नॉन बजट की छोटी फिल्‍में ही सिनेमा का भविष्‍य है #Mami

मुंबई डायरी
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उमेश पंत
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Umesh Pant

सजग चेतना के पत्रकार, सिनेकर्मी। सिनेमा और समाज के खास कोनों पर नजर रहती है। मोहल्‍ला लाइव, नयी सोच और पिक्‍चर हॉल नाम के ब्‍लॉग पर लगातार लिखते हैं। फिलहाल मुंबई में हैं। उनसे mshpant@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।

♦ उमेश पंत

मुंबई फेस्टिवल के छठे दिन फेसबुक पर फेस्टिवल के पेज से जानकारी मिली कि मुंबई डाईमेंशन कैटेगरी के अंदर आने वाली 25 शॉर्ट फिल्म्स का प्रदर्शन एक बार फिर किया जा रहा है। मुंबई डाईमेंशन की पहली स्क्रीनिंग छूट जाने का बहुत मलाल हुआ था। इसलिए इस स्क्रीनिंग को किसी भी हाल में न छोड़ने का मन बना लिया था। मैंने फेसबुक पर पढ़ा था कि दिन के एक बजकर तीस मिनट पर फिल्म गोदरेज थिएटर में स्क्रीन होगी। पूरे फेस्टिवल का एक यही वैन्यू बचा था, जिसमें हो रही स्क्रीनिंग में अब तक शामिल नहीं हुआ जा सका था। इसलिए खुशी हुई कि आज ये आखिरी वैन्यू भी देख लिया जाएगा। फेस्टिवल के बहाने मुंबई के उन सारे सिनेमाहॉल्‍स में फिल्में देखने का ये सुनहरा मौका हाथ लगा था, जिनमें शायद कभी जाना भी होता या नहीं। खैर आज फिर वक्त बिल्कुल सर पर नाच रहा था। ट्रेन, फिर टैक्सी और फिर गोदरेज थिएटर। वहां पहुंच कर जो देखा उसे देखकर बड़ा आश्चर्य हुआ। एक बजकर बीस मिनट हो चुके थे, पर वो हॉल लगभग खाली था और वहां पहले से कोई और ही फिल्म चल रही थी।

जल्दी से थिएटर से बाहर आकर फेस्टिवल के वॉलेंटियर्स से पूछा, तो उन्होंने बताया कि मुंबई डाईमेंशन तो एनसीपीए के जमशेद बावा थिएटर में स्क्रीन होगी। वक्त बहुत कम बचा था। तुरंत टैक्सी की और फिर किसी तरह भागते दौड़ते एनसीपीए। पांच मिनट लेट ही सही, हॉल में दाखिल हुआ। तब तक एक फिल्म छूट चुकी थी। खैर खुशी की बात ये थी कि अभी 24 फिल्में शेष थी।

यहां हॉल में कुछ वैसा ही माहौल था, जैसा पुणे के फिल्म इंस्‍टीटयूट में फिल्म देखते हुए होता है। फिल्में देखने वाले ज्यादातर लोग स्टूडेंट सरीखे नजर आ रहे थे। इसीलिए फिल्मों के बाद उसी तरह हूटिंग हो रही थी और अच्छी फिल्मों के बाद उसी उत्साह से तालियां भी बज रही थीं। यहां फिल्मों के भविष्य का वर्तमान अपनी सिनेमाई समझ का प्रदर्शन कर रहा था। इसीलिए ये फिल्में अपने सबसे करीब महसूस हो रही थी।

इन फिल्मों की अच्छी बात ये थी कि इनमें पूरी मासूमियत थी। क्यूंकि ये फिल्में लगभग न के बराबर बजट में बनी फिल्में थीं, इसीलिए इनमें तकनीकी दिखावा नहीं था। बेहद कम समय और कम संसाधनों में अपने ज्यादा से ज्यादा सिनेमाई ज्ञान को प्रदर्शित करती ये फिल्में संभावना जगाती फिल्में थी। प्रेरणा देती फिल्में थी। और उससे भी बढ़कर सिनेमा के माध्यम से अपने परिवेश को समझने की कोशिश करती फिल्में थी।

इन फिल्मों में मुंबई के भीतरखानों की अच्छी झलकें देखने को मिली। मुंबई डाईमेंशन कैटेगरी की एक शॉर्ट फिल्म लोकल दिखाती है कि कैसे लोकल ट्रेन के तेज शोर को नयी नयी शादी करके चॉल में रहने आये पति-पत्नी अंतरंग लम्‍हे बिताने के लिए एक टूल की तरह प्रयोग करते हैं। मुंबई में रहने वाले लोग परिस्थितियों से किस हद तक खुशी-खुशी सामंजस्य बिठा लेते हैं, कैसे सिमटी हुई, शोर भरी गलियों के भीतर भी मुस्कुराहटें सहेज के रख लेते हैं मुंबई वाले, लोकल नाम की ये शॉर्ट फिल्म बहुत ही कम संवादों में ये बात बहुत अच्छे से बयां कर जाती है।

सिनेजगत के पात्रों को तरह-तरह के परिधानों से अलग रंग-रूप देने वाले ड्रेसवालाज पर एक छोटी सी डॉक्‍यूमेंट्री फिल्म ड्रेसवाला भी एक अच्छा प्रयास लगती है। फिल्म में ड्रेसवालाज के मालिक एक बेहद बुजुर्ग शख्स जब बड़े ही अंदाज से तख्लिया कहते हैं, तो उस लम्‍हे को कैप्चर कर लेने के लिए फिल्म के निर्देशक को बधाई देने का मन होता है।

नरेशन के टूल को बहुत अच्छे से प्रयोग करने वाली एक फिल्म दो रुपये का पैन भी अच्छा प्रयास लगती है।

केवल पंक्तियों से बनाये ग्राफिक के माध्यम से पूरे मुंबई की झलकी दे देने वाली फिल्म मुंबई ज्योमेट्री भी एक अलग अप्रोच के कारण याद रह जाती है।

इसके अलावा आंखों देखा हाल, आठ आना, बॉम्‍बे कुल्फी, नुंबई, बीएसएन यानी बालू शिखा की नैनो लव स्टोरी जैसी कुछ और फिल्में हैं, जो जहन में बनी रहती हैं।

इन पच्चीस लघु फिल्मों को देख लेने के बाद मुंबई के लिए प्यार थोड़ा और बढ़ गया। सिनेमा के लिए प्यार तो खैर बढ़ना ही था।

आखिरी दिन पुरस्कारों का दिन था। इंडिया गोल्ड के तहत मिस लवली को बेस्ट फिल्म का पुरस्कार मिला, तो बाहर से आयी फिल्मों में हेयर एंड देयर को सर्वश्रेष्ठ फिल्म चुना गया। मुंबई डाईमेंशन की तरह भरत सिंह पवार की फिल्म लोकल को सर्वश्रेष्ठ फिल्म के पुरस्कार से नवाजा गया। वहीदा रहमान को लाइफ टाइम अचीवमेंट देकर सम्मानित किया गया। खैर दर्शकों के लिए तो फिल्में देखना ही पुरस्कार मिलने जैसा था।

ये सात दिन बहुत जल्दी गुजर गये। इन सात दिनों की भागदौड़, एक्जाम्स के टाइम टेबल की याद दिलाता फेस्टिवल की फिल्मों का शैड्यूल, कभी बिल्कुल खाली तो कभी पूरी तरह से भरे थिएटर और सामने स्क्रीन पर चुनी हुई फिल्में देखने का मौका। ये सब कुछ याद करना अगले मुंबई फिल्म फेस्टिवल के आने तक अच्छा ही लगेगा।

अच्छा हो कि ऐसे फिल्म फेस्टिवल हर चार-पांच महीने में होते रहें ताकि विश्व सिनेमा के साथ-साथ अपने देश के रीजनल सिनेमा को भी दर्शकों तक अच्छी तादाद में पहुंचाया जा सके। वो फिल्में भी थिएटर तक पहुंच सकें, जो अच्छी होने के बावजूद आर्थिक कारणों से रिलीज नहीं हो पातीं। ताकि फिल्म से जुड़े लोगों को बेहतर फिल्में देखने को मिले, जिससे बेहतर फिल्में बनाने की प्रेरणा मिलती रहे।

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