ज्ञान पर पुरुषों का ही नहीं, स्त्रियों का भी नैसर्गिक अधिकार है

उपनिषद गंगा का 30वां एपिसोड विदुषी गार्गी पर

किसी भी संस्कृति की उत्कृष्टता उसके ऋषि-मनीषी-विद्वान्-विदुषियों की ज्ञान-संपदा पर निर्भर करती है। और फिर भारतीय संस्कृति का क्या कहना जिसमें याज्ञवल्क्य, शांडिल्य, शाकल्य, वरहमिहर, आर्यभट्ट जैसे महान विद्वानों का आविर्भाव हुआ। इन महान मनीषियों में महिला विदुषियों का स्थान कहीं पीछे न था, वरन तत्कालीन समाज की प्रथा व मान्यता को दरकिनार कर अपाला, घोषा, सुलभा, मैत्रेयी, लोपामुद्रा और गार्गी जैसी विदुषियों ने अपनी ज्ञान-निष्ठा क परिचय दे ज्ञान प्रधान वैदिक समाज में अपनी विशिष्टता स्थापित की।

वैदिक काल में मिथिलानरेश विदेहजनक द्वारा आयोजित ब्रह्मसभा में ऋषि याज्ञवल्क्य को चुनौती देनेवाली ऋषि वचक्नु की पुत्री वाचक्नवी गार्गी के प्रश्नों की प्रासंगिकता उतनी ही है, जितनी शरीर में सांसों की। भरी सभा में गार्गी के निडरतापूर्ण ब्रह्म की पृच्छा एवं चर्चा मानव जाति को ब्रह्मचिंतन करने को विवश करते हैं। गार्गी का व्यक्तित्व और वैदिकसमाज का दृष्‍टांत आज के तथाकथित आधुनिक समाज को एक नयी दिशा और दशा देने की क्षमता रखते हैं। आधुनिकता की इस अंधाधुंध दौड़ में, जहां स्त्री-पुरुष में समानता का संघर्ष और वर्चस्व की लड़ाई छिड़ी है, वहां हमारे सामने भारतीय वैदिक संस्कृति का चित्र है, जिसमें सबको ज्ञान-प्राप्ति के लिए समान अधिकार तथा एक-दूसरे की प्रतिभा को सम्मान दिया जाता था। माता द्वारा पुत्री के विवाह के आग्रह के बावजूद, पिता ऋषि वचक्नु का गार्गी को उच्च ज्ञान की प्राप्ति के लिए प्रेरणा और सहयोग प्रदान करना दर्शाता है कि ज्ञान की प्राप्ति करना पुरुषों का ही नहीं अपितु स्त्रियों का भी नैसर्गिक अधिकार है। निडर, निर्भयी गार्गी आज भी मनुजता के लिए प्रेरणा स्तंभ है।

ब्रह्मसभा में याज्ञवल्क्य को पूछे गये दो प्रश्नों में गार्गी ने “स्वयं का सत स्वरूप क्या है?” अर्थात “मैं कौन हूं?”, “यह सृष्टि की रचना कैसे हुई?” इत्यादि विषयों पर चर्चा की है। ये सभी जीवन के मूलभूत प्रश्न हम सबके भीतर जन्म से लेकर मृत्यु पर्यंत समाहित हैं। इन सभी प्रश्नों के निवारण के लिए तथा गार्गी के अत्‍यंत प्रभावशाली व्यक्तित्व के दर्शन के लिए देखिए “गार्गी याज्ञवल्क्य संवाद” पर आधारित धारावाहिक उपनिषद् गंगा का तीसवां प्रकरण – रविवार, सात अक्टूबर, सुबह दस बजे, डीडी नेशनल (डीडी 1) पर।

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