दस मिनट में मैगी, तो सेक्‍स टू मिनट नूडल्‍स की तरह क्‍यों?

♦ उमेश पंत

सेक्स सोसाइटी एंड शी (SEX SOCIETY AND SHE)… लखनऊ में इस नाम से कोई थिएटर शो है, पहले तो ये जानकर ही हैरानी हुई। साथी गौरव मस्तो श्रीवास्‍तव निमंत्रण पत्र देके गये थे। लखनऊ में थिएटर देखने का पहला अवसर था, इसलिए उत्साह भी बहुत था। संगीत नाटक अकादमी पहुंचे, तो वहां पहले से भोजपुरी महोत्सव के रंग बिखरे हुए थे। सुनने में आया कि भोजपुरी के चहेते गायक मनोज तिवारी कुछ घंटों में इस महोत्सव में शिरकत करने आ रहे हैं।

खैर ऑडिटोरियम पहुंचे, तो देखा कि पहले से काफी लोग वहां आ पहुंचे थे। कुछ ही देर में ऑडिटोरियम की तकरीबन सारी कुर्सियां भर चुकी थीं। उत्सुकता थी कि सेक्स जैसे विषय पर हो रही ये रंगमंचीय अभिव्यक्ति यौनिक मसलों को लेकर कट्टर माने जाने वाले इस देश के सबसे बड़े प्रदेश की राजधानी में किस सीमा तक अपनी बात कह पाएगी। और वो भी जब बात महिलाओं के यौनिक व्यवहार और उनकी यौनिक कुंठाओं पर हो रही हो।

परदा खुलता है तो एक युगल (माया और जय) हां-ना की सीमा को लांघते अंतरंग क्षणों की ओर बढ़ते दिखाई देता है, पर बात चुंबन पर आकर ठहर जाती है। यहां दर्शक के तौर पर आप पहली बार असहज महसूस करते हैं।

फिर बात एक मेडिटेशन सेंटर के मीडिएटर आलाप और एक महिला मीरा के बीच जा पहुंचती है। मीरा परेशान है, वजह नहीं जान पा रही। आलाप उसे समझाता है कि मानसिक अशांति की दो ही वजहें हैं – पहला हमारे भीतर की मरी इच्छाएं और दूसरा हमारे भीतर की अधूरी इच्छाएं। और इस अशांति से निजात के दो समाधान हैं। मरी हुई इच्छाओं को मन से बाहर कर देना और अधूरी इच्छाओं को पूरी कर लेना। चर्चा के कुछ देर बाद मीरा ये मानती है कि उसकी इस अशांति की वजह उसकी पूरी न हो पा रही यौन इच्छाएं हैं।

तीसरी सेटिंग एक ऑफिस की है, जहां जय जो कि सेक्स के मामले में लिबरल है, अपनी कलीग जेस से चर्चा कर रहा है।

धीरे-धीरे कहानी आगे बढ़ती है। और हर उस मसले पर खुलकर चर्चा होती है, जो एक आम भारतीय महिला की यौन इच्छा के अधिकार से जुड़ा है। माया जो जय के साथ शारीरिक संबंध बनाने से इसलिए मना कर देती है, क्योंकि उसे चुंबन तक ठीक से करना नहीं आता। नाटक इस बात पर सवाल उठाता है कि बात जब सेक्स की होती है, तो वहां महिला की संतुष्टि और इच्छाएं दरकिनार कर दी जाती हैं, कोई महिला अगर इस पर बात भी करे तो उसे चरित्रहीन घोषित कर दिया जाता है जबकि पुरुष अपने हिसाब से कभी धर्म के नाम पर, तो कभी रस्म रिवाज के नाम पर तो कभी बस अपनी संतुष्टि के लिए उसे प्रयोग करता रहा है।

जय फैसला लेता है कि वो औरतों की यौन इच्छाओं पर एक लेख लिखेगा और औरतों से बात करेगा कि उनका क्या मानना है। औरतों से हुई उसकी बातों को हम कविताओं के माध्यम से सुनते हैं।

इस नाटक की नकारात्मक चर्चाएं लोगों में ज्यादा हो रही हैं… कि नाटक वल्गर है, अश्लील है। लेकिन उस ऑडिटोरियम में मेरे ठीक आगे एक वाकया हुआ। एक बुजुर्ग दंपती नाटक के बीच में आये और मुझसे ठीक आगे खाली पड़ी सीट पर बैठ गये। पत्नी ने पति से कहा, अच्छा किया कि यहां आ गये। लेकिन मंच पर बात हो रही थी कि किस तरह से रुटीन की तरह सेक्स करना रिश्तों को बासी करता है… अगर ऑफिस के काम में, खाना बनाने में… हर जगह हम नये तरीके अपनाते हैं तो सेक्स में क्यूं नहीं। अब तो लोग मैगी बनाने में भी 10 मिनट लेते हैं फिर सेक्स टू मिनट नूडल्स की तरह क्यूं? ये सब देख के तकरीबन 55 साल की उस महिला ने लगभग 65 साल के अपने पति से झिझकते हुए कहा कि चलो चलते हैं यहां से। पति ने बिना मंच से नजर हटाये अपने बूढ़े हाथों से इशारा किया कि रुको। और फिर दोनों प्ले खत्म होने तक बैठे रहे और चुपचाप मंच पर हो रही बातें सुनते रहे। हो सकता है कि कल्चरल शॉक हो उनके लिए। कि कहीं वक्त बदल तो नहीं गया। इतना कि शिवलिंग के नीचे बनी रहने वाली पार्वती की योनि को नजरअंदाज करने पर लखनऊ के एक मंच में युवा तल्ख होते नजर आ रहे हैं। क्या इस बात पर कोई इतने खुले तौर पर चर्चा कर भी सकता है। उन बूढ़ी निगाहों में ये सवाल भले ही उठा हो, पर शायद उन्हें भी इसमें कुछ नाजायज नजर नहीं आया।

इस वाकये से ये तो समझा जा सकता है कि लोग इन विषयों पर असहज होकर ही सही बात करना चाहते हैं क्योंकि ये मसले केवल सेक्स से नही बल्कि हमारे रिश्तों से जुड़े हैं और इनके सामाजिक सरोकारों को आप नकार नहीं सकते। सेक्स का नाम जुड़ते ही आप इन विषयों को अश्लील कहकर सिरे से खारिज नहीं कर सकते। इन पर बात होना भी जरूरी है। हो भी रही है। होनी भी चाहिए।

अर्शना अजमत निर्देशित ये नाटक एक सर्वे पर आधारित है, जो ये बताता है कि देश की 70 फीसदी महिलाएं यौन असंतुष्टि की शिकार हैं। 47 फीसदी महिलाएं चाहती हैं कि सेक्स के दौरान उनकी इच्छाओं का भी खयाल रखा जाए।

नाटक की अच्छी बात ये है कि इसमें हिचकिचाहट नहीं है। दूसरा ये कि आदमियों को विलेन बनाकर नहीं परोसा गया है। बताया गया है कि जानबूझ कर ही नहीं, एक बड़ा वर्ग ऐसा है जो अनजाने ही महिलाओं की इन दबी हुई इच्छाओं को दरकिनार कर देता है। वो इच्छाएं जिनका पूरा होना उनका हक है। जिन पर बिना शर्म के खुलकर बात करना गुनाह नहीं है।

नाटक के बीच में एक-आध खिल्लियों के अलावा कोई कुछ नहीं बोला। बीच में कुछ तालियां बजी। अच्छा लगा कि लखनऊ वैचारिक दृष्टि से इतना आगे तो बढ़ा है कि वहां एक मंच पर ऐसे मसलों पर बात भी हो रही है और लोग उसे गंभीरता से ले भी रहे हैं, ज्यादा नहीं तो उस डेढ़ घंटे तक ही सही, किसी ने शुरुआत तो की। अर्शना अजमत के इस प्रयास को एक बहादुर प्रयास माना जाना चाहिए और इसके लिए उनका विरोध नहीं बल्कि उनकी सराहना की जानी चाहिए। साथ ही नाटक में भाग लेने वाले कलाकारों स्वेता सक्सेना, सिमरन गुप्ता, ऋषि राज मौर्या, प्रफुल्ल त्रिपाठी, शिष्टा और रिजवान हैदर की भी तारीफ करनी चाहिए, जिन्होंने उस नाटक में भाग लिया, जिसे एडल्ट और वल्गर कहकर रंगमंच के पुराने कलाकारों ने भाग लेने से मना कर दिया।

