स्त्रियां स्‍त्री-विमर्श से आगे का आकाश नापें, तो बात बने!

दिल्‍ली का अंतर्राष्‍ट्रीय पुस्‍तक मेला बीत गया। बारह नंबर हॉल में बनी चौपाल में रोज कई साहित्यिक सेशन थे। एक दिन हिंदी की कई स्‍त्री कवियों (कवयित्रियों) ने अपनी कविताएं पढ़ीं। पहला खटका तो यही लगा कि मंच पर एनबीटी के लालित्‍य ललित थे और संचालक त्रिपुरारी कुमार शर्मा थे। भाई प्रभात रंजन भी मंचासीन थे, लेकिन हमारी पुकार पर नीचे आ गये और दर्शकों-श्रोताओं के लिए रखे गये एक मोढ़ा पर बैठ गये। यानी स्त्रियों के कविता पाठ में पुरुषों का निर्देशन और पुरुषों का मंच।

त्रिपुरारी विनम्र अश्‍लीलता के साथ कवयित्रियों को बुला रहे थे, सो अलग… पर मुझे जो बात कहनी है, वह अब शुरू करता हूं:

ज्‍यादातर स्त्रियों ने जो कविताएं पढ़ीं, उनका विषय स्‍त्री के ही इर्दगिर्द था। मुझे याद आ गयी, अनुराग कश्‍यप से हुई एक बातचीत, जिसमें मैंने उनसे पूछा था कि आपकी टीम में लड़कियां हर मोर्चों पर ज्‍यादा सक्रिय दिखती हैं। लेकिन हिंदी सिनेमा के फिल्‍मकारों की फेहरिस्‍त में उनकी संख्‍या नगण्‍य है। ऐसा क्‍यों है?

अनुराग ने बताया कि उनकी ही नहीं, हर टीम में लड़कियां ज्‍यादा काबिलियत से अपने अपने मोर्चो पर डटी हैं। लेकिन विषय के मामले में जब तक वो स्‍त्री मुद्दों से आगे बढ़ कर सारे विषयों को अपना हिस्‍सा नहीं मानेंगी, तब तक वह सिनेमा की मुख्‍यधारा से होड़ नहीं ले पाएंगी।

मुझे लगता है कि हिंदी की कवयित्रियों को भी “हंसती हुई लड़कियां”, “दौड़ती हुई लड़कियां”, “लड़ती हुई लड़कियां” जैसे मुहावरों से आगे अपनी नजर दौड़ानी चाहिए।

♦ अविनाश

Sudha Upadhyay
मंच पर लालित्‍य ललित, त्रिपुरारी कुमार शर्मा और सुधा उपाध्‍याय

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