यूरोप एक बंद होती हुई बोतल का घमंड से भरा हुआ नाम है
♦ ओरहान पामुक
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मैंने अपना पूरा जीवन ही यूरोप की सरहद पर गुजारा है। मेरे घर और दफ्तर की खिड़कियों से एक तरफ यूरोप का बोसफोरस दिखता था और दूसरी ओर एशिया। यूरोप और आधुनिकता के बारे में सोचते हुए मैं बाकी दुनिया के लोगों की तरह ही थोड़ा-सा संकुचित नजरिये वाला हो जाता हूं। पश्चिम के बाहर रहने वाले करोड़ों लोगों की तरह जब मैं यूरोप को दूर से देखता हूं, तो मैं अपनी पहचान को लेकर सचेत हो जाता हूं। मुङो इस सवाल से अक्सर हैरत होती है कि यूरोप का मेरे लिए या हम सबके लिए क्या अर्थ है? यह मेरा और दुनिया की बहुसंख्य आबादी का साझा अनुभव है। लेकिन मेरा घर इस्तांबुल में है, जहां से यूरोप शुरू होता है। या यूं कहें कि जहां पर यूरोप खत्म हो जाता है। इस नाते मेरे दिमाग में यह विचार लगातार चलता रहता है, लगातार दबाव बनाता है।
मेरा परिवार इस्तांबुल के उन बहुत से उच्च-मध्यवर्गीय परिवारों में से एक है, जिन्होंने कमाल अतातुर्क द्वारा स्थापित पश्चिमीकरण और धर्मनिरपेक्षता की कोशिशों को दिल से स्वीकार किया था। तुर्की गणराज्य के संस्थापक अतातुर्क ने यह काम 1920 से 1930 के मध्य किया था। हमारे लिए यूरोप सभ्यता का प्रकाश स्तंभ था। यहां पर मैं कुछ ऐतिहासिक तथ्यों की ओर ध्यान दिलाना चाहूंगा। तुर्की कभी किसी पश्चिमी ताकत का उपनिवेश नहीं रहा, यूरोपीय साम्राज्यवाद ने इसका शोषण कभी नहीं किया। इस वजह से हम बहुत आसानी से यूरोपीय शैली के पश्चिमीकरण का सपना देख सकते थे, बिना अपनी किन्हीं बुरी यादों को दबाये हुए। सात साल पहले तक मैं लोगों को यह बताता था कि अगर तुर्की को यूरोपीय संघ का सदस्य बना लिया जाए, तो कितना अच्छा होगा। अक्तूबर 2005 में तुर्की और यूरोपीय संघ के बीच रिश्ते अपने चरम पर थे। जब यूरोपीय संघ और तुर्की के बीच आधिकारिक बातचीत शुरू हुई, तो यहां लोग खुश थे। तुर्की के कुछ अखबारों ने तो यहां तक अटकल लगानी शुरू कर दी थी कि सब कुछ काफी तेजी से होगा और 2014 तक तुर्की यूरोपीय संघ का पूर्ण सदस्य बन जाएगा। कुछ अखबार तो उस युग की सुहानी गाथाएं रचने लग गये थे, जब तुर्की यूरोपीय संघ का पूर्ण सदस्य होगा।

इनमें सबसे महत्वपूर्ण बात यह थी कि यूरोपीय संघ के कई फंड के जरिये तुर्की में बड़ी तादाद में निवेश आएगा और ग्रीस की तरह हम भी सामाजिक विकास की बुलंदियों की तरफ बढ़ने लगेंगे। ठीक उसी समय यूरोप में, खासकर जर्मनी और फ्रांस में कट्टरपंथी और राष्ट्रवादी विरोध के स्वर सुनाई देने लगे, जो यूरोपीय संघ में तुर्की के संभावित प्रवेश के खिलाफ थे। इस बहस में मुझे भी खींच लिया गया। मुझसे यह पूछा जाने लगा कि मेरे लिए यूरोप का क्या अर्थ है? अगर हम मान लें कि यूरोप की सरहदें मजहब से तय होती हैं, तो मेरी समझ में यूरोप एक ईसाई सभ्यता है। इस हिसाब से देखें, तो तुर्की भले ही भौगोलिक रूप से यूरोप से जुड़ा हुआ हो, पर उसके लिए यूरोपीय संघ में कोई जगह नहीं है, क्योंकि उसकी 99 फीसदी आबादी मुस्लिम है।
लेकिन क्या यूरोप के लोग अपने महाद्वीप की ऐसी संकीर्ण सोच वाली परिभाषा से सहमत होंगे? क्योंकि यह ईसाइयत नहीं है, जिसने गैर-पश्चिमी लोगों के सामने यूरोप को एक उदाहरण के तौर पर पेश किया। इसकी वजह तो वहां एक लंबे दौर में हुए आर्थिक और सामाजिक बदलाव हैं, इसके अलावा वहां पनपे विचार हैं। यही वह ताकत थी जिसने पिछली दो सदियों तक बाकी दुनिया को यूरोप की तरफ आकर्षित किया। इसी को हम साधारण शब्दों में आधुनिकता कहते हैं। इतिहास की हमारी किताबें हमें यही सिखाती हैं कि आधुनिकता वह उत्पाद है, जो यूरोपीय विकास के दौरान पैदा हुआ। इसका जन्म रेनेसां, एनलाइटेनमेंट, फ्रांस की क्रांति और औद्योगिक क्रांति जैसी घटनाओं के मध्य हुआ था।
इसमें सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि जो ताकतें इसके पीछे थीं, वे धार्मिक नहीं थीं, वे धर्मनिरपेक्ष थीं।
अभी कुछ साल पहले तक जब यूरोपीय संघ के बारे में चर्चा होती तो मैं यह कहता था कि तुर्की को यूरोपीय संघ में शामिल हो जाना चाहिए, बशर्ते यूरोपीय संघ इस मामले में स्वतंत्रता, समता और भाईचारे के सिद्धांतों का सम्मान कर सके। तब हमेशा मुझसे यही सवाल पूछा जाता था ‘लेकिन क्या तुर्की इन सिद्धांतों का सम्मान करता है?’ सवाल में दम था। और चर्चा ऐसे ही सवालों से आगे बढ़ती थी। आज जब मैं उन दिनों को याद करता हूं, तो मेरे भीतर एक नॉस्टेलजिया का एहसास जगता है। कितनी शिद्दत से हमने ये चर्चाएं की थीं। यह नॉस्टेलजियां तुर्की और यूरोप दोनों के लिए होता है, उन मूल्यों के लिए जिनके लिए यूरोप को जाना जाता है।
इन दिनों जब यूरोप अपने यूरो संकट से जूझ रहा है, यूरोपीय संघ के विस्तार का अभियान सुस्त पड़ गया है। अब हममें से किसी को भी इस बात करने तक की जरूरत महसूस नहीं होती। और बदकिस्मती से वे सारी सकारात्मक चीजें भी अब कमजोर पड़ती जा रही हैं, जिन्हें तुर्की की यूरोपीय संघ की सदस्यता के लिए अहम माना जा रहा था। यह शायद इसलिए भी है कि विचार की स्वतंत्रता अभी भी तुर्की में पूरी तरह विकसित नहीं हुई। लेकिन, निस्संदेह एक बड़ा कारण वह मुस्लिम आबादी है जो एशिया और अफ्रीका से पलायन करके यूरोप पहुंच गयी है। कई यूरोपीय लोगों के मन में इसी से भय और संदेह पैदा हुए हैं और वे किसी मुस्लिम देश के यूरोपीय संघ में शामिल होने के खिलाफ हो गये हैं। यह बिल्कुल साफ है कि यह भय यूरोप की सरहदों पर दीवार बनकर खड़ा हो गया है, और यह धीर-धीरे उसे बाकी दुनिया से दूर कर रहा है। जैसे-जैसे स्वतंत्रता, समानता और भाईचारे की भावनाओं को भूला जाने लगेगा, एक दुखद बदलाव यह होगा कि यूरोप लगातार कट्टर होता जाएगा, जहां धार्मिक और जातीय पहचान का ही बोलबाला होगा।
(ओरहान पामुक। उपन्यासकार। इस्तांबुल में 1952 में जन्म। 1974 से लेखन की शुरुआत। माई नेम इज रेड किताब से दुनिया भर में शोहरत मिली। उसके बाद उन्होंने स्नो, म्यूज़ियम आफ इनोसेंस, इस्तांबुल: मेमोरी एंड द सिटी जैसी किताबें लिखीं, जो अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर बेस्टसेलर साबित हुई। कई पुरस्कारों से सम्मानित ओरहन पामुक को वर्ष 2006 में साहित्य के नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया।)










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