लखनऊ में अब भी बचा है थोड़ा सा लखनऊ

लखनऊ डायरी
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उमेश पंत
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Umesh Pant

सजग चेतना के पत्रकार, सिनेकर्मी। सिनेमा और समाज के खास कोनों पर नजर रहती है। मोहल्‍ला लाइव, नयी सोच और पिक्‍चर हॉल नाम के ब्‍लॉग पर लगातार लिखते हैं। फिलहाल यूपी से ग्रामीण पाठकों के लिए निकलने वाले अखबार गांव कनेक्‍शन से जुड़े हैं और लखनऊ में रहते हैं। उनसे mshpant@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।

♦ उमेश पंत

खनऊ के गोमती नगर के इस घर में अभी अभी पड़ौसी के चूल्हे (बोन फायर) से आग लेके आये हैं। होली की झलकियां मिली हैं। बोन फायर के 3 चक्कर लगाके एक दहकता हुआ कोयला वापस घर में आया है। अंकल (नीलेश सर के पिताजी) ने बताया है कि पहले के जमाने में घरों में आग बचा के रखी जाती थी। एक बार जो जली, तो साल भर तक उसे सहेज के रखा जाता था। पुराने जमाने की बातें दंत कथाओं सी लगती हैं। पर उन बातों में इतनी गर्माहट होती है कि उसकी आंच अब भी अच्छी लगती है। घर लौटे हैं, तो आंटी ने पूछा है कि तुम लोग तो लाल रंग ही लेके गये थे, चेहरे पे ये हरा रंग किसने लगा दिया। इस सवाल का जो जवाब है, वही शायद होली का मजा है। जब तक दूसरों के रंग आपके चेहरे पे न चढें, तब तक होली कैसी? लखनऊ में भी फ्लैट वाला कल्चर हावी हो चुका है। ऐसे में किसी अजनबी अंकल के हाथों से चेहरे पे लगा वो अजनबी सा हरा रंग मायने रखता है। बोन फायर की मद्धम आंच में हल्का सा नजर आता उन अंकल का चेहरा भले याद न रहे पर उनकी खिलायी बूंदी का मीठा स्वाद देर तक याद रहेगा। और इस बहाने होली भी जो अजनबियों को भी रंगों के बहाने करीब ले आती है।

लखनऊ आये हुए 100 दिन से भी ज्यादा हो चुके हैं। लखनऊ आने और मुंबई आने में एक समानता रही है। जब दिल्ली से मुंबई आया था, तो एक छोटा सा बैग लेकर गया था। सोचा था बालाजी टेलीफिल्म्स का इंटरव्यू देकर हफ्ते भर में लौट आऊंगा। पर वो हफ्ता कई महीनों का सफर तय करता रहा। बालाजी के लिए लिखना चलता रहा। नये कपड़े आते रहे, पुराने जाते रहे पर गृहस्थी उस बैग में सिमटी रही। फुल फर्निश्ड किराये के घरों में गृहस्थी जुटा भी नहीं करती। आप जब उन घरों को छोड़ते हैं, तो वही एक बैग आपके साथ खड़ा रहता है, जिसके साथ आप उस घर में आये थे।

और फिर एक दिन यूं ही लखनऊ आना हुआ। गांव कनेक्शन के लांच की वजह से हफ्तेभर के लिए एक बार फिर एक छोटे से बैग के साथ। एक बार फिर हफ्ता महीनों की मियाद पूरी कर चुका है। यहां से लौटूंगा, तो फिर शायद एक छोटा सा बैग साथ होगा। ये छोटे से बैग जो हम जैसे बैचलर्स एक शहर से दूसरे शहर फिर दूसरे से तीसरे शहर ढोया करते हैं, उनमें भरे कपड़े-लत्ते भले ही पुराने हो जाएं, पर वो उम्मीदें कभी पुरानी नहीं होती जो उस बैग के किसी कोने में किसी चेन के भीतर तसल्ली से बंद रहती हैं।

