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एक आंदोलन, जिसकी ओर मीडिया ने देखा तक नहीं!

5 October 2012 3 Comments

हरियाणा का दलित आंदोलन और वेदपाल तंवर

♦ प्रमोद रंजन

फारवर्ड प्रेस के मैनेजिंग एडिटर प्रमोद रंजन का यह लेख पत्रिका के सितंबर, 2012 अंक में छपा है। भगाना प्रकरण व हरियाणा में बढ़ रहे दलित और पिछडी जातियों के उत्‍पीड़न को लेकर पत्रिका ने अभियान छेड़ रखा है। आप इस अभियान से संबंधित कुछ अन्‍य चीजें फारवर्ड प्रेस के फेसबुक पेज facebook.com/forward.press.india पर देख सकते हैं। 21वीं सदी में दलित उत्‍पीड़न की ये घटनाएं खुद हमारे माथे पर कलंक हैं : मॉडरेटर


गिरफ्तार तंवर (इनसेट)। तंवर की गिरफ्तारी पर हंसते पुलिस व प्रशासन के अधिकारी।

पिछले महीने हरियाणा की राजनीति में उफान लाने वाली दो घटनाएं हुईं। 5 अगस्त को प्रदेश के पूर्व उपमुख्यमंत्री चंद्रमोहन उर्फ चांद मोहम्मद की पत्नी रहीं अनुराधा बाली उर्फ फिजा की लाश मिली और इसी दिन राज्यमंत्री गोपाल कांडा के एयरलाइंस में काम करने वाली गीतिका शर्मा ने मंत्री पर प्रताड़ना का आरोप लगाते हुए खुदकुशी कर ली। जाट वर्चस्व वाले हरियाणा में इन दोनों मामलों में शक की सूई गैरजाट नेताओं चंद्रमोहन विश्नोई (विश्नोई) गोपाल कांडा (सोनार) की ओर रही। मीडिया को दौलत, सत्ता और सेक्स के संबंधों को खंगालने का खूब मौका मिला। यह उचित भी था, आखिर जो बिकेगा, वही तो दिखेगा!

लेकिन उत्तर भारत का मीडिया इतनी सीधी और सरल रेखा पर नहीं चलता।

इसी दौरान हरियाणा में एक और बड़ी हलचल चल रही थी, जिसके कारण सूबे के सत्ता संस्थानों में भारी खलबली थी। हिसार से महज 19 किलोमीटर दूर स्थित भगाना गांव के दलितों ने जाटों के खिलाफ विद्रोह का आगाज कर दिया था। सामाजिक बहिष्‍कार का विरोध करते हुए वे हिसार स्थित उपायुक्त कार्यालय तथा दिल्ली के जंतर-मंतर पहुंच गये थे (देखें, फारवर्ड प्रेस, अगस्त, 2012 की कवर स्टोरी ‘हरियाणा में दलित दमन’) और लगभग दो महीने से उन्होंने हरियाणा सरकार की नाक में दम कर रखा था। फिजा और गीतिका शर्मा की मौत के दिनों में भी उनका आंदोलन जारी था लेकिन मीडिया को इसकी सुध न थी। आंदोलनकारी परिवार हिसार उपायुक्त कार्यालय में अपने गाय, गोरूओं, घोड़ों के साथ जमे थे जबकि दिल्ली के जंतर-मंतर पर अर्धनग्न होकर प्रदर्शन कर रहे थे। 21 वीं सदी में जाति आधारित दमन की इस खबर के लिए बड़ा बाजार मौजूद था लेकिन खबरों के दुकानदारों को इसे बेचने में कोई रुचि नहीं थी।

अंततः हरियाणा के इस दलित आंदोलन का पटाक्षेप एक राजपूत वेदपाल तंवर की गिरफ्तारी से हुआ। यह पिछले एक महीने में हरियाणा की राजनीतिक दृष्टि से तीसरी बड़ी घटना थी। लेकिन इसे मीडिया की नजरों से तो ओझल रहना ही था, जब दलितों के आंदोलन में ही मीडिया की कोई रुचि नहीं थी तो भला इस आंदोलन की हिमायत कर रहे व्यक्ति की उसके लिए क्या अहमियत हो सकती थी?

