुलिस से मोराल की बात कर रही है, जिसकी करतूतें जगजाहिर है। और इस केस के संदर्भ में बात करें, तो मामला और साफ है कि सरकार जिस स्पेशल सेल को बचाना चाह रही है, अब सब जानते हैं कि उनका असल काम मासूम लोगों को फंसाना, वाहवाही बटोरना और पैसे कमाना है। कल ही प्रकाशित हुई जामिया टीचर्स सॉलिडरिटी असोसिअशन (JTSA) की रिपोर्ट से साफ जाहिर होता है कि ये लोग फर्जी केस बनाने और फर्जी मुठभेड़ करने में माहिर हैं। JTSA की ये रिपोर्ट कोई हवाबाजी या बयानों का पुलिंदा नहीं है बल्कि कोर्ट द्वारा दिये गये फैसलों पर आधारित एक शोध है, जो स्पेशल सेल की करतूतों को उजागर कर देता है। दूसरा दावा, कि एनएचआरसी ने इस मामले की जांच की है, बिलकुल झूठा है। एनएचआरसी ने इस मामले में कोई खोजबीन नहीं की है, बस रुटीन कार्यवाही की है। और वो कार्यवाही ये है कि आयोग ने उसी पुलिस डिपार्टमेंट को नोटिस भेज दिया, जिसने ये सब कुछ किया। सो जवाब जो मिलना था सो मिला।
यही नहीं, आयोग ने न ही घटनास्थल कर दौरा किया, न संबंधित व्यक्तियों से मुलाकात की, न उन लोगों से मिले जो लगातार सवाल उठा रहे थे, बावजूद इसके आयोग के अध्यक्ष से हमने समय भी मांगा था। और बिना ये सब किये, पुलिस के जवाब के आधार पर इस पूरे मामले को सही घोषित कर दिया! अगर आपको यकीन नहीं आता हो आज भी आप ये रिपोर्ट देख सकते हैं। क्या इसी को मामले की जांच कहते हैं? और बाद में RTI एक्टिविस्ट अफरोज आलम साहिल द्वारा सूचना के अधिकार के तहत इसी आयोग से निकाली गयी पोस्ट मार्टम रिपोर्ट ने और कई सारे सवाल खड़े दिये।
रही बात इंस्पेक्टर मोहन चंद शर्मा की मौत की, तो हम भी ये जानना चाहते हैं कि उसकी मौत कैसे और किन हालत में हुई? आखिर उसे हॉस्पिटल पहुंचाने में उतनी देर क्यूं लगी ताकि वह पहुंचते ही मर जाए? जबकि साक्ष्य बताते हैं कि जब उसको ले जाया जा रहा था, तो वह पूरे होशो-हवास में था। साथ ही यहां पर इस बात का उल्लेख भी जरूरी है कि यही मोहन चंद शर्मा कम से कम 8 ऐसे केस में लिप्त है, जिसमें इसने मासूम लोगों को फंसा कर उनकी जिंदगियां बर्बाद कर दी हैं। और ये सारे केस किसी बाटला हाउस ‘इनकाउंटर’ से कम नहीं हैं। फलतः ऐसे व्यक्ति द्वारा अंजाम दी गयी कार्रवाई पर शक का गहराना और लाजिम है।
इसीलिए सरकार को चाहिए, कुछ पुलिस वालों की नौकरी बचने के चक्कर में न्यायिक जांच की मांग कर रहे हजारों नहीं बल्कि लाखों लोगों का मोराल डाउन न करें क्यूंकि लोकतंत्र में जनता ही सर्वोपरि है और उसकी मांग को ठुकराना लोकतंत्र की हत्या है। और इस वक्त जनता की मांग बटला हाउस मामले की निष्पक्ष और उच्चस्तरीय जांच है।
(महताब आलम। बुनियादी तौर पर मानवाधिकार कार्यकर्ता, लेकिन जरूरत भर लिखने के लिए स्वघोषित स्वतंत्र पत्रकार। दिल्ली में ठिकाना है, पर घुमंतू भोटिया। महताब से activist.journalist@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)