लखनऊ पहली बार तब आया था, जब ग्यारहवीं में पढ़ता था। सन 2003 के आसपास। तब लखनऊ आना एक छोटे शहर से एक बड़े शहर में आना था। बाल विज्ञान कांग्रेस की राष्ट्रीय प्रतियोगिता में चुने जाने की खुशी लिये, बड़े शहर को देखने की उत्सुकता के साथ। आलम बाग के सिटी मौंटेसरी स्कूल को देखा था तो लगा था कैसे होते होंगे वो बच्चे जो इतने बड़े स्कूल में पढ़ते होंगे, जिंदगी में पहली बार स्वीमिंग पुल देखा था तब। इमारतें कई मंजिलों की होती हैं, तब तक बस किताबों में पढ़ा था। तब लखनऊ एक बड़ा शहर था मेरे लिए। पर अनुभव पर्सपेक्टिव की तरह होते हैं। बहुत दूर से देखने पर आकार में एक दूसरे से बड़ी चीजें भी बराबर की दिखाई देती हैं।

तब जो शहर इतना बड़ा लगता था, अब उससे बड़े शहर पास से देखे हैं तो जाना है ये शहर इतने सालों बाद आज भी बड़ा कहां हुआ है। अब दिल्ली देख लिया है, मुंबई नाप लिया है, लखनऊ अब बहुत छोटा सा लगता है। आकार में छोटा भले ही न रहा हो, पर दिल से अब भी ये एक छोटा शहर ही तो है। ये शहर खुद से ज्यादा करीब लगता है शायद इसलिए अपने सपनों से बहुत दूर मालूम पड़ता है। सपने जिस शहर से ज्यादा नजदीक दिखाई देते हैं, वो शहर अब भी खुद से उतना ही दूर सा लगता है। कौन जाने क्यों?

मुंबई और लखनऊ दोनों के चरित्र एक दूसरे से बिल्कुल मेल नहीं खाते। लखनऊ और दिल्ली में कई समानताएं हैं। मसलन पुरानी दिल्ली की तर्ज पर अमीनाबाद की बिरियानी और कबाब, कनाट प्लेस से मेल खाते हजरत गंज के बाजार। दिल्ली और मुंबई में भी कई समानताएं हैं। मसलन ऊंची ऊंची इमारतें, आने जाने के लिए ट्रेन। इन समानताओं को एक ओर कर देने पर जो असमानताएं बाकी रह जाती हैं, मुंबई और लखनऊ के बीच उन्हीं असमानताओं के रिश्ते हैं।

Lucknow

लखनऊ आकर कई नये अनुभव हुए हैं। देहात को गहराई से समझने का मौका मिल रहा है। पत्रकारिता हमेशा से फ्रीलांसिंग का हिस्सा रही थी। अब भी वो नौकरी की तरह नहीं लगती। शौक को मिशन की चाशनी में घोलकर पत्रकारिता का रस चख रहा हूं। अच्छा लग रहा है। कुछ सार्थक करने जैसा। यहां पैसा कम है, पर समझ आ रहा है कि पैसे से संतुष्टि नहीं खरीदी जा सकती। यहां से सपने भले दूर दिखते हैं, पर कई तरह की सच्चाइयों को पास से देखना भी किसी सपने से कम कहां होता है।

