गांव कनेक्‍शन: अखबार नहीं, एक आंदोलन की शुरुआत

♦ उमेश पंत

न दिनों लखनऊ में हूं। लखनऊ से सीतापुर की तरफ जाने वाली हाईवे से एक पतली सी सड़क कुनौरा नाम के एक छोटे से गांव की तरफ जाती है। इस गांव में पिछली दो तारीख को एक खास बात हुई। उस दिन अचानक डीएम, एसडीएम, कमिश्नर से लेकर बड़े बड़े और छुटभैय्ये नेताओं की हलचल उस गांव में बढ़ने लगी। ग्रामीण बालिका विद्यालय के इस प्रांगण के इर्द-गिर्द सरकारी लाल बत्तियों और जीपों की आवाजाही अचानक बढ़ गयी। बस अभी अभी बनाये गये हैलीपैड में उस दिन पहली बार गांव वालों ने हैलीकॉप्‍टर को अपने गांव में उतरते हुए देखा। गांव से निकलने वाले अपनी तरह के अकेले अखबार गांव कनेक्शन के लौंच के मौके पर मुख्यमंत्री अखिलेश यादव जब गांव में आये तो सुरक्षा के चौकस इंतजामों के बीच गांव की जनता आयोजन स्थल पर आने से डर रही थी। इससे पहले उन्होंने इतनी भारी मात्रा में पुलिस दल को अपने गांव में कभी नहीं देखा था। मंच से कई बार पुकारने के बाद गांव के लोग डरते सहमते आयोजन स्थल तक पहुंचे।

इस गांव में उस दिन दिल्ली, मुंबई, लखनऊ जैसे कई शहरों से लोग पहुंचे। और उन्‍होंने देखा कि शहरों में जाकर बसे लोग जब अपने गावों की तरफ लौटते हैं और उस गांव के लिए कुछ कर गुजरने की मंशा पाल लेते हैं, तो चीजें बदलती हैं।

उस इतवारी सुबह सुरक्षा बाड़ों के पीछे खड़े होकर मंच पर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखे गांव कनेक्शन के उस बैनर को देखते हुए उस गांव की जनता समझने की कोशिश कर रही थी कि आजादी के इतने सालों तक उपेक्षित रहे इस गांव में आज आखिर ऐसा हो क्या रहा है? ग्यारह बजे के आसपास जब मुख्यमंत्री का हैलीकॉप्‍टर धुएं का इशारा पाकर धूल को हवा में बिखेरता हुआ गांव की जमीन पर उतरा, तो कई जोड़ी आंखों में उम्मीद की चमक लौट आयी। एक उम्मीद कि शायद गांव कनेक्शन नाम की इस शुरुआत के बहाने उनके हाशिये पर रखे विकास के सपनों को मुख्यधारा में आने का मौका मिल जाए।

साप्ताहिक अखबार गांव कनेक्शन के संपादकीय निदेशक नीलेश मिश्र कहते हैं कि भारत के गांवों को खेती के नाम पर स्टीरियोटाइप कर दिया गया है, और ऐसा होने में हमारी मीडिया की बड़ी अहम भूमिका है। सारे अखबार शहर से निकलते हैं, जिनमें ग्रामीण पत्रकारिता के लिए जगह सिमटती जा रही है। इंटरनेट के जाल में बुरी तरह फंसे पत्रकार इनडोर रिपोर्टिंग करके संतुष्ट हो जाते हैं और उन्होंने फील्ड पर जाना बहुत कम कर दिया है। ऐसे में मीडिया में गांवों का जो थोड़ा बहुत रिप्रेजेंटेशन है, वो भी फौल्टी है।

गांवों की तस्वीर जिस गति से बदल रही है, उस गति से अखबारों में उनकी तस्वीर नहीं बदली है। गांवों में मोबाइल, कंप्‍यूटर और यहां तक कि फेसबुक भले ही पहुंच गया हो लेकिन मीडिया का रवैया गांवों के लिए अब भी नहीं बदला है। इलैक्ट्रोनिक मीडिया में तो खैर गांव पूरी तरह से तिरस्कृत हैं ही, प्रिंट मीडिया ने भी उन्हें सौतेली नजर से ही देखा है। शायद इसलिए गांवों पर केंद्रित खबरों की संख्या दिन-ब-दिन अखबारों में कमती ही जा रही है। एक केस स्टडी के मुताबिक भारत के मेनस्ट्रीम अखबारों में केवल दो प्रतिशत खबरें ही गांवों की होती हैं।

इस कार्यक्रम में मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने माना कि देश के बजट का बड़ा हिस्सा शहरी विकास में खर्च होता है, जबकि हमारे देश की ग्रामीण जनसंख्या शहरों से कई ज्यादा है।

विकास की इसी दौड़ में लगातार पिछड़ने के वजहकर गांवों से शहरों की तरफ होने वाले पलायन की दर अस्सी फीसदी से भी ज्यादा हो गयी है।

पूर्व वैज्ञानिक शिवबालक मिश्र इस बाबत एक जरूरी बात कहते हैं। उनका मानना है कि यदि देश की 72 प्रतिशत जनसंख्या आज भी ग्रामीण भारत में रहती है तो विकास का 72 फीसदी आरक्षण उन्हें दिया जाना चाहिए।

वरिष्ठ पत्रकार शरत प्रधान कहते हैं कि गांवों की खबरों को अमूमन अखबारों में जगह तब ही मिलती है, जब वहां कोई जातीय हिंसा होती है या फिर आगजनी की घटनाएं होती हैं।

ऐसा बहुत कम होता है कि मंच पर मुख्यमंत्री बैठे हुए हों और जनता को संबोधित करते हुए 65 साल की एक औरत उन्हीं के महकमे पर सरेआम सवाल उठाने लगे। वो तमाम खामियां गिनाने लगे, जो गांवों के लिए सरकार के तिरस्कार भरे रवैये से उपजते हैं। पर गांव कनेक्शन के लोकार्पण के इस मौके पर निर्मला मिश्रा ये हौसला कर पायीं क्योंकि अपने जीवन के चालीस साल उन्होंने इस गांव में साक्षरता के प्रचार प्रसार के लिए समर्पित कर दिये। तमाम सरकारी असहयोग के बावजूद भारतीय ग्रामीण विद्यालय नाम के एक स्कूल को अपने पति शिवबालक मिश्रा के साथ शून्य से शुरू करके एक मुकाम देने वाली निर्मला मिश्रा अपने संघर्ष की कहानी मंच से बयां करते हुए भावुक हो जाती हैं। वो मुख्यमंत्री जी को उनके मुंह पर कहती हैं कि इस स्कूल को मान्यता दिलाने के लिए उन्होंने एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया लेकिन क्यूंकि उनके पास काला धन नहीं था इस वजह से स्कूल को मान्यता नहीं मिल सकी।

भारत में अब तक शायद ही कोई अखबार हो, जिसकी पहुंच व्यापक हो और जो केवल और केवल गांवों की खबरों पर केंद्रित हो। देश के अलग-अलग हिस्सों में अगर कहीं ऐसे अखबार निकल भी रहे हैं, तो उनकी पहुंच बहुत सीमित है। इतनी सीमित कि उनके बारे में ज्यादातर जनता को जानकारी तक नहीं हो पाती।

लखनऊ के गांव में हो रही ये शुरुआत इस लिहाज से अहम हो जाती है क्योंकि अव्वल तो बंबई में फिल्मों से जुड़े पटकथा लेखक और गीतकार नीलेश मिश्र अपनी जड़ों की ओर लौटते हुए ये कदम उठा रहे हैं। इसलिए इसे गांवों को छोड़कर शहरों में रह रहे लोगों के द्वारा गांव के लिए कुछ करने की प्रेरणा के रूप में देखा जाना चाहिए। और दूसरा ये भी कि प्रिंट मीडिया में ग्रामीण खबरों और लेखों को उचित स्थान दिये जाने की एक पहल के रूप में भी ऐसे प्रयासों की सराहना की जानी चाहिए।

Umesh Pant(उमेश पंत। सजग चेतना के पत्रकार, सिनेकर्मी। सिनेमा और समाज के खास कोनों पर नजर रहती है। मोहल्‍ला लाइव, नयी सोच और पिक्‍चर हॉल नाम के ब्‍लॉग पर लगातार लिखते हैं। फिलहाल मुंबई में हैं। उनसे mshpant@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

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