[नाटक के बाद मनोज तिवारी बाहर खुले मंच में आ पहुंचे थे। भोजपुरी को समर्पित कहा जा रहा ये मंच मुलायम सिंह यादव और समाजवादी पार्टी को समर्पित ज्यादा दिखा। कार्यक्रम के संचालक मंच पर मौजूद प्रतीक यादव की पत्नी और मुलायम सिंह की पुत्रवधू की तारीफें करते नहीं थक रहे थे। और मनोज तिवारी की तारीफों के तो उन्होंने मुफ्त के कई पुल बांध ही लिये थे। मनोज तिवारी आये, तो उन्होंने भी भोजपुरी के नाम पर संयोजक प्रभुनाथ यादव की तारीफों की झड़ि‍यां लगायीं। लोकगीतों को समर्पित एक मंच को राजनीतिक मंच में बदलते देखने का ये अनुभव कुछ खास नहीं जंचा। मनोज तिवारी गा रहे थे और पार्श्‍व में उनकी और ऑर्केस्‍ट्रा पार्टी की आवाज को छोड़कर मैं लौट आया।]

रात का तकरीबन नौ बज रहा था। संगीत नाटक अकादमी से बाहर निकला ही था कि मेनरोड पर एक रिक्शेवाले को अपने रिक्शे पर कपड़ा मारते हुए देखा। पूछा कि क्या वो अंबेडकर पार्क की तरफ जाएगा? मुझे इसी ओर जाना था। रिक्शेवाले ने मना कर दिया। तभी पीछे एक शख्स को साइकिल के साथ खड़ा पाया। वो शख्स अपनी साइकिल रोक के मेरी ओर देख रहा था। मेरे मुड़ने पर तकरीबन 40-45 साल के उस आदमी ने कहा कि “मैं भी चारबाग की तरफ जा रहा हूं। आप चाहो तो चल सकते हो।”

उस अजनबी आदमी को गौर से देखा। सफेद रंग का कुर्ता, जिस पर काले अक्षरों से शायद गायत्री मंत्र लिखा था। सलेटी रंग को छोड़ कर सफेदी की तरफ बढ़ते कुछ बड़े बाल। आखों में चौकोर फ्रेम का एक चश्मा। साइकिल के करियर पर बैठकर जाने का ये आमंत्रण रोचक लगा। कुछ ही देर में हम संगीत नाटक अकादमी के अहाते की दीवार से लगी सड़क से होकर अंबेडकर पार्क की तरफ जाने वाले रास्ते से गुजर रहे थे। बात निकली तो पता चला इनका नाम मेराज आलम है। मेराज पिछले 32 सालों से लोककलाओं पर काम कर रहे हैं। थिएटर, एक्टिंग से लेकर कठपुतली तक उन्होंने सारे काम किये हैं। लेकिन कठपुतली से उन्हें खासा लगाव है। बातों बातों में पता चला कि वो कठपुतली से जुड़ी कार्यशालाएं भी कराते हैं।

जैसे-जैसे बात बढ़ती जा रही थी, ये आदमी मेरे लिए रोचक होता जा रहा था। एक अजनबी जो अब से 10 मिनट पहले मेरी जिंदगी में दूर-दूर तक कहीं नहीं था, मेरे सामने उस साइकिल पर बैठा पैडल मारता हुआ लखनऊ के तकरीबन सबसे पॉश इलाके की उस चौड़ी सड़क पर हो रही इस यात्रा में अपनी जिंदगी के चिट्ठे खोल रहा था। और मैं सुन रहा था, सवाल पूछ रहा था। ऐसे जैसे कोई बच्चा किसी अनुभवी शख्स से कहानियां सुन रहा हो, किसी दूसरी दुनिया की।

चारबाग की तरफ जाने वाले रास्ते पर पहुंचे, तो हम रास्ता भटक चुके थे। मैं कठपुतलियों के उस संसार में डूबा हुआ था। वैसे भी भौगोलिक दृष्टि से मैं खुद को बहुत ज्यादा साक्षर नहीं मानता। अक्‍सर दिशाओं की गलतियां कर बैठता हूं। उस शख्स को ही खयाल आया कि हम गलत रास्ते पर आ गये हैं। साइकिल मोड़ी जा चुकी थी। अब हम दोनों पैदल चलते हुए कठपुतलियों के उस संसार की बातें कर रहे थे, जो वो आदमी पिछले कई सालों से लगभग रोज रचता रहा है। इस बीच मेरे भीतर का पत्रकार कुलांचे भर चुका था। मेरे फोन का रिकॉर्डर ऑन हो चुका था। मैं उस शख्स को बता चुका था कि मैं गांव कनेक्शन नाम के एक साप्ताहिक अखबार के लिए लिखता भी हूं।

