आमोर और पांच अध्याय से इलेक्ट्रिक चिल्ड्रन तक #Mami
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उमेश पंत
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सजग चेतना के पत्रकार, सिनेकर्मी। सिनेमा और समाज के खास कोनों पर नजर रहती है। मोहल्ला लाइव, नयी सोच और पिक्चर हॉल नाम के ब्लॉग पर लगातार लिखते हैं। फिलहाल मुंबई में हैं। उनसे mshpant@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।
♦ उमेश पंत
पिछले पांच दिनों से मुंबई के पांच अलग-अलग थिएटरों का पीछा किया है। हर थिएटर जैसे एक ट्रेन हो और फिल्म शुरू होने का वक्त जैसे किसी सफर के शुरू होने का वक्त हो। रोज कई सफर ऐसे ही तय किये हैं इन दिनों में। सुबह उठना, घर से निकलने के पहले जरूरी काम निपटाना, रेलवे स्टेशन की तरफ भागना, चलती हुई ट्रेन में मुंबई फिल्म फेस्टिवल के कैटलॉग पर डौट पेन से टिक करके संभावित अच्छी फिल्मों की लिस्ट बनाना, टिकट खिड़कियों से उस फिल्म का पास लेना, वक्त पर पहुंचने के लिए थिएटर की तरफ भागना और फिर थिएटर में लगभग दो घंटे तक उस फिल्म के पैदा किये हुए संसार को जीना। इस फिल्म फेस्टिवल ने कुछ दिनों के लिए दिनचर्या को बिल्कुल बदल दिया है। और ऐसा मुंबई में मौजूद कई सिनेप्रेमियों के साथ हुआ है। जब आपके सामने दो सौ से ज्यादा चुनिंदा फिल्मों की लिस्ट हो और आपके पास उनमें से बस बीस-पच्चीस देख पाने का मौका हो तो लगता है काश दिन बड़े हो जाते और उन बड़े हुए दिनों में कुछ और ज्यादा फिल्में मामी की समय सारिणी में शामिल हो पातीं। जैसे कई सारी अशर्फियां आपके सामने रख दी गयी हो और कह दिया गया हो – समेट लो जितना समेटना है।
कल एक कहानी पूरी करके शाम के 5 बजकर 30 मिनट वाली फिल्म देखने के लिए सायान रवाना हुआ। शेमलेस देखने का मन था पर पहुंचते पहुंचते देर हो चुकी थी। इसलिए दूसरी स्क्रीन पर बस अभी अभी शुरू हुई फिल्म चेरी देखने बैठ गया। आने से पहले सोचा था कि इसके बाद दिन की आखिरी एक और फिल्म देखी जाएगी। पर न जाने क्यों चेरी आधी छोड़कर हॉल से लौट आया। मन उचट सा गया, दूसरी फिल्म देखने का खयाल दूसरे दिन तक के लिए टाल दिया। चेरी एक टीन एजर लड़की की कहानी है, जो किसी तरह सेन फ्रेंसिस्को आकर पोर्नोग्राफी के व्यवसाय में आ जाती है। फिल्म में पोर्नोग्राफी की दुनिया में काम करने वाली लड़कियों की जिंदगी को दिखाने की कोशिश की गयी है, पर फिल्म आपको कहीं इनगेज नहीं कर पाती। कोई ऐसी नयी बात नहीं कहती या दिखाती, जिससे आपको इस व्यवसाय में काम करने वाले लागों की मनोवैज्ञानिक स्थिति की जरा भी झलक मिले। एक बेहद कमजोर फिल्म। उस फिल्म को सिनेमा हॉल में देखते हुए बड़ा असहज सा महसूस होता रहा। आधी फिल्म से लौटकर कुछ देर यूं ही सायान के आसपास की अजनबी गलियों में भटकने का मन हुआ। नुक्कड़ की दुकान पर चाय पी और घर लौट आया।
फेस्टिवल का पांचवां दिन अच्छी फिल्में देखने के लिहाज से सबसे बेहतर रहा। एनसीपीए के जमशेद बाहा थिएटर में 3 बजकर 30 मिनट से माइकल हैनेके की फिल्म अमोर देखनी शुरू की। इस फिल्म को कई लोगों ने रिकमंड किया था। लगभग 1100 लोगों की कैपेसिटी वाले इस थिएटर में मुश्किल से कोई सीट खाली थी। मुंबई फिल्म फेस्टिवल की इस फिल्म का बड़े दिनों से बेसब्री से इंतजार था। और फिल्म देखने के बाद लगा कि वो इंतजार, वो बेसब्री बिल्कुल जायज थी। महज एक अपार्टमेंट में सेट इस पूरी फिल्म के केंद्र में 80 साल का एक बुजुर्ग दंपति है। दोनों