“इनाम के लिए मैं अपने पात्रों की जबान नहीं काट सकता”

Anurag Kashyap Imageसन 1959 में जर्मन लेखक गुंटर ग्रास ने एक उपन्‍यास लिखा था, द टिन ड्रम। इसी नाम से 1979 में Volker Schlöndorff ने फिल्‍म बनायी। कहानी हिटलर के वक्‍त की है। नाजी सेना यहूदियों को चुन चुन कर मार रहे हैं। बच्‍चे उस कत्‍लोगारत में शामिल नहीं किये जाते। तो एक बच्‍चा, जिसका शारीरिक विकास हिटलर की हुकूमत के साथ ही थम जाता है, अपनी आंखों से हिटलर के उस पूरे दौर को देखता है। गुंटर ग्रास की कलम में और Volker Schlöndorff के कैमरे में उसी बच्‍चे का नजरिया है। उस फिल्‍म में सेक्‍स के इतने स्‍वाभाविक दृश्‍य हैं कि उस फिल्‍म से गुजरते हुए आप उसका हिस्‍सा हो जाते हैं। आपको लगता है कि आप हिटलर के उसी समय और उसके समय की कई सारी बेतरतीब जुगुप्‍साओं के बीच एक पात्र हैं। लेकिन वैसी ही कोई फिल्‍म अगर भारत में बनायी जाती, तो शायद हिंदुस्‍तान का पवित्र दर्शक उसे उन्‍हीं कुछ दृश्‍यों की वजह से खारिज कर देता। शांतिस्‍वरूप त्रिपाठी के साथ अनुराग कश्‍यप की बातचीत में जिस तरह के सवाल उठे, उन पर फेसबुक की कुछ प्रतिक्रियाएं देख कर लगता है कि हम अब भी सिनेमा को कक्षा छह तक की कला-पुस्तिका के स्‍तर पर ही देखना चाहते हैं। जीवन-मूल्‍य को पारिवारिक शुचिता के दायरे में रखने वाले लोग सृजन की नयी खिड़कियां नहीं खोल सकते। हिंदी सिनेमा को अभी इस्‍मत चुगताई, मंटो, राजकमल चौधरी की जरूरत है, जिन्‍होंने हमारे पारंपरिक यौन-मूल्‍यों के पीछे की दुर्गंध को अपने साहित्‍य में उकेर दिया था: मॉडरेटर

पक्ष

♦ धनंजय कुमार सिंह

सिनेमा में गाली के बारे में मेरे विचार वही हैं, जो साहित्य में गाली-गलौज के बारे में राही मासूम रजा साहेब के थे। गालियों के बगैर भारतीय सिनेमा और साहित्य एक ऐसा मकान होगा, जिसमें न तो नालियों की व्यवस्था है और न ही लघु व दीर्घ-शंका के निवारण की। यानी के एक शौचालयहीन गृह। अब कुछ फिल्में सिर्फ ड्राइंग रूम तक ले जाती हैं, तो कुछ वॉशरूम तक। अब अगर आपको पेशाब नहीं लगी है मियां, तो क्यूं खामखा वॉशरूम में घुसे जा रहे हैं। बैठिए न इत्मीनान से ड्राइंग रूम में। किसने न्यौता दिया आपको या किसने जबरदस्ती की है कि वॉशरूम भी हो ही आइए। न जाना है तो न जाएं वहां, जब जाना होगा तब जाइएगा (और जाना तो पड़ेगा ही, आज नहीं तो कल। आखिर, दुनिया में हम आये हैं तो जाना ही पड़ेगा वाली स्थिति है न…) पर जब तक आप को जाने की जरूरत नहीं पड़ती, भला आप होते कौन हैं किसी और को वहां जाने से रोकने वाले।

लीजिए फिलहाल ड्राइंग रूम में बैठकर राही मासूम रजा साहेब के एक उपन्यास ‘ओस की बूंद’ की भूमिका पढ़िए…

