RTI को कुंद करने की बिहार सरकार की मंशा उजागर

♦ विष्‍णु राजगढ़िया

बिहार सरकार ने आरटीआई कानून की हत्या कर दी। अब कानूनी तौर पर भी इसका सुराग मिलने लगा है। पटना उच्च न्यायालय ने बिहार सरकार को आरटीआई के एक अवैध नियम को बदलने का निर्देश दिया है। नीतीश कुमार ने बिहार में सुशासन लाने के लिए आरटीआई की हत्या करने वाली पूर्णतया अवैध नियमावली बनायी थी। ऐसी अवैध नियमावली का सहारा लेकर बिहार राज्य सूचना आयोग ने हजारों नागरिकों के आवेदनों को सीधे निरस्त कर दिया। कहा कि जिस नागरिक की प्रथम अपील की सुनवाई नहीं हुई हो, उसकी हम दूसरी अपील भी नहीं सुनेंगे। यानी अगर प्रथम अपीलीय अधिकारी ने आपका कुर्ता खोल लिया हो तो सूचना आयोग आपकी धोती भी उतार लेगा। गनीमत है कि हाईकोर्ट ने सुशासन की पोल खोल दी। बिहार आरटीआई नियमावली के अन्य अवैध प्रावधानों पर भी रोक लगनी चाहिए।

बिहार सूचना का अधिकार नियमावली 2006 की धारा छह (दो) का दुरुपयोग करके बिहार राज्य सूचना आयोग ने हजारों नागरिकों को न्याय देने से इनकार कर दिया था। पटना उच्च न्यायालय ने शिवप्रकाश राय बनाम बिहार राज्य के मामले में सुनवाई के दौरान इस धारा को अवैधानिक मानते हुए बिहार सरकार तीन सप्ताह के अंदर संशोधन करने का आदेश दिया है। पटना उच्च न्यायालय ने यह फैसला 12 अप्रैल 2013 को सुनाया। इससे, उन हजारों आवेदकों को राहत मिल सकती है, जिनका सूचना आयोग में दायर द्वितीय अपील प्रथम अपील के निर्णय के अभाव में ठुकराया जा चुका है।

RTI

अब सुशासन के नाम पर डुग्गी-तबला बजाने वालों का मुंह देखने लायक है।

बिहार सूचना का अधिकार नियमावली 2006 की धारा छह इस प्रकार है –
धारा छह – अपील :

(1) लोक सूचना पदाधिकारी द्वारा प्रपत्र ‘घ’ एवं ‘च’ में दिये गये निर्णय से विक्षुब्ध अथवा कोई भी निर्णय नहीं दिये जाने पर विक्षुब्ध व्यक्ति राज्य सरकार द्वारा नियुक्त अपीलीय प्राधिकारी के समक्ष निर्णय की प्राप्ति अथवा अप्राप्ति की तिथि के 30 दिनों के अंदर प्रपत्र ‘छह’ में अपील कर सकेगा।

(2) उस नियम (1) में अपीलीय प्राधिकार के आदेश से भी विक्षुब्ध आवेदक अपीलीय प्राधिकार के आदेश की प्राप्ति की तिथि से नब्बे दिनों के अंदर आयोग के समक्ष द्वितीय अपील निम्नलिखित ब्यौरा के साथ कर सकेगा।

संसद द्वारा पारित सूचना का अधिकार अधिनियम 2005 में प्रावधान है कि किसी नागरिक को सूचना न मिले या प्राप्त सूचना से संतुष्ट न हो तो वरीय अधिकारी के पास प्रथम अपील कर सकता है। इसके बावजूद उसे वांछित सूचना नहीं मिले तो सूचना आयोग में द्वितीय अपील कर सकता है। जाहिर है कि प्रथम अपील की सुनवाई नहीं होने पर भी नागरिक को द्वितीय अपील करने का अधिकार है। देश भर में ऐसा ही हो रहा है। सिवाय बिहार के, जहां बिहार राज्य सूचना आयाग ने इस अवैध नियमावली को आधार बनाकर कहा कि कोई नागरिक द्वितीय अपील तभी कर सकता है, जब प्रथम अपील पर कोई निर्णय हुआ हो। बिहार में ऐसे हजारों मामलों में प्रथम अपीलीय अधिकारी ने कोई निर्णय नहीं सुनाया। इस आधार पर सूचना आयोग ने भी सुनवाई नहीं की। इस तरह अन्याय के शिकार नागरिकों के साथ खुद सूचना आयोग ने भी अन्याय किया।

अब पटना हाईकोर्ट के आदेश ने यह सबूत दे दिया है कि बिहार में सूचना कानून की हत्या हुई। बिहार की अवैध नियमावली के अन्य प्रावधानों को भी तत्काल बदलकर मूल कानून को लागू करना जरूरी है।

बिहार में आरटीआई कानून की हत्या के संबंध में मोहल्ला लाइव में प्रकाशित आलेख देखा जा सकता है।

www.mohallalive.com

Vishnu Rajgadia image(विष्‍णु राजगढ़िया। वरिष्‍ठ पत्रकार। सूचना के अधिकार को लेकर पिछले कुछ वर्षों से सक्रिय। रांची में रहते हैं। उनसे vranchi@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

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