ये सब सवाल करने का काम राजीव यादव जी जेसे लोग पूरी ताकत और ईमानदारी से कर ही रहे हे मगर आप बहुत मुस्लिम लेखको पत्रकारों और पढ़े लिखे लोगो ने तो जेसे अपना काम ईमानदारी से न करने की कसम खा रखी हे अभी तक दिल्ली में असम को लेकर भड़काऊ पोस्टर लगे हुए हे ( जाहिर हे आने वाले चुनावो को देखते हुए ) कट्टरपन्ति ताकतो का हाल ये हो रहा हे की वो हमें गेर मुस्लिमो से तो भिडवा ही रही हे आपस में भी एकता खत्म कर रही हे यहाँ तक की अब लोगो के निजी जीवन -पारिवारिक रिश्तो में भी कलह करवा रही हे लेकिन अल्लाह जाने आप लोग कोन सी दुनिया में रहते हे आप लोगो को कुछ दीखता ही नहीं .खेर ऊपर बाटला कांड की बात हे तो मुझे जानना हे की अगर ऐसा था जेसा की आप बता रहे तो फिर वहा पकडे गये लडको का जो इंडिया टुडे में लम्बा इंटरव्यू छपा था जिसमे उन्होंने कहा था की वो उस बाज़ार में भी बम रख सकते हे जहा उनकी माँ भी खरीदारी के लिए जाती हे – अब अगर वो सब बेगुनाह थे तो क्या हम मान ले की इतना बड़ा मीडिया ग्रुप भी लोगो की कनपटी पर बन्दूक रखवा कर फेक इंटरव्यू लेने का काम कंरता हे ?
ये बहुत ही अजीब बात हे की हम भारतीय मुस्लिमो में ये परम्परा सी बन गयी हे की आम मुस्लिम को हमेशा इस भ्रम में रखने की कोशिश की जाती हे की हमारे यहाँ कोई भी किसी भी मसले पर गलती या गलत लोग या उनकी गलत सोच या गलत काम हो ही नहीं सकती हे यही कारण हे की आम तोर पर ऐसा होता ही नहीं देखा जाता की किसी भी मुस्लिम महफ़िल में उसमे चाहे पढ़े लिखे डोक्टर इंजीनियर आदि बेठे हो या आम कुछ कम पढ़े लिखे छोटा मोटा रोज़गार वेगेरह करने वाले लोग ये कम ही होता दीखता हे की ये चर्चा चल रही हो की ”हा हमारे यहाँ भी ये ये गलत लोग हे इन्होने ये ये गलत किया हे नहीं करना चाहिए था गेर मुस्लिमो की ये ये बात जायज़ हे हमें इस पर गौर करना चाहिए मुस्लिमो में भी जो गलत लोग हे उनकी कड़ी निंदा करनी चाहिए ”.जी नहीं हमें तो हमेशा यही बताया या कहा जाता हे की गलत लोग तो केवल दूसरो में ही होते हे गलतिय जुलुम अत्याचार बदमिजाजी दंगे पंगे तो केवल गेर मुस्लिम ही करते हे , अब अगर ये बात मान भी ले भी ले की गलत लोग तो सिर्फ गेर मुस्लिमो में ही होते हे तब तो हम मुस्लिमो कोई स्पेशल समाज होना चाहिए था जिसमे न कोई जाती होती न कोई वर्ग हो न कोई छोटा बड़ा हो मगर सच क्या हे ? सच तो यही हे न की हम मुस्लिम भी ऊपर से लेकर नीचे तक शिया सुन्नी देवबंदी बेरल्वी अशरफ अज्लाफ़ और विभिन जातियों में और अमीर मध्यम्वेर्गीय गरीब अदि बटे हुए हे मुस्लिम नेता अक्सर ही एक मुस्लिम पार्टी या मुस्लिम मंच बनाने की बात करते रहते हे मगर होता क्या हे हर बार आपस में लड़ पड़ते हे और ऐसा कोई प्रयास फल नहीं पाता. इसके अलावा ऐसा भी कुछ नहीं हे की हम मुस्लिम आपस में कोई विशेष एकता बना कर रखते हो गेर मुस्लिमो की तरह ही हमारे यहाँ भी तो आपसी झगड़ो विवादों तू तू में में की बाढ़ घरो मोहल्लो अडोस पड़ोस और फिर कोर्ट कचहरी पुलिस थाने में दर्ज देखी जा सकती हे . दुनिया में भी कोई ऐसा मुस्लिम मुल्क नहीं हे जो कहे की किसी भी गेर मुल्की आम मुस्लिम का बिना पासपोर्ट वीसा स्वागत हे जितने चाहो यहाँ आ जाओ रहो . मुसलमानों के सबसे बड़े खुद घोषित ठेकेदार पकिस्तान का हाल ये हे की सिर्फ 4- लाख बिहारी मुसलमानों को भी जो बंगलादेश के शिविरों में 1971 से पड़े हुए हे अपने मुल्क जाना चाहते हे उन्हें लेने को आज तक तय्यार नहीं हुआ .पंजाबियों को छोड़ कर हर कौम अब तक पाकिस्तान में जुलुम ज्यादती की शिकार बन चुकी हे मुंबई में भड़काऊ भाषण कराकर दंगे कराने वाले से पूछा जाना चाहिए की उन्होंने बंगलादेश दूतावास के सामने तोड़ फोड़ पर्दर्शन क्यों नहीं करते क्योकि ये मुस्लिम देश बर्मा के पीड़ित मुस्लिमो को शरण देना के बजाय उन्हें वापस धकेल रहा हे पाकिस्तान की मासूम हिन्दू लडकियों पर हर घोर अत्याचार के लिए तो चलो मान लिया की हमारे इन रहनुमाओ को कोई लेना देना ही नहीं हे चलो कोई बात नहीं बलूचियो के लिए क्यों नहीं पर्दर्शन करते ? कराची के लिए क्यों नहीं पर्दर्शन करते जहा पिछले 25 सालो से लगातार मुहाजिर मसले पर हिंसा जारी हे ये हमारे बहुत से रहनुमा विभाजन के बाद भी दुनिया के शायद सबसे अधिक मुस्लिम आबादी वाले गाँधी नेहरु आजाद के देश में मुस्लिमो पर जुलुम की बात करते हे सवाल ये हे की अगर इतना ही जुलुम हे तो क्यों यहाँ ही और करोड़ो बंगलादेशी मुस्लिम भी रोजी रोटी कमाने आ रहे क्या हमारे ये मुस्लिम रहनुमा सिर्फ इतना कर सकते हे की दुनिया के 50 -60 मुस्लिम देशो में किसी 1 को भी राज़ी कर ले की वो और कुछ नहीं सिर्फ और सिर्फ 10 – 5 या 1 लाख बंगलादेशी मुस्लिमो को ही पनाह व् रोजी रोटी नागरिकता दे दे . जाहिर हे ये ऐसा कभी नहीं करेंगे करेंगे भी तो कोई सुनने वाला नहीं सभी देशो के अपने ही मसले बहुत हे . में आम मुस्लिम से ये अपील करता हूँ की खुदा के वास्ते वो इन भड़काने वाले रहनुमाओ के बहकावे में बिलकुल न आये ये न केवल हमें आपस में लड़वाते हे बल्कि गेर मुस्लिमो के साथ भी हमेशा तनाव ही बने रखना चाहते इसी में इनका हित हे और आम जनता का भारी नुकसान हे ये शायद चाहते यही हे की मुस्लिम जब वोट दे तो वो सारी बाते रोटी कपड़ा मकान रोज़गार शिक्षा बिज़ली पानी असमानता भ्रष्टाचार सब भूल जाय और केवल संपारदायिक मुद्दे को याद रखकर इन्हे अपने सर पर बिठा ले और इनके शोषण पर बिल्कुल धयान ना दे अगर समस्याए हे भी वही समस्याए गेर मुस्लिमो के साथ भी हे सिर्फ आप ही नहीं भुगत रहे और भी बहुत लोग भुगत रहे हे और देश में ऐसे गेर मुस्लिमो की कोई भी कमी नहीं हे जो इस्लाम और मुसलमानों का सम्मान ही करते हे उनके साथ कंधे से कंधे मिलकर लड़े समस्याओ को साम्पर्दायिक रूप देने वाले किसी के भी सगे न हुए न होते हे न होंगे मत आइये इनके बहकावे में वर्ना दूसरो का तो जो नुकसान होगा सो होगा सबसे ज्यादा हमारा अपना ही नुकसान होगा
और चलिए मान लिया बटला कांड में जो २ लड़के मारे गये वो बेगुनाह थे आप उनके लिए आवाज़ उठा रहे हे बहुत बढ़िया बात हे लेकिन ये बताइये की की मुंबई में जो मुस्लिम रहनुमाओ के भड़कावे पर २- मुस्लिम मारे गये -सेकड़ो युवको की और पुलिस जेल कचहरी के चक्कर में जिन्दगी खराब होगी उनके खिलाफ आपका लेख हमें कब पढने को मिलेगा ? जो देश करोड़ो बंगलादेशियो को रोजी रोटी पनाह दे रहा हे उसे तो ये रहनुमा भला बुरा कह रहे हे और जो पाकिस्तान- 1971 से बंगलादेश के सिर्फ 4 -लाख बिहारी मुसलमानों को 40 साल से लेने से इंकार कर रहा हे जो बंगलादेश कुछ हज़ार बर्मी मुसलमानों को भी वापस धकेल रहा हे खाड़ी देशो से रोज़ ही उपमहादीप के लोगो (मुस्लिम भी ) के भयानक शोषण की खबर आती हे उनके खिलाफ ये रहनुमा चू भी नहीं करते इसलिए नहीं करते की क्योकि कोई सुनने वाला नहीं हे यहाँ लोकतंत्र हे आपके वोट चाहिए हे इसलिए इन बदमिजाज और बददिमाग रहनुमाओ को बर्दाश्त किया जाता हे एक और समस्या हे इस सम्बन्ध अविनाश भाई एंड पार्टी यानि देश के वाम लोग जो हिन्दू कठमुल्लावाद के खिलाफ लड़ाई के दोरान कुछ अति करते हुए बिना सोचे समझे गलत मुस्लिमो का भी बचाव करते जाते या उन्हें नज़रंदाज़ ही करते हे मुझे लगता हे कही न कही इसी अति के कारण ही अधिकांश मुस्लिम लेखक बुद्धिजीवी और पढ़े लिखे लोग बड़े आराम से अपनी जिम्मेदारियों से भागते रहते हे
काफी सही बाते लिखी है आपने सिकंदर भाई ..शायद ये पढ़ के कुछ भटके हुए और कुछ हमेशा भटकने वालो का दिमाग सही हो जाये
मुझे नहीं लगता कि इस एनकाउंटर पर जितने सवाल उठाए गए है इतना हल्ला किसी और मामले में हुआ है ।वैसे तो पूरी घटना जानने के बाद इस पर शक करना मुश्किल है लेकिन एक बात समझ नहीं आती जब इतने सवाल उठ रहे हैं सरकार और पुलिस की लगतार थू थू हो रही है तो क्यों नहीं सरकार निष्पक्ष जाँच को राजी होती ?सरकार इन सब सवालों के जवाब क्यों नहीं देती ?जो आरोप उठ रहे है वो अपने आप बंद हो जाएँगे।क्या सरकार ऐसा नहीं चाहती? क्या सरकार को अपनी साख की भी परवाह नही?सरकार का ऐसा रवैया देखकर जो शक न करे उसे भी शक होने लगता है।
बात हिंदू या मुस्लिम की नहीं है बात ये है कि भारत का शासक वर्ग केवल शासन करने से मतलब रखता है उसे अपनी साख की परवाह नहीं है और न जनता की संतुष्टि की।
इस बारे में राजन भाई मुझे लगता हे की लड़के गुनाहगार तो होंगे ( जब वो खुद इंडिया टुडे को दिए इंटरव्यू में मान रहे थे ) पर शर्मा जी शायद आपसी गोलीबारी में ही गलती से मारे गये होंगे और बाद में २ लडको को पकड़ने के बाद मार दिया गया होगा गुस्से में या सोच समझ कर दहशत फेलाने के लिए जो भी हे खेर मेंइन बहुत से मुस्लिम लेखको पत्रकारों की इस मानसिकता की कड़ी निंदा करता हूँ की आप 4 साल पुराना केस तो उठा रहे हे और हाल ही में मुंबई इलाहाबाद लखनऊ आदि की शर्मनाक घटनाओ पर मुह में दही जमा कर बेठे रहते हे आपकी अपने फ़र्ज़ के साथ की गयी इसी मक्कारी और गद्दारी का शायद ये भी एक नतीजा सामने हे की देखिये उधर विस्फोट के अच्छे भले सेकुलर संपादक संजय तिवारी जी आज विष्णुगुप्त का घोर मुस्लिम विरोधी लेख भी छाप रहे हे
@ महताब जी ,
आपके आलेख मुझे कुछ हद तक पक्षपातपूर्ण लगे |जहाँ भी कुछ संदेहास्पद मुस्लिम लड़के मारे जाते हैं तो आप जैसे लोग खूब हाय -तौबा मचाने लगते हैं और जहाँ मुस्लिम समाज के सच्चा रहनुमा बनकर कुछ घटनाओं(मसलन असम दंगा या मुंबई की हिंसा )की निंदा करने की जरूररत होती है(ताकि समग्र समाज का विश्वास बना रहे ), वहां चुप्पी लगा जाते हैं |मैं और मेरे जैसे कई लोग निरंतर ऐसी फितरत को देखकर निराश होते जा रहे हैं | निस्संदेह ऐसे ही मौके का फायदा अन्य कट्टरपंथी लोग और संस्थाएं उठाते हैं और लोगों को अपने पक्ष में गोलबंद करते हैं | मैं यह नही कहता की बाटला केस की निष्पक्ष जांच न हो , लेकिन जांच केवल इस बिना पर न हो कि मरने वाले मुस्लिम थे (गोया अगर हिंदू मरते तो शायद आप सिसकी भी न भरते ), बल्कि इस लिए हो कि इस इनकाउंटर पर जो भी शक के चादर तने है , जो भी मानवाधिकार का उन्लंघन हुआ है, उसकी निष्पक्ष जांच हो | लोगों को न्याय मिले | आप जैसे लेखक तस्लीमा के भारत प्रवास के प्रतिबंद को जायज मानते है और मकबूल फ़िदा हुसैन के निर्वासन पर विलाप करते हैं | ये दोहरा मानदंड क्यों अख्तियार किया जा रहा है? क्या ‘राम’ का नाम लेना सांप्रदायिक होने और मुस्लिमो के समर्थन में आँख-मूंदकर भंगरा करना सेकुलर होने का प्रमाणपत्र हैं ? जब हम अभिव्यक्ति की आजादी की बात करते हैं , तो ‘इन्नोसेंस ऑफ मुस्लिम्स’जैसे फिल्मों पर क्यों प्रतिबन्ध का समर्थन करते हैं ? मेरे कहने का उदेश्य यह नही की अभिव्यक्ति के नाम पर आप-हम किसी की भावनाओं से खिलवाड़ करे लेकिन ये कैसी भावना है जो एक समय तो रोये और उसी पीड़ा पर चुप भी रहे , क्योंकि ये पीड़ा अपनी नही अपने पड़ोस के आस्था की है ? मैं बार -बार कहता हूँ की ऐसी बातों से केवल कट्टरपंथियो को ही फायदा मिल रहा है | मैं खुद कुछ लोगों से रू-ब-रू हो रहा हूँ जो मानने लगे हैं कि कुछ खास संगठन के विचार ही सही है , और भारत में सांप्रदायिक समरसता की बात करना बेकार है | बस ‘सिकंदर हयात’ जैसे ही कुछ लोग बचे हैं जो सही बातों को सामने रख रहे हैं| वे अनवरत लिख रहे हैं | लेकिन उनके सवालों के जवाब कोई मुस्लिम लेखक या बुद्धिजीवी क्यों नही दे रहे ? क्या मुस्लिम समाज में अब कोई और समस्या नही रह गया है क्या? क्या सारे अंडे बेचने वाले बच्चे स्कूल में भरती हो गये है ? क्या पोलियो के ड्रॉप सारे मुस्लिम बच्चों को पिलाया जा रहा है ? ऐसे ही हजारों सवाल हैं जिससे मुस्लिम समाज अन्क्रांत हैं? पहले इनका समाधान जरूरी है | लेकिन जान बूझकर ऐसा नही किया जा रहा है | जिहाद में कौन जा रहा है ? इसका भी फैसला हो ही जाना चाहिए |
@सिकंदर भाई के सवालों पर चर्चा की आवश्यकता है ? कृपया सभी पाठकों से अनुरोध है कि वे अपना मंतव्य दे ?
नोट – इसके लिए आपको किसी सर्टिफिकेट कि जरूरत नही है | आमीन !