एक आर्ट फॉर्म के तौर पर कठपुतलियों को कैसे बचाया जा सकता है, उनको बचाया जाना जरूरी है भी कि नहीं, वो शख्स कहां-कहां और कैसे-कैसे इस कला पर काम कर रहा है, कैसे अपनी रोजाना की एक नौकरी के बीच से वो कठपुतलियों के लिए वक्त निकाल पाता है, गोमती नदी के पुल से गुजरते, हाथियों से सराबोर पार्क के अहाते को पार करते, अंबेडकर पार्क की तरफ जाते इन तमाम मसलों पर हम बात करते रहे।

रात के साढ़े नौ बज रहे थे। लोहिया पार्क से लगे उस चौराहे के पास चबूतरे पे खड़ा मैं अजनबियत की ताजा-ताजा टूटी उस महीन दीवार को पार कर उस पैंतालीस साल के शख्स के साथ आइसक्रीम खा रहा था। वो साइकिल सवार आदमी खुश था। उसकी बातों में ये खुशी झलक रही थी। उसके चेहरे के उत्साह में उसके अनुभवों की तरावट थी, जिसके सामने उम्र और पसीना दोनों मात खा रहे थे।

मुझे विपुल खंड वापस आना था। उस शख्स का साइकिल चलाकर सिर्फ मेरे लिए उस ओर आना मुझे अच्छा नहीं लग रहा था। एक तकल्लुफ था, जो हम दोनों की उम्र के अंतर से उपजा था। पर अनुभव तकल्लुफों को भांपने में माहिर होते हैं। मुस्कुराते हुए मेराज आलम नाम के उस आदमी ने अपनी साइकिल अपने गंतव्य की विपरीत दिशा में, यानि मेरे गंतव्य की दिशा में घुमायी, पैडल पर पांव रखा और साइकिल पर चढ़ते हुए बोला – उम्र में भले ही ज्यादा दिखता हूं, पर जवानी अभी भी कम नहीं है। चलिए आपको घर तक छोड़ आता हूं। कुछ आग्रह अपने दायरे को पारकर अधिकार की ओर चले जाते हैं। एक घंटे की उस छोटी सी बातचीत में अधिकार समझ कर कही गयी उस बात ने इनकार की गुंजाइश नहीं छोड़ी। कुछ ही देर में मैं अपने गंतव्य के गेट पर था। वो शख्स मुस्कुराते हुए बोला – माशाअल्लाह अच्छी और खुली जगह पर रहते हैं आप। हसरत भरी निगाहों से एक नजर उस इलाके को देख कर और फिर अपनेपन से भरी निगाहों से मुझे देखकर वो साइकिल सवार शख्स फोन करने का वायदा देकर अपने गंतव्य की तरफ रवाना हो चुका था।

मैं सोच रहा था, “क्या मैं आपको छोड़ दूं” से लेकर “कल मैं आपको फोन करूंगा” तक का ये सफर तय करना इतना मुश्किल तो नहीं होता, फिर भी ऐसे सफर बार बार तय नहीं होते। इनके तय होने के लिए एक चीज जो सबसे जरूरी है, वो है संयोग। लखनऊ का ये दिन इस संयोग से गुजरता हुआ एक यादगार दिन में तब्दील हो चुका था।

[ लखनऊ डायरी ]

Umesh Pant(उमेश पंत। सजग चेतना के पत्रकार, सिनेकर्मी। सिनेमा और समाज के खास कोनों पर नजर रहती है। मोहल्‍ला लाइव, नयी सोच और पिक्‍चर हॉल नाम के ब्‍लॉग पर लगातार लिखते हैं। फिलहाल यूपी से ग्रामीण पाठकों के लिए निकलने वाले अखबार गांव कनेक्‍शन से जुड़े हैं और लखनऊ में रहते हैं। उनसे mshpant@gmail.com पर संपर्क किया जा सकता है।)

You may also like...

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *