बाप रे, ये रामनौमी तो डराने वाला है भाई!

♦ पुंज प्रकाश

भारत विचित्रताओं से भरा देश है, इसलिए भारतीय संस्कृति का व्यावहारिक अध्ययन करना एक जरूरी अंग बन जाता है। किताबों में बातें जितनी कोमल और सुंदर लगती हैं किंतु ऐसा हो सकता है कि यथार्थ जगत में मामला एकदम ही उल्टा हो। इतिहास पलट कर देखें तो हमारे देश की सबसे बड़ी सेकुलर ताकतों और पार्टियों के हाथ भी मासूमों के खून से सने हैं। जिन्हें इस बात पर जरा भी संदेह है, वो 1947 के बाद के भारतीय इतिहास के पन्ने पलट के नजर डाल लें।

आज रामनौमी है। रामनौमी अर्थात बजरंगबली का दिन। रामनौमी अर्थात धर्मध्वजा की स्थापना का दिन। बचपन को याद करता हूं तो यह दिन दो वजहों से खास तौर पर याद आती हैं। इन दोनों वजहों में धर्म कहां है, मुझे नहीं मालूम। पहला कि उस दिन किसी भी घर में मांस-मछली नहीं बनता था और दूसरा कि पूजा के बाद खाने के लिए लडुआ (एक खास प्रकार का घर में बनाया लड्डू) मिलाता था। तब कहां पता था कि धर्म इतना मासूम नहीं होता।

अन्य धर्मों के मुकाबले हिंदू धर्म ज्यादा सहिष्णु है, ऐसा अक्सर ही पढ़ने-सुनने में आता है। ये बात और है कि हर धर्म का अनुयायी उस धर्म को सबसे ज्यादा सहिष्णु और यहां तक कि वैज्ञानिक धर्म तक घोषित करने में तनिक भी नहीं हिचकते। टीवी डिबेट देखिए लोग आतंकवाद तक को वैज्ञानिक दृष्टिकोण देने से नहीं शर्माते! कहा भी गया है – जाकी रही भावना जैसी, प्रभु मूरत देखी तिन तैसी!!

एकाएक मन किया चलो कल रामनौमी है तो आज शहर घूमा जाए। देखें तो सही, आदिवासी लैंड झारखंड की राजधानी इस पर्व को कैसे मनाती है। बाहर निकला तो कांके रोड से बिरसा कृषि विश्विद्यालय की तरफ चल पड़ा। मुझे बताया गया कि बीच में कहीं अस्त्र-शस्त्र प्रतियोगिता का आयोजन होता है, जहां अलग-अलग दल आकर अस्त्र-शस्त्र संचालन का प्रदर्शन करते हैं और पुरस्कृत होते हैं। लगभग ग्यारह बजे सुबह का वक्‍त था। वैसे गर्मी के दिन में इसे सुबह कहना उचित नहीं। मैं अपने दुपहिया के कान जोर से उमेठता अस्त्र-शस्त्र प्रतियोगिता आयोजन स्थल की ओर चल पड़ा। रास्ते में लाल रंग के बड़े-बड़े पताके (तिकोना झंडा) बड़े-बड़े और ऊंचे बांस के सहारे खूब ऊंचे हवा में फहरा रहे थे और उन पर रामभक्त हनुमान विराजमान हो हवा में फुर्र-फुर्र उड़ रहे थे। मुझे अपना गांव याद हो आया, जहां रामनौमी की शाम किसी ऊंची छत से गांव को निहारना एक अलग ही अनुभूति का हिस्सा हुआ करता था। लगभग हर घर में खूब ऊंचे-ऊंचे बांस के सहारे पताका फहरा रहा होता था। खुला आसमान, फहराते लाल-लाल पताके और खपड़ैल घरों से उठता धुआं। उसे निहारना एक काव्यात्मक अनुभव हुआ करता था और इस काव्यात्मकता में धर्म कहीं नहीं था।

खैर, आगे बढ़ा तो पाया कि झंडे तो एक से एक हैं पर रंग बहुतेरे हो गये हैं। हनुमान अब केवल लाल रंग के नहीं रहे। वो केसरिया, नीला, पीला आदि पता नहीं कितने रंग से भर गये थे, पर हरा नहीं था कहीं भी। अब ये हरे रंग का झंडा कहीं क्यों नहीं लगा था, इस सवाल का जवाब देनेवाला कोई नहीं था। वैसे शायद जवाब की जरूरत नहीं है, हम सब जानते हैं। अब जानबूझ कर अनजान बने रहने का अभिनय करें तो बात और है।