भूमिका

बड़े-बूढ़ों ने कई बार कहा कि गालियां न लिखो, जो ‘आधा गांव’ में इतनी गालियां न होतीं तो तुम्हें साहित्य अकादमी का पुरस्कार अवश्य मिल गया होता, परंतु मैं यह सोचता हूं कि क्या मैं उपन्यास इसीलिए लिखता हूं कि मुझे साहित्य अकादमी का पुरस्कार मिले? पुरस्कार मिलने में कोई नुकसान नहीं, फायदा ही है। परंतु मैं साहित्यकार हूं। मेरे पात्र यदि गीता बोलेंगे तो मैं गीता के श्लोक लिखूंगा। और वह गालियां बकेंगे तो मैं अवश्य उनकी गालियां भी लिखूंगा। मैं कोई नाजी साहित्यकार नहीं हूं कि अपने उपन्यास के शहरों पर अपना हुक्म चलाऊं और हर पात्र को एक शब्दकोश थमाकर हुक्म दे दूं कि जो एक शब्द भी अपनी तरफ से बोले तो गोली मार दूंगा। कोई बड़ा-बूढ़ा यह बताये कि जहां मेरे पात्र गाली बकते हैं, वहां मैं गालियां हटाकर क्या लिखूं? डॉट… डॉट… डॉट…? तब तो लोग अपनी तरफ से गालियां गढ़ने लगेंगे! और मुझे गालियों के सिलसिले में अपने पात्रों के सिवा किसी पर भरोसा नहीं है।

गालियां मुझे भी अच्छी नहीं लगतीं। मेरे घर में गाली की परंपरा नहीं है। परंतु लोग सड़कों पर गालियां बकते हैं। पड़ोस से गालियों की आवाज आती है और मैं अपने कान बंद नहीं करता। यही आप करते होंगे। फिर यदि मेरे पात्र गालियां बकते हैं, तो आप मुझे क्यों दौड़ाते हैं? वे पात्र अपने घरों में गालियां बक रहे हैं। वे न मेरे घर में हैं, न आपके घर में। इसलिए साहब, साहित्य अकादमी के इनाम के लिए मैं अपने पात्रों की जबान नहीं काट सकता। इस उपन्यास के पात्र भी कहीं-कहीं गालियां बकते हैं। यदि आपने कभी गाली सुनी ही न हो, तो आप यह उपन्यास न पढें। मैं आपको ब्लश करवाना नहीं चाहता।

राही मासूम रजा

प्रतिपक्ष

♦ अनुराग आर्य

विश्व सिनेमा भी हमारे देश के कई दर्शकों की तरह हमारे सिनेमा से अनजान है। वरना श्याम बेनेगल, गोविंद निहालनी, शुरुआती दौर के केतन मेहता, मणि कॉल, गौतम घोष ओर सत्यजीत रॉय जैसे निर्देशकों ने तमाम सीमाओं के रहते विश्व को श्रेष्ठ सिनेमा दिया है। उस दौर में, जब बेहद सीमित बजट होता था और दर्शकों तक पहुंचने के न इतने माध्यम, न इतने सपोर्ट करने वाले पत्रकार। यथार्थ केवल भाषा और हिंसा पर निर्भर नहीं करता। जो निर्देशक सरोकारी सिनेमा में बीलिव करता है, वो यथार्थ गढ़ लेता है। कैमरा अपने आप में एक ऐसी भाषा है, जिसकी कोई हदें नहीं, कोई भौगोलिक निर्भरता नहीं। उस पर अगर इसे म्युजिक का साथ मिल जाए तो याद कीजिए सई परांजपे की “स्पर्श”, स्मिता पाटिल की “भूमिका” या श्याम बेनेगल की “मंडी” या गोविंद निहालनी की “आक्रोश”… जब किसी ने नक्सली आंदोलन का नाम भी नहीं सुना था, तब आदिवासी समाज के शोषण का चित्रण…

इन निर्देशकों के विजन क्लियर थे। पढ़ने वाले लोग थे। खूब पढ़ने वाले समाज-देश को समझते थे। उसके प्रति अपनी जिम्मेवारी को भी। दरअसल आपका मैसेज क्या है? किसी मूवी के जरिये क्या कहना चाहते हैं आप?

स्टोरी टेलिंग भी एक आर्ट है। क्लासिक क्या है? जो समय सीमा में बंधा न हो। जिससे आप रिलेट करने लगें। हां, जिस तरह से कहा गया है, वो कितने लोगों की सोच बदल सकता है। सुजाता जैसी कमर्शियल फिल्म हो, प्यासा जैसी या गाइड… उनके साथ कुछ मैसेज है।

ईरानी सिनेमा को देखिए? कितनी बंदिशों में रहते हुए उन्‍होंने विश्व को श्रेठ सिनेमा दिया है। केवल भाषा पर यथार्थ निर्भर नहीं करता। हां, यदि किसी निर्देशक का विजन क्लियर हो तो वो अर्धसत्य जैसी छूट ले लेता है … और वो अखरता नहीं, पर हर चीज को इसलिए शामिल कर लेना कि वो हमारे समाज में होता है, इसलिए दिखाओ, पचता नहीं। कौन से घर में गालियां सिखायी जाती हैं?

