अकादमिक दुनिया ऐसे लोगों से आबाद क्यों नहीं है?

दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय में संजय चौहान के साथ संवाद

पटकथाकार और संवाद लेखक संजय चौहान इन दिनों दिल्‍ली में हैं। एनसीईआरटी के छात्रों के साथ एक वर्कशॉप में स्‍क्रिप्‍ट लेखन की बारीकियां बताने के लिए आये हुए हैं। दिल्‍ली वालों को जैसे जैसे खबर मिल रही है, उनके व्‍यस्‍त शिड्यूल से खींच कर उनसे मिल रहे हैं, उन सुन रहे हैं। बुधवार को दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय में उन्‍होंने दो जगह अपनी बात रखी और छात्रों से रूबरू हुए। शाम को जेएनयू के गंगा ढाबा पर उन्‍होंने काफी वक्‍त बिताया। गुरुवार को तीन बजे इंडियन इंस्‍टीच्‍यूट ऑफ मास कम्‍युनिकेशन के छात्रों के साथ उनके संवाद का आयोजन है। यह जो विवरण नीचे दिया जा रहा है, वह दीवान मेल ग्रुप पर विनीत कुमार ने जारी किया है। चूंकि दीवान मेल ग्रुप कॉपीराइट एक्‍ट की जगह कॉपी लेफ्ट का परचम फहराता है, हम इसे वहां से कॉपी-पेस्‍ट कर रहे हैं: मॉडरेटर

Sanjay Chouhan in Hindu Collegeसिनेमा पर संजय चौहान को सुनना एक बहुत ही दिलचस्प सिनेमा की स्क्रिप्ट से गुजरना है। वो जिस अंदाज में आपकी बात रखते हैं, लगेगा कि कोई पटकथा सुना रहे हों या फिर बच्चों की जिद के आगे कॉमिक्स पढ़ रहे हों जिसमें फचाक-ठिशुम, ठांय जैसे शब्द आने पर उसे भी एक्शन के साथ उच्चारना जरूरी समझते हैं… “हम राजस्थान में आधे से ज्यादा वक्त रेत खा रहे थे क्योंकि मई में बहुत ही कम कीमत पर वो महल मिला था शूट करने के लिए और हवा चलने पर सिर्फ रेत ही रेत…” ऐसी कई सारी पंक्तियां और उसी बॉडी लैंग्वेज में। सेमिनारों के मीनारों पर चढ़कर विषय को गरुड़ पुराण कथावाचन की शैली में पेश करनेवाले को उन्हें सुनना चाहिए कि कैसे गंभीर से गंभीर बात रखी जाए कि श्रोता बोलनेवाले को बंधक बना ले कि बेटाजी, बोलोगे नहीं तो जाओगे कहां?

दूसरी बात कि संजय चौहान का कीबोर्ड जितना साफ है, पूरी बातचीत में वो खुद भी उतने ही क्रिस्टल लगते हैं। एक साहित्य का छात्र और सिनेमा लेखक कितनी सहजता से स्वीकार करता है कि सिनेमा कला नहीं कॉमर्स है… जाहिर है संजयजी को इस समझ तक आने में वक्त लगा होगा और इस हिस्से में तकलीफ भी होगी लेकिन वो इसे खोलकर हमारे सामने रख रहे थे। सिनेमा सिर्फ लेखन या निर्देशन का हिस्सा नहीं है… इसके पीछे के असल खेल हैं वितरण और प्रोमोशन के और ये सब सिनेमा की बातचीत में शामिल हो… अच्छा लगता है कि सिनेमा के भीतर का शख्स साहित्यिक विमर्शों की जमीन पर आकर एक अलग दुनिया के सच को सामने रखता है। हकीकत से गुजरने के लिए छात्रों को मानसिक रूप से तैयार करता है, हउआ नहीं खड़ी करता।

आज हिंदू कॉलेज में शिक्षकों रामेश्वर राय, रचना मैम के बीच पान सिंह तोमर देखने के बाद संजय सिंह को सुनना एक शिक्षक त्रयी को सुनने जैसा लगा। संजयजी की बातचीत की पूरी शैली दोस्ताना होते हुए भी एक रोचक क्लासरूम की थी। कब वो फिल्म लेखक से हमारे सिनेमा के शिक्षक बन गये, पता नहीं चला और वैसे भी फिजिक्स के क्लासरूम में जहां पीछे बहुत सारे फार्मूले लिखे थे, वहां खड़े होकर सिनेमा की केमेस्ट्री पर कोई बात कर रहा हो तो शिक्षक से अलग क्या लगेगा… ऐसे लोगों को सुनकर ही मन कचोटता है, अकादमिक दुनिया आखिर ऐसे लोगों से आबाद क्यों नहीं है?

छोटे शहरों से आये लेखक-निर्देशक सिनेमा बदल रहे हैं [Interviw with Sanjay Chouhan]

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