वे किस्से-कहानियां कहने वाले इतिहासकार नहीं थे

♦ रामचंद्र गुहा

न 1919 में रॉलेट सत्याग्रह हुआ। 1920 में कांग्रेस खिलाफत गठबंधन बना। 1921 में असहयोग आंदोलन हुआ और 1922 में चौरीचौरा की घटना घटी। इनके मुकाबले सन 1923 भारतीय इतिहास का अपेक्षाकृत शांत वर्ष है। लेकिन इतिहासकारों के लिए इसका बहुत महत्व है। 23 मई, 1923 को इतिहास के सबआल्टर्न स्कूल के संस्थापक रोनोजीत गुहा का जन्म हुआ। इसके ठीक एक महीना पहले 23 अप्रैल को एक ऐसे इतिहासकार का जन्म हुआ, जिन्होंने कोई स्कूल नहीं स्थापित किया, लेकिन फिर भी या इसी वजह से वे हमारे लिए महत्वपूर्ण हो गए। उनका नाम सर्वपल्ली गोपाल था। रोनोजीत गुहा पूर्वी बंगाल के मध्यवर्गीय परिवार में पैदा हुए थे। उन्होंने इतिहास की पढ़ाई कोलकाता में की, जहां वह कम्युनिस्ट हो गए। वह छात्र राजनीति में सक्रिय रहे, किंतु 1956 में हंगरी पर सोवियत संघ के आक्रमण के बाद उन्होंने पार्टी छोड़ दी। उन्होंने साल 1963 में औपनिवेशिक भूमि नीति पर एक अध्ययन प्रकाशित किया। लेकिन उन्हें 1980 के दशक में सच्ची मान्यता मिली। इस दौरान उन्होंने सबआल्टर्न शोध ग्रंथों का संपादन किया और 1983 में उनकी महत्वपूर्ण किताब द एलीमेंटरी एसपेक्ट्स ऑफ पीजंट इनसर्जेसी आई। आने वाले वर्षों में वह महानायक की तरह हो गए और पूरी दुनिया के वामपंथी बुद्धिजीवी उनके आगे नतमस्तक रहने लगे।

History

गुहा के ही समकालीन सर्वपल्ली गोपाल का परिवार भी मध्यवर्गीय था, पर उसकी सामाजिक हैसियत बहुत बड़ी थी। वह विख्यात दार्शनिक सर्वपल्ली राधाकृष्णन के बेटे थे, इसलिए शुरू से ही उन्हें बड़े राजनेताओं, लेखकों व चिंतकों की संगत मिली। उन्होंने अपनी पढ़ाई ऑक्सफोर्ड में की और बाद में वहां पढ़ाया भी। 1960 के दशक में उन्होंने वायसराय और उनकी नीतियों पर कुछ बढ़िया अध्ययन प्रकाशित किए। सन 1971 में उन्होंने नई दिल्ली आकर नौकरी कर ली। अगले पंद्रह वर्षों में उन्होंने जवाहरलाल नेहरू की जीवनी तीन खंडों में प्रकाशित की, जो आज तक मानक मानी जाती है। 1989 में उन्होंने एक तीखी जीवनी अपने पिता की लिखी, जो उनकी सात किताबों में सर्वश्रेष्ठ कही जा सकती है। गोपाल सत्ता और राजनीति के इतिहासकार थे। उन्होंने वायसराय, प्रधानमंत्रियों और उनकी नीतियों पर लिखा। दूसरी ओर, गुहा बुनियादी तौर पर छोटे किसानों, मजदूरों और आदिवासियों के इतिहासकार थे। इस फर्क के बावजूद दोनों में कई समानताएं हैं।

दोनों बहुत मेहनती शोधकर्ता थे, जो घंटों दस्तावेजों को छानते रहते थे। दोनों बहुत सुंदर अंग्रेजी लिखते थे और दोनों यह मानते थे कि इतिहास सामाजिक विज्ञान होने के साथ-साथ साहित्य भी है। आजकल जो लोकप्रिय इतिहास की किताबें बाजार में हैं, उनके मुकाबले गुहा व गोपाल का लेखन ज्यादा विश्लेषणात्मक और पठनीय था। राजनीतिक सिद्धांत, समाजशास्त्र, नृवंशशास्त्र और मनोविज्ञान का इस्तेमाल इन दोनों इतिहासकारों ने व्यक्तियों और समाजों के विश्लेषण में बहुत अच्छी तरह किया। दोनों बहुत अच्छा लिखते थे, लेकिन वे गंभीर अध्येता और इतिहासकार थे। सिर्फ किस्से-कहानियां कहने वाले शौकिया इतिहासकार नहीं थे। एकांगी विचारधाराओं के प्रति गहरा समर्थन ज्यादा आसान है, इसलिए गुहा को बड़े पैमाने पर युवा चाहने वाले मिले, जो उन्हें लगभग मसीहा मानते थे। सर्वपल्ली गोपाल के आसपास ऐसा कोई पंथ नहीं बना। क्योंकि एक तो राजनीतिक इतिहास और जीवनियां आजकल फैशन से बाहर हैं और दूसरे संवाद और समन्वय पर जोर देने वाला उदारवाद युवाओं को ज्यादा आकर्षित नहीं करता।

उन्हें दक्षिण या वाम विचारधाराएं ज्यादा आकर्षित करती हैं, जिनके नेता तुरंत और संपूर्ण नतीजे दिखाते हैं। राजनीतिक नजरिये से गोपाल कुछ वाम की ओर झुके हुए थे, हालांकि मार्क्सवाद के एकाधिकारवादी नजरिये ने उन्हें कभी आकर्षित नहीं किया। शायद उन्हें समतावादी उदार इतिहासकार कहा जा सकता है। उनका एक निबंध है, जो विशिष्ट सामाजिक स्थिति के बारे में उनकी समझ को दिखाता है। कैंब्रिज के कुछ विद्वानों का यह दावा था कि 1920 और 30 के दशक में दक्षिण का ब्राह्मण विरोधी आंदोलन अवसरवादी और कैरियररिस्ट लोगों का आंदोलन था। गोपाल हालांकि खुद ब्राह्मण थे, लेकिन वह इससे असहमत थे और उन्होंने दिखाया है कि मद्रास प्रेसीडेंसी में आर्थिक, राजनीतिक, प्रशासनिक और सांस्कृतिक जीवन पर ब्राह्मणों का कैसा वर्चस्व था।

Sarvepalli Gopal Imageगोपाल के संकलित निबंधों की जो किताब मैं अभी पढ़ रहा हूं, उसमें जवाहरलाल नेहरू पर कई निबंध हैं, जिनमें लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता को कायम रखने में नेहरू के काम को दर्शाया गया है। गोपाल नेहरू के प्रशंसक थे, लेकिन वह यह देख सकते थे कि गांधी ज्यादा महान इंसान थे। वह लिखते हैं, ‘गांधीजी ने पश्चिम से बहुत कुछ लिया, लेकिन वह उसके विचारों व आदर्शों को अपने भारतीय अनुभव में ढाल पाए, जबकि नेहरू हमेशा एक बाहरी व्यक्ति रहे। वह खुद इस बात को अच्छी तरह समझते थे और गांधी के प्रति उनके आदर का एक बड़ा कारण यही था।’ आगे जनता को संबोधित करने की नेहरू की आदत के बारे में गोपाल लिखते हैं, ‘गांधीजी एक शक्तिशाली आदमी थे, जो दूसरों को शक्ति देते थे, नेहरू इसके बरक्स अपनी लोकप्रियता से शक्ति अजिर्त करते थे।’ गोपाल नेहरूवादी धर्मनिरपेक्षता और भारत में उसके महत्व को समझते थे, जो नेहरू और गांधी में समान थी। गोपाल लिखते हैं, ‘बहुसंख्यक सांप्रदायिकता, अल्पसंख्यकों की सांप्रदायिकता से ज्यादा खतरनाक है, क्योंकि वह सांप्रदायिकता राष्ट्रवाद का मुखौटा ओढ़ सकती है।’

इमरजेंसी हटने के कुछ दिनों बाद गोपाल ने लिखा कि सन 1975 से 1977 के बीच की घटनाओं ने नेहरू को इस देश में बदनाम कर दिया है। सन 1986 से 88 और 2009 से 2013 तक उनके उत्तराधिकारियों ने नेहरू का नाम खराब करने में कोई कसर नहीं छोड़ी है, इसलिए यह अच्छा है कि जिन मूल्यों के लिए नेहरू जिए, उनका कोई मजबूती से बचाव करे। इस किताब की सबसे बड़ी उपलब्धि उनका एक निबंध है ‘सुभाषचंद्र बोस के अंतर्विरोध’। यह निबंध पहले अप्रकाशित था। गोपाल यह मानते हैं कि बोस के साथ इतिहास ने क्रूरता बरती। सन 1939 में उन्हें कांग्रेस अध्यक्ष के पद से और बाद में कांग्रेस से बाहर होना पड़ा। बाद में जब भारत की आजादी तय हो गई और बोस को एक नायक की तरह सम्मान मिल सकता था, तो विमान दुर्घटना में उनकी मृत्यु हो गई। गोपाल लिखते हैं, ‘यह समझा जा सकता है कि उनके प्रशंसक बहुत उग्रता से उनका बचाव करते हैं और उनकी किसी भी आलोचना को बर्दाश्त नहीं करते, लेकिन बोस को भावुक सहानुभूति की नहीं, आलोचनात्मक विश्लेषण की जरूरत है।’

मृत्यु के दस साल बाद इतिहासकार की तरह गोपाल महत्वपूर्ण नजर आते हैं। इस किताब में गोपाल रवींद्रनाथ टैगोर के उपन्यास गोरा के नायक का कथन उद्धृत करते हैं कि आखिरकार मैं एक भारतीय हूं, मुझ में हिंदू, मुस्लिम, ईसाई किसी समाज के प्रति कोई बैर नहीं है, वे सब मेरे हैं और मैं उनका हूं। कुछ पन्नों के बाद गोपाल टैगोर के व्यापक मानवतावाद और संकीर्ण भेदभाव के खिलाफ उनके विचारों की बात करते हैं। एक इतिहासकार के उद्धरण उसके अपने बारे में बहुत कुछ बताते हैं। टैगोर के उद्धरण सर्वपल्ली गोपाल के अपने बहुलतावादी समन्वयकारी और मानवीय भारत के प्रति रुझान को साफ करते हैं।

यह लेख अंग्रेजी में पढ़ें: A HISTORIAN’S HISTORIAN – Histories that endure
सौजन्‍य: दैनिक हिंदुस्‍तान & द टेलीग्राफ

रामचंद्र गुहा मशहूर इतिहासकार हैं। कई अखबारों और पत्रिकाओं के लिए स्‍तंभ लिखते हैं, जिसमें विविध विषयों को समेटते हैं। मसलन क्रिकेट, पर्यावरण, समाज, राजनीति आदि। उन्‍होंने बीस के आसपास किताबें लिखी हैं। 2007 में छपी उनकी किताब इंडिया आफ्टर गांधी को खासी लोकप्रियता मिली। इस किताब को हिंदी में पेंग्विन ने छापा है, जिसका अनुवाद युवा पत्रकार सुशांत झा ने किया है। रामचंद्र गुहा से ramachandraguha@yahoo.in पर और सुशांत झा से jhasushant@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।

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