आलोचना सह न सके रंग-ए-माहौल के आयोजक

♦ मोहल्ला डेस्क

बीते 26 फरवरी को बिहार के बेगूसराय जिले के दिनकर भवन में नाट्य महोत्सव ‘रंग-ए-माहौल’ प्रारंभ हुआ। सीमा विश्वास की शानदार प्रस्तुति से कार्यक्रम का आगाज हुआ और नादिरा जहीर बब्बर, यशपाल शर्मा, प्रोबीर गुहा, सुरेश भारद्वाज, अनुराधा कपूर जैसे देश के नामचीन रंगकर्मियों ने भी इस महोत्सव में शिरकत की। जिससे पूरे महोत्सव के दौरान लोगों की उत्सुकता बनी रही और बेगूसराय एवं आस-पास के कला प्रेमियों को कुछ बेहतरीन नाट्य प्रस्तुतियों से रूबरू होने का मौका मिला। लेकिन आगाज के साथ ही यह आयोजन विवादों में भी घिर गया है।

हुआ यूं कि हिंदुस्तान अखबार ने प्रवीण कुमार गुंजन, जो कि इस नाट्य महोत्सव के आयोजक भी हैं, के निर्देशन में हुई प्रस्तुति की आलोचनात्मक समीक्षा प्रकाशित की। उनके निर्देशन में 27 फरवरी को द फैक्ट रंगमंडल की ओर से ’जर्नी फार फ्रीडम’ की प्रस्तुति की गई थी। अखबार ने आलोचनात्मक समीक्षा प्रकाशित करते हुये लिखा कि कमजोर कथानक एवं लचर प्रस्तुति के कारण नाटक प्रभाव छोडने में असफल रहा। इस आलोचना से बौखला कर प्रवीण कुमार गुंजन ने अखबार के रिपोर्टर को यह कहते हुए धमकाया कि उन्हें महोत्सव से संबंधित समाचार-संकलन नहीं करने दिया जायेगा। इतना ही नहीं आयोजक को नाटक ‘मठ के रास्ते में एक दिन’ की सराहना भी नागवार गुजरी जिसका मंचन 28 फरवरी को हुआ था। सुरेश भारद्वाज निर्देशित इस नाटक की प्रस्तुति नई दिल्ली की रंग संस्था विवादी की ओर से की गई थी।

Rang-e-Mahaulइसके बाद 01 मार्च को गुंजन द्वारा ही निर्देशित दूसरे नाटक ‘समझौता’ का मंचन हुआ। इस नाटक की समीक्षा में हिंदुस्तान ने लिखा कि संगीत की तेज आवाज में कथानक एवं कथ्य दब कर रह गये। इस समीक्षा से बैखलाए गुंजन धमकी देने अखबार के दफ्तर पहुंच गये और कहने लगे कि हमें आपके (हिंदुस्तान) अखबार में रपट नहीं चाहिए, आपके संवाददाता अगर कार्यक्रम में जाते हैं तो ठीक नहीं होगा, हम उन्हें घुसने नहीं देंगे इत्यादि-इत्यादि। इतना ही नहीं अगले दिन उन्होंने दिनकर भवन के गेट पर बकायदा उस अखबार के संवाददाता के साथ बदसलूकी तक की और आयोजन स्थल के दीवारों पर हिंदुस्तान अखबार का विरोध करते हुए हस्तलिखित पोस्टर भी चिपका दिया। (देखें तस्वीर) मामला यहीं तक नहीं रूका। 02 मार्च को प्रोबीर गुहा के नाटक ‘घर वापसी के गीत’ का मंचन होना था, लेकिन उस दिन ठीक मंचन से पहले गुंजन ने एक बार फिर अपने मानसिक दिवालियेपन का सबूत दिया। मंच से ही उन्होंने कहा, ‘हम हिंदुस्तान अखबार का विरोध करते हैं, हमें उसकी रिर्पोट नहीं चाहिए। हम ऐसे अखबार को अपने महोत्सव की खबर छापने नहीं देंगे जो हमारी आलोचना करता है।’

आयोजक के इस व्यवहार की शहर के संस्कृतिकर्मियों एवं बुद्धिजीवियों ने तीखी भत्र्सना की है। जहां एक ओर चिकित्सक और सामाजिक कार्यकर्ता डा. विद्यापति राय आयोजक के इस रवैये को अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की हत्या करार देते हैं और साथ ही वह यह भी जोड़ते हैं कि एक रंगकर्मी द्वारा ऐसा किया जाना इस कारण भी ज्यादा चिंतनीय है क्योंकि रंगकर्म तो अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का पुरजोर समर्थक होता है। वहीं दूसरी ओर बेगूसराय जिले के एसडीओ और रंग-ए-माहौल के स्वागताध्यक्ष कुमार अनुज प्रवीण कुमार गुंजन के इस रवैये की घोर निंदा करते हुए कहते हैं कि लोकतंत्र में कल्चरल फासिज्म की कोई जगह नहीं है। गौरतलब है कि प्रवीण कुमार गुंजन का यह तुनकमिजाजी रवैया बहुत पुराना है। कुछ समय पहले पटना में भी उनके द्वारा किया गया आयोजन विवादित रहा था। ऐसे में बेगूसराय में आलोचना से उनका आपा खोना यह साबित करता है कि उन्होंने पटना की घटना से कोई सीख नहीं ली है।

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