शुक्रिया सुजीत भाई में कह ही चूका हूँ की अधिकांश भारत के मुस्लिम लेखको और पत्रकारों ने हद कर दी हे अपने फ़र्ज़ से ये लोग जिस तरह से भाग रहे उसी के कारण हालत ख़राब हो रहे हे हिन्दू मुस्लिम रिश्ते खराब होने का सीधा और एक ही अर्थ होगा भारत और भारतीय उपमहादीप में शोषणकारी ताकतो की और चांदी आम आदमी की हालत और खराब . वास्तव में बहुत मुस्लिम लेखको आदि के इस बेहिस रेवेये के पीछे ये अविनाश भाई आदि जेसे बहुत वाम लोग लेख संपादक ही हे लोग ही हे जो बिना सोचे समझे वही ऐतिहासिक भूल दोहरा रहे जो उन्होंने 1940 के दशक में मुस्लिम लीग को समर्थन देकर की थी पाकिस्तान के मांग अगर मुस्लिम मजदूर किसान कर रहे होते पाकिस्तान में किसी इस्लामिक समाजवाद के निर्माण के लिए तब भी एक बात थी मगर मुस्लिम लीग में तो सारे गुंडे मवाली जमींदार पूंजीवादी पिशाचो कठ्मुल्लाओ की फौज थी जो सामने से गेर मुस्लिमो के हटते ही आम मुस्लिम का भी खून चूसते थे आज भी ये सब वही भयावह भूल दोहरा रहे हे इन सबके बीच सबसे अधिक बुरी तरह से पिस रहे हे तो हम जेसे लोग हमें कोई नहीं पसंद करता मुस्लिमfundamentalist हमें भला बुरा कहते हे बजरंगी हमें सोफ्ट जिहादी कहते हे ( आज ही विस्फोट पर विष्णुगुप्त के लेख पर हुई बहस देखिये ) अविनाश भाई जेसे वाम लोग हमें नापसंद करते हे या घास नहीं डालते . विस्फोट पर तिवारी जी जेसे ‘निष्पक्ष ‘ भी एक तरफ तो विष्णुगुप्त के घोर मुस्लिम विरोधी लेख और जफ़र नकवी साहब के ” सेकुलरिस्म ऐसा तो हिन्दू राष्ट्र में क्या बुराई हे ” जेसे लेख तो पब्लिश करते हे पर हमारे मुस्लिम समाजसुधार और आताम्निरिक्षण पर लिखे को इन्टरनेट की रद्दी के हवाले करते हे खुद को भारत का मालिक समझने वाले अंग्रेजी पिशाचो और पूंजीवादी कठ्मुल्लाओ से भी हमारी नहीं बनती . ऊपर से बड़ा परिवार , कट्टर पन्तियो दुआरा फेलाई सामाजिक पारिवारिक असहिष्णुता का सीधा वार , कोर्ट कचहरी के धक्के सरकारी नौकरी का दूर दूर तक नामोनिशान नहीं . कोई सोच भी नहीं सकता की हमारे काम किस कदर कठिन थकाने वाला पकाने वाला हे लेकिन कुछ भी हो जाए घास खाकर भी हम संगर्ष करेंगे और अपना जिहाद जारी रखेगे , आप जेसे लोग तो साथ हे ही
महताब साहब आपने तमाम पहलुओं को बड़े ही बेहतर ढंग से सामने रखा है। वैसे भी गुनाह सिर्फ वही नहीं होता जो हो जाता है। गुनाह को छुपाना भी बड़ा गुनाह होता है। जिन्दगियां नहीं लौट सकतीं। लेकिन अगर न्याय मिलता है तो लोगों को संतोष मिलता है। ये बात हजम नही होती कि जांच से मोराल डाउन हो जाता है। ऐसे में तो हम तमाम गलत काम करेंगे और अंत में मोराल की आड़ में बच जाएंगे। घटनाएं पुरानी होती हैं, प्रवृत्तियां बनी रहती हैं और हम सबकी जिम्मेदारी है कि प्रवृत्तियों के खिलाफ जंग करें। लेकिन हां, ये भी जरूरी है कि हम अपने गिरेबां में झांकें, अपना मूल्यांकन करें।
@ सिकंदर भाई ,
मै आपके विचार से सहमत हूँ | मुस्लिम लीग केवल आमिर-धनाड्य लोगों का जमावड़ा ही था | जिसने अंग्रेजों के शह पर गरीब मुसलमानों के रूदीवादिता का फायदा उठाया | उन्हें अतिरिक्त मायलेज हिंदू कट्टरपंथियों ने भी प्रदान की | रही बात कम्युनिस्ट विचारधारा की तो राजनैतिक तौर पर ये विचारधारा सदैव कन्फ्यूज ही रही है | हां,साहित्य, कला, संस्कृति में इसकी विशाल परम्परा रही है | खैर, अविनाश जी की क्या विवशता है , वे ही बेहतर बता सकते हैं | शायद आपका बडा डिग्रीधारी या नौकरीशुदा न होना भी एक कारण हो सकता है| किसी ब्लॉग या पत्रिका को चलाने के लिए बड़े नामों की जरूरत होती है | इसे आप अविनाश जी की व्यावसायिक मजबूरी भी कह सकते हैं | बहरहाल , हम साधारण पाठक केवल कयास ही लगा सकते हैं | शायद उनका कोई जस्टिफिकेशन आ जाये (हालांकि उम्मीद कम ही हैं) | आप बस यूँ ही लिखते रहे , लोग सामने आयेंगे | अनास्था के इस गहरे धून्ध में कहीं उम्मीद की किरणे भी छुपी हुई है|
जुलेखा जबीन सिस्टर जब चाहो विस्फोट मोहल्ला पर आकर मुझसे बहस कर लो खुदा की कसम आप 10 मिनट भी बहस में टिक नहीं पाएंगी क्योकि आपके सारे तर्क लंगड़े और विचार शून्य हे यही कारण हे की आप जेसे लोग हिंदी नेट पर भी कही भी मुस्लिम विरोधी लोगो से -हिन्दू कट्टर पन्तियो से भी कोई सार्थक बहस भी नहीं कर पाते हे जबकि में न जाने कितनी बार विस्फोट नवभारत आदि पर इस्लाम और मुस्लिमो का बचाव करते हुए कितनी ही लम्बी लम्बी बहस कर चूका हूँ जिसका 50 % भी आप करके दिखा दो तो आप दिल्ली आकर मेरे मुह पर थूक देना . और में एक सुन्नी ,सय्यद, देवबंदी मुस्लिम हूँ और बचपन में हल्का फुल्का’ तालिबान ‘ भी रह चूका हूँ
सभी भारतीय मुस्लिम इन भारत में रह चुके वरिष्ठ पाकिस्तानी मुस्लिम पत्रकार परवेज़ अहमद साहब की बात सुन जरुर ले you tube टाइप
11th Hour 3rd September 2012 India’s Attitude towards Pakistan
खासकर 20 :15 मिनट से सुन ले सवाल ये हे की जब एक पाकिस्तानी मुस्लिम ऐसी बाते कर रहा हे तो आखिर अधिकांश भारतीय मुस्लिम रहनुमा क्यों इनके उलट ही भड़काऊ बाते करते रहते हे वजह साफ हे यही उनकी राजनीति हे और कुछ नहीं, भड़काने के अलावे उन्हें कोई और राजनीति का तरीका पल्ले नहीं पडता हे
इस विडियो में वरिष्ट पाकिस्तानी पत्रकार साहब बता रहा हे की 1971 में बंगलादेश युद्ध के समय 7 % मुस्लिम थे असाम में- आज 31 % हे बताइए और उधर पाकिस्तान में 24 % हिन्दू थे 1947 में आज २- 4 % रह गये हे आपको कुछ कहते नहीं सुनते नहीं चुप चाप रहते हे लेकिन फिर भी जुलुम ज्यादती – रोज़ उनकी लडकिया उठा ली जाती हे पाकिस्तानी लेखिका जाहिदा हिना देनिक भास्कर में कहती हे की ऐसा काम कर करके कुछ मुर्ख लोग अपने लिए जन्नत में महल खड़े कर रहे हे , बताइए ये हाल हे की हम भारतीय मुस्लिमो के बहुत से धार्मिक सामाजिक राजनीतिक रहनुमाओ और बहुत से लेखको पत्रकारों की का ठीक हे आप कर कुछ नहीं सकते लेकिन क्या इतनी भी इंसानियत नहीं रही हे आपमें की कम से कम लिख कर बोल कर इसका कड़ा विरोध तो करे जेसे आप बटला कांड के पीडितो के लिए आवाज़ उठा रहे वेसे ही इनके लिए भी उठाय – लेकिन विरोध किया जा रहा हे भड़काऊ भाषण मुहजोरी पोस्टरबाज़ी हो रही हे तो असाम के लिए जहा का सच ये पाकिस्तानी पत्रकार साहब बता ही रहे हे
Mahatab Alam ji,
you are raising the issue after 4 years. I am saying the encounter was genuine or fake but it is true that Some politician had raised this issue for their benefit 4 years back. This is not the only encounter , in which peoples are raised the finger. There are hundreds of examples we have but it looks you have looking at encounter with Muslim goggles which is not correct.
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