class="single single-post postid-32831 single-format-standard col-1c full-width topbar-enabled unknown">

महादेवीजी का जीवन सुकरात के जहर पीने की कहानी है


♦ ओम थानवी

फ़िराक़ गोरखपुरी हिंदी को लेकर नुक्ताचीनी करते थे। हिंदी लेखकों के बारे में भी। लेकिन हिंदी ही देश की राष्ट्रभाषा हो सकती है, यह भी कहते थे। तुलसीदास को दुनिया का सबसे बड़ा कवि बताते थे। फ़िराक़ हिंदी के उस तरह दुश्मन नहीं थे, जिस तरह उन्हें ठहरा दिया गया है। इसका पता रमेशचंद्र द्विवेदी की किताब “मैंने फ़िराक़ को देखा था” में महादेवी वर्मा पर व्यक्त फ़िराक़ के इन विचारों से भी चल सकता है:

“महादेवीजी बहुत अच्छी कविता करती हैं। उनके पास बड़ी प्रबल काव्य-चेतना है। महादेवीजी का जीवन सुकरात के जहर पीने की कहानी है। कोई जानता हो या न जानता हो मगर चेहरे पर उनकी अंतर्व्यथा एक रागिनी हमेशा छेड़ती रहती है। विषपान तो करना ही पड़ेगा। महादेवी को भी करना पड़ा। .. जहर का अर्थ है जहराबये हयात, जीवन का विष। उनके चेहरे को गौर से देखो हलाहल पर काबू पा लेने वाला चेहरा है। कितना संजीदा, कितना चाइल्ड-लाइक और कितना आशीर्वादात्मक। महादेवी के भीतर कई महाभारत की जंगें एक साथ चलती रहती हैं, मगर चेहरे पर शांति पर्व ही नजर आएगा। …

महादेवीजी सर से पैर तक कविता ही कविता हैं। वे सौ फीसद कवि हैं। कवि की पहचान के लिए कविता ही काफी नहीं है। उसका उठना, बैठना, बात करना, गुस्सा करना, उसका अपना आत्मविश्वास, और कभी-कभी उसकी अकड़, लोगों से तपाक से मिलना और बेजरूरत कतराना — यह सभी कुछ शायरी है। तुम महादेवीजी के पास बैठो तो महसूस करोगे कि तुम कविता के पास बैठे हो और तुम यह भी अनुभव करोगे कि तुम पहले से कई गुना बेहतर इन्सान बन गए हो। लेकिन यह सब तुम्हारे ऊपर है। महादेवी के साथ, या और आगे बढ़िए तो महात्मा गांधी के साथ भी, जिंदगी भर रहकर आदमी जैसा था उससे भी घटिया हो सकता है। यह तो आपके ऊपर है। एक साहब थे, पूरी जिंदगी गांधी के साथ गुजारी या जिंदगी का बड़ा हिस्सा गांधी की कुरबत में बीता, मगर थे चोर और चोर ही रहकर वापस आए। एक महान कलाकार और एक साधारण आदमी के पानी मांगने के अंदाज में फर्क होगा। महादेवी के जीवन में और उनकी शायरी में रहस्यमयता का एक अचेतन प्रवाह अबाध गति से सब कुछ बहाए लिए चला जा रहा है। उनकी पेंटिंग तुमने देखी है। कितने गंभीर और रहस्यमय सौंदर्य की आकृति उभरती है उनके चित्रों में। अथाह कंपन, अथाह शांति। हां एक कमी खटकती है, और वह है भाषा की कमी। लगता है, कविता की देवी के कोमल पदों में जैसे चलते-चलते ठोकर लग जाए। कहीं-कहीं भाषा ऐसी ही खटकती है। जैसे — “निशा की धो देता राकेश चांदनी में जब अलकें खोल। ‘निशा की’ इस किनारे, ‘अलकें’ उस किनारे। बात इस तरह नहीं बनती।

किंतु जहां तक कवित्व शक्ति का प्रश्न है, वे उसी परंपरा से संबंध रखती हैं जिसमें कालिदास, सूर और मीरा शरीक हैं। इसमें काल, भाषा और शैली की असमानता होते हुए भी एक समानता है जिसे हम वर्ड्सवर्थ के शब्दों में ‘केप्ट वॉच ओवर मैन्स मॉरटैलिटी’ कह सकते हैं। कविता का जीवन अनन्त होता है। …एक बात हमेशा मेरे दिमाग में खटकती रहती है। मैं जब महादेवीजी को देखता हूं उनके चेहरे पर अनेक कवित्वमय, करुणा भरे, विद्रोही, ममतामयी, स्निग्धतापूर्ण, विद्वतापूर्ण, संस्कृत भाषा और साहित्य से उद्भूत देवीप्रकाश के साथ-साथ एक और भाव की धुंधली बहुत धुंधली रेखा उभरती है, जैसे वे प्रत्येक पल कुछ छिपाने का, कुछ भूल जाने का, कुछ याद करके अपने से अलग रहने का, किसी दुख को, किसी क्रौंच-वध को, किसी भूल को, जो अचेतन मन कर बैठा हो, हर वक्त पूजा से पवित्र करने के प्रयत्न में लगी रहती हैं। मुझे ऐसा लगता है कि उनके भीतर एक द्वंद्व का तूफान उठता रहता है। उनके जीवन-सागर की करोड़ों लहरों में मुझे कभी-कभी एक ऐसी भी लहर की झलक मिल जाती है जो सुई की नोक की तरह या कांटे की तरह समुद्र के हृदय में खटकती रहती है। सारी साधना उसी कांटे को निकालने का प्रयत्न है। महादेवी की हृदय में चुभा यह कांटा हर दिल का कांटा है, जो हमेशा मीठी-मीठी चुभन पैदा करता है। हो सकता है इसके पीछे कोई करुणा का अपार सिंधु लहरा रहा हो। किसी के बारे में कुछ कहा नहीं जा सकता। हो सकता है यह सब कुछ न भी हो, मेरी आंखों का ही भ्रम हो। …”

Om Thanvi Image(ओम थानवी। भाषाई विविधता और वैचारिक असहमतियों का सम्‍मान करने वाले विलक्षण पत्रकार। राजस्‍थान पत्रिका से पत्रकारीय करियर की शुरुआत। वहां से प्रभाष जी उन्‍हें जनसत्ता, चंडीगढ़ संस्‍करण में स्‍थानीय संपादक बना कर ले गये। फिलहाल जनसत्ता समूह के कार्यकारी संपादक। उनसे om.thanvi@ expressindia.com पर संपर्क किया जा सकता है।)


You may also like...

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

You may use these HTML tags and attributes: <a href="" title=""> <abbr title=""> <acronym title=""> <b> <blockquote cite=""> <cite> <code> <del datetime=""> <em> <i> <q cite=""> <strike> <strong>