माधोगढ़ के बीहड़ में हम जब निर्भय गूजर से मिलने पहुंचे!

♦ शंभुनाथ शुक्‍ल

न 2004 की एक फरवरी को मैं निर्भय गूजर से मिलने उसके ठिकाने पर गया था। उस वक्त बीहड़ और भी खौफनाक थे। तब मैं अमर उजाला के कानपुर संस्करण में स्थानीय संपादक था और निर्भय से मिलने का वक्त हमारे उरई के ब्यूरो प्रमुख अनिल शर्मा ने फिक्स किया था। कानपुर दफ्तर के दो वरिष्ठ संवाददाता और एक फोटोग्राफर हमारे साथ था।

उरई से शैलेश, शैलेंद्र और अनिल के साथ हम घंटे भर बाद माधोगढ़ पहुंचे। वहां से अमित पोरवाल हमारे साथ हो लिये। अमित को ही बीहड़ के रास्ते मालूम थे। करीब दस किमी तक हम भयानक बीहड़ में गाड़ी चलाते रहे। आगे पहुज नदी के तट पर सड़क खत्म हो गयी। मील भर के करीब रेतीले मैदान में चलने के बाद सामने पहुज दिखी, जो साफ और निर्मल जल को समेटे तीव्र गति से बह रही थी। नदी पार करने के लिए कोई नाव नहीं। उधर दोपहर ढल रही थी। पोरवाल ने तब तक करील के पेड़ों के झुंड से एक बड़ा सा पटरा खोज निकाला। साथ ही एक पतवार भी। पोरवाल ने बताया कि डकैत इसका इस्तेमाल नदी पार करने के लिए करते हैं। यानी खुद नाव को खेओ।

हमने नदी पार की। उस पार का तट काफी ऊंचाई पर था। पटरे से उतरने के बाद कुछ दूरी तक कीचड़ भी था। किसी तरह उसे पार करते हुए हम कगार पर चढ़कर ऊपर आये। यह उत्तर प्रदेश की सीमा का आखिरी गांव था। एक तरह से डकैतों व यूपी पुलिस के बीच संधिरेखा भी यहीं से समाप्त होती थी। यहां पीएसी की एक कंपनी डेरा डाले थी। हमारे उतरते ही वे लोग आ गये। इस कंपनी का कमांडर मेरे गांव का ही निकला। पहुज चंबल से भी ज्यादा तीव्र गति से बहती है, इसलिए किनारों को तेजी से काटती है। उसके दोनों तरफ मीलों तक ऊंची-नीची खाइयां हैं और घने करील के जंगल भी, जिन्हें भेदना पुलिस के बूते से बाहर है। कई जगह तो हालत यह होती है कि पास से गुजर रहा शख्स भी नहीं दिखता है। पीएसी कमांडर ने सादे कपड़ों में पीएसी के कुछ जवान भी हमारे साथ रास्ता दिखाने के लिए भेजे। पर वो एक प्वाइंट के बाद लौट गये। आगे का रास्ता उनके साथ जाना सेफ नहीं था। अब पोरवाल ही हमारा गाइड था।

रास्ता और भी बीहड़ व खाई खंदक वाला होता जा रहा था। जरा सी भी आहट हमें चौंका देती। वहां डकैतों के साथ-साथ जंगली जानवरों का भी खतरा था। हम करीब आधा मील चले और एक ऊंचे कगार पर ठहर गये। वहां बबूल का एक घना जंगल था। यही निर्भय का डेरा है, पोरवाल ने हमें बताया। हम आगे बढ़े तो देखा कि जगह-जगह पर बबूल के कांटों की बाड़ लगाकर रास्ता रोक रखा गया है। पोरवाल ने हमें वहीं रोक दिया। उसने फुसफुसाते हुए कहा कि निर्भय यहीं है। निर्भय के वहीं होने की खबर से हम रोमांचित हो गये। सब दम साधे खड़े थे। किसी के मुंह से बोल नहीं फूट रहा था। हम करीब आधे घंटे वहीं खड़े रहे, पर जंगल की तरफ से कोई नहीं आया, न कोई आहट हुई। कुछ सरसराने की या पत्ते खड़कने की आवाजें जरूर आयीं लेकिन न तो फायरिंग की न किसी आदमी के वहां होने का आभास मिला। हिम्मत कर हमने कांटों की बाड़ हटायी और अंदर घुसे। एक जगह कुछ अधजली बीड़ि‍यों के ढेर दिखे। उसी के पास मेक्डावेल नंबर वन की बोतल पड़ी हुई थी, जिसमें कुछ शराब अभी बाकी थी। एक गढ्ढे में तमाम देसी शराब के पाउच और कुछ बोतलें फेंकी गयी थीं। मिट्टी के एक चूल्हे में लकड़ी सुलग रही थी। एक जगह किसी स्त्री का झंफर फटा पड़ा था। एक कुरता दिखा और कुछ लाल रंग के लंगोट, एक साड़ी व एक पेटीकोट एक अलगनी में पड़े थे। ऐसा लग रहा था कि कुछ समय पहले ही यहां से लोग गये हैं।

पोरवाल ने कहा कि हमसे कुछ गड़बड़ हो गयी है। लगता है कि डकैत हमें आता देख ही यहां से चले गये हैं। उन्होंने हमें गाड़ी से उतरते ही देख लिया था। हो सकता है कि उनके पास कोई नयी पकड़ सहेजने के लिए बाहर से भेजी गयी हो और वे उसे छिपाकर रखना चाहते हों।

Shambhunath Shukla in Beehad

यह फोटो उसी समय का है, जिसे शैलेंद्र ने खींचा था। हम लोग पहुज किनारे खड़े पोरवाल का इंतजार कर रहे थे कि वही पटरा लाया जाए और हम उस पार पहुंचें। ढलते हुए सूरज के साथ हमारे चेहरे भी उदास होते जा रहे थे।

Shambhunath Shukla(शंभुनाथ शुक्‍ल। वरिष्‍ठ पत्रकार। अमर उजाला में लंबे समय तक वरिष्‍ठ पदों पर रहे। अब अवकाशप्राप्‍त हैं। इन दिनों अपने पत्रकारीय दिनों के अनुभव फेसबुक पर साझा कर रहे हैं। उनसे http://www.facebook.com/messages/100000107608498 पर संपर्क किया जा सकता है।)

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