Ramnaumi

बड़े-बड़े कटआउट में हनुमान अपनी छाती फाड़ कर राम और सीता का दर्शन करा रहे थे, तो कहीं राम बाल लहराते राम जन्मभूमि – बाबरी मस्जिद विवाद की याद ताजा कर रहे थे। कल एक बुजुर्ग कह रहे थे कि अब अयोध्या नाम लेते ही डर लगता है। रुकिए एक बहुत पुराना चुटकुला याद आ रहा है। एक ने पूछा – सबसे पहला मार्क्सवादी कौन था? दूसरे ने जवाब दिया – हनुमान, क्योंकि वो कच्छा भी लाल रंग का पहनते थे।

अस्त्र-शस्त्र प्रतियोगिता स्थल पर पहुंच कर जो कुछ भी देखा, उसे कैसे परिभाषित करूं, समझ में नहीं आ रहा। वो हिंसक भी था और घिनौना भी। ढेर सारे लोग एक बड़े से गोल दायरे में जमा थे और बीच में नुक्कड़ नाटक के प्रदर्शननुमा एक परफॉर्मेंस दिखाया जा रहा था। जिसका मूल मंत्र ये था कि पाप और शैतान से मुक्ति चाहिए तो बजरंगबली का मंदिर बनना और उनकी आराधना जरूरी है। इस आग्रह से मुझे व्यक्तिगत तौर पर कोई आपत्ति नहीं, पर यहां यह बात आग्रहपूर्वक नहीं बल्कि डराकर कही जा रही थी। जो प्रस्तुति दिखायी जा रही थी, वो पूरी तरह से अंधविश्वासों पर आधारित थी। एक बीस साल का लड़का इस प्रदर्शन में शैतान बना था। उसके पूरे शरीर पर काला रंग पोत दिया गया था और उसे सांप खाते हुए दिखलाया गया। जी हां जिंदा सांप, सचमुच का सांप। उसने मेरी आंखों के सामने दो जिंदा सांप को अपने दांतों से काट दिया। एक सांप के कुछ टुकड़े को तो वो खा भी गया। फिर आम आदमी बने कुछ अभिनेताओं ने हनुमान से गुहार लगायी। हनुमान प्रकट हुए और उसने उस शैतान का वध कर दिया और धर्म की स्थापना कर दी। फिर कुछ देर तक तलवार और लाठी के सहारे असत्य पर सत्य की विजय की कहानी दिखायी गयी। वहां बहुत कुछ और चल रहा था। लगे हाथ उस प्रस्तुति में इस्तेमाल की जा रही भाषा पर भी कर लेते हैं। उस पर बस इतना कह देना काफी होगा कि संवादों में कब हनुमान स्त्रीलिंग और कब पुल्लिंग हो जा रहे थे, पता ही नहीं चल रहा था। वैसे हम कह सकते हैं कि भाषा हिंदी थी। सबका निचोड़ ये कि धर्म के नाम पर की गयी हत्या, हत्या नहीं कहलाती।

एक नाटक खुलेआम लोगों में अंधविश्वास को बढ़ावा और धर्म के नाम पर हत्या करने की प्रेरणा दे रहा था और किसी को इसकी कोई चिंता नहीं। वहां न प्रशासन का कोई आदमी था, न ही समाज का ठेका अपने सड़े कंधों पर उठाये समाज का कोई ठेकेदार। अरुण गोविल को राम माननेवाली जनता तो हिंसा और नफरत से भरे इस प्रदर्शन को देखकर गदगद थी। कैसे इस मुल्क में किसी एक व्यक्ति के आह्वान पर लोग रामराज स्थापित करने के लिए एक खास समुदाय को समूल नष्ट करने को तत्पर हो जाते हैं, ये सब देखने के बाद बहुत कुछ समझ में आ जाता है।

क्या यह शक्ति प्रदर्शन था? क्या ऐसे आयोजन अन्य धर्म या समुदाय के लोग नहीं करते? गौर करिए, दूध का धुला कोई नहीं है। बहरहाल, आज रामनौमी है और शहर के पुलिसकर्मियों को तैनात रहने को कह दिया गया है कि कहीं कुछ गड़बड़ न हो जाए! पर्व चाहे हिंदू का हो, मुसलमान का हो, आदिवासी का हो या किसी और का, गडबड़ी की संभावना रहती ही है!

(पुंज प्रकाश। हिंदी रंगमंच के समर्थ युवा अभिनेता। पटना रंगमंच से रंग-जीवन की शुरुआत। एनएसडी से स्‍नातक। एनएसडी रेपर्टरी से भी जुड़े रहे हैं। इन दिनों रांची में रहते हैं। उनसे punjprak@gmail.com पर संपर्क करें।)

You may also like...

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *