संस्कृति बगैर राजनीति, राजनीति बगैर संस्कृति…! असंभव!!

समाज में उथल-पुथल मचाने वाले सवालों के जवाब टालना कितना खतरनाक होता है, इसे गिरीश कर्नाड ने ‘तालेदंड’ (हिंदी में ‘रक्त कल्याण’) शीषर्क से लिखे नाटक के जरिये सामने रखा है। 1989 में गिरीश कार्नाड ने यह नाटक कन्नड़ भाषा में तब लिखा, जब भारतीय राजनीतिक परिदृश्य में मंडल और मंदिर के प्रश्न ज्वलंत थे। ‘मंदिर के प्रश्नों’ को टालने के कारण ही बाबरी मस्जिद जमींदोज कर दी गई और फिर उसके बाद पूरा भारत ‘बदल’ गया, लेकिन उस प्रश्न का उत्तर आज तक नहीं ढूंढा गया है। धर्म, समाज और राजनीति तो इसमें असफल रही ही है अब तो न्यायालय भी उसी राह पर चलता हुआ दिखाई देता है। बाबरी मस्जिद विवाद से संबंधित इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ का सितंबर, 2010 का फैसला यही बताता है कि न्यायालय भी अब इस विवाद का फैसला करने से बचना चाहती है। ऐसे में ‘तालेदंड’ का संदर्भ आज भी प्रासंगिक है और बाबरी की शहादत के 20 बरस पूरे होने के अवसर पर पटना इप्टा ने तनवीर अख्तर के निर्देशन में ‘रक्त कल्याण’ का मंचन भी किया। यह आयोजन इप्टा के पूर्व राष्ट्रीय अध्यक्ष एवं वरिष्ठ अभिनेता दिवंगत ए. के. हंगल को समर्पित था। हम यहां वर्तमान समय में इस नाटक के मंचन की जरूरत और अन्य दूसरे पहलुओं पर रोशनी डालने के लिए जारी किये गए पर्चे को प्रस्तुत कर रहे हैं: संपादक

अपने भीतर झांकने की कोशिश है ‘रक्त कल्याण’
♦ तनवीर अख्तर
‘राजनीति और संस्कृति को एक स्तर के बाद अलग-अलग नहीं किया जा सकता है। आज जो हिन्दुस्तान की स्थिति है, जो सामाजिक विषमता पैदा हुई है और धार्मिक द्वेष पैदा किया गया है, उसके बारे में कोई अराजनीतिक नहीं रह सकता है। कथाकार भी नहीं। आज तक मैंने किसी भी राजनीति में भाग नहीं लिया है। अब ले रहा हूं।’ 15 अगस्त, 1993 को आयोध्या में सरयू नदी के तट पर ‘मुक्तनाद’ कार्यक्रम के दौरान एक इंटरव्यू में गिरीश कार्नाड ने यह बातें कही थीं। अपनी इसी सोच के मद्देनजर उन्होंने कन्नड़ में एक नाटक लिखा, पूरी तरह राजनीतिक नाटक।
हालांकि यह नाटक है तो लगभग 800 साल पुरानी घटना पर आधारित लेकिन इसका संदर्भ आज भी प्रासंगिक है। स्वयं गिरीश कर्नाड के शब्दों में ‘तालेदण्ड शीर्षक से मैंने यह नाटक कन्नड़ में सन् 1989 में लिखा था, जब मंडल और मंदिर का प्रश्न ज्वलंत था। (नाटक का हिन्दी अनुवाद राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय, दिल्ली के पूर्व निदेशक राम गोपाल बजाज ने किया है।) यह स्पष्ट हो रहा था कि शरणाओं द्वारा उठाए गए प्रश्न हमारे समय के लिए कितने सटीक हैं। कल्याण में होने वाली घटनाओं की भयानकता से साबित होता है कि प्रश्नों के जवाब टालना कितना खतरनाक होता है।’


नाटक के केंद्रीय पात्र बसवण्णा की भूमिका में विनोद कुमार

गिरीश कार्नाड कि यही चिंता हमें दक्षिण भारतीय कथानक पर आधारित इस नाटक को बिहार में बार-बार मंचित करने के लिए प्रेरित करती हैं। पहली बार 1995 में जब यह नाटक प्रस्तुत हुआ तो बिहार सहित देश के कई राज्यों में मंडल और मंदिर जैसे मुद्दे प्रभावी थे। बिहार, उत्तर प्रदेश, कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, सहित कई राज्यों में नई राजनीतिक शक्ति का उदय हुआ था। इनमें सामाजिक न्याय की बात करने वाली शक्तियां भी शामिल हैं। कालांतर में इन शक्तियों के आपसी द्वंद्व, असहमति एवं फूट का फायदा धर्म के नाम पर राजनीति करने वाली रूढि़वादी ताकतों ने उठाया। सामाजिक न्याय की सोच के साथ ‘सोशल इंजीनियरिंग’ की नई अवधारणा में विश्वास करने वाली राजनीतिक पार्टियां ‘गंठबंधन की राजनीति’ के तहत इन्हीं के साथ हैं। आज 17 साल बाद तब से आज की स्थितियां और विकट हुई हैं। देश की संवैधानिक भावना के विरूद्ध वैमनस्यता और विद्वेष की राजनीति करने वाली ताकतें न सिर्फ मजबूत हुईं है बल्कि उन्होंने अपनी विध्वंसकारी राजनीति के कई प्रयोग भी किये हैं। प्रगतिवादी, जनवादी राजनीतिक ताकतें ठगी हुई सी कमजोर नजर आती है।
इसलिए यह सवाल हमारे लिए समझना आवश्यक है कि क्या वजह है कि शरणाओं का इतना सशक्त आन्दोलन रक्त में डूब गया? वे कौन से कारण थे कि अहिंसा पर आधारित आंदोलन हिंसक हो गया? वे कौन से हालात थे जब शरणा आन्दोलन का नेतृत्व उसके प्रर्वतक बसवण्णा के हाथों निकल गया?
यह नाटक महज इतिहास को पलटने की कोशिश नहीं है बल्कि अपने भीतर झांकने की कोशिश है।

नाटककार का वक्तव्य
♦ गिरीश कार्नाड
सन् 1168 से पहले के दो दशकों में कल्याण नगरी में हुई घटनाओं और कर्नाटक के इतिहास के लिए इस कालखंड में हुए चिंतक एवं युगदृष्टा बसवण्णा ने कल्याण नगर में कवियों, रहस्यवादियों, दार्शिनकों, कार्मिकों को एक सूत्र में ऐसे पिरो लिया, जैसा कभी कहीं एक स्थान पर न तो पहले हो पाया था और न ही इसके बाद कभी हुआ। उन्होंने देवता और आदमी सभी कुछ के बारे में संस्कृत छोड़ सामान्य भाषा में बातचीत की। मूर्तिपूजा या मंदिर-निर्माण का बहिष्कार किया। जो कुछ भी गतिवान (जंगम) था, उसी को महत्व दिया। उन्होंने कठिन परिश्रम और समर्पित भाव से कार्य (कायक) के सिद्धांत को स्थापित किया। स्त्री-पुरूष की समानता पर बल दिया। जाति प्रथा का विरोध किया। केवल सिद्धांत में नहीं-व्यवहार में। इससे परंपरावादियों का भयानक आक्रोश उन पर बरसा और शरणा आन्दोलन आंतक और रक्तपात में डूब गया। कल्याण नगरी रक्त कल्याण हो गई।


नाटक के एक दृश्य को जीवंत करते जावेद अख्तर खां (बिज्जल) और मोना झा (रंभावती)

इस नाटक में होने वाली घटनाओं को बीते आठ सौ साल से भी ज्यादा साल हो चुके हैं, फिर भी हमारी स्मृति इन घटनाओं से अब तक आतंकित है। वह युग प्रतिभा, उत्साह, मौलिक प्रश्नों के साहस, विजय और दुःख से भरा हुआ था। जैसे जीभ दुखते हुए दांत की तरफ बार-बार पलटती है, वैसे ही कन्नड़ भाषा के लेखक, कवि, चिंतक बार-बार उस युग की ओर पलटते हैं और बार-बार इस सबकी सार्थकता को अपने युग-प्रसंग में समझने की कोशिश करते हैं।
‘तालेदण्ड’ शीर्षक से मैंने यह नाटक कन्नड़ में सन् 1989 में तब लिखा था, जब मंडल और मंदिर का प्रश्न ज्वलंत था। यह स्पष्ट हो रहा था कि शरणाओं द्वारा उठाए गए प्रश्न हमारे समय के लिए कितने सटीक हैं। कल्याण में होने वाली घटनाओं की भयानकता से साबित होता है कि ऐसे प्रश्नों के जवाब टालना कितना खतरनाक है।
(नाटक की पुस्तक ‘रक्त कल्याण’ से साभार)

नाटक की कहानी
मरणासन्न अवस्था में सांभशिव शास्त्री अपने बेटे जगदेव को पुकारते हैं लेकिन जगदेव सोविदेव के षड़यंत्र के विरूद्ध शरणाओं को लेकर भंडार घर को घेर लेता है। बसवण्णा के वहां आने पर ही घर लौटता है। उसके पिता उसके सामने दम तोड़ देते हैं।
अपमानित सोविदेव रानी रंभावती के सामने क्रोधित होता है। राजा बिज्जल को जब यह सूचना प्राप्त होती है तो वह अपने पुत्र को इस षड़यंत्र के कारण पीटता है। बसवण्णा के विरूद्ध सोविदेव के षड़यंत्र के कारण बसवण्णा, जो राजा का भंडारी है, भंडार घर की चाबियां राजा को वापस कर देता है।
जनसाधारण में यह अफवाह फैलती है कि बसवण्णा ने कोई चमत्कार कर दिया इसलिए भंडारे का सारा हिसाब सही है। इस पर जगदेव नाराज हो जाता है कि सारी मेहनत उसने की और श्रेय बसवण्णा को मिल रहा है। बसवण्णा के पास एक चमार शरणा और एक ब्राह्यण शरणा के विवाह संबंध का प्रस्ताव आता है लेकिन बसवण्णा इस संबंध में लड़का और लड़की की रजामंदी महत्वपूर्ण मानते हैं। राजा बिज्जल इस विवाह को लेकर बसवण्णा को खबरदार करता है लेकिन फिर विवाह की अनुमति देकर सेना के साथ नगर के बाहर चला जाता है।
दामोदर भट्ट गणिका इंद्राणी के यहां सोविदेव को इस विवाह की सूचना देता है। सोविदेव को युवराज घोषित करके बिज्जल का तख्ता पलट दिया जाता है। बसवण्णा लोगों को यह सूचना देता है कि राजा को महल में बंदी बना लिया गया है, चूंकि राजा ने हमारी सुरक्षा की है इसलिए हमें भी उसकी मदद करनी चाहिए लेकिन शरणा इससे असहमत है। इधर बिज्जल भी बसवण्णा की प्रतीक्षा कर रहा है। बिज्जल से मिलने पर बसवण्णा उसे हर हाल में शिव में आस्था रखने को कहता है लेकिन बिज्जल इसे अस्वीकार कर देता है।
मनचण्ण क्रमित के कहने पर सोविदेव विवाहित दंपत्ति के पिता को मरवा देता है। इस पर शरणा जगदेव के नेतृत्व में महल पर धावा बोल देतें हैं लेकिन सोविदेव वहां से भाग जाता है। महल के शिवालय में अर्धविक्षिप्त बिज्जल ही मिलता है। जगदेव उसे धोखे से मंदिर से बाहर लाकर सिर्फ अपनी लाज रखने के लिए (बिज्जल को) मार देता है। बाद में वह आत्महत्या कर लेता है। बसवण्णा नगर छोड़ चुके हैं और कल्याण नगरी रक्त में डूब जाती है।

‘रक्त कल्याण’ फिर क्यों?
♦ पटना इप्टा
पटना इप्टा ने ‘रक्त कल्याण’ का मंचन 17 साल बाद पुनः किया। गिरीश कार्नाड का यह आख्यान इतिहास की खिड़की से वर्तमान के अनुत्तरित सवालों के जवाब ढूंढने की एक कोशिश है। नाटक का हरेक दृश्य, हरेक संवाद आज के सवाल और उससे जुड़े मुद्दों के पास स्वयं ही ले जाता है; जवाबों के पास स्वयं ही ले जाता है। यह नाटक इस सामाजिक द्वन्द्व से रू-ब-रू कराता है कि कोई विचार जन्म लेता है, आन्दोलन खड़ा होता है और सत्ता भी मिलती है परंतु वह क्यों षड़यंत्रों का शिकार हो जाता है? उन्हीं वैचारिक षड़यंत्रों के साथ कभी खड़ा तो कभी उसी की तरह कृत्य करता हुआ सा दिखता है, जिनके खिलाफ उसका जन्म हुआ था। जिस उम्मीद और साझा कार्यक्रम के साथ ‘एनडीए’ के विरूद्ध ‘संप्रग’ सत्ता में आया था और पहली पारी में कुछ ‘जनपक्षीय’ कार्यक्रम आये थे; किन्तु फिर से एक ‘ऐतिहासिक भूल’ ने उसे उसी अवसरवादी चरित्र दे दिया जिसके खिलाफ जनता का बहुमत मिला था।


नाटक का अंतिम दृश्य

सवाल यह है कि हर बार ‘ऐतिहासिक भूल’ क्यों हो जाती है? यह सवाल किसी भीड़, किसी प्रतीक से नहीं है बल्कि हम स्वयं अपने से भी यह सवाल पूछते हैं और आपके साथ जवाब ढूंढने का प्रयास करते हैं। इप्टा ने अपना नायक आम जन को माना है, हम जनता के साथ हर सवाल, हर संघर्ष में उनके साथ कदम-दर-कदम साथ खड़े हैं। युवाओं एवं वरिष्ठ इप्टाकर्मियों की टीम के साथ ‘रक्त कल्याण’ की पुनप्र्रस्तुति कुछेक सवालों का स्वतः जवाब भी है, जो रंगमंच, संस्कृतिकर्म और इसके जनवादी स्वरूप पर ही सवाल पैदा करते हैं। लोकप्रियता की चुनौती देते हैं। हर समय, हर दौर संस्कृतिकर्म के लिए चुनौती भरा रहा है और यही हम संस्कृतिकर्मियों के लिए सृजनशीलता की ऊर्जा उत्पन्न करता है। इसीलिए आज इप्टा युग के युवा के साथ हिन्दुस्तान के हर रंगशाला, हर गली-चैक पर अपने जनवादी गीतों-नाटकों के साथ सक्रिय है, जैसा बंगाल की अकाल में हिन्दुस्तान का संस्कृतिकर्म था। ‘ऐ रहबर मुल्कों कौम बता…’ की आवाज़ लगाते इप्टा के कलाकार मुंबई से लेकर बिहार के सुदूर गांवों तक आवाज़ बुलंद करते हैं यह सवाल करते हैं कि क्या हुआ उन सपनों का जो तुमने दिखाये थे?

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