गांवों में भटकना ऐसा लगता है, जैसे माजिद मजीदी या टैरेंस मलिक की फिल्मों को सामने से देख रहे हों। कलम लेकर निकलो तो हर बात खबर सी लगती है, हर खबर अनछुई सी लगती है। मीडिया के लिए जो गांव कोई हैसियत नहीं रखते उन गांवों को तेजी से बदलते देखना और इस तेज बदलाव के बीच खड़े होकर उन्हें देखना ऐसा लगता है, जैसे आप बीच भंवर में खड़े हों। चारों ओर सब कुछ घूम रहा हो। गोल गोल। ये सब कुछ जब ठहरेगा तो भी शायद कुछ खास बदल नहीं पाया होगा। इस भंवर में सरकारी योजनाएं, अफसरशाह, बाजार, और पूंजीपति आगे-आगे भाग रहे हैं और पीछे-पीछे भाग रहे हैं गांव के लोग। सब कुछ इतना तेज हो रहा है कि ये बदलाव सच है या भ्रम, समझना मुश्किल है। शहर के बीचोंबीच केजीएमसी में एक अमरीका सिंह एक महीने से अपनी बच्ची के इलाज के इंतजार में खुले आसमान के नीचे डॉक्टर की राह तक रहा है। दरवाजे के भीतर एक डॉक्टर है जिसे न उसकी परवाह है, न उसकी 10 महीने की बच्ची की। बाराबंकी के एक गांव में एक बूढ़ा आदमी जो बेघर है, जो देख नहीं सकता, जिसका और कोई नहीं है, क्यूंकि उसके पास घूस देने के लिए के पांच हजार रुपये नहीं हैं, इसलिए लेखपाल उसकी आय 36 हजार से ज्यादा बताकर उसको घर दिलाने की लिस्ट से बाहर निकाल रहा है और दूर कोई मैकेंजी, कोई ओगिल्वी बता रहा है कि गांव शहर से ज्यादा खर्च कर रहे हैं। कि गांवों के लोग अमीर हो रहे हैं। अखबार शायद गांवों पर हो रहे शोधों में ज्यादा यकीन रखते हैं, गांवों में जाकर शोध करने में उनका यकीन बहुत कम है। और इतनी मेहनत करना उनके बस में है भी नहीं। इसलिए गांवों में आंकड़े नहीं बदल रहे, पर आंकड़ों में गांव जरूर बदल रहे हैं। गांवों पर अखबारों से ज्यादा मार्केटिंग कंपनियों की नजर है। क्यूंकि वहां रामशरण जैसे किसान भी खड़े हो रहे हैं, जो खेती से महीने का लाखों कमा रहे हैं, नाहिद जैसी औरतें खड़ी हो रही हैं जो महिलाओं के द्वारा गांव में चलाये जाने वाले बड़े रिटेल स्टोर को खोलने का सपना देख रही हैं। औरतें सौर ऊर्जा लालटेनें किराये पर देकर अच्छी कमाई कर रही हैं, गांवों में खुल गये बीपीओ में बेझिझक नौकरी कर रही हैं। खबर की नजर से अच्छा बुरा सब कुछ है गांवों में। बुरा शायद ज्यादा हो। अच्छा भले कम हो, पर अच्छे की संभावनाएं कम नहीं हैं। लखनऊ आकर गांवों को देखने की नजर काफी हद तक बदल गयी है।

कैमरे की नजर से देखें तो यहां सबकुछ खूबसूरत है। उस खूबसूरत नजर को लेकर निकलो तो गांव बड़े अच्छे लगने लगते हैं। शहरों से कहीं ज्यादा सुंदर लगने लगते हैं और सच्चे भी। खबर के लिए भटकते हुए, हाइवे पे चलते हुए अचानक आपकी नजर उस मटर के ढेर पे जाती है जो आपके ठीक बायीं तरफ, बगल के खेत में तोड़े जा रहे हैं। आप बायें मुड़ते हैं और पगडंडी पकड़ लेते हैं, उतरते हैं, कैमरा निकालते हैं और चाची की उम्र की महिला से ऐसे बात करने लगते हैं, जैसे वो रिश्ते में आपकी चाची ही हों, आप फोटो खींचते खींचते अपना परिचय देने लगते हैं, पीछे मुड़ते हैं तो आपको एक लड़का दिखाई देता है, सर पे मटर का बोरा लिये, आप उसकी फोटो खींचते हैं, उसकी फोटो खींचते हुए दूर कहीं फ्रेम में एक बिजूका नजर आता है, आप उस दूरी को तय कर लेते हैं, बिजूका को क्लिक करते हुए पीछे कई औरतें दिखती हैं, वो परिचय पूछती हैं, आप बताते हैं, हर औरत आपको एक एक मुठ्ठी मटर देती है, आप मना करते हैं, वो ऐसे जिद करती हैं जेसे घर से परदेस के लिए निकलते हुए मां बेटे से जिद करती है कि आचार भी रख लो, पापड़ भी, आप मना करते हैं पर मां तो मां होती है। आगे बढ़ते हैं… एक बूढ़े चाचा की उम्र के आदमी बच्चों सी जिद करते हैं कि मेरा भी फोटो खींच लो, फोटो खींचने पर उनकी खुशी दिल खुश कर देती है, उन अजनबियों से शायद फिर कभी मुलाकात ही नहीं होगी, पर कैमरे में कैद वो अजनबी हमेशा के लिए अपने हो जाते हैं, आपके हाथ में रखा वो छोटा सा कैमरा इतनी कूव्वत रखता है कि वो अजनबियत की दीवारें हटा देता है। मीठी मटर का स्वाद और एक देहाती जायका हमेशा के लिए जहन पे लेके आप लौट आते हैं।

इन तीन महीनों में ही लखनऊ का अच्छा रंग चढ़ गया है। अखबार से बोनस में मिल रहे व्यस्त जगरातों के बीच जितना वक्त मिलेगा लखनऊ को उतना समझने की कोशिश रहेगी, और ये कोशिश इस लखनऊ डायरी में झलकती रहेगी, उम्मीद कुछ यही है।

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