‘दलित मीडिया को आगे लाने की जरुरत’

मोहल्ला डेस्क: मीडिया में दलितों के साथ दलित समस्याएं भी अनुपस्थित हैं। साथ ही वे अगर मीडिया में आ भी जाये तो करेंगे क्या? एक बड़ा सवाल मौजूद है, जिस पर समग्र रूप से विचार करने की जरूरत है। मुख्य धारा की मीडिया को जनतांत्रिक कैसे बनाया जाये इस पर भी विमर्श की आवश्यकता है। रविवार (31 मार्च) को यूपी पे्रस क्लब, लखनऊ में लेखक व पत्रकार संजय कुमार की किताब ‘मीडिया में दलित ढूंढते रह जाओगे’ के लोकार्पण के बाद वक्ताओं ने परिसंवाद में यह बातें कहीं। पुस्तक का लोकार्पण संयुक्त रूप से मानवाधिकार कार्यकर्ता व दलित चिंतक एस. आर. दारापुरी, जाने माने आलोचक वीरेंद्र यादव, प्रगतिशील महिला एसोसिएशन की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष ताहिरा हसन, दलित चिंतक अरूण खोटे और जसम के संयोजक कौशल किशोर ने किया।

media me dalit- lokarpan- charchaपरिसंवाद के दौरान जाने माने आलोचक वीरेंद्र यादव ने कहा कि मीडिया में मुकम्मल भारत की तस्वीर नहीं दिखाई देती है, गांव नहीं हैं, हाशिये का समाज नहीं है। मीडिया में दलितों के साथ दलित समस्याएं भी अनुपस्थित है। आज समाज को समग्र नजरिये से देखने की जरूरत है। उपस्थिति के साथ, दलित समाज के आलोचना की जरूरत के लिए भी मीडिया में दलितों की आवश्यकता है। इस मौके पर दलित चिंतक अरूण खोटे ने कहा कि इतिहास में जायंे तो दलित ही मीडिया के जनक रहे हैं। इसके बावजूद शिक्षा और संसाधनों से वंचित यह वर्ग अब मीडिया से लगभग गायब हो गया है। आज बात सिर्फ मीडिया में दलितों के प्रतिनिधित्व भर का नहीं है, बल्कि दलितों के मुद्दों के लिए क्या यहां जगह है-सवाल यह भी है।

कार्यक्रम में दलित चिंतक एस. आर. दारापुरी ने कहा कि दलितों के साथ अब भी भेदभाव बरकरार है। लेकिन यह सब मीडिया में खबर नहीं बनती है, क्योंकि मीडिया भी उसी द्विज वर्चस्व को बरकरार रखना चाहता है। उन्होंने कहा कि मीडिया में दलित नहीं है यह सच्चाई है तो सवाल यह है कि हम क्या करें। ऐसे में दलित मीडिया को आगे लाने की जरुरत है। दूसरी ओर प्रगतिशील महिला एसोसिएशन की राष्ट्रीय उपाध्यक्ष ताहिरा हसन ने कहा कि राजनीति को समझते हुए दलितों और मुस्लमानों को एक साथ आगे आना होगा और लामबंद तरीके से लड़ाई लड़नी होगी। जन संस्कृति मंच के संयोजक कौशल किशोर ने कहा कि कहने को तो लोकतांत्रिक व्यवस्था है लेकिन सामाजिक बराबरी आज भी दुर्लभ है।

पुस्तक के लेखक और आकाशवाणी पटना के समाचार संपादक संजय कुमार ने कहा कि मीडिया को लोकतंत्र का चैथा खंभा तो कहा जाता है परंतु इसकी बनावट जातिवादी तथा दलित विरोधी है। दलित मीडिया से जुड़ना तो चाहते हैं, लेकिन उन्हें जान-बूझकर इससे दूर रखा जाता है। यदि कोई प्रतिभाशाली और योग्य दलित मीडिया में प्रवेश पा भी लेता है तो उसे शीर्ष तक पहुंचने नहीं दिया जाता, बल्कि उसे बाहर का रास्ता दिखाने के लगातार उपाय ढंूढ़े जाते हैं। उन्होंने राष्ट्रीय मीडिया के सर्वे का हवाला देते हुए कहा कि कुल जनसंख्या में 8 प्रतिशत वाली ऊंची जातियों का मीडिया हाऊस में 71 प्रतिशत शीर्ष पदों पर कब्जा है। इनमें 49 प्रतिशत ब्राह्मण, 14 प्रतिशत कायस्थ, वैश्य और राजपूत 7-7 प्रतिशत, खत्री-9, गैर द्विज उच्च जाति-2 और अन्य पिछड़ी जातियां 4 प्रतिशत हैं। इनमें दलित कहीं नहीं दिखते। इसी सर्वे के मुताकिब बिहार के मीडिया में सवर्णों का 87 प्रतिशत कब्जा है। इनमें ब्राह्मण 34, राजपूत 23, भूमिहार-14 और कायस्थ 16 प्रतिशत हंै। शेष 13 प्रतिशत में पिछड़ी जाति, अति पिछड़ी जातियों, मुसलमानों और दलितों की हिस्सेदारी है। इनमें सबसे कम लगभग 01 प्रतिशत दलित पत्रकार ही बिहार की मीडिया से जुड़े हैं। जबकि सरकारी मीडिया संस्थानों में में लगभग 12 प्रतिशत दलित हैं। जसम की ओर से आयोजित इस कार्यक्रम में नाटककार राजेश कुमार, अलग दुनिया के के.के. वत्स, कवि आलोचक चंद्रेश्वर सहित कई चर्चित पत्रकार-साहित्यकार उपस्थित थे। कार्यक्रम का संचालन जसम के संयोजक कौशल किशोर किया।

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