वे प्रधानमंत्री थे, लेकिन पांच लोगों को नाश्‍ता नहीं करवा सके


Acclaimed lyricist Gulzar, film director Mahesh Bhatt, actor Tisca Chopra and others at the release in New Delhi of the book House Full: The Golden Age of Hindi Cinema edited by Zia Us Salam.

♦ अविनाश

30 अक्‍टूबर को, परसों, क्‍लैरिजेज होटल में, सौ साल के सिनेमा का उत्‍सव ओम बुक्‍स इंटरनेशनल ने मनाया। फिल्‍म पत्रकार जिया साहब ने एक किताब संपादित की है: हाउस फुल, उसी के विमोचन के बहाने हिंदी सिनेमा के “गोल्‍डेन एरा” पर एक पैनल डिस्‍कशन था। गुलजार साहब की बहुत साफ समझ थी कि सिनेमा और संगीत उस दौर से काफी आगे निकल आया है और उसने अपनी लैंग्‍वेज इधर बनानी शुरू की। महेश भट्ट ने मदर इंडिया को उस दौर का अपने सबसे पसंदीदा सिनेमा बताया, लेकिन गुलजार ने उसे मैलोड्रामा के खाते में डालते हुए “औरत” को उससे बेहतरीन रचना बताया, जिससे प्रेरित होकर मदर इंडिया बनायी गयी थी। ऐसे अनेक खुरपेंच मिश्रित संवादों के बीच गुलजार साहब ने उस जमाने का एक किस्‍सा सुनाया।

ख्‍वाजा अहमद अब्‍बास की एक फिल्‍म की स्‍क्रीनिंग दिल्‍ली में थी। पंडित नेहरु देखने आये थे। फिल्‍म देखने के बाद पंडित जी ने अब्‍बास साहब से कहा कि क्‍या सुबह हमारे यहां नाश्‍ते पर आ सकते हैं? अब्‍बास साहब ने कहा कि वे अकेले नहीं आ सकते। उनके साथ पांच टेक्‍नीशियन हैं, अगर वे पांचों आ सकते हैं, तभी वे भी आ सकते हैं। पंडित जी इंदिरा गांधी के पास गये और उनसे कहा कि इंदु कल सुबह का इंतजाम देख लो – अंडे वगैरा मंगवा लो – अब्‍बास साहब अपने पांच साथियों के साथ नाश्‍ते पर आएंगे। तो इंदिरा जी ने कहा कि अब्‍बास साहब से कहिए, उनसे मिल लें। पंडित जी ने कहा अब्‍बास साहब से आकर कहा कि इंदु आपसे कुछ बात करना चाहती है। अब्‍बास साहब इंदिरा गांधी के पास आये, तो इंदिरा जी ने उनसे कहा कि देखिए, हमारे पिता की कोई अतिरिक्‍त आमदनी नहीं है। किताबों की रॉयल्‍टी से घर के खाने-पीने का इंतजाम होता है। पांच आदमियों के लिए नाश्‍ते का इंतजाम हम पर भारी पड़ेगा – इसलिए कृपा करके आप अकेले आइए।

पता नहीं क्‍यों, मैं इस कहानी में मौजूद संवेदनशील रेशों से बहुत प्रभावित नहीं हो पाया। उन दिनों पंडित जवाहर लाल नेहरु प्रधानमंत्री थे। मेरी समझ में ये नहीं आया कि एक प्रधानमंत्री क्‍या पांच आदमियों को सुबह नाश्‍ता नहीं करवा सकता था? वो तो एक मित्र ने बताया कि संभव है इंदिरा गांधी ये दर्शाना चाहती हों कि पंडित नेहरु की ईमानदारी का सम्‍मान किया जाए और यह भी कि घर में अतिरिक्‍त आदमियों की भीड़ न बढ़ायी जाए।

आपको क्‍या लगता है?

Celebrating 100 Years of Indian Cinema

Remember the first time the illustrious Mangeshkar sisters sang together? Or the time when music composer, poet and lyricist Gulzar was prohibited from singing his own song? And do you know who was supposed to step into the famous actress Madhubala’s shoes in Mughal-e-Azam? Replete with little-known facts about the actors, actresses, directors, producers, composers and lyricists of the path-breaking films of the ’50s and ’60s, a period rightly qualified as the Golden Years of Bollywood, this book, rich with anecdotes is an important record of cinematic history that examines the changing trends in Hindi films, right from the times of Alam Ara to films like Lagaan and Tare Zameen Par via films like Pyaasa, Do Bigah Zamin, Mughal-e-Azam, Sholay and the rest.

A film critic with the renowned Indian daily The Hindu since 2000, ZIYA US SALAM has been writing regularly on cinema, preferring a multi-layered approach to the medium often reduced to mere slapstick in today’s media. A dispassionate observer of Hindi cinema, he has contributed to several anthologies.

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