वेदपाल सिंह तंवर से मेरा परिचय मई, 2012 में उस समय हुआ था, जब मैं तत्कालीन सेना प्रमुख जनरल वीके सिंह के उम्र विवाद पर कवर स्टोरी (देखें, फारवर्ड प्रेस, जून, 2012 ‘सेना के भीतर युद्ध’) पर काम कर रहा था। उस समय तंवर का फोन नंबर देते हुए हरियाणा के मेरे एक सीनियर पत्रकार साथी ने बताया था कि ‘वीके सिंह के पक्ष में जो राजपूत रैलियां हो रही हैं, उसका कर्ताधर्ता यही है’। इस बीच सेना के कुछ बड़े अधिकारियों से मेरी बात हो चुकी थी और मैं इस निर्णय पर पहुंच चुका था कि वीके सिंह विवाद वास्तव में ब्राह्मण-राजपूत संघर्ष की ही एक कड़ी हैं, जिसमें एक ओर रक्षा मंत्रालय पर काबिज ब्राह्मण लॉबी है तो दूसरी ओर वीके सिंह व उनके कुछ विश्वस्त राजपूत, गैर ब्राह्मण व गैर खत्री-सिख सेना-सरदार। (हाल के दिनों में सेना प्रमुख बनने के बाद सिख जनरल विक्रम सिंह द्वारा वीके सिंह के विश्वस्तों को उनके पदों से हटाने तथा उनके विरोधियों पर कृपा बरसाने से यह बात और साफ हो गयी है। दूसरी ओर वीके सिंह ने अन्ना के मंच से पूर्व सैनिकों का देश की कमान संभालने के लिए आह्वान करके अपनी राजनीतिक मंशा का भी संकेत कर दिया है।)

बहरहाल, ‘राजपूत संघर्ष समिति के संयोजक कुंवर वेदपाल तंवर’ में मेरी क्या दिलचस्पी हो सकती थी? इसलिए फोन पर बातचीत में मैंने उनसे वीके सिंह के पक्ष में हिसार और भिवानी में आयोजित राजपूत रैलियों के फोटोग्राफ चाहे, जिनसे मेरी रिपोर्ट के ऊपरोक्त तथ्य स्थापित होते थे।

तंवर ने बताया कि ‘फोटोग्राफ मेरे ईमेल पर हैं’। मैंने तस्वीरें फारवर्ड कर देने की गुजारिश की, तो उन्होंने जबाब में एक मोबाइल फोन का नंबर दे डाला। मैंने पूछा क्या इस नंबर पर फोन करके मुझे तस्वीर मांगनी है, तो उन्होंने कहा कि नहीं यह मेरे ईमेल का पासवर्ड है। मैं इंटरनेट नहीं चलाता, आप मेरे ईमेल से तस्वीरें निकाल लें। मैं हैरान रह गया। उन दिनों पूरे देश को वीके सिंह प्रकरण मथ रहा था और इंटरनेट की सोशल नेटवर्किंग साईट्स पर जनरल द्वारा की गयी कथित तख्ता पलट की कोशिशों के कारण हंगामा बरपा हुआ था। और, वीके सिंह का यह करीबी आदमी, उनके पक्ष में रैलियां आयोजित करने वाला मुख्य शख्स इतनी मासूमियत से एक अपरिचित पत्रकार को अपने इमेल का पासवर्ड दे रहा है! बहरहाल, मेरी पत्रकारीय बुद्धि ने मुझे पासवर्ड मिलते ही उनका ईमेल एकाउंट खंगालने के लिए उकसाया।