रिटायर्ड म्यूजिक टीचर हैं। उम्र के लगभग आखिरी पड़ाव में प्यार के एहसास को कितनी खूबसूरती से महसूसा, जीया और निभाया जा सकता है, इस फिल्म में इसकी बेहतरीन नुमाइश होती है। वो उम्र जब प्यार प्यार में कोई दैहिक या शायद काफी हद तक मनोवैज्ञानिक जिज्ञासाएं नहीं रह जातीं, जहां शायद बड़ी बड़ी ख्वाहिशें दम तोड़ चुकी होती हैं, या उनकी जरूरत ही नहीं रह जाती, जहां उम्र बचपन की ओर लौटने लगती है, छोटी सी बातों से खुशी की लहरें दौड़ जाती है, या कोई छोटा सा एहसास दिल दुखा जाता है, खीझ होने लगती है, आत्मसम्मान को ठेस पहुंच जाती है, जिंदगी के सबसे नाजुक मोड़ में आखिरी सांसें लेती जिंदगी। और उस उम्र में जब आप शारीरिक रूप से असहाय हो जाएं, खुद के शरीर के अंग आपका साथ छोड़ने लगें, ऐसे में आपके पास कोई हो, जो आपके एक एक एहसास की कद्र करने के लिए जिंदा हो, एक एक इच्छा और जरूरत का खयाल रखने के लिए खुद को समर्पित कर चुका हो। आमोर इन सारे एहसासों की बहुत ही गहराई से पड़ताल करती है, इस हद तक कि आपको एक एक संवाद, एक एक ध्वनि और यहां तक कि एक एक सन्नाटा खुद से जोड़ लेता है। बेहतरीन अदाकारी और निर्देशन का जादुई कमाल ही है कि फिल्म के किरदार जैसा महूसस कर रहे होते हैं, आप उस एहसास के बिल्कुल करीब पहुंच जाते हैं। फिल्म इस हद तक खुद से आपको जोड़ लेती है कि आपको किसी कहानी की दरकार नहीं रह जाती। साउंड डिजाइन से लेकर सिनेमैटोग्राफी तक सब कुछ बेहद सधा हुआ और खूबसूरत। हैनेके की इस फिल्म में बार-बार एक कबूतर अपार्टमेंट में आता है। निस्संदेह आमोर को देखना मुंबई फिल्म फेस्टिवल के सबसे खूबसूरत अनुभवों में एक रहा।
आमोर के बाद आईनौक्स में प्रोतिम दास गुप्ता की बंगाली फिल्म पांच अध्याय के लिए जा रहा था कि थिएटर के ठीक बाहर किसी ने पीछे से पीठ में हाथ रखकर आवाज लगायी। पीछे मुड़ के देखा अजय ब्रह्मात्मज जी सामने थे। उन्होंने भी पांच अध्याय का पास लिया था। फिल्म के निर्देशक प्रोतिम दास गुप्ता अजय जी से मिले, तो उन्होंने मुझे भी उनसे मिलवा दिया। ऑडिटोरियम में जाते ही प्रियांशु अजय ब्रह्मात्मज जी से मिले। कुछ देर बात चली कि प्रियांशु ही इस फिल्म के लीड हैं। कभी तुम बिन में उन्हें देखा था। फिल्म शुरू होने से पहले एक बार फिर यश चोपड़ा जी के निधन पर दो मिनट का मौन रखा गया। प्रियांशु और दिया मीज्रा फिल्म के लीड हैं। फिल्म पांच हिस्सों में बंटी है। ये हिस्से दरअसल एक रिश्ते के पांच हिस्से हैं। एक दूसरे को प्यार करने वाले दो लोगों के रिश्ते को वक्त में आगे पीछे जाकर पांच अलग-अलग परतों में देखने की एक कोशिश। प्रोतिम की ये फिल्म ऐसी नहीं है, जो कि गहराई तक छाप छोड़ जाए। जिसे आप शायद लंबे समय तक याद रखें। पर अगर आप बॉलीवुड मसाला और आर्ट फिल्मों के बीच के किसी जौनर में यकीन रखते हैं, तो बिना किसी इरीटेशन के आप इस फिल्म को पूरा देख सकते हैं। एक निर्देशक के रूप में प्रोतिम की भी ये पहली फिल्म है, और एक एक्ट्रेस के रूप में दिया मीर्जा की पहली रीजनल फिल्म। पांच अध्याय में प्यार की मासूमियत तो है, पर एक रिश्ते का डाईसेक्शन करते वक्त फिल्म उतनी मेच्योर नहीं लगती। फिल्म बीच-बीच में आपको कुछ अच्छे मूमेंट्स जरूर देती है, पर कुल मिलाकर प्यार, तकरार और आखिर में बहुत प्रिडिक्टेबल क्लाइमेक्स की वजह से दिल में गहरे तक नहीं उतर पाती। कहीं सतह पर कुछ अच्छे अनुभव छोड़कर निकल जाती है।