डीके बोस का म्यूजिक अच्छा है। अकेले में इसे सुनकर आप भी मुस्करा लेंगे, पर जब आपकी पांच साल की लड़की इसे पब्लिक प्लेटफॉर्म पर गाएगी, आप बगलें झांकेंगे।

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पर ये भी सच है कि हमारे सिनेमा में अभी तक निर्देशकों के भीतर साहस ओर बड़े स्टार पावर को कनविंस करने की क्षमता नहीं है। वरना “अनुभव” और “आविष्कार” जैसी फिल्‍में भी बनी हैं। ह्यूमन रिलेशंस पर जितना बोल्ड हिंदी साहित्य है, उतना हिंदी सिनेमा नहीं।

♦ नबीन भोजपुरिया

हा हा हा… हमारे सिनेमा ने अच्छी-अच्छी बनावटी-बनावटी बातें दिखाकर लोगों को चश्मा पहना दिया है!

अनुराग जी का यह स्टेटमेंट पूरी तरह गलत है। सिनेमा अगर अच्छा-अच्छा दिखाता तो भले ही वह बनावटी हो… फिर क्या कहने थे… लोग फैंटेसी में ही रह जाते! खैर विश्व सिनेमा और विश्व की बेहतरीन फिल्‍मों को अगर उठा लिया जाए, तो क्या हमारे सामने हिंसा ही है? क्या केवल सेक्स है या केवल मां-बहन की गाली ही है? विश्व सिनेमा का मतलब गाली, हिंसा और सेक्स है? फिर तो पोर्न फिल्‍में विश्व सिनेमा में जगह पाने की सबसे बड़ी हकदार है!

अगर बेडरूम सीन दिखाना हो, तो यह कोई भी फिल्मकार दिखा सकता है और पूरी तरह दिखा सकता है… लेकिन फिल्मकार वो है, जो सब कुछ न दिखाते हुए भी सब कुछ दर्शकों को दिखा दे।

समाज में जो है वो बेडरूम नहीं है। गालियां होती हैं और है… लेकिन उन गालियों को क्या अच्छी दृष्टि से देखा जाता है? बाप जब अपने बेटे को गाली देता है, तो उस वाकये को आप हर जगह फिट नहीं बैठा सकते हैं!

और बनावटीपन तब और अधिक बढ़ जाता है, जब उन गालियों को वाक्य में कॉमा नहीं, फुल स्टाप के बाद दिया जाता है (तिग्मांशु की गाली गैंग्स आफ वासेपुर में देखें, जिसको देने से पहले और देने के समय वो असहज दिखते हैं या फिर सरदार की पत्नी को देखें…)।

समाज का रेप्लिका या यथार्थ सिनेमा का तात्पर्य गाली, सेक्स और वीभत्स हिंसा नहीं है।

महेश भट्ट के लिए अगर सेक्स ही कला है तो फिर अनुराग कश्यप के लिए शायद क्रूर हिंसा, भयंकर तरिके से गालियों की बौछार और खुलेआम लंगटपन शायद विश्व सिनेमा है, यथार्थ सिनेमा है, समाज को दिखाता हुआ सिनेमा है… जो कि कतई सही नहीं है।

अब हमारी बातें कैसी भी हों, लेकिन विश्व सिनेमा हमने भी देखा है, जिसमें हिंसा, सेक्स और गाली से इतर भी बहुत सारी चीजें हैं… जिनकी ओर अनुराग जी या यथार्थ का वर्चुअल नक्‍शा काटने वाले नहीं देखना पसंद करेंगे!

किसी भी साल की पांच बेस्ट फिल्‍में उठा के देख लीजिए, तीन फिल्‍में वैसी ही होंगी, जिनमें हिंसा, सेक्स और गाली (फक यू जैसी बातें तो उन लोगों के आम जनजीवन में है, इसलिए इसको गाली मानना मूर्खता होगी उनके दृष्टिकोण से… क्‍योंकि यह शब्द उनके भाई-बहन भी आपस में बोलते हैं) है ही नहीं या बहुत कम है!

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