निदेशक की जागीर बना मथुरा का राजकीय संग्रहालय

mahatma buddh♦ अशोक बंसल

रीब ढाई हजार साल प्राचीन मूर्ति कला को सुरक्षित रखने के लिए संपूर्ण विश्व में जाना जाने वाला मथुरा का राजकीय संग्रहालय आज बदहाली, उपेक्षा और बदइंतजामी का जबरदस्त शिकार हो गया है। निदेशक एके पांडेय की हुकूमत ने इस संग्रहालय की सुरक्षा पर भी सवालिया निशान लगा दिया है। संग्रहालय के कर्मचारी फिलहाल देश की धरोहर को नष्ट होते देख रहे हैं लेकिन अपने निदेशक के खिलाफ बगावत के मूड में भी दिखाई दे रहे हैं।

म्यूजियम सूत्रों के मुताबिक कुषाण काल (दूसरी से पांचवीं शताब्दी) में मथुरा में मूर्ति कला अत्याधिक विकसित थी। ‘मथुरा स्कूल आफ आर्ट्स’ के नाम से विख्यात इस कला की मूर्तियां आज देश और दुनिया के संग्रहालयों की शोभा बढ़ा रही हैं। दुनिया भर के मूर्ति कला विशेषज्ञ और शिक्षक-छात्र मूर्ति कला के अध्‍ययन के लिए 150 साल पुराने मथुरा म्यूजियम में वक्त-वक्त पर डेरा जमाते हैं। यह बात अलग है कि मथुरा की शान मथुरा म्यूजियम के महत्व का इल्म शहर के पढ़े-लिखों को नहीं है। वर्ष भर में म्यूजियम देखने आने वाले विदेशी पर्यटकों की गिनती नगरवासियों के मुकाबले बहुत अधिक है। सूत्रों के मुताबिक देश और प्रदेश के सांस्कृतिक विभाग मथुरा म्यूजियम को लोकप्रिय बनाने में तनिक भी रुचि नहीं लेते। वक्त-वक्त पर आने वाले अनुदान से म्यूजियम में ईंट-गारे का काम होता तो होता है, लेकिन कहीं भी विकास का उजाला नजर नहीं आता। सन 2010 से जमे बैठे निदेशक एके पांडेय ने लापरवाही के मामले में पूर्व में रहे निदेशकों को काफी पीछे छोड़ दिया है।

जानकारी के मुताबिक मार्च 2013 में कलकत्ता के साइंस म्यूजियम से एक टीम मथुरा म्यूजियम आयी और महात्मा बुद्ध की बेशकीमती ढाई हजार वर्ष पुरानी मूर्तियों की अनुकृतियां तैयार की। इस कार्य के लिए मूर्ति पर कैमिकल का लेप किया जाता है। इस कार्य से मूर्तियों के नष्ट होने का खतरा बना रहता है और मूर्ति का प्राचीन स्वरूप नष्ट हो सकता है। करीब 6 मूर्तियों के माडल तैयार किये गये। इस काम में मूर्ति न. 10/130 को नुकसान पहुंचा है। यह मूर्ति दो हजार वर्ष पुरानी है। इस कार्य की अनुमति निदेशक पांडेय ने क्यों दी, इस सवाल का कोई जवाब किसी के पास नहीं। कई शहरों के अनजान लोग पांडेय जी का नाम लेकर म्यूजियम आ रहे हैं और कर्मचारियों को निर्देश दे कर मनमानी कर रहे हैं। कर्मचारियों का कहना है कि ऐसी अनहोनी पूर्व में नहीं देखी गयी।

निदेशक पांडेय ने म्यूजियम की साहित्यिक-सांस्कृतिक गतिविधियों पर विराम लगा दिया है। म्यूजियम परिसर में किये जाने वाले कार्यक्रम प्रबुद्ध वर्ग को अपनी ओर खींचते थे। लाइब्रेरी में ताले जड़ दिये गये हैं। प्रतिदिन आने वाली पत्र-पत्रिकाओं को फिजूल का खर्च बता बंद कर दिया गया है। शोधकर्ताओं के लिए यह पुस्तकालय एक नायाब उपलब्धि रहा है। पुस्तकालय में 45000 हजार पुस्तकें धूल चाट रही हैं। इनमें अनेक पांडुलिपियां भी हैं। इसके ठीक विपरीत साहित्य विरोधी निदेशक अपनी शान-शौकत के प्रति बेहद जागरूक हैं। उन्होंने अपने निदेशक के कमरे की भव्यता पर पिछले दिनों दो लाख से ज्यादा का खर्च किया है। जबकि पांडेय पर झांसी म्यूजियम का चार्ज भी है और वह माह में दो-तीन दिन ही मथुरा में बिताते हैं। बाकी वक्त निदेशक कक्ष पर ताले जड़े रहते हैं।

इसके अतिरिक्त मथुरा म्यूजियम में पानी की जबरदस्त किल्लत है। निदेशक पांडेय ने अपने एक चहेते को दस हजार रुपये सिर्फ इस सलाह-मशविरे की एवज में दे दिये कि म्यूजियम में किस स्थान पर बोरिंग करना कारगर होगा। बोरिंग फिर भी नहीं हुई। म्यूजियम में सन 2000 में लाखों रुपये खर्च कर सीसीटीवी कैमरे लगवाये गये थे। पांडेय ने मार्च में इन्हें हटवा दिया और नये कैमरे पर हजारों रुपये क्यों बर्बाद कर दिये, कोई नहीं जानता। कुल मिलाकर मथुरा का प्रसिद्ध म्यूजियम धीरे-धीरे एक सरकारी अस्तबल का रूप लेता जा रहा है। कर्मचारियों ने बताया कि प्रदेश के सांस्कृतिक सचिव संजीव शरण को मथुरा म्यूजियम की दुर्गति की कोई जानकारी नहीं। पूर्व में रहे सचिव मनोज कुमार का चूंकि पांडेय पर वरदहस्त था, सो उनकी करतूतों पर पर्दा रहा। नगर के बुद्धजीवियों का कहना है कि प्रदेश सरकार ने मथुरा म्यूजियम में व्याप्त अनिमितताओं पर अधिक दिन पर्दा पड़े रहने दिया तो प्राचीन धरोहर के लिए खतरा पैदा हो सकता है। सरकार को चाहिए कि मथुरा म्यूजियम की जांच गंभीरता से कराये।

(अशोक बंसल। पेशे से शिक्षक। पत्रकारिता में रुचि। दो पुस्तकें प्रकाशित। ऑस्ट्रेलिया की ऐतिहासिक घटनाओं पर तीसरी पुस्तक सोने के देश में जल्‍दी प्रकाशित होगी। उनसे ashok7211@yahoo.co.in और 0983719969 पर संपर्क कर सकते हैं।)

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