अजय जी और मैं दोनों थिएटर से निकले तो पानी के गिरने की तेज तेज आवाजें आ रही थीं। लगा कि कूलिंग मशीन की आवाज होगी, पर जैसे ही आईनौक्स के बाहर निकले, बारिश की तेज तेज बूंदों से सामना हुआ। ऐसे सरप्राइज करती बारिशें कभी-कभी अच्छी लगती हैं। मिट्टी की सोंधी महक दिल खुश कर जाती है। लेकिन इस वक्त हमें आईनौक्स से कुछ दूर एनसीपीए पहुंचना था। पर बारिश थी कि रुक ही नहीं रही थी। अजय जी ने कहा चलो चले चलते हैं, जरा भीग ही तो जाएंगे। लगा कि जब मुझसे कई ज्यादा उम्रदराज होने के बावजूद उन्हें भीगने का कोई डर नहीं है, तो फिर मुझे क्यों। अब तक बारिश हल्की हो चुकी थी। हल्की हल्की बारिश में भीगते हुए हम जमशेद बावा थिएटर पहुंचे, जहां इलैक्ट्रिक चिल्ड्रन नाम की वो फिल्म बस अभी अभी शुरू हो चुकी थी।
इलैक्ट्रिक चिल्ड्रन में एक मां अपने टीन एजर बच्चों को कहानियां सुनाया करती है। एक दिन उसकी लड़की को पता चलता है कि वो प्रेग्नेंट है। इसी बीच वो एक ऑडियो टेप सुनती है और उसे महसूस होता है कि उस टेप में जिसकी आवाज उसने सुनी है, वही उसके पेट में पल रहे बच्चे का पिता है। उस अजनबी, अनजान आदमी को वो भगवान का कोई दूत समझ कर उसकी खोज में घर से भागकर एक शहर की ओर निकल जाती है। शहर में उसकी मुलाकात उसी की उम्र के लड़के-लड़कियों के एक ग्रुप से होती है। कैसे वो और उसका भाई शहर में इस ग्रुप के साथ घुलते-मिलते हैं, कैसे लड़की अपने बच्चे के पिता की जगह अपने पिता को खोज लेती है, घर लौटती है तो वहां उसकी शादी करने का प्रयास किया जाता है और आखिरकार कैसे शहर से उस ग्रुप में मौजूद लड़का, जो उसे पसंद करता है, कस्बे में आकर शादी के इस जंजाल से निकाल कर उसे अपने साथ ले जाता है। फिल्म में हयूमर का भरपूर पुट है और उसे अच्छे तरीके से निभाया गया है, इसीलिए पूरी फिल्म देखने में मजा आता है। नैरेशन के टूल के रूप में ऑडियो टेप को अच्छी तरह से फिल्म में प्रयोग किया गया है। मुंबई फिल्म फेस्टिवल के अच्छे सिनेमाई अनुभवों में एक रही ये फिल्म।
फिल्म से लौटते वक्त रात का लगभग साढे दस बच चुका था। एनसीपीए से कोई टैक्सी नहीं मिल रही थी। अजय जी और मैं समंदर किनारे मरीन ड्राइव पर कुछ आगे चले आये थे। राह चलते अजय जी ने बताया कि अपने संघर्ष के दिनों में यहां से एक ही दिन में कई बार सीएसटी तक पैदल चलना पड़ता था। तब जेब में टैक्सी तो दूर बस तक के पैसे नहीं होते थे। अजय जी की बातों से लगा कि इसी तरह छोटी दूरियां तय करते-करते हम कितनी बड़ी दूरियां तय कर लेते हैं, हमें पता ही नहीं चलता। टाइडेंट होटल के बाहर टैक्सी वाले बड़ी दूरियों की सवारियों का इंतजार कर रहे थे। और हम किसी टैक्सी वाले का इंतजार करते कुछ और आगे चले आये जो हमें हमारी छोटी दूरियों तक पहुंचा दे। खैर अजय जी को रास्ते पे ड्रॉप करके मैं सीएसटी चला आया। वहां कुछ देर खड़े होकर चाय पी, एक समोसा खाया। अपनी अपनी साइकिल पे अंडे की भुजिया और पाव बेचते कई लोग थे वहां। अपने अपने काम से लौटे थके हारे लोग जितने चाव से भुजिया और पाव खा रहे थे, उन्हें देखते हुए एक खयाल आया कि क्या ये लोग अपनी जिंदगी को इतने चाव से जी पाते होंगे। ऐसे ही छोटे छोटे चाव से जीये जाने वाले पल जिंदगी को खूबसूरत बनाते हैं शायद।
कुछ देर बाद स्टेशन पर मुझे अपने लंबे सफर के लिए ट्रेन मिल चुकी थी। एक छोटा सफर पीछे छूट चुका था। और इन दोनों घटनाओं से अलग एक और लंबा सफर आगे इंतजार कर रहा था।










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