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जमीन बचाने के लिए गांव से चल कर रांची पहुंचा मंगरा

23 September 2012 One Comment

आदिवासियों के लिए लड़ने-लिखने वाली पत्रकार नेता वासवी पर आरोप

♦ ग्लैडसन डुंगडुंग


मंगरा उरांव


वासवी


कोटारी गांव (बुढ़मू) में टोडंग ट्रस्‍ट का ऑफिस

19 सितंबर, 2012 को दिन के लगभग दो बजे मंगरा उरांव अपने बेटे किशोर उरांव एवं फुफेरी बहन सूर्यमणि के साथ रांची सिविल कोर्ट पहुंचा। मंगरा उरांव का पैतृक गांव ‘कोटारी’ है, जो झारखंड की राजधानी रांची से लगभग 40 किलोमीटर की दूरी पर बुढ़मू थाना के पास जंगल में स्थित है। गांव में अभी खेती-बारी का मौसम है, लेकिन मंगरा ने अपनी जमीन बचाने के लिए खेती-बारी छोड़कर रांची आने का फैसला किया।

आज मंगरा उरांव ने पहली बार सिविल कोर्ट, रांची में शपथ-पत्र बनवाया, जिस पर लिखा है, ‘वासवी ने मुझे जमीन के बदले पैसा के साथ संस्थान में नौकरी भी देने का वचन दिया। साथ ही मेरी जमीन का उपयोग आदिवासी समाज के उत्थान के लिए करने का वादा किया। फलस्वरूप, मैंने उन्हें 1.41 एकड़ जमीन दे दी, लेकिन वासवी ने मुझसे धोखाधड़ी करते हुए सादे कागज पर हस्ताक्षर करवाकर जमीन अपने नाम से निबंधन करवाने हेतु कोर्ट से परमिशन ले लिया। जब मुझे असलियत का पता चला तो मैंने जमीन रजिस्ट्री ही नहीं की। इस दौरान उन्होंने मेरे साथ कई बार झगड़ा भी किया एवं प्रलोभन देने का प्रयास भी किया। मैं अपना जमीन वासवी को नहीं बेचना चाहता हूं क्योंकि उसने मेरे साथ धोखाधड़ी की है। वह गैर-आदिवासी है लेकिन मुझसे स्वयं को उरांव समुदाय का सदस्य बताकर जमीन की मांग की थी।’

मंगरा उरांव के मामले को गंभीरता से समझने की जरूरत है, क्योंकि झारखंड में लाखों की संख्या में मंगरा मौजूद हैं, जिनकी जमीन किसी न किसी तरीके से लूटी जा रही है। मंगरा उरांव की 1.41 एकड़ जमीन को झारखंड महिला आयोग की सदस्य, सामाजिक कार्यकर्ता एवं आदिवासी मुद्दों को प्रखरता से उठाने का दावा करने वाली वासवी बोस उर्फ वासवी किड़ो ने असंवैधानिक एवं गैर-कानूनी तरीके से कब्जा किया है। इसके लिए उन्होंने भारत के संविधान के अनुच्छेद 342 एवं सीएनटी एक्ट 1908 की धारा 46 का खुल्ला उल्लंघन किया है। इस बात का प्रमाण वासवी बोस द्वारा 31 अक्टूबर, 2007 को सिविल कोर्ट, रांची में दायर शपथ-पत्र, जमीन के दस्तावेज, टोड़ंग ट्रस्ट, बुढ़मू का दस्तावेज, उर्सुलाईन स्कूल, रांची के दस्तावेज एवं बिहार विद्यालय परीक्षा समिति के दस्तावेज में मौजूद हैं। वासवी बोस ने न्यायालय में शपथ-पत्र दायर कर स्‍वयं को उरांव आदिवासी समुदाय का सदस्य घोषित करते हुए रांची जिलांतर्गत बुढ़मू थाना के कोटारी निवासी मंगरा उरांव पिता स्‍व बंधन उरांव का 1.41 एकड़ जमीन 450 रुपये प्रति डिसमिल की दर से अपने नाम पर निबंधन करवाने के लिए आदेश जारी करवाया है। इसके बाद वासवी बोस ने मंगरा उरांव की जमीन को अपने कब्जे में लेकर उस पर एक मकान का निर्माण किया है, जिस पर टोड़ंग ट्रस्ट (www.torang.in) नामक संस्थान का कार्यालय खोला है, जिसकी वह सचिव हैं। इस संस्थान को राष्‍ट्रीय महिला आयोग द्वारा वित्तीय सहायता प्राप्त है।

1. वासवी बोस के तीन पिता

उर्सुलाईन स्कूल, रांची एवं बिहार विद्यालय परीक्षा समिति के दस्तावेजों में वासवी बोस उर्फ वासवी किड़ो का पूरा नाम वासवी बोस, पिता प्रफुल्‍लो बोस एवं निवास स्थान थड़पखना, रांची आंकित है, जहां आज भी वासवी बोस रहती हैं। लेकिन 31 अक्टूबर, 2007 को 1.41 एकड़ आदिवासी जमीन का परमिशन फाइल करने के समय वासवी बोस ने सिविल कोर्ट, रांची में शपथ-पत्र दायर करते हुए स्वयं को उरांव आदिवासी समुदाय का सदस्य घोषित किया है। शपथ-पत्र में वासवी, पिता स्वर्गीय प्रफुल्ल कुमार, जाति उरांव एवं निवास स्थान बुड़मू थाना अंतर्गत ग्राम कोटारी आंकित है। इसी तरह 19 नवंबर, 2005 को वासवी बोस ने ‘टोड़ंग न्याय’ नामक संस्थान का रजिस्ट्रेशन ‘इंडियन ट्रस्ट एक्ट 1882’ के तहत सिविल कोर्ट, रांची में करवाया है। इस दस्तावेज में वासवी बोस का नाम वासवी कुजूर पिता भोला कुजूर ग्राम कोटारी का निवासी अंकित है। वासवी बोस ने स्वयं को अनुसूचित जनजाति (आदिवासी) घोषित करने के लिए अपने गोत्र एवं पिता का नाम तीन बार बदल दिया। इस तरह से वासवी बोस ने खुद को कभी वासवी कुजूर, वासवी भगत, तो कभी वासवी किड़ो बनाया, जिनके तीन पिता क्रमश: स्‍व प्रफुल्लो बोस, स्‍व प्रफुल्ल कुमार (उरांव) एवं भोला कुजूर हैं। इस तरह से वासवी बोस ने आदिवासी का दर्जा प्राप्त कर आदिवासी के नाम पर फायदा उठाने के लिए ही इस तरह का असंवैधानिक कार्य किया है।

2. संविधान का उल्लंघन

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 342 के तहत किसी समुदाय को अनुसूचित जनजाति (आदिवासी) घोषित करने का अधिकार राज्यपाल की सिफारिश से सिर्फ देश के राष्‍ट्रपति को है। लेकिन वासवी बोस ने न सिर्फ संविधान की अवहेलना करते हुए स्‍वयं को अनुसूचित जनजाति (आदिवासी) घोषित किया बल्कि महामहिम राष्‍ट्रपति के अधिकार को भी अपने हाथ में ले लिया। क्या वासवी बोस संविधान से ऊपर हैं? वासवी बोस आदिवासी माता एवं बंगाली पिता की संतान हैं। सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक फैसले [वलसम्मा पॉल बनाम कोचिन यूनिवर्सिटी एवं अन्य (1996) 3 एससीसी 545, पूनित राय बनाम दिनेश चैधरी (2003) 8 एससीसी 204 तथा अंजन कुमार बनाम यूनियन ऑफ इंडिया एवं अन्य (2006) 3 एससीसी 257] में कहा है कि आदिवासी माता एवं गैर-आदिवासी पिता की संतान आदिवासी होने का दावा नहीं कर सकती है क्योंकि संतान की जाति उसके पिता से निर्धारित होती है।

सुप्रीम कोर्ट ने इस विषय पर 18 जनवरी, 2012 को ‘रामेशबाई दबाई नायक बनाम स्टेट ऑफ गुजरात एवं अन्य एसएलपी (सिविल) (2012) के 4282’ में आदिवासी माता एवं गैर-आदिवासी पिता से उत्पन्न संतानों के अधिकारों को ध्यान में रखते हुए फैसला दिया कि आदिवासी माता एवं गैर-आदिवासी पिता की संतान को अगर उसके जीवन के शुरुआती दौर में गैर-आदिवासी पिता से किसी तरह का लाभ नहीं मिला हो, वह अपनी आदिवासी मां के घर में एक आदिवासी की तरह वंचित, अनादर एवं अपमानजनक स्थिति में पली-बढ़ी हो तथा उसे उस आदिवासी समुदाय ने स्वीकार किया हो, तो उसे आदिवासी का दर्जा दिया जा सकता है। लेकिन सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला भी वासवी बोस के मामले में लागू नहीं होगा क्योंकि वासवी बोस रांची के थड़पखना में अपने पिता स्‍व प्रफुल्लो बोस, जो एक कोयला व्यवसायी थे, के साथ सपरिवार रहती थी एवं उसे अपने जीवन के शुरुआती दौर में बंगाली समुदाय के सदस्य के रूप में जीवन गुजारने का मौका मिला। आज भी उसके सभी सात भाई अपने नाम के साथ ‘बोस’ सरनेम लगाते हैं। ऐसी स्थिति में वासवी बोस का स्‍वयं को आदिवासी घोषित करना असंवैधानिक कार्य है।

4. गैर-आदिवासी महिला को आदिवासी का दर्जा नहीं

वासवी बोस एक गैर-आदिवासी महिला हैं लेकिन उन्‍होंने एक आदिवासी पुरुष संतोष किड़ो से शादी की। हमेशा ऐसा देखा गया है कि जब भी अंतरजातीय विवाह होता है, तो पत्नी पति का जाति अपनाती हैं। लेकिन क्या इस स्थिति में एक गैर-आदिवासी महिला को आदिवासी पुरुष से शादी करने पर संविधान के अनुच्छेद – 15(4) या 16(4) के तहत अनुसूचित जनजाति (आदिवासी) को मिलने वाले आरक्षण का लाभ उसे मिल सकता है? सुप्रीम कोर्ट ने मुर्लिधर दयानदेव केसेकर बनाम विश्‍वनाथ पांडू बर्डे 1995 (2) एससीसी 549 एवं आर चंद्रदेवरप्पा बनाम स्टेट ऑफ कर्नाटक (1995) 6 एससीसी 309 : जेटी (1995) 7 एससी 93 में कहा कि आर्थिक सशक्‍तीकरण गरीबों का मौलिक अधिकार है एवं संविधान का अनुच्छेद – 15(3), 46 एवं 49 के द्वारा उन्हें आर्थिक सशक्‍तीकरण के लिए अवसर उपलब्ध कराया गया है। इसलिए गैर-आदिवासी महिला को सिर्फ आदिवासी पुरुष से शादी करने के आधार पर आदिवासी होने का लाभ नहीं दिया जा सकता है क्योंकि इस तरह का कदम संविधान को धोखा देने जैसा है। इसलिए वासवी बोस उर्फ वासवी किड़ो के मामले में आदिवासी पुरुष से शादी करने के बावजूद उसे आदिवासी का दर्जा नहीं मिल सकता है।

3. सीएनटी एक्ट का उल्लंघन

छोटानागपुर काश्‍तकारी अधिनियम की धारा 46 (ए) के तहत एक ही थाना क्षेत्र में निवास करने वाले आदिवासी ही आपस में जमीन की खरीद-बिक्री कर सकते हैं। वासवी बोस एक गैर-आदिवासी है एवं रांची के लोअर बाजार थानांतर्गत थड़पखना की निवासी है। लेकिन अंचलाधिकारी, बुढ़मू के जांच प्रतिवेदन के अनुसार वासवी उराईन स्‍व प्रफुल्ल कुमार (उरांव) ग्राम कोटारी, थाना बुढ़मू की निवासी है, जो 1.55 एकड़ जमीन की मालिक है और उसने बुढ़मू के कोटारी निवासी मंगरा उरांव का 1.41 एकड़ जमीन की बंदोबस्ती हेतु परमिशन मांगा है। इसी आधार पर अंचलाधिकारी, बुढ़मू ने वासवी बोस को आदिवासी एवं कोटारी का निवासी बताते हुए उसके नाम से मंगरा उरांव की 1.41 एकड़ जमीन बंदोबस्त करने का आदेश निर्गत कर दिया। अंतत: वासवी बोस ने फर्जी तरीके से स्‍वयं को आदिवासी बनाकर 1.55 एकड़ जमीन खरीदी एवं 1.41 एकड़ जमीन का बंदोबस्ती हेतु परमिशन हासिल किया। इस तरह से वह 2.99 एकड़ आदिवासी जमीन की मालिक बन चुकी हैं। यह सीएनटी एक्ट का खुल्ला उल्लंघन है क्योंकि एक गैर-आदिवासी व्यक्ति, आदिवासी की जमीन नहीं खरीद सकता है।

5. उपायुक्त के आदेश से बंदोबस्त

छोटानागपुर काश्‍तकारी अधिनियम की धारा 46 (ए) के तहत एक ही थाना क्षेत्र में निवास करने वाले आदिवासी ही आपस में जमीन की खरीद-बिक्री कर सकते हैं। लेकिन इसके लिए एक विशेष शर्त यह है कि उन्हें जिला के उपायुक्त से परमिशन लेना होगा। इतनी कड़ी व्यवस्था होने के बावजूद वासवी बोस को 2.99 एकड़ आदिवासी जमीन बंदोबस्त करने का आदेश दिया गया। बुढ़मू के कोटारी निवासी श्री मंगरा उरांव की 1.41 एकड़ जमीन की बंदोबस्ती के मामले में जांच करते हुए बुढ़मू के अंचलाधिकारी ने वासवी बोस को उरांव आदिवास समुदाय का सदस्य घोषित करते हुए जमीन की बंदोबस्ती का आदेश दे दिया। अंचलाधिकारी ने अपने प्रतिवेदन में स्‍पष्‍ट रूप से लिखा है कि क्रेता पहले से 1.55 एकड़ जमीन की मालिक है। विक्रेता एवं क्रेता एक ही गांव, थाना एवं अनुसूचित जनजाति समुदाय से आते हैं, इसलिए उक्त जमीन की बिक्री की अनुमति दी जाती है। रांची के तत्कालीन उपायुक्त ने भी इस मामले की ठीक से जांच-पड़ताल किये बगैर जमीन की बंदोबस्ती का आदेश दे दिया। इस तरह से इस मामले में अंचलाधिकारी एवं उपायुक्त दोनों पदाधिकारियों ने संविधान एवं सीएनटी एक्ट का उल्लंघन किया है।

जमीन लूट की इस कहानी का पीड़ित मंगरा उरांव बताता है कि उसके नाम पर रांची सिविल कोर्ट में फर्जी कागज बनाया गया और उसी के आधार पर उसकी 1.41 एकड़ जमीन की रजिस्ट्री का परमिशन मिला। मंगरा सवाल पूछता है कि वह कभी कोर्ट नहीं गया लेकिन उसके नाम से शपथ-पत्र कैसे बन गया? झारखंड में आदिवासियों की गैर-कानूनी एवं असंवैधानिक तरीके से जमीन लूट कोई नयी बात नहीं है। झारखंड का पिछला तीन सौ साल का इतिहास ही आदिवासियों की जमीन लूट और उसके खिलाफ संघर्ष का है। लेकिन मांगरा उरांव का मामला विशिष्‍ट इसलिए बन जाता है क्योंकि यहां असंवैधानिक एवं गैर-कानूनी तरीके से जमीन लूटने वाला आदिवासियों का तथाकथित पहरेदार ही है। दूसरा, यहां आदिवासी की जमीन लूट आदिवासी समाज के कल्याण के नाम पर हो रहा है, जैसा सरकार अक्सर विकास एवं जनहित के नाम पर करती है। तीसरा, इस मामले में झारखंड के तीन बडे मीडिया समूह के संपादकों ने इस असंवैधानिक एवं गैर-कानूनी जमीन लूट की हकीकत को अपने अखबारों में जगह देने से मना कर दिया। इसी से आप समझ सकते हैं कि मांगरा की जमीन लूटने वाला कितना ताकतवार है। क्या इस ताकत के सामने मांगरा का रांची आना सार्थक साबित होगा?

(ग्‍लैडसन डुंगडुंग। मानवाधिकार कार्यकर्ता, लेखक। उलगुलान का सौदा नाम की किताब से चर्चा में आये। आईआईएचआर, नयी दिल्‍ली से ह्यूमन राइट्स में पोस्‍ट ग्रैजुएट किया। नेशनल सेंटर फॉर एडवोकेसी स्‍टडीज, पुणे से इंटर्नशिप की। फिलहाल वो झारखंड इंडिजिनस पीपुल्‍स फोरम के संयोजक हैं। उनसे gladsonhractivist@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

One Comment »

  • पंकज झा. said:

    इसमें नयी बात क्या है? आदिवासी अधिकारों, मानव अधिकारों या जल जंगल ज़माएं की कथित लड़ाई लड़ने वाले सभी पेशेवर बिलकुल वासवी की तरह ही होते हैं….हां ये ज़रूर अहि कि जिसका जितना बड़ा नाम उसका उतना बड़ा मुखौटा…..अगर आपका कद अरुंधती की तरह हो जाय तो बुकर के रूप में कीमत वसूलेंगे, अगर वासवी जितना ही कद हो तो 1 एकड़ से कुछ अधिक ज़मीन भी चलेगा.

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