उस कवर स्टोरी के छपने के तुरंत बाद तंवर का फोन आया। ‘भाई साहब, आपकी पत्रिका देखकर ऐसा लगा कि आप दलितों की हिमायत करते हो। यहां हरियाणा में दलितों के साथ बड़ा जुल्म हो रहा है। पास के ही एक गांव (भगाना) में दबंगों ने दलितों का बहिष्कार कर दिया है। मैं इन दिनों उनकी ही लड़ाई लड़ रहा हूं। बड़ी कृपा होगी अगर आप यहां आकर खुद सारा हाल देखें’। उसके कुछ ही दिन बाद भागाना के दलितों के बहिष्कार की एक छोटी खबर किसी हिंदी अखबार ने नेट संस्करण पर दिखी और मैंने अपनी टीम के साथ हरियाणा जाना तय किया। हमने तय किया कि हम तंवर से सबसे अंत में मिलेंगे, पहले भगाना के पीड़ितों से मिलेंगे, उसके बाद मिर्चपुर जाएंगे। लेकिन हम एक बार फिर आश्चर्यचकित रह गये, जब हमने पाया कि मिर्चपुर के दलित आज तक अपने गांव नहीं लौट सके हैं और तंवर ने पिछले दो सालों से लगभग 30 दलित परिवारों को स्थानीय जाटों व पुलिस-प्रशासन के तमाम विरोध के बावजूद अपने फार्म हाउस में पनाह दे रखी है।

किस्सा-कोताह यह कि, न सिर्फ भगाना गांव के दलितों का आंदोलन बल्कि मिर्चपुर में जिंदा जला दिये गये बाप-बेटी को न्याय की लड़ाई भी यह तंवर ही पर्दे के पीछे से लड़ रहे थे। इस लड़ाई ने दलितों के बीच एक नया युवा नेतृत्व पैदा किया था, उनमें अपने अधिकारों के लिए जागरूकता लायी थी लेकिन आर्थिक संबल तंवर का ही थे।

अब मेरे सामने सवाल था कि यह तंवर वास्तव में है कौन? जाटों से ऐसी खुली लड़ाई लेने के पीछे इसकी कैसी राजनीतिक मंशा है? वेदपाल तंवर ने अपनी जिंदगी की शुरुआत एक ट्रैक्टर ड्राइवर के रूप में की, हरियाणा के गिट्टी खदानों में वह मजदूर यूनियन का नेता बना और बाद में खदानों का ठेका लेकर खूब पैसा बनाया लेकिन हरियाणा में जाटों का वर्चस्व उन्हें खलता रहा। वर्ष 2008 में हरियणा का खरक गांव आंदोलन, जो दो राजपूत लड़कों की रहस्यमयी मौत के बाद फूट पड़ा था, में तंवर ने बढ़-चढ़ कर हिस्सा लिया। एक दिन प्रदर्शन के दौरान पुलिस ने गोली चलायी, जिसमें चार लोगों की मौत हो गयी। तंवर का कहना है कि तत्कालीन राज्य सरकार (तत्कालीन मुख्यमंत्री, भूपेंद्र सिंह हुड्डा) के इशारे पर उन पर मुकदमा हुआ और उन्हें जेल भेज दिया गया। लगभग 9 महीने वह जेल में रहे। इसी बीच तंवर का इकलौता बेटा एक सड़क दुर्घटना में मारा गया। तंवर का विश्वास है कि उनके बेटे की दुर्घटना में मौत नहीं हुई बल्कि जाटों ने उसकी हत्या की है। इस दुर्घटना में उनके साले के बेटे की भी मौत हो गयी थी।

जेल से छूटने के बाद, बेटे की हत्या से गमजदा तंवर को हरियाणा से तड़ीपार घोषित कर दिया गया। एक साल तक वे हरियाणा से बाहर अपने रिश्तेदारों के यहां भटकते रहे। जब वे वर्ष 2010 में हरियाणा लौटे तो मिर्चपुर कांड हो चुका था। तंवर ने मिर्चपुर के दलितों का संबल लेकर अपने पुत्र की हत्या का बदला लेने की ठानी। उसके बाद से हरियाणा में जाटों के विरुद्ध उनका संघर्ष शुरू हुआ, जिसकी परिणति में उनका पहले से ही बरबाद हो चुका व्यापार और भी तबाह हो गया। बचे-खुचे पैसे (जो अब भी काफी बचे हैं) के सहारे वे दलितों की लड़ाई लड़ रहे हैं और हरियाणा में एक गैर जाटों का राजनीतिक मोर्चा बनाने की कोशिश में हैं।

दिल्ली के जंतर-मंतर पर अन्ना ने 29 जुलाई से अनशन शुरू किया था। यह अनशन ठीक उस जगह के बगल में हो रहा था, जहां भगाना के बहिष्कृत दलित लगभग एक पखवाड़े से धरना पर बैठे थे। अनशन के पहले ही दिन तंवर अन्ना के आंदोलन को अपना समर्थन देने हिसार से चलकर आये थे। उस दिन शाम में उनका फोन आया, ‘भाई साहब, आप मीडिया वालों को अन्ना टीम का समर्थन नहीं करना चाहिए। मैं बहुत दुःखी होकर यहां से लौट रहा हूं। अन्ना के मंच पर (जाट) ‘खाप पंचायतें’ बैठी हैं। ये सिर्फ बड़े लोगों की बात करने वाले लोग हैं। यह अरविंद केजरीवाल खुद हिसार का है, लेकिन दलितों के ऊपर जुल्म पर ये लोग एक शब्द भी बोलने को तैयार नहीं है’। ‘खाप पंचायत’ से तंवर का आशय हरियाणा के खाप पंचायतों के प्रतिनिधियों के अन्ना के मंच पर मौजूद होने से था। दरअसल, हरियाणा की कई कुख्यात खाप पंचायतों ने बकायदा बयान जारी कर अन्ना के ‘भ्रष्टाचार विरोधी’ आंदोलन को अपना समर्थन दिया था।

यही तंवर, जिनकी शह पर भगाना के दलित अपने स्वाभिमान की लड़ाई लड़ रहे हैं और जिन्होंने मिर्चपुर के दलितों के लिए न्याय की अनवरत लड़ाई लड़ी है, एक बार फिर पिछले 16 अगस्त से जेल में हैं। आरोप है कि उन्होंने अपने फार्म पर रह रहे दलितों में से एक को सांप के डस लेने पर उसका अंग्रेजी इलाज नहीं करवाया और उसे देशी दवाएं दीं, जिससे उसकी मौत हो गयी! जाहिर है, फिजा और गीतिका शर्मा के हत्यारों को पकड़ने में नाकाम रही हरियाणा पुलिस की यह ‘कामयाबी’ हास्यास्पद ही है। वेदपाल तंवर की गिरफ्तारी के बाद भगाना गांव के दलितों का आंदोलन भले ही मृतप्राय हो गया है, लेकिन इस प्रकरण ने स्पष्ट रूप से यह संकेत कर दिया है कि हरियाणा की दलित समस्या सिर्फ सामाजिक नहीं है, वहां दलित-दमन में प्रशासन और सरकार प्रत्यक्ष सहयोगी की भूमिका में हैं।

Pramod-Ranjan(प्रमोद रंजन। प्रखर युवा पत्रकार एवं समीक्षक। अपनी त्‍वरा और सजगता के लिए विशेष रूप से जाने जाते हैं। फॉरवर्ड प्रेस के संपादक। जनविकल्‍प नाम की पत्रिका भी निकाली। कई अखबारों में नौकरी की। बाद में स्‍वतंत्र रूप से तीन पुस्तिकाएं लिखकर नीतीश कुमार के शासन के इर्द-गिर्द रचे जा रहे छद्म और पाखंड को उजागर करने वाले वह संभवत: सबसे पहले प‍त्रकार बने। उनसे pramodrnjn@gmail.com पर संपर्क करें।)

3 Comments »

  • Jigme wangdi said:

    In his informative piece , Ranjan has aptly highlighted the sorry state of affairs in Haryana. Besides having the lowest sex ratio in the country ,these recent spates of heinous violence committed against women and dalits does not bode well for the STATE. One must remember that the state is not known only by its strong economic indicators but rather a true measure would be to take into account its social parameters.

  • अरुण कुमार said:

    दबंग जातियों और मुख्यधारा के मीडिया का ब्राह्मणवादी चेहरा काफी खौफनाक है. केजरीवाल का मिर्चपुर और भगाना काण्ड करने वाले खाप-पंचायत प्रतिनिधियों को मौन समर्थन देना शर्मनाक है. प्रशासन व सरकार के अन्याय के विरुद्ध डटे कुंवर वेदपाल तंवर के ज़ज्बे को सलाम !

  • aarti singh said:

    हरियाणा में जाटवाद, खापवाद, ब्राह्मणवाद, मर्दवाद का खतरनाक कॉकटेल तैयार हो चुका है !

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