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रोबोट एंड फ्रेंक | सिल्‍वर लाइनिंग प्‍लेबुक… स्‍टोरीज वी टेल

22 October 2012 No Comment

#Mami #Mumbai Film Festival #2nd & 3rd Day

मुंबई डायरी
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उमेश पंत
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Umesh Pant

सजग चेतना के पत्रकार, सिनेकर्मी। सिनेमा और समाज के खास कोनों पर नजर रहती है। मोहल्‍ला लाइव, नयी सोच और पिक्‍चर हॉल नाम के ब्‍लॉग पर लगातार लिखते हैं। फिलहाल मुंबई में हैं। उनसे mshpant@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।

♦ उमेश पंत

सुबह सुबह नीद खुली तो देर हो चुकी थी। साढ़े नौ बज चुके थे। रात को सोते वक्त सोचा था कि मुंबर्इ फिल्म फेस्टिवल के दूसरे दिन की पहली फिल्म से शुरुआत की जाएगी। और फिर पूरा दिन थिएटर की कुर्सियों पर टिककर फिल्मी अनुभवों को अपनी जिंदगी का हिस्सा बनाया जाएगा। पर रात को देर से सोने की आदत सुबह देर से उठने की मजबूरी पैदा कर ही देती है।

खैर, उठते ही फटाफट नहा-धोकर कदम स्टेशन की ओर बढ़ाये जा चुके थे। ट्रेन से सीएसटी पहुंचा जा चुका था। फिर सीएसटी से टैक्सी ने एनसीपीए तक पहुंचाया। रजिस्‍ट्रेशन काउंटर पर बैठे वोलेंटियर ने इशारा करके बताया कि सर प्रेस वाले कार्ड वहां से…। इशारे की दिशा में जाकर किसी से पूछा, तो उन्होंने बताया कि सर ये काउंटर सिर्फ अमेरिकन एक्सप्रेस की मेंबरशिप वाले लोगों के लिए हैं। वहां बैठी एक उम्रदराज पत्रकार भी मामी के किसी वोलेंटियर का इंतजार कर रही थी। उन्हें बताया गया था कि मीडिया वाले कार्ड्स फलां के पास हैं और वो साढ़े ग्यारह बजे के बाद आएंगी। खैर, वापस रजिस्‍ट्रेशन काउंटर पर जाते ही गार्ड ने कहा – वो देख रहे हैं… उनसे पूछिए। उस वो की तरफ कदम बढ़ाये। एक लड़की थी। उनसे कार्ड के बारे में पूछा, तो उन्होंने प्यार से बस नाम पूछा और बस दो मिनट में आने का वादा कर एक दिशा में चलती बनी। जैसा कि प्रथा है, दो मिनट पांच छह मिनटों में तब्दील हो चुके थे। लगा कि शायद वो नहीं आएंगी। लेकिन कुछ ही देर में वो आती हुर्इ दिखीं। हाथ में मामी का प्रेस कार्ड था और सारी फिल्मों का मोटा सा कैटलॉग भी। लगा कि जैसे किसी बड़े खजाने की चाभी हाथ लग गयी हो।

खैर, पहली फिल्म अब तक मिस हो चुकी थी। तीन बजे ‘याद शहर’ से मंडली का बुलावा था। तय किया कि अगले एक घंटे में सीएसटी से अंधेरी पहुंचकर इनफिनिटी के आर्इमेक्स में कम से कम एक फिल्म देखकर फिर ‘याद शहर’ की मीटिंग माने मंडे मंडली में शामिल हुआ जाएगा। कहानियां पढ़ी और सुनी जाएंगी और वहां से फारिग होकर फिर से आठ बजकर पैंतालिस मिनट की आखिरी फिल्म देखी जाएगी।

मामला कट टु कट था। सीएसटी से एक घंटे में अंधेरी और फिर अंधेरी स्टेशन से पंद्रह मिनट में आर्इमैक्स। पर स्टेशन से जो ऑटो लिया। उससे अभी अभी उतरे पैसेंजर और ड्राइवर ने जैसे मीडिएटर बना दिया था मुझे। ड्राइवर अपनी रेट सीट मेरी तरफ बढ़ाता हुआ बोला कि आप इन्हें बताओ कि किराये बढ़ गये हैं। और ये मीटर पुराना वाला है। इसमें रेट नहीं आते, बस रीडिंग आती है। मैं ऑटो में बैठ चुका था और किनारे से पैसेंजर्स की दो जोड़ी आंखें मेरी ओर किसी फैसले के लिए ताक रही थी। मैंने उन्हें बताया कि ड्राइवर जो कह रहा है, वो सही है। लेकिन निर्भर करता है कि आप लोग कहां से बैठे। मीटर फास्ट भी हो सकता है वगैरह वगैरह। किसी तरह पैसेंजर तो मान गये, पर पता लगा कि उनके पास हजार का नोट है। तो अभी उस नोट के छुट्टे होने थे। फाइनल रेट डिसाइड होना था। और मैं फालतू उनके बीच अपना टाइम जाया कर रहा था और वहां फिल्म बस शुरू होने ही वाली थी।

खैर, मैंने अपनी भलार्इ समझते हुए दूसरे ऑटो की तरफ रुख किया। पहुंचते पहुंचते एक दोस्त का मैसेज आ चुका था कि फिल्म शुरू होने ही वाली है। तुरंत पहुंचो। पहुंचे तो फिल्म शुरू होने में अभी बस थोड़ा सा वक्त था। पर जो सीट मिली, सबसे आगे की थी। पूरा हॉल खचाखच भरा था। बस रिजर्व्‍ड सीट खाली थी, जिन पर शायद लेट से आने वाले बड़े लोगों का पहले से कब्जा था। खैर इस बीच एक अफवाह फैली कि रिजर्व्‍ड सीट सभी के लिए खुल चुकी है। आगे की सीटों पर बैठे कर्इ लोग मौके पर चौका लगाने की फिराक में पीछे की तरफ भागे। हम भी उनमें शामिल थे। पर पीछे पहुंच कर अफवाह की सच्चार्इ पता चल गयी। लेकिन अफवाह का इतना तो फायदा हुआ कि जब पीछे की सीट से वापस आये तो चौथे नंबर वाली लार्इन पर हमें दो खाली सीटें मिल गयीं, जिन्हें हमने छेक लिया। और शायद उन सीटों पर पहले बैठे लोगों को न माया मिली न राम की तर्ज पर सबसे आगे वाली सीटों पर जाकर बैठना पड़ा।

कुछ ही देर में फिल्म स्क्रीन पर शुरू हो चुकी थी। रोबोट एंड फ्रेंक। फ्रेंक नाम के एक बूढ़े आदमी को उसका बेटा एक रोबोट गिफ्ट करता है, जिसे उसकी देखभाल करने के लिए प्रोग्राम किया गया है। पहले पहल तो फ्रेंक उस रोबोट से चिढ़ा हुआ है, जिसे उसका बेटा अपने विकल्प के तौर पर उसके पास रख गया है। फ्रेंक अब बूढ़ा हो चुका है। भूलने की आदत हो गयी। वो अपने वक्त में एक हार्इप्रोफार्इल ज्वैल थीफ रह चुका है। धीरे धीरे उसे लगता है कि गिफ्ट में मिला वो रोबोट उसकी इंसानों से ज्यादा परवाह करता है। कब खाना है, कब जगना है, कब अपने आप को व्यस्त रखने के लिए कोर्इ एक्टिविटी करनी है। वो उसे वक्त पर हर चीज का रिमाइंडर देता है। अपनी मशीनी हद में रहकर ये रोबोट वो सब कुछ करता है, जो अपने बाप से प्यार करने वाली संतान उसके लिए कर सकती है। यहां तक कि उसके लिए पार्टनर इन क्राइम की भूमिका भी निभाता है। उस रोबोट पर फ्रेंक की निर्भरता या कहें प्यार इतना बढ़ जाता है कि चोरी के इल्जाम से खुद को बचाने के लिए जब रोबोट उसे अपनी मैमोरी डिलीट करने को कहता है, तो फ्रेंक मना कर देता है। फिल्म का आखिरी शॉट फिल्म को किसी और लेवल पे पहुंचा देता है। फ्रेंक एक ओल्ड एज सेंटर में है और वहां वो देखता है कि उसके जैसे कर्इ सारे बूढ़े आदमी अपने अपने केबिन में जा रहे हैं और उनके साथ कर्इ सारे रोबोट भी। ये उस दौर की बात कहने वाली एक फ्यूचरिस्टिक फिल्म है, जब शायद इंसानी रिश्तों से बढ़कर मशीनी रिश्ते अहम हो जाएंगे। जब भावनाएं प्रोग्राम्ड हो जाएंगी।

फिल्म देखने के बाद तुरंत यारी रोड में नीलेश मिश्रा जी के घर पर होने वाली मंडली को ज्‍वाइन किया। अपनी अगली नयी कहानी पढ़ी। कहानी पर मंडली के सदस्यों की राय ली। मंडली बहुत दिनों बाद थी। तय था उसे देर तक चलना था। पर एक और फिल्म भी देखनी ही थी। मंडली से ब्रेक लेकर एक बार फिर सिनेमैक्स की ओर रुख कर लिया। दिन की ये आखिरी फिल्म मामी की ओपनिंग फिल्म भी थी। सिल्वर लाइनिंग प्लेबुक। ब्रेडली कूपर और रौबर्ट डीनियरो की गजब की अदाकारी का मिश्रण इस फिल्म में देखने को मिला। एक मेंटल इंस्‍टीच्‍यूट से लौटा पैट अपने परिवार में अपने पिता और मां के साथ फिर से नॉर्मल जिंदगी में लौटने की कोशिश करता है। सामंजस्य बिठाने की इस कोशिश में उसके पिता यानी रॉबर्ट डिनियरो के साथ जो उसकी नोंकझोंक है, जो प्यार है, जो असमानताएं हैं, और उस पूरी प्रक्रिया की अदाकारी में जो सहजता है, उसे देखकर ऐसा लगता है कि परदे पर फिल्म नहीं कोर्इ जिंदगी चल रही है। और फिर आती है टिफनी यानी जैनीफर लौरेंस। जो सारे समीकरण बदल के रख देती है। जिसकी असामान्यता या कहें असहजता में एक खास तरह का आकर्षण है। कैसे उसके साथ पैट के रिश्ते पनपते हैं और कैसे पैट की पूर्व पत्नी दोनों के रिश्ते के बीच एक अदृश्य कड़ी का काम करती है। टिफनी का वो अल्हड़पन, वो जलन, वो जिद और अंतत: वो जीत। फिल्म के अलग अलग हिस्सों में ये सारी भावनाएं फिल्म को एक अलग आयाम देती नजर आती हैं।

फिल्म पूरी होने के बाद फिर से मंडली में शामिल होना था, सो हुए। रात के साढ़े तीन बजे यारी रोड से कांजुरमार्ग की तरफ रवाना हुए और रात के चार बजे के आसपास घर पहुंचना हुआ। एक लंबा, थकान भरा पर संतोषजनक दिन।

मामी के तीसरे दिन घर के सबसे नजदीक के थिएटर सिनेमैक्स सायान में दो फिल्में देखीं। पहली फिल्म द मैजिक औफ बैली आइल। एक उपन्यासकार मौर्गन फ्रीमन की कहानी, जो गर्मियों में लिखने के लिए बैले आर्इलैंड आ जाता है और वहां उसकी दोस्ती पड़ोस में रहने वाली एक सुंदर तलाकशुदा महिला और उसकी तीन छोटी छोटी बच्चियों से होती है। उनमें से एक बच्ची उससे सीखना चाहती है कि इमैजिनेशन की कला आखिर है क्या? बाहर से आये उस लेखक और उस छोटे से आर्इलैंड में रह रहे परिवार के बीच एक ऐसा जुड़ाव हो जाता है कि जब लेखक के वापस जाने का वक्त आता है, तो उनमें से कोर्इ उसे जाने नहीं देना चाहता। एक शांत समुद्री किनारे पारिवारिक से माहौल में बने इन कोमल से रिश्तों की कहानी कहती ये फिल्म भी दिल को छू जाती है।

इस फिल्म के बाद सायान सिनेमैक्स के बाहर लगभग डेढ़ घंटे तक वहां लग रही अगली फिल्म स्टोरीज वी टैल का इंतजार किया। पर फिल्म ने बुरी तरह निराश किया। इतना कि फिल्म पूरी देख पाने का हौसला कम से कम मैं तो नहीं कर पाया। इसलिए इस फिल्म के बारे में ज्यादा कहना भी मुझे मुफीद नहीं लगता। हालांकि ये फिल्म मामी द्वारा भेजी गयी बीस सर्वश्रेष्ठ फिल्मों की लिस्ट में शामिल थी।

खैर, अभी अभी घर का बना लजीज चिकन खाकर मुंबर्इ डायरी की ये किस्‍त लिख रहा हूं। उम्मीद है कि कल से 25 तारीख तक कुछ और बेहतरीन फिल्में देखने को मिलेंगी, जिनके बारे में कुछ लिखने का मन होगा। और उन फिल्मों पर एक बेहद अनौपचारिक सी प्रतिक्रिया लिये हुए होंगी कुछ और मुंबर्इ